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  • भारत के अति प्राचीन रहस्यमयी मंदिर, जिनकी अनसुलझी पहेलियों और अकल्पनीय चमत्कारों के सामने विज्ञान भी हुआ नतमस्तक

    भारत के अति प्राचीन रहस्यमयी मंदिर, जिनकी अनसुलझी पहेलियों और अकल्पनीय चमत्कारों के सामने विज्ञान भी हुआ नतमस्तक


    नई दिल्ली ।
    भारत की पहचान सदियों से उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और स्थापत्य कला के बेजोड़ उदाहरण माने जाने वाले प्राचीन मंदिरों से रही है। देश के विभिन्न भूभागों में स्थित कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जहां की परंपराएं और अनोखी विशेषताएं आज के आधुनिक वैज्ञानिक युग में भी कौतूहल का विषय बनी हुई हैं। इन मंदिरों से जुड़ी मान्यताएं न केवल श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा का प्रतीक हैं, बल्कि इनके निर्माण और चमत्कारों के पीछे छिपे रहस्यों को समझ पाना आज भी शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

    उत्तरी भारत के राजस्थान राज्य में स्थित कई प्रमुख मंदिर अपनी विशिष्ट परंपराओं के लिए जाने जाते हैं। बीकानेर के प्रसिद्ध देवी मंदिर में हजारों की संख्या में रहने वाले चूहों की मौजूदगी और उन्हें दिए जाने वाले प्रसाद की परंपरा अद्भुत मानी जाती है। इसी प्रकार धौलपुर क्षेत्र में चंबल नदी के निकट स्थित प्राचीन शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग के दिन में तीन बार रंग बदलने की मान्यता भक्तों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र है। दौसा जिले में स्थित हनुमान मंदिर में भी नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्ति और आध्यात्मिक शांति के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं।

    दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश में स्थित वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर की अपनी अलग भव्यता और धार्मिक महत्ता है। इस मंदिर परिसर से जुड़ी अनेक धार्मिक कल्पनाएं और प्राकृतिक ध्वनियों की अनुभूति श्रद्धालुओं को गहराई से प्रभावित करती है। असम के गुवाहाटी में नीलांचल पहाड़ी पर स्थित कामाख्या देवी का स्थल भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है, जहां प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं।

    तटीय राज्यों की बात करें तो गुजरात के अरब सागर तट पर स्थित शिव मंदिर ज्वार-भाटे की प्राकृतिक प्रक्रिया के कारण दिन में दो बार समुद्र के पानी में पूरी तरह जलमग्न हो जाता है और पानी उतरने पर पुनः स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता है। भावनगर तट के समीप स्थित एक अन्य शिव मंदिर में भी समुद्र की लहरें प्राकृतिक रूप से शिवलिंग का जलाभिषेक करती हैं, जहां भक्त केवल पानी का स्तर घटने पर ही पैदल पहुंचकर पूजा-अर्चना कर पाते हैं।

    मध्य प्रदेश के तटीय और सीमावर्ती जिलों में स्थित अनेक प्राचीन मंदिरों की महत्ता भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचानी जाती है। भिंड जिले में स्थित प्रसिद्ध हनुमान मंदिर से जुड़ी जनश्रुतियों के अनुसार श्रद्धालु असाध्य रोगों से राहत पाने की आस में यहां माथा टेकने आते हैं। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में भी ऐसे मंदिर मौजूद हैं, जहां शिवलिंग पर प्राकृतिक बिजली गिरने के बाद उसका पुनः जुड़ जाना, एक लाख छिद्रों वाले शिवलिंग का अस्तित्व होना अथवा कोणार्क के रथ रूपी सूर्य मंदिर के पहियों से सटीक समय का अनुमान लगाना जैसी अद्भुत विशेषताएं देखने को मिलती हैं।

    इन सभी स्थलों की ऐतिहासिकता, वास्तुकला और धार्मिक अनुष्ठान भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखते हैं। वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने कई बार इन घटनाओं के पीछे के भौतिक और वैज्ञानिक कारणों को समझने का प्रयास किया है, परंतु अनेक प्रश्नों के उत्तर आज भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो सके हैं। यही कारण है कि यह सभी स्थान न केवल आस्था के केंद्र हैं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान-विज्ञान परंपरा का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।

  • नर्मदा उफान पर, घाट-मंदिर जलमग्न; छोटे पुल-रपटे डूबे, जोहिला बांध के पांच गेट खुले

    नर्मदा उफान पर, घाट-मंदिर जलमग्न; छोटे पुल-रपटे डूबे, जोहिला बांध के पांच गेट खुले


    उमरिया।
    मंडला जिले में पिछले 24 घंटे से हो रही तेज बारिश के चलते नर्मदा नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ गया है। नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है। जलस्तर बढ़ने से नर्मदा किनारे स्थित मंदिर और घाट जलमग्न हो गए हैं। मंडला शहर का छोटा रपटा पुल भी पूरी तरह डूब गया है और पानी पुल के ऊपर से बह रहा है।

    नर्मदा में बढ़ते जलस्तर और तेज बहाव को देखते हुए प्रशासन ने नदी किनारे सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है। माहिष्मती घाट, सहस्रधारा सहित प्रमुख घाटों पर पुलिस बल तैनात किया गया है। लोगों को नदी के पास जाने, नहाने और जलमग्न पुल-पुलियों को पार करने से रोका जा रहा है।

    पांच-छह छोटे पुल और रपटे जलमग्न

    लगातार बारिश के कारण जिले के करीब पांच-छह छोटे पुल और रपटे भी जलमग्न होने की सूचना है। प्रशासन ने ऐसे स्थानों पर बैरिकेडिंग कर आवागमन बंद कराया है। चौकीदारों की तैनाती के साथ पुलिस और होमगार्ड की टीमें लगातार निगरानी कर रही हैं।

    जोहिला बांध के पांच गेट खुले

    उमरिया जिले में पिछले कई दिनों से रुक-रुककर हो रही बारिश के कारण जोहिला बांध का जलस्तर भी लगातार बढ़ रहा है। पानी की बढ़ती आवक को देखते हुए बांध प्रबंधन ने रविवार को इस मानसून में पहली बार एक साथ पांच गेट खोलकर पानी की निकासी शुरू की। गेट खुलने के बाद तेज बहाव के साथ पानी बाहर निकल रहा है।

    बांध प्रबंधन के अनुसार गेट क्रमांक दो को दो मीटर, तीन को तीन मीटर, चार को तीन मीटर, पांच को दो मीटर और छह को दो मीटर तक खोला गया है। पांचों गेट से कुल 12 मीटर पानी की निकासी की जा रही है। इससे करीब 50 हजार क्यूसेक पानी प्रति सेकंड की दर से बाहर निकल रहा है।

    बांध देखने पहुंच रहे लोग

    जोहिला बांध के पांच गेट एक साथ खोले जाने की सूचना के बाद आसपास के लोग बांध का नजारा देखने पहुंचने लगे हैं। पाली निवासी शिवम गुप्ता ने बताया कि इससे पहले एक और दो गेट खुले थे, लेकिन पांच गेटों से एक साथ पानी निकलते देखना अलग अनुभव है।

    माला गुप्ता ने बताया कि तेज बहाव के साथ बांध से निकलते पानी का दृश्य आकर्षक है। एक साथ पांच गेट खुलना आम तौर पर देखने को नहीं मिलता। हालांकि, बांध पर सुरक्षा कर्मी तैनात हैं और लोगों को पानी के तेज बहाव वाले क्षेत्र से दूर रहने की हिदायत दी जा रही है।

    सुरक्षा को लेकर प्रशासन सतर्क

    बांध के गेट खुलने के बाद लोगों की बढ़ती संख्या को देखते हुए सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की गई है। लोगों को पानी के नजदीक जाने से रोका जा रहा है। प्रशासन और बांध प्रबंधन ने लोगों से तेज बहाव वाले क्षेत्रों में नहीं जाने और सावधानी बरतने की अपील की है।

    प्रशासन ने नर्मदा के बढ़ते जलस्तर को देखते हुए भी लोगों से नदी और जलमग्न पुल-पुलियों से दूरी बनाए रखने को कहा है। संबंधित विभागों को स्थिति पर लगातार नजर रखने के निर्देश दिए गए हैं।

  • आस्था और तकनीक का बेजोड़ संगम: कहीं धड़कता है भगवान का दिल तो कहीं आता है साक्षात पसीना, जानें इन तीन रहस्यमयी मंदिरों की गाथा

    आस्था और तकनीक का बेजोड़ संगम: कहीं धड़कता है भगवान का दिल तो कहीं आता है साक्षात पसीना, जानें इन तीन रहस्यमयी मंदिरों की गाथा


    नई दिल्ली । भारत के दक्षिणी राज्यों में स्थित प्राचीन मंदिर अपनी वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्ता के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। लेकिन तमिलनाडु के तीन ऐसे विशिष्ट मंदिर भी हैं, जहाँ की मूर्तियां निर्जीव पत्थरों की होने के बावजूद इंसानों की तरह व्यवहार करती दिखाई देती हैं। इन विग्रहों में मानवीय धड़कन महसूस होने, भीषण गर्मी में साक्षात पसीना आने और चेहरे पर मूंछों के बाल प्राकृतिक रूप से बढ़ने के दावे किए जाते हैं। आधुनिक विज्ञान और शोधकर्ताओं के लिए यह चमत्कारी घटनाएं आज भी एक अबूझ पहेली बनी हुई हैं, जबकि श्रद्धालुओं के लिए यह ईश्वर की प्रत्यक्ष उपस्थिति का प्रमाण है।

    तमिलनाडु में स्थित चिदंबरम नटराज मंदिर भगवान शिव के सबसे पवित्र और प्रमुख धामों में से एक माना जाता है, जहाँ शिव जी नटराज स्वरूप में विराजमान हैं। इस मंदिर को लेकर वैज्ञानिक जगत और शोधकर्ताओं के बीच लंबे समय से अध्ययन जारी है। प्रामाणिक मान्यताओं के अनुसार यदि मंदिर की मुख्य विग्रह के हृदय वाले स्थान पर अत्यंत ध्यानपूर्वक महसूस किया जाए, तो वहाँ एक निरंतर धड़कन की ध्वनि सुनाई देती है। यह कंपन बिल्कुल किसी जीवित मनुष्य के हृदय की गति के समान प्रतीत होता है। विशेषज्ञों का एक वर्ग यह भी मानता है कि यह देवालय पृथ्वी के चुंबकीय केंद्र पर निर्मित है, जिससे यहाँ एक अत्यंत तीव्र और शक्तिशाली ऊर्जा का प्रवाह बना रहता है।

    रहस्य की इस कड़ी में अगला नाम तिरुनेलवेली के थिरुमालीरुंचोलई मंदिर का आता है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है। इस पावन परिसर में ग्रीष्म ऋतु के दौरान एक अत्यंत विस्मयकारी दृश्य देखने को मिलता है। जब बाहरी वातावरण का तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है, तब गर्भगृह के भीतर स्थापित भगवान विष्णु की पाषाण निर्मित मूर्ति को साक्षात पसीना आने लगता है। मूर्ति के मुखमंडल और शरीर पर स्वेद की छोटी-छोटी बूंदें स्पष्ट रूप से उभर आती हैं। इस अलौकिक दृश्य को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं और मंदिर के सेवादार प्रतिदिन अत्यंत आदर भाव से सूती वस्त्र की सहायता से इस जल को पोंछते हैं।

    तीसरा चमत्कार कोयंबटूर के निकट स्थित पेरूर पट्टेश्वरर मंदिर से जुड़ा हुआ है, जो अपनी प्राचीन कलाकृति के साथ-साथ एक विशेष मूर्ति के लिए चर्चा में रहता है। मंदिर परिसर में स्थापित एक विशिष्ट विग्रह की मूंछों के बाल समय के साथ प्राकृतिक रूप से बड़े होते जाते हैं। स्थानीय परंपराओं और पीढ़ियों से सेवा कर रहे पुजारियों के अनुसार, एक निश्चित समयावधि के पश्चात इन बालों को तराशना पड़ता है। पाषाण खंड पर इस तरह से बालों का विकास होना विज्ञान के सभी स्थापित नियमों को चुनौती देता है।

    वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार इन घटनाओं के पीछे पत्थरों की विशिष्ट प्रकृति, वातावरण की आर्द्रता, भौगोलिक स्थिति अथवा कोई अज्ञात भू-गर्भीय या रासायनिक प्रतिक्रिया उत्तरदायी हो सकती है। हालांकि, कड़े और नियंत्रित वातावरण के भीतर भी इन विसंगतियों का कोई ठोस वैज्ञानिक कारण अभी तक स्पष्ट नहीं किया जा सका है। हमारे पूर्वजों ने किस अदृश्य तकनीक और वैज्ञानिक चेतना के बल पर इन दिव्य संरचनाओं का निर्माण किया था, यह रहस्य आज भी इतिहास के गर्भ में छिपा हुआ है, लेकिन इन स्थलों के प्रति जनमानस की अगाध श्रद्धा निरंतर बनी हुई है।

  • हनुमान जयंती पर ग्वालियर में मंदिरों में उमड़े भक्‍त, रोकड़िया सरकार को लगाया 5100 लड्डुओं का भोग

    हनुमान जयंती पर ग्वालियर में मंदिरों में उमड़े भक्‍त, रोकड़िया सरकार को लगाया 5100 लड्डुओं का भोग


    ग्वालियर । ग्वालियर में हनुमान जयंती के अवसर पर श्रद्धा और भक्ति का माहौल देखने को मिल रहा है। शहर के प्रमुख मंदिरों में सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें लगी हुई हैं। श्रद्धालु भगवान हनुमान के दर्शन कर पूजा-अर्चना के माध्यम से आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं।

    सिंधिया रियासत कालीन छतरी मैदान स्थित रोकड़िया हनुमान मंदिर में विशेष आयोजन किए जा रहे हैं। यहां तड़के 4 बजे से अभिषेक और पूजन की शुरुआत हुई, जिसके बाद भगवान को चोला चढ़ाकर भव्य श्रृंगार किया गया और मंदिर के पट खोले गए। मंदिर में सुंदरकांड पाठ जारी है और भगवान को 5100 लड्डुओं का भोग अर्पित किया गया, जिसे प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में वितरित किया जा रहा है। साथ ही फूल बंगला और छप्पन भोग जैसी आकर्षक व्यवस्थाएं भी की गई हैं।

    शहर के मंशापूर्ण हनुमान मंदिर, जो करीब 300 वर्ष पुराना माना जाता है, वहां भी सुबह से भारी भीड़ देखी जा रही है। श्रद्धालु दूर-दूर तक कतारों में लगकर बाबा के दर्शन कर रहे हैं। हनुमान जयंती पर शहर से करीब 45 किलोमीटर दूर घाटीगांव स्थित धुआं वाले हनुमान मंदिर में मेले का आयोजन किया गया है, जहां बड़ी संख्या में भक्त पहुंच रहे हैं। इसी तरह जौरासी घाटी में स्थित जौरासी हनुमान मंदिर पर भी सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है।

    वहीं बहोड़ापुर धाम मंदिर में बुधवार से अखंड रामायण पाठ जारी है, जिसका समापन गुरुवार शाम को होगा। यहां बाबा को परंपरा के अनुसार सोने के वर्क वाला चोला अर्पित किया गया है, जिससे मंदिर में भक्ति का विशेष वातावरण बना हुआ है।

  • स्टेन स्वामी का मेमोरियल पर दिए बयान पर फ‍िर चर्चा में आए जस्‍ट‍िस स्‍वाम‍िनाथन ?

    स्टेन स्वामी का मेमोरियल पर दिए बयान पर फ‍िर चर्चा में आए जस्‍ट‍िस स्‍वाम‍िनाथन ?

    चैन्‍नई। तमिलनाडु में मंदिर में दीप जलाने के मुद्दे को लेकर राज्य सरकार और केंद्र में विपक्षी पार्टियों के निशाने पर आए जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन ने एक और अहम फैसला सुनाया है। मद्रास हाई कोर्ट में जस्टिस स्वामीनाथन ने 1755 में अंग्रेजों के खिलाफ लड़े नथम कनवाई युद्ध की याद में स्मारक स्तूप बनाने का रास्ता साफ कर दिया है।
    यह फैसला 18वीं सदी में गुलामी के दौर में भारतीयों के प्रतिरोध की एक प्रेरक इतिहास को उदाहरण बनाता है।

    जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन की तरफ से यह फैसला नथम के तहसीलदार द्वारा इस स्मारक को अनुमति न दिए जाने के बाद आया है। तहसीलदार द्वारा अनुमति न मिलने के बाद एक याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में रिट दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस स्वामीनाथन ने इस बात पर चिंता जताई कि आज की पीढ़ी को भारत के औपनिवेशिक शासन का इतिहास पता नहीं है, न ही उन्हें इस गुलामी से मुक्त कराने के लिए लड़ी गई लड़ाइयों के बारे में ही जानकारी है।

    जस्टिस ने कहा, “राज्य में अगर स्टैन स्वामी की याद में पत्थर का स्तंभ लगाया जा सकता है, उसके लिए अनुमति कि आवश्यकता नहीं पड़ी, तो निश्चित रूप से नथन कनवाई युद्ध की स्मृति में स्तूप स्थापित करने किए भी किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।”

    गौरतलब है कि अदालत ने जिन स्टेन स्वामी का जिक्र हुआ है वह जेसुइट पादरी और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता थे। इनका नाम भीमा कोरेगांव में भड़की हिंसा से भी जोड़ा जाता है, 2021 में इनकी मौत के बाद मद्रास हाई कोर्ट ने उनकी याद में एक स्मृति स्तंभ बनाने की अनुमति दी थी।
    क्या हुआ था नथम कनवाई युद्ध में?

    इस स्मारक को बनाने के लिए याचिका लेकर आए वकील ने तथ्य रखा कि वर्ष 1755 में नथम कनवाई इलाके में मेलूर कल्लर समुदाय और ब्रिटिश सेना के बीच में एक भीषण युद्ध हुआ था। इस युद्ध में कल्लर समुदाय विजयी रहा था। याचिकाकर्ता के मुताबिक यह युद्ध कोइलकुड़ी के तिरुमोगुर मंदिर की वजह से हुआ था। इस मंदिर से ब्रिटिश सैनिकों ने कर्नल अलेक्जेंडर हेरॉन के नेतृत्व में पीतल की मूर्तियां और अन्य कीमती सामान लूट लिया था। इसके बाद जुटे कल्लर समुदाय ने युद्ध के जरिए इन मूर्तियों को वापस पा लिया।