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  • पुजारी से अलग अफसर संभालते हैं प्रशासन जानिए बड़े मंदिरों में कैसे चलता है CEO सिस्टम

    पुजारी से अलग अफसर संभालते हैं प्रशासन जानिए बड़े मंदिरों में कैसे चलता है CEO सिस्टम


    नई दिल्ली। अयोध्या के राम मंदिर में मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी CEO की नियुक्ति के बाद मंदिर प्रशासन की व्यवस्था एक बार फिर चर्चा में आ गई है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की अहम बैठक में रिटायर्ड एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्र को ट्रस्ट का पहला CEO नियुक्त करने को मंजूरी दी गई है। इसके साथ ही राम मंदिर उन प्रमुख धार्मिक संस्थानों की श्रेणी में शामिल हो गया है जहां धार्मिक गतिविधियों के साथ प्रशासनिक जिम्मेदारियों को अलग स्तर पर संभालने की व्यवस्था है।

    देश के कई बड़े और प्रसिद्ध मंदिरों में पहले से ही इसी तरह का प्रशासनिक ढांचा मौजूद है। कहीं एग्जीक्यूटिव ऑफिसर तो कहीं चीफ एडमिनिस्ट्रेटर जैसे पदों पर अधिकारी रोजमर्रा के कामकाज की जिम्मेदारी संभालते हैं। इसका उद्देश्य बड़े स्तर पर आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं से लेकर वित्तीय व्यवस्था सुरक्षा स्वच्छता और मंदिर की संपत्तियों के प्रबंधन तक सभी कामों को व्यवस्थित तरीके से संचालित करना होता है।

    आंध्र प्रदेश का तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम इस व्यवस्था का बड़ा उदाहरण है। यहां मुख्य प्रशासनिक अधिकारी को CEO के बजाय एग्जीक्यूटिव ऑफिसर कहा जाता है। यही अधिकारी मंदिर प्रशासन के रोजमर्रा के संचालन की जिम्मेदारी संभालता है। उसके साथ ज्वाइंट एग्जीक्यूटिव ऑफिसर वित्त और लेखा से जुड़े अधिकारी मुख्य अभियंता तथा सुरक्षा से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी काम करते हैं। इस पूरी व्यवस्था में बोर्ड नीतिगत फैसलों से जुड़ी भूमिका निभाता है जबकि अधिकारी उन फैसलों को जमीन पर लागू कराने का काम करते हैं।

    उत्तराखंड के बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के प्रशासन में भी CEO की अहम भूमिका है। बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अंतर्गत दोनों प्रमुख धामों की व्यवस्थाएं संचालित होती हैं। समिति में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष जैसे पदों के साथ CEO का प्रशासनिक ढांचा भी मौजूद है। CEO के अधीन अलग-अलग अधिकारी मंदिर व्यवस्था से जुड़े कार्यों को देखते हैं। यहां भी धार्मिक परंपराओं और प्रशासनिक कामकाज के बीच जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन देखने को मिलता है।

    ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर में पद का नाम CEO नहीं बल्कि चीफ एडमिनिस्ट्रेटर है। यह अधिकारी मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था में केंद्रीय भूमिका निभाता है। उसके जिम्मे मंदिर की संपत्ति श्रद्धालुओं की सुविधाएं साफ-सफाई अनुशासन सुरक्षा और धन तथा आभूषणों की सुरक्षित देखरेख जैसे महत्वपूर्ण काम होते हैं। कानून के तहत चीफ एडमिनिस्ट्रेटर मंदिर प्रबंध समिति के सचिव और मुख्य कार्यकारी अधिकारी की भूमिका भी निभाता है।

    जम्मू स्थित माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड में भी CEO का पद मौजूद है। यहां बोर्ड नीतिगत स्तर पर फैसले करता है जबकि CEO और उनकी टीम श्रद्धालुओं की सुविधाओं यात्रा व्यवस्था सुरक्षा और रोजमर्रा के प्रशासन को संचालित करती है।

    दरअसल बड़े मंदिरों में CEO जैसी व्यवस्था का मकसद धार्मिक परंपराओं को बदलना नहीं बल्कि विशाल स्तर पर होने वाले प्रशासनिक काम को पेशेवर तरीके से चलाना है। लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही दान और चढ़ावे का प्रबंधन सुरक्षा साफ-सफाई तकनीकी व्यवस्था और मंदिर की संपत्तियों की देखरेख जैसे कामों के लिए एक मजबूत प्रशासनिक ढांचा जरूरी होता है। अयोध्या के राम मंदिर में CEO की नियुक्ति के बाद अब इस व्यवस्था को लेकर देशभर में चर्चा तेज हो गई है।

  • तिरुपति मंदिर में नकली घी के बाद एक और घोटाला… पॉलिस्टर शॉल को बना दिया 100% सिल्क

    तिरुपति मंदिर में नकली घी के बाद एक और घोटाला… पॉलिस्टर शॉल को बना दिया 100% सिल्क


    तिरुपति।
    आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) के मशहूर तिरुपति बालाजी मंदिर (Tirupati Balaji Temple) में नकली घी घोटाले के बाद अब एक नया घोटाला सामने आया है। तिरुमाला मंदिर (Tirumala Temple) को मैनेज करने वाले ट्रस्ट, तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) की अंदरूनी जांच में यह घोटाला सामने आया है, जिसमें पाया गया कि एक कॉन्ट्रैक्टर लगातार दस सालों तक 100% पॉलिस्टर शॉल (Polyester Shawl) को शुद्ध शहतूत सिल्क शॉल बताकर बिल का भुगतान करवा रहा था। 2015 से 2025 तक यानी पूरे एक दशक तक TTD में चले 54 करोड़ रुपये के सिल्क शॉल घोटाले के खुलासे से हड़कंप मच गया है।

    TTD की आंतरिक जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि एक कॉन्ट्रैक्टर 100% पॉलिएस्टर शॉल को 100 फीसदी शुद्ध मलबरी सिल्क शॉल बताकर लगातार एक दशक से सप्लाई कर रहा था, और सिल्क के दाम वसूल रहा था। चेयरमैन बीआर नायडू के नेतृत्व वाले TTD बोर्ड द्वारा शॉल की क्वालिटी पर चिंता जताने के बाद शुरू की गई इस जांच से कथित धोखाधड़ी का पता चला। मंदिर प्रबंधन द्वारा ये शॉल बड़े दानदाताओं या वीआईपीज को दिए जाते हैं और वेदासिरवचनम जैसे मंदिर के रीति-रिवाजों में भी इनका इस्तेमाल होता है।


    10 साल से चल रहा था गोरखधंधा

    एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ये गड़बड़ियां पिछले दस सालों के दौरान हुईं, जिससे मंदिर ट्रस्ट को लगभग 54 करोड़ रुपये से ज़्यादा का नुकसान हुआ है। TTD बोर्ड के चेयरमैन बीआर नायडू ने कहा, “एक शॉल जिसकी कीमत लगभग 350 रुपये है, उसका बिल 1,300 रुपये दिया गया और उसका भुगतान किया गया। कुल सप्लाई 50 करोड़ रुपये से ज़्यादा की होगी। हमने ACB (एंटी-करप्शन ब्यूरो) से जांच कराने को कहा है।”


    दो लैब में भेजे गए थे शॉल के सैंपल्स

    उन्होंने बाया कि शॉल के सैंपल्स साइंटिफिक एनालिसिस के लिए दो लैब में भेजे गए थे, जिनमें से एक सेंट्रल सिल्क बोर्ड (CSB) के तहत थी। दोनों टेस्ट से पता चला कि मैटेरियल पॉलिएस्टर था, जो टेंडर स्पेसिफिकेशन्स का साफ उल्लंघन है। विजिलेंस अधिकारियों ने यह भी देखा कि असली सिल्क प्रोडक्ट्स को ऑथेंटिकेट करने के लिए ज़रूरी सिल्क होलोग्राम, सप्लाई किए गए सैंपल्स में नहीं था। कहा जाता है कि इस दौरान TTD को कपड़े की ज्यादातर सप्लाई के लिए एक ही फर्म और उसकी सिस्टर कंपनियां जिम्मेदार थीं।


    सभी मौजूदा टेंडर कैंसल

    विजिलेंस रिपोर्ट पर तुरंत एक्शन लेते हुए, TTD ट्रस्ट बोर्ड ने फर्म के साथ सभी मौजूदा टेंडर कैंसल कर दिए हैं और पूरे मामले को पूरी क्रिमिनल जांच के लिए स्टेट एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) को भेज दिया है। बता दें कि पिछले साल इसी मंदिर में नकली घी की सप्लाई करने और उससे प्रसादम (लड्डू) बनाने का मामला उजागर हुआ था। पांच साल को दौरान TTD को करीब 250 करोड़ रुपये मूल्य का 68 लाख किलो नकली घी की सप्लाई की गई थी।