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  • टैरिफ से बदलेगी अमेरिका की तस्वीर: ट्रंप बोले- फैक्ट्रियां लौट रहीं, बढ़ रही नौकरियां

    टैरिफ से बदलेगी अमेरिका की तस्वीर: ट्रंप बोले- फैक्ट्रियां लौट रहीं, बढ़ रही नौकरियां


    नई दिल्ली ।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपनी टैरिफ आधारित व्यापार नीति को देश की आर्थिक मजबूती का आधार बताया है। पेंसिल्वेनिया के मैकुंगी स्थित मैक ट्रक्स फैक्ट्री में कर्मचारियों को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा कि आयातित वस्तुओं पर लगाए गए टैरिफ न केवल अमेरिकी उद्योगों को नई ताकत दे रहे हैं बल्कि कंपनियों को अमेरिका में उत्पादन इकाइयां स्थापित करने के लिए भी प्रेरित कर रहे हैं। उनके मुताबिक यह नीति वर्षों से कमजोर पड़ रहे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को पुनर्जीवित करने और लाखों रोजगार सृजित करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रही है।

    अपने संबोधन में ट्रंप ने कहा कि लंबे समय तक अमेरिकी श्रमिकों को ऐसे हालात का सामना करना पड़ा जब वैश्विक व्यापार नीतियों के कारण फैक्ट्रियां बंद होती गईं और नौकरियां दूसरे देशों में स्थानांतरित होती रहीं। उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार ने इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए हैं और अब अमेरिकी हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। ट्रंप ने कहा कि आज देश के श्रमिकों के पास ऐसा नेतृत्व है जो अमेरिका और अमेरिकी कामगारों के हितों को सबसे पहले रखता है।

    राष्ट्रपति ने विदेशी स्टील एल्यूमीनियम और कॉपर पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य घरेलू उद्योगों को सस्ता विदेशी प्रतिस्पर्धी दबाव से बचाना है। उन्होंने यह भी बताया कि विदेशी कारों और मध्यम तथा भारी श्रेणी के ट्रकों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया है ताकि अमेरिकी कंपनियां घरेलू बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकें। ट्रंप के अनुसार इस नीति का सीधा लाभ मैक ट्रक्स जैसी कंपनियों को मिला है जो अमेरिका में निर्माण कर रही हैं और हजारों लोगों को रोजगार दे रही हैं।

    ट्रंप ने दावा किया कि टैरिफ नीति के कारण कई वैश्विक कंपनियां अपना उत्पादन अमेरिका में स्थानांतरित कर रही हैं। उन्होंने कहा कि देश में पहले की तुलना में तीन गुना अधिक फैक्ट्रियों का निर्माण हो रहा है। इनमें ऑटोमोबाइल उत्पादन इकाइयों से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हाईटेक मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी फैक्ट्रियां शामिल हैं। उन्होंने कंपनियों को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि यदि वे टैरिफ से बचना चाहती हैं तो उन्हें अमेरिका में फैक्ट्री लगानी होगी और अमेरिकी नागरिकों को रोजगार देना होगा।

    व्यापार संतुलन को लेकर भी ट्रंप ने अपनी सरकार की उपलब्धियों का उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि उनके कार्यकाल के दौरान चीन के साथ व्यापार घाटे में ऐतिहासिक कमी दर्ज की गई और अमेरिकी निर्यात में लगभग 150 अरब डॉलर की वृद्धि हुई। उनके अनुसार यह अमेरिका के व्यापार इतिहास में सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है और इससे घरेलू उद्योगों को नई ऊर्जा मिली है।

    मैक ट्रक्स के कर्मचारियों और प्रबंधन की सराहना करते हुए ट्रंप ने कंपनी को अमेरिकी औद्योगिक ताकत का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में अमेरिका की सड़कों पर अधिकतर ट्रक अमेरिकी फैक्ट्रियों में बने होंगे। कार्यक्रम के दौरान मरीन कॉर्प्स के पूर्व सैनिक और मैक ट्रक्स के तीसरी पीढ़ी के कर्मचारी पैट्रिक मैकह्यू ने भी कहा कि कंपनी अमेरिका में ही उत्पादन करने और देश की प्रगति में योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध है।

    अपने संबोधन में ट्रंप ने पेंसिल्वेनिया में हो रहे नए निवेशों का भी जिक्र किया। उन्होंने फार्मास्युटिकल कंपनी एली लिली टेलीकॉम कंपनी नोकिया और मेडिकल टेक्नोलॉजी क्षेत्र की कंपनी बी ब्रॉन के निवेश प्रस्तावों को अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बढ़ते विश्वास का प्रमाण बताया। ट्रंप के अनुसार ये निवेश दर्शाते हैं कि वैश्विक कंपनियां अमेरिका को भविष्य के विनिर्माण और नवाचार केंद्र के रूप में देख रही हैं।

    ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब उनकी टैरिफ नीति को लेकर अमेरिका और दुनिया भर में बहस जारी है। समर्थकों का मानना है कि इससे घरेलू उद्योग और रोजगार मजबूत होंगे जबकि आलोचक इसे वैश्विक व्यापार के लिए चुनौती मानते हैं। हालांकि ट्रंप का दावा है कि उनकी आर्थिक रणनीति का अंतिम लक्ष्य अमेरिकी उद्योगों को आत्मनिर्भर और प्रतिस्पर्धी बनाना है।

  • चांदी आयात पर बड़ा सरकारी फैसला: विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए सख्त नियंत्रण लागू

    चांदी आयात पर बड़ा सरकारी फैसला: विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए सख्त नियंत्रण लागू

    नई दिल्ली । देश की अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव और लगातार बढ़ते व्यापार घाटे को नियंत्रित करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने चांदी के आयात को लेकर एक अहम और सख्त निर्णय लागू किया है, जिसे आर्थिक प्रबंधन की दिशा में एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है।
    इस नए बदलाव के तहत 99.9 प्रतिशत शुद्धता वाले सिल्वर बार को अब तक की ‘फ्री’ श्रेणी से हटाकर तत्काल प्रभाव से ‘रिस्ट्रिक्टेड’ श्रेणी में शामिल कर दिया गया है, जिससे इसके आयात पर अब सीधे बाजार आधारित खरीद की जगह सरकारी अनुमति और लाइसेंस व्यवस्था लागू हो गई है। इस निर्णय का उद्देश्य उन अनावश्यक आयातों को नियंत्रित करना है, जिनके कारण देश का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से बाहर जा रहा था और डॉलर पर दबाव बढ़ रहा था, जिससे रुपये की स्थिरता भी प्रभावित हो रही थी।
    वैश्विक स्तर पर जारी आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ते जोखिमों के बीच भारत पर आयात बिल का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है, विशेष रूप से कीमती धातुओं के आयात में भारी विदेशी मुद्रा खर्च होता है, जो देश के व्यापार घाटे को और अधिक गहरा करता है। महानिदेशालय द्वारा जारी संशोधित नीति के अनुसार अब कोई भी व्यापारी या आयातक बिना पूर्व अनुमति के सीधे चांदी का आयात नहीं कर सकेगा और इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य होगा, जिससे आयात की मात्रा और प्रवाह पर सरकार की सीधी निगरानी संभव हो सकेगी।
    यह कदम केवल चांदी तक सीमित नहीं है बल्कि पिछले कुछ समय से सरकार ने सोना, प्लैटिनम और अन्य बहुमूल्य धातुओं के आयात पर भी शुल्क संरचना को सख्त किया है, ताकि घरेलू बाजार में अनियंत्रित खरीद और बाहरी मुद्रा पर निर्भरता को कम किया जा सके। पहले ही प्लैटिनम पर आयात शुल्क में उल्लेखनीय वृद्धि की जा चुकी है और सोने व चांदी से जुड़े कई उत्पादों पर भी शुल्क संरचना को संशोधित किया गया है, जिससे इन वस्तुओं की गैर-जरूरी मांग को नियंत्रित किया जा सके। इसके साथ ही एडवांस ऑथराइजेशन स्कीम के तहत भी नियमों को और सख्त किया गया है, जिसके अंतर्गत ज्वेलरी निर्यातकों के लिए कच्चे माल के आयात पर अब स्पष्ट सीमाएं तय कर दी गई हैं, ताकि आयात और निर्यात के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके।
    विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह के कदम अल्पकाल में बाजार पर कुछ दबाव डाल सकते हैं, लेकिन दीर्घकाल में यह विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिर करने और रुपये को मजबूती देने में मदद कर सकते हैं। सरकार का मानना है कि जब तक आयात और निर्यात के बीच संतुलन नहीं बनेगा, तब तक व्यापार घाटे पर नियंत्रण कठिन रहेगा, इसलिए यह नीति आर्थिक अनुशासन और बाहरी निर्भरता को कम करने की दिशा में एक निर्णायक पहल के रूप में देखी जा रही है।
  • डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया, जानिए गिरावट की बड़ी वजहें और बचाव के उपाय

    डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया, जानिए गिरावट की बड़ी वजहें और बचाव के उपाय


    नई दिल्ली
    /भारतीय रुपया इन दिनों गंभीर दबाव में है और डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है। दिसंबर 2025 में पहली बार रुपया 91 के पार चला गया जिसने सरकार रिजर्व बैंक निवेशकों और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह गिरावट किसी एक वजह से नहीं बल्कि घरेलू और वैश्विक कारकों के संयुक्त असर से हुई है। सबसे बड़ा कारण विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली माना जा रहा है। विदेशी संस्थागत निवेशक FII भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार से तेजी से पैसा निकाल रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक इस साल अब तक विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से करीब 18 अरब डॉलर से अधिक निकाल चुके हैं। इससे बाजार में डॉलर की मांग बढ़ी है और रुपये की मांग कमजोर पड़ी है जिसका सीधा असर मुद्रा विनिमय दर पर दिख रहा है।

    दूसरा अहम कारण डॉलर की वैश्विक मजबूती है। अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों और मजबूत आर्थिक संकेतों के चलते डॉलर दुनियाभर की मुद्राओं के मुकाबले मजबूत बना हुआ है। जब अमेरिकी बॉन्ड पर रिटर्न बढ़ता है तो वैश्विक निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अमेरिका की ओर रुख करते हैं। इसका असर भारत जैसे देशों की मुद्रा पर पड़ता है।भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बनी अनिश्चितता ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है। अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर कुछ उत्पादों में ऊंची टैरिफ दरें लगाए जाने से भारतीय सामानों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा घटी है। इससे निर्यात से होने वाली डॉलर की आमद सीमित हुई है और चालू खाते के घाटे की चिंता बढ़ी है।

    रुपये की गिरावट का असर आम आदमी की जिंदगी पर भी पड़ता है। कमजोर रुपये के कारण कच्चा तेल गैस इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं। इससे पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने और महंगाई में दोबारा तेजी आने का खतरा रहता है जिसका बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर पड़ता है।तेल आयात भी रुपये की कमजोरी की एक बड़ी वजह है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से भारत का आयात बिल बढ़ गया है। इससे व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका है जो मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव डालता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये की गिरावट को थामने में भारतीय रिजर्व बैंक RBIकी भूमिका बेहद अहम है। आरबीआई जरूरत पड़ने पर बाजार में डॉलर बेचकर और तरलता का प्रबंधन कर रुपये की तेज गिरावट को रोक सकता है। हालांकि केंद्रीय बैंक आमतौर पर बहुत ज्यादा हस्तक्षेप से बचता है ताकि बाजार में अस्थिरता न बढ़े।लंबी अवधि में रुपये को स्थिर रखने के लिए सिर्फ मौद्रिक हस्तक्षेप काफी नहीं होगा। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत को विदेशी प्रत्यक्ष निवेश FDIऔर दीर्घकालिक पूंजी प्रवाह को बढ़ावा देना होगा। मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ने से डॉलर की स्थायी आमद होगी।

    निर्यात बढ़ाना भी रुपये को सहारा देने का एक अहम तरीका है। आईटी फार्मा इंजीनियरिंग और सेवा क्षेत्र के निर्यात में मजबूती आने से विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत हो सकता है। इसके साथ ही अमेरिका और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ संतुलित और स्पष्ट व्यापार समझौते विदेशी मुद्रा प्रवाह को बढ़ा सकते हैं।महंगाई पर नियंत्रण भी रुपये की स्थिरता के लिए जरूरी है। अगर महंगाई काबू में रहती है तो आरबीआई को नीतिगत समर्थन बनाए रखने में आसानी होती है और ब्याज दरों पर दबाव कम रहता है। मध्यम से लंबी अवधि में नीतिगत सुधार निवेश अनुकूल माहौल और निर्यात को बढ़ावा देने वाली रणनीतियां रुपये की गिरावट पर ब्रेक लगा सकती हैं।