Tag: tiger conservation

  • कभी MP से बाघ मांग रहा था छत्तीसगढ़, अब खुद पहुंच रहे टाइगर और बढ़ा रहे कुनबा; अचानकमार बना नई उम्मीद का केंद्र

    कभी MP से बाघ मांग रहा था छत्तीसगढ़, अब खुद पहुंच रहे टाइगर और बढ़ा रहे कुनबा; अचानकमार बना नई उम्मीद का केंद्र


    छत्तीसगढ़ कभी बाघों की कमी से जूझ रहे छत्तीसगढ़ के जंगलों में अब टाइगरों की दहाड़ फिर सुनाई दे रही है। खास बात यह है कि इसके पीछे किसी बड़े ट्रांसलोकेशन अभियान से ज्यादा प्राकृतिक जंगलों और वन्यजीव कॉरिडोर की भूमिका सामने आई है। मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ कान्हा और पेंच टाइगर रिजर्व से निकलकर बाघ प्राकृतिक रास्तों से छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिजर्व तक पहुंचे और अब वहीं अपना क्षेत्र बनाकर प्रजनन कर रहे हैं। इससे छत्तीसगढ़ में बाघों की आबादी बढ़ाने की उम्मीद मजबूत हुई है।

    एक समय ऐसा था जब छत्तीसगढ़ को अपने जंगलों में बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश से बाघ लेने की जरूरत महसूस हुई थी। इसके लिए बाघों को दूसरे राज्यों से लाने की चर्चा भी हुई थी लेकिन अब प्राकृतिक रूप से पहुंचे बाघ ही छत्तीसगढ़ के जंगलों में नया कुनबा तैयार कर रहे हैं। यही वजह है कि फिलहाल मध्य प्रदेश से बाघ लाने के प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है।

    अचानकमार टाइगर रिजर्व में बांधवगढ़ से पहुंची बाघिन झुमरी इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल बनी है। करीब 400 किलोमीटर का सफर तय कर झुमरी वर्ष 2021 में बांधवगढ़ से अचानकमार पहुंची थी। यहां उसने अपना क्षेत्र बनाया और अब तक तीन बार में सात शावकों को जन्म दे चुकी है। हाल ही में उसके फिर चार शावकों को जन्म देने की जानकारी सामने आई है। झुमरी के कारण अचानकमार में बाघों की प्राकृतिक आबादी बढ़ाने की उम्मीद को नई मजबूती मिली है।

    मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ पहुंचने वाले बाघों में केवल झुमरी ही नहीं है। वर्ष 2023 में कान्हा से टी-200 नाम का बाघ अचानकमार पहुंचा था। पेंच से आई गंगा नाम की बाघिन ने भी यहां अपना कुनबा बढ़ाने में योगदान दिया। इसके अलावा मध्य प्रदेश से घायल अवस्था में पहुंची एक बाघिन को आशा नाम दिया गया। इन बाघों और बाघिनों की मौजूदगी ने अचानकमार के जंगलों में बाघों की आबादी के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया है।

    आंकड़ों पर नजर डालें तो अचानकमार में बाघों की संख्या लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। वर्ष 2010 में यहां केवल एक बाघ दर्ज किया गया था। 2014 में यह संख्या बढ़कर तीन हुई और 2018 में पांच बाघ दर्ज किए गए। अब हालिया निगरानी में यहां 18 बाघों की मौजूदगी का पता चला है। वहीं छत्तीसगढ़ में वर्ष 2022 में 17 बाघ दर्ज किए गए थे जबकि अप्रैल 2025 तक राज्य में बाघों की संख्या बढ़कर 35 हो गई।

    वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक इस बदलाव में मध्य प्रदेश के टाइगर रिजर्व से प्राकृतिक रूप से होने वाला बाघों का मूवमेंट बेहद महत्वपूर्ण है। अचानकमार टाइगर रिजर्व की फील्ड डायरेक्टर प्रियंका पांडेय के अनुसार मध्य प्रदेश से पहुंचे बाघ और बाघिनों ने यहां प्रजनन कर आबादी बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।

    हालांकि बाघों के इस प्राकृतिक आवागमन को बनाए रखना आसान नहीं है। बांधवगढ़ कान्हा और पेंच से अचानकमार तक आने वाले बाघों को जंगलों के बीच सुरक्षित कॉरिडोर की जरूरत होती है। रास्ते में इंसानी बस्तियां सड़कें और दूसरी बाधाएं उनके लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं। बाघों की आबादी को लंबे समय तक स्थायी रूप से बढ़ाने के लिए इन प्राकृतिक कॉरिडोर को सुरक्षित रखना जरूरी होगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों के बीच जीन पूल का प्राकृतिक आदान प्रदान भी वन्यजीव संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है। यदि जंगलों के बीच संपर्क टूटता है तो बाघों की आवाजाही प्रभावित होगी और भविष्य में आनुवंशिक विविधता पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बीच मौजूद प्राकृतिक वन गलियारों का संरक्षण दोनों राज्यों में बाघों की आबादी के लिए बेहद अहम है।

    छत्तीसगढ़ के जंगलों में लौटती बाघों की दहाड़ इसलिए भी खास है क्योंकि यह संरक्षण की उस सफलता को दिखाती है जिसमें प्रकृति को अपना रास्ता देने पर वन्यजीव खुद नए क्षेत्रों तक पहुंचकर अपना कुनबा बढ़ा सकते हैं। अब चुनौती इस प्राकृतिक रास्ते को सुरक्षित रखने की है ताकि मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ तक बाघों की यह आवाजाही भविष्य में भी जारी रहे।

  • पेंच टाइगर रिजर्व में वन्यजीव संरक्षण की बड़ी तैयारी, कुत्तों का वैक्सीनेशन कर टाला खतरा

    पेंच टाइगर रिजर्व में वन्यजीव संरक्षण की बड़ी तैयारी, कुत्तों का वैक्सीनेशन कर टाला खतरा


    सिवनी, मध्यप्रदेश: सिवनी जिले के प्रसिद्ध पेंच टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों, खासकर बाघों को एक गंभीर खतरे से बचाने के लिए बड़ा अभियान शुरू किया जा रहा है। बफर जोन के 120 गांवों में पाए गए करीब 1560 आवारा श्वानों का वैक्सीनेशन किया जाएगा, ताकि खतरनाक कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) को फैलने से रोका जा सके।

    वन विभाग ने यह कदम तब उठाया है जब पड़ोसी कान्हा टाइगर रिजर्व में इसी वायरस के कारण पांच बाघों की मौत की पुष्टि हुई थी। इसके बाद पेंच प्रबंधन पूरी तरह अलर्ट मोड में आ गया है, क्योंकि दोनों टाइगर रिजर्व के बीच वन्यजीव कॉरिडोर होने के कारण बाघों की आवाजाही लगातार बनी रहती है।

    पार्क प्रबंधन ने वन रक्षकों की मदद से बफर क्षेत्र के गांवों में सर्वे कराया, जिसमें सिवनी जिले के 80 और छिंदवाड़ा जिले के 40 गांव शामिल हैं। सर्वे में कुल 1560 आवारा कुत्तों की पहचान की गई है, जिन्हें अब चरणबद्ध तरीके से टीका लगाया जाएगा। हालांकि, अभी यह तय नहीं हो पाया है कि वैक्सीनेशन का काम कौन करेगा, लेकिन इसके लिए एनजीओ, पशु चिकित्सा विभाग और वाइल्डलाइफ हेल्थ संस्थानों से सहयोग लेने की योजना बनाई जा रही है।

    कैनाइन डिस्टेंपर वायरस एक अत्यंत संक्रामक बीमारी है, जो मुख्य रूप से कुत्तों और अन्य मांसाहारी वन्यजीवों को प्रभावित करती है। यह बीमारी बाघ, तेंदुआ, लोमड़ी, भेड़िया और लकड़बग्घा जैसे जानवरों तक भी फैल सकती है। संक्रमित आवारा कुत्ते जंगल के आसपास घूमते हुए इस वायरस को वन्यजीवों तक पहुंचा देते हैं, जिससे बड़ी वन्यजीव क्षति का खतरा बढ़ जाता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, इस बीमारी के लक्षणों में सांस लेने में कठिनाई, लगातार खांसी, उल्टी-दस्त, कमजोरी, शरीर कांपना और चलने में लड़खड़ाहट शामिल हैं। गंभीर स्थिति में यह जानलेवा साबित हो सकती है।

    वन विभाग के सामने इस अभियान में बजट की चुनौती भी है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही वैक्सीनेशन कार्य शुरू कर दिया जाएगा। पेंच टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर पुनीत गोयल ने बताया कि योजना तैयार है और जल्द ही जमीनी स्तर पर काम शुरू होगा।

    यह पहल न केवल बाघों की सुरक्षा के लिए अहम है, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।