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  • देश में बनेगा संक्रामक रोगों की जांच का मजबूत नेटवर्क, अगले 5 साल में 732.304 करोड़ रुपये खर्च करेगी सरकार

    देश में बनेगा संक्रामक रोगों की जांच का मजबूत नेटवर्क, अगले 5 साल में 732.304 करोड़ रुपये खर्च करेगी सरकार


    नई दिल्ली।
    देश में नई और तेजी से फैलने वाली संक्रामक बीमारियों (Infectious Disease) की पहचान अब दूरदराज के इलाकों में भी पहले से जल्दी हो सकेगी। सरकार (Government) ने अगले पांच साल में 732.304 करोड़ रुपये से देश के हर हिस्से में वायरल बीमारियों (Viral Diseases) की जांच के लिए नेटवर्क बनाने का फैसला लिया है। केंद्र सरकार उन इलाकों में नई प्रयोगशालाएं (New Laboratories) स्थापित करने पर जोर दे रही है, जहां अभी संक्रामक बीमारियों की उन्नत जांच की पर्याप्त सुविधा नहीं है।

    अब तक इस नेटवर्क में मेडिकल कॉलेजों और शोध संस्थानों की बड़ी भूमिका रही है। अब सरकार व्यवस्था को जिला स्तर तक ले जाने की संभावना पर काम कर रही है। हालांकि, भी संख्या तय नहीं हुई है। स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश में 167 वायरस अनुसंधान एवं निदान प्रयोगशालाएं काम कर रही हैं।

    सीमावर्ती इलाकों पर नजर
    सरकार दूरदराज और कम सुविधा वाले क्षेत्रों को लेकर खासतौर पर चिंतित है। पूर्वोत्तर राज्यों, लद्दाख और लक्षद्वीप जैसे इलाकों में अब भी जांच सुविधा के विस्तार की जरूरत बताई गई है। इन क्षेत्रों में संस्थानों की उपलब्धता कम होने पर मौजूदा नियमों में विशेष प्रावधान करने की सिफारिश की गई है। स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के अनुसार, इन क्षेत्रों में प्रयोगशालाओं के लिए प्रस्ताव मिल रहे हैं। लेह, दादरा एवं नगर हवेली और नागालैंड के प्रस्ताव फिलहाल विचाराधीन हैं।

  • विमानन सुरक्षा पर मंडराया नशीले पदार्थों का खतरा अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के क्रू मेंबर्स की डोप टेस्टिंग बढ़ाने की मांग

    विमानन सुरक्षा पर मंडराया नशीले पदार्थों का खतरा अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के क्रू मेंबर्स की डोप टेस्टिंग बढ़ाने की मांग

    नई दिल्ली । फुकेत से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की उड़ान में हुई हालिया घटना के बाद देश के नागरिक उड्डयन क्षेत्र में सुरक्षा और जांच मानकों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विमान के पायलट के नशीले पदार्थों के शुरुआती डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाए जाने के बाद विमानन नियामक ने सख्त कदम उठाने के संकेत दिए हैं।

    विमानन विशेषज्ञों के अनुसार थाईलैंड और नीदरलैंड जैसे देशों में कुछ पदार्थों की कानूनी सुलभता एयरलाइंस कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। शराब की उपस्थिति जांचने के लिए नियमित ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट उपलब्ध हैं, लेकिन अन्य साइकोएक्टिव पदार्थों का परीक्षण अपेक्षाकृत जटिल प्रक्रिया माना जाता है।

    अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन के दिशा-निर्देशों के मुताबिक किसी भी नशीले पदार्थ के प्रभाव में विमान का संचालन यात्रियों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकता है। ऐसे पदार्थों का असर शरीर में लंबे समय तक बना रहता है जिससे चालक दल की निर्णय क्षमता प्रभावित हो सकती है।

    वर्तमान में नागरिक उड्डयन महानिदेशालय के नियमों के तहत सभी अनुसूचित वाणिज्यिक एयरलाइंस को अपने कम से कम 10 प्रतिशत क्रू मेंबर्स और एयर ट्रैफिक कंट्रोलर्स का वार्षिक रूप से रैंडम डोप टेस्ट कराना अनिवार्य है। मध्य प्रदेश सहित देश भर के प्रमुख हवाई अड्डों पर अब इन नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जा रहा है।

    विमानन अधिकारियों का मानना है कि केवल स्व-घोषणा या नशामुक्ति अभियानों के भरोसे इस समस्या से नहीं निपटा जा सकता। इसके लिए रैंडम डोप जांच की आवृत्ति बढ़ाने और नियमों को अधिक कठोर बनाने की आवश्यकता जताई जा रही है ताकि उड़ानों के दौरान यात्रियों की सुरक्षा पूरी तरह से सुनिश्चित की जा सके।

    नियामक संस्थाएं अब चिकित्सा अधिकारियों के साथ मिलकर परीक्षण प्रक्रियाओं को और अधिक सटीक बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। संदिग्ध मामलों में कानूनी कार्रवाई और लाइसेंस निलंबन जैसे कड़े प्रावधान लागू करने पर भी विचार किया जा रहा है।

  • मेटा के एआई मॉडल ने टेस्टिंग के दौरान बाहरी सिस्टम में लगाई सेंध, इंटरनेट कनेक्शन की गड़बड़ी बनी वजह

    मेटा के एआई मॉडल ने टेस्टिंग के दौरान बाहरी सिस्टम में लगाई सेंध, इंटरनेट कनेक्शन की गड़बड़ी बनी वजह

    नई दिल्ली । आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती क्षमताओं के बीच एक नया मामला सामने आया है, जिसने एआई सुरक्षा और परीक्षण प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। मेटा ने खुलासा किया है कि उसके एक एआई मॉडल ने साइबर सिक्योरिटी परीक्षण के दौरान अनजाने में इंटरनेट तक पहुंच बना ली और इसके बाद एक बाहरी सर्विस सिस्टम की सुरक्षा कमजोरी का फायदा उठाकर उसमें अनधिकृत प्रवेश कर लिया। हालांकि कंपनी ने स्पष्ट किया है कि यह घटना परीक्षण के दौरान हुई तकनीकी गड़बड़ी का परिणाम थी और इसकी विस्तृत जांच जारी है।

    कंपनी के अनुसार यह घटना उसके हाल ही में जारी किए गए एआई मॉडल ‘म्यूज स्पार्क 1.1’ के परीक्षण के दौरान हुई। परीक्षण के लिए तैयार किए गए विशेष वातावरण में एक गलत कॉन्फिगरेशन के कारण मॉडल इंटरनेट से कनेक्ट हो गया। सामान्य परिस्थितियों में इस प्रकार के परीक्षण पूरी तरह नियंत्रित और सीमित नेटवर्क पर किए जाते हैं, लेकिन तकनीकी त्रुटि के चलते मॉडल बाहरी नेटवर्क तक पहुंच गया। इसके बाद उसने एक थर्ड पार्टी सर्विस में मौजूद सुरक्षा कमजोरी का उपयोग करते हुए अनधिकृत पहुंच प्राप्त कर ली।

    मेटा ने कहा कि परीक्षण प्रक्रिया एक स्वतंत्र साइबर सिक्योरिटी पार्टनर के सहयोग से संचालित की जा रही थी। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि तकनीकी सेटअप में हुई कॉन्फिगरेशन संबंधी गलती के कारण यह स्थिति बनी। कंपनी ने जोर देकर कहा कि यह किसी जानबूझकर किए गए साइबर हमले का मामला नहीं था, बल्कि परीक्षण वातावरण में हुई चूक के कारण उत्पन्न हुई अप्रत्याशित घटना थी। पूरे घटनाक्रम की विस्तृत समीक्षा की जा रही है और सभी तथ्य सामने आने के बाद विस्तृत रिपोर्ट जारी की जाएगी।

    यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब दुनिया भर की प्रमुख एआई कंपनियां अधिक सक्षम और स्वायत्त मॉडल विकसित करने की दिशा में तेजी से काम कर रही हैं। पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान अन्य बड़ी एआई कंपनियों ने भी परीक्षण के दौरान अपने मॉडल्स द्वारा बाहरी सिस्टम तक अनपेक्षित पहुंच बनाने जैसी घटनाओं की जानकारी साझा की थी। इन घटनाओं ने यह सवाल और गहरा कर दिया है कि अत्यधिक सक्षम एआई मॉडल्स के परीक्षण के लिए वर्तमान सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त है या नहीं।

    साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक एआई एजेंट अब केवल निर्देशों का पालन करने तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि वे नेटवर्क संरचना, सिस्टम की कमजोरियों और संभावित सुरक्षा खामियों की पहचान करने में भी पहले से अधिक सक्षम हो रहे हैं। यदि परीक्षण वातावरण पूरी तरह सुरक्षित और अलग-थलग न हो तो इस प्रकार की घटनाएं भविष्य में बड़े जोखिम का कारण बन सकती हैं। यही वजह है कि नियंत्रित परीक्षण ढांचे, मजबूत नेटवर्क आइसोलेशन और बहुस्तरीय सुरक्षा उपायों की आवश्यकता लगातार बढ़ती जा रही है।

    घटना के बाद एआई सुरक्षा मानकों और परीक्षण प्रक्रियाओं की समीक्षा की मांग भी तेज हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि नई पीढ़ी के एआई मॉडल्स की बढ़ती क्षमताओं को देखते हुए केवल पारंपरिक सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। कंपनियों को अधिक कठोर परीक्षण प्रोटोकॉल, सुरक्षित नेटवर्क संरचना और स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट अपनाने होंगे ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके। फिलहाल मेटा पूरे मामले की जांच में जुटा है और अंतिम निष्कर्ष आने के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।

  • पंचकुला के रामगढ़ रेंज में DRDO का हाई-पावर बम परीक्षण, 2 किमी क्षेत्र ‘स्प्लिंटर डेंजर जोन’ घोषित

    पंचकुला के रामगढ़ रेंज में DRDO का हाई-पावर बम परीक्षण, 2 किमी क्षेत्र ‘स्प्लिंटर डेंजर जोन’ घोषित

    नई दिल्ली । हरियाणा के पंचकुला जिले में सुरक्षा और वैज्ञानिक परीक्षण से जुड़ी एक महत्वपूर्ण गतिविधि के तहत रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) 31 मई को रामगढ़ रेंज में हाई-पावर बम का परीक्षण करने जा रहा है। इस परीक्षण को लेकर स्थानीय प्रशासन ने पूरी तैयारी कर ली है और आसपास के गांवों के लिए विशेष सुरक्षा एडवाइजरी जारी की गई है। यह परीक्षण DRDO की प्रतिष्ठित प्रयोगशाला टर्मिनल बैलिस्टिक्स अनुसंधान प्रयोगशाला द्वारा किया जा रहा है, जो देश में हथियारों, विस्फोटकों और गोला-बारूद की जांच एवं विकास से जुड़ी प्रमुख इकाई मानी जाती है।

    प्रशासन द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार यह परीक्षण पूरी तरह से नियंत्रित परिस्थितियों में किया जाएगा और इसका उद्देश्य रक्षा प्रणाली को और अधिक मजबूत एवं सुरक्षित बनाना है। परीक्षण के दौरान संभावित खतरे को देखते हुए रामगढ़ रेंज के आसपास के लगभग दो किलोमीटर के दायरे को ‘स्प्लिंटर डेंजर जोन’ घोषित किया गया है। इसका मतलब है कि इस क्षेत्र में बम विस्फोट के दौरान निकलने वाले टुकड़े और प्रभावी दबाव से किसी भी तरह की जनहानि या नुकसान से बचाव के लिए प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा।

    स्थानीय अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि परीक्षण के दौरान बम के टुकड़े लगभग 1.5 किलोमीटर की ऊंचाई तक जा सकते हैं, इसलिए सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। इस वजह से प्रभावित क्षेत्र के सभी गांवों को अलर्ट पर रखा गया है और लोगों से अपील की गई है कि परीक्षण के निर्धारित समय के दौरान वे अपने घरों के अंदर ही रहें और किसी भी प्रकार की खुले स्थानों पर आवाजाही से बचें। प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह एक नियमित और वैज्ञानिक परीक्षण प्रक्रिया का हिस्सा है, इसलिए घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है।

    सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने के लिए पूरे क्षेत्र में कड़ी निगरानी की जाएगी और भारतीय वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी भी इस परीक्षण की मॉनिटरिंग के लिए मौजूद रहेंगे। सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित कर पूरे क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित बनाया गया है ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय स्थिति उत्पन्न न हो।

    प्रशासन ने विशेष रूप से भानू और बिल्ला गांवों के निवासियों को सावधानी बरतने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा आसरेवाली, नाग्गल, मोगीनंद, किशनगढ़ और रामगढ़ नगर परिषद क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अन्य गांवों के लोगों को भी सतर्क रहने और अनावश्यक आवाजाही से बचने की सलाह दी गई है। अधिकारियों ने साफ किया है कि यह परीक्षण देश की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के उद्देश्य से किया जा रहा है और इसमें सभी सुरक्षा मानकों का पूरी तरह पालन किया जाएगा।

    स्थानीय प्रशासन ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और केवल आधिकारिक दिशा-निर्देशों का पालन करने की अपील की है। पूरे क्षेत्र में सुरक्षा बलों की तैनाती और निगरानी व्यवस्था सुनिश्चित कर दी गई है ताकि परीक्षण प्रक्रिया शांतिपूर्ण और सुरक्षित तरीके से पूरी हो सके।