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  • TMC में बढ़ी कलह? भाजपा का दावा- 60 विधायक नाराज, ममता-अभिषेक से बना रहे दूरी..

    TMC में बढ़ी कलह? भाजपा का दावा- 60 विधायक नाराज, ममता-अभिषेक से बना रहे दूरी..


    नई दिल्ली । 
    पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी All India Trinamool Congress के भीतर कथित असंतोष को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता Shehzad Poonawalla ने दावा किया है कि पार्टी के भीतर बड़े स्तर पर नाराजगी बढ़ रही है और कई नेता वर्तमान नेतृत्व से दूरी बना रहे हैं।

    पूनावाला ने आरोप लगाया कि करीब 60 विधायक खुद को “असली टीएमसी” बता रहे हैं और Mamata Banerjee तथा Abhishek Banerjee के नेतृत्व से असहज हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी में परिवारवाद हावी हो गया है, जिससे संगठन के भीतर असंतोष बढ़ रहा है।

    भाजपा प्रवक्ता ने यह भी दावा किया कि कुछ सांसद भी पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली से संतुष्ट नहीं हैं और संगठन के भीतर मतभेद लगातार गहराते जा रहे हैं। उनके अनुसार यह स्थिति तृणमूल कांग्रेस के अंदर नेतृत्व संकट की ओर इशारा करती है।

    विवाद उस समय और बढ़ गया जब सोशल मीडिया पर एक कथित सूची वायरल हुई। इस सूची में दावा किया गया कि टीएमसी के 20 सांसदों का एक समूह केंद्र की एनडीए सरकार को समर्थन देने की तैयारी कर रहा है। सूची में पार्टी के कई वरिष्ठ और नए सांसदों के नाम होने की बात कही गई।

    हालांकि टीएमसी ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। पार्टी नेता Kirti Azad ने वायरल सूची को फर्जी और मनगढ़ंत बताया। उन्होंने कहा कि सूची में शामिल कई सांसदों ने ऐसे किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से साफ इनकार किया है।

    कीर्ति आजाद ने भाजपा पर “ऑपरेशन लोटस” के जरिए पार्टी में फूट डालने की कोशिश का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस एकजुट है और विपक्षी दलों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम का कोई असर नहीं पड़ेगा।

    फिलहाल भाजपा के आरोपों और टीएमसी के खंडन के बीच पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। पार्टी के भीतर वास्तविक स्थिति को लेकर राजनीतिक गलियारों में अटकलों का दौर जारी है।

  • बंगाल में TMC में अंदरूनी संकट गहराया, दो और पार्षदों ने छोड़े पद, नेतृत्व पर उठाए सवाल

    बंगाल में TMC में अंदरूनी संकट गहराया, दो और पार्षदों ने छोड़े पद, नेतृत्व पर उठाए सवाल

    कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। अब पार्टी के मजबूत माने जाने वाले शहरी निकायों और नगर निगमों में भी बगावत के सुर सुनाई देने लगे हैं। ताजा घटनाक्रम में कोलकाता नगर निगम के दो वरिष्ठ पार्षदों ने अपने महत्वपूर्ण पदों से इस्तीफा दे दिया है।

    बुधवार को टीएमसी नेता सुशांत घोष ने बरो-12 चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया, जबकि अरूप चक्रवर्ती ने नगर निगम की अकाउंट्स कमेटी के चेयरमैन पद छोड़ने का ऐलान किया। हालांकि दोनों नेताओं ने फिलहाल पार्षद पद नहीं छोड़ा है।

    नेतृत्व के खिलाफ खुलकर नाराजगी
    इस्तीफे के साथ दोनों नेताओं ने पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए। अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि चुनावी हार को स्वीकार करना जरूरी है, क्योंकि हार मानने से इनकार करने पर पिछली जीतों का महत्व भी खत्म हो जाता है। राजनीतिक गलियारों में उनके बयान को पार्टी नेतृत्व पर सीधा हमला माना जा रहा है।

    दोनों नेताओं का आरोप है कि चुनाव परिणाम आने के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंत्री आम कार्यकर्ताओं और पार्षदों से दूरी बना चुके हैं। चक्रवर्ती ने कहा कि लंबे समय तक कुछ प्रभावशाली नेताओं ने मुख्यमंत्री तक पहुंच को भी सीमित कर दिया था और अब हार के बाद वही नेता सार्वजनिक जीवन से गायब हैं।

    भाजपा सरकार की तारीफ से बढ़ीं अटकले
    सुशांत घोष ने अपने घर के बाहर हुए जानलेवा हमले का जिक्र करते हुए पुलिस जांच पर सवाल उठाए और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की।

    भवानीपुर से शुरू हुआ असंतोष
    टीएमसी के भीतर विरोध का यह सिलसिला हाल ही में तब शुरू हुआ था, जब पार्षद देबोलीना बिस्वास ने केएमसी के बरो-9 अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था। भवानीपुर विधानसभा सीट पर पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद यह नाराजगी सामने आई थी। भवानीपुर को लंबे समय तक टीएमसी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है।

    पार्टी के भीतर बढ़ रहा संकट
    राज्य की सत्ता से बाहर होने के बाद टीएमसी में लगातार अंदरूनी खींचतान बढ़ती जा रही है। हाल ही में वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने भी पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था। कई विधायक, सांसद और पार्षद पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की बैठकों से दूरी बनाए हुए हैं और संगठन की कार्यप्रणाली पर खुलकर सवाल उठा रहे हैं।

    सूत्रों के अनुसार, सत्ता परिवर्तन के बाद अब तक 60 से ज्यादा टीएमसी पार्षद विभिन्न नगरपालिकाओं और नगर निगमों में अपने पद छोड़ चुके हैं या संगठनात्मक गतिविधियों से अलग हो गए हैं। कई पार्षदों ने कार्यालय आना भी बंद कर दिया है, जिससे नगर निकायों के कामकाज पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले एक दशक तक नगरपालिकाएं और नगर निगम टीएमसी की सबसे मजबूत राजनीतिक ताकत रहे, लेकिन अब वहीं पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनते दिखाई दे रहे हैं।

  • पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हलचल बढ़ी, BJP सांसद का दावा- हरी झंडी मिलते ही TMC में बड़ा टूट संभव

    पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हलचल बढ़ी, BJP सांसद का दावा- हरी झंडी मिलते ही TMC में बड़ा टूट संभव

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़े राजनीतिक बदलाव की अटकलों ने सियासी माहौल को गर्म कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी के सांसद सौमित्र खान के एक बयान ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने दावा किया है कि तृणमूल कांग्रेस के लगभग 20 सांसद और 50 विधायक भाजपा के संपर्क में हैं और पार्टी नेतृत्व की अनुमति मिलते ही वे पाला बदल सकते हैं। इस बयान के सामने आने के बाद राज्य की राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं और विपक्षी दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो गया है।

    लगातार तीसरी बार लोकसभा पहुंचे सौमित्र खान ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि तृणमूल कांग्रेस के कई जनप्रतिनिधि अपनी ही पार्टी की कार्यप्रणाली और नेतृत्व से संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी के भीतर लंबे समय से असंतोष का माहौल बना हुआ है और कई नेता राजनीतिक भविष्य को लेकर नई संभावनाओं की तलाश में हैं। खान ने कहा कि यदि भाजपा नेतृत्व चाहे तो आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा परिवर्तन देखने को मिल सकता है। हालांकि उन्होंने उन नेताओं के नाम सार्वजनिक नहीं किए जो कथित तौर पर भाजपा के संपर्क में बताए जा रहे हैं।

    इस दावे के बाद राजनीतिक गलियारों में दल-बदल विरोधी कानून को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से फिलहाल तृणमूल कांग्रेस के पास 29 सांसद हैं, जबकि भाजपा के पास 12 और कांग्रेस के पास एक सीट है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि किसी दल के दो-तिहाई सांसद एक साथ पार्टी बदलते हैं तो दल-बदल विरोधी कानून के तहत उनकी सदस्यता पर खतरा नहीं रहता। ऐसे में 29 सांसदों वाली पार्टी के लिए यह आंकड़ा लगभग 19 से 20 सांसदों का बनता है, जो सौमित्र खान के दावे के काफी करीब माना जा रहा है।

    दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा सांसद के बयान को पूरी तरह निराधार बताया है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि भाजपा जानबूझकर भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही है और ऐसा कोई राजनीतिक संकट तृणमूल कांग्रेस में मौजूद नहीं है। पार्टी नेताओं का कहना है कि भाजपा राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए इस तरह के दावे कर रही है, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। तृणमूल कांग्रेस ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी पूरी तरह एकजुट है और नेतृत्व के खिलाफ किसी तरह की नाराजगी जैसी बातें केवल राजनीतिक प्रचार का हिस्सा हैं।

    पश्चिम बंगाल में दलबदल की राजनीति कोई नई बात नहीं है। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले भी तृणमूल कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने भाजपा का दामन थामा था। हालांकि चुनाव के बाद राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और कई नेता फिर से अपनी पुरानी पार्टी में लौट गए। लेकिन इस बार राज्य की राजनीति पहले से अलग नजर आ रही है। बीते कुछ समय में तृणमूल कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा सार्वजनिक मंचों पर असंतोष जाहिर किए जाने की घटनाओं ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दी है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी चुनावों को देखते हुए पश्चिम बंगाल में सियासी समीकरण तेजी से बदल सकते हैं। भाजपा लगातार राज्य में अपने संगठन को मजबूत करने में जुटी है, जबकि तृणमूल कांग्रेस अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए सक्रिय रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में सौमित्र खान का यह बयान आने वाले समय में बंगाल की राजनीति को और अधिक दिलचस्प बना सकता है।

  • फाल्टा उपचुनाव में TMC को करारी शिकस्त, हार के बाद भड़का सियासी तूफान; पार्टी के भीतर ‘गद्दारी’ के आरोपों ने बढ़ाई ममता खेमे की मुश्किलें

    फाल्टा उपचुनाव में TMC को करारी शिकस्त, हार के बाद भड़का सियासी तूफान; पार्टी के भीतर ‘गद्दारी’ के आरोपों ने बढ़ाई ममता खेमे की मुश्किलें


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में फाल्टा विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड जीत ने जहां विपक्षी खेमे को उत्साहित किया है, वहीं तृणमूल कांग्रेस के लिए यह परिणाम कई सवाल छोड़ गया है। चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर नाराजगी और आरोपों का दौर शुरू हो गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस अप्रत्याशित परिणाम के लिए अपने ही उम्मीदवार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति को नई बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।

    Mamata Banerjee के करीबी माने जाने वाले सांसद Sougata Roy ने चुनाव परिणाम के बाद तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पार्टी को मिली हार केवल चुनावी रणनीति की कमी का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे आंतरिक परिस्थितियों ने भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी उम्मीदवार जहांगीर खान के फैसलों ने संगठन को नुकसान पहुंचाया और अंतिम समय में पैदा हुई परिस्थितियों के कारण पार्टी प्रभावी ढंग से चुनावी रणनीति नहीं बना सकी।

    फाल्टा सीट पर चुनावी मुकाबला कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा था। चुनाव प्रचार के दौरान विभिन्न दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंकी थी और इस सीट को प्रतिष्ठा की लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा था। लेकिन परिणाम सामने आने के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार देबांगशु पांडा ने भारी मतों के अंतर से जीत दर्ज कर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी। उनकी जीत केवल एक सीट का परिणाम नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे राज्य के राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

    सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। चुनावी आंकड़ों ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान कर दिया क्योंकि पार्टी उम्मीदवार अपेक्षित समर्थन हासिल नहीं कर सके। यह स्थिति पार्टी के लिए और भी असहज इसलिए मानी जा रही है क्योंकि लंबे समय बाद ऐसा देखने को मिला कि संगठन को इतना कमजोर चुनावी परिणाम झेलना पड़ा। इस नतीजे ने पार्टी नेतृत्व के सामने संगठनात्मक मजबूती और आंतरिक एकजुटता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

    राजनीतिक जानकार मानते हैं कि उपचुनाव अक्सर बड़े चुनावों की दिशा तय करने वाले संकेत देते हैं। ऐसे में फाल्टा का परिणाम आने वाले समय में पश्चिम बंगाल की राजनीति पर असर डाल सकता है। भाजपा इस जीत को अपने बढ़ते जनाधार के संकेत के रूप में देख रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस के सामने अब अपनी रणनीति और संगठन दोनों को लेकर गंभीर समीक्षा की चुनौती खड़ी हो गई है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह चुनावी झटका राज्य की राजनीति में किस तरह के नए समीकरण पैदा करता है।