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  • रक्षाबंधन 2026 पर राखी खरीदते समय रखें डिजाइन का ध्यान, जानिए भगवान की तस्वीर से काले धागे तक क्या मान्यताएं हैं

    रक्षाबंधन 2026 पर राखी खरीदते समय रखें डिजाइन का ध्यान, जानिए भगवान की तस्वीर से काले धागे तक क्या मान्यताएं हैं

    नई दिल्ली ।रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के संकल्प से जुड़ा माना जाता है। इस दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं में राखी को केवल धागा नहीं माना जाता, बल्कि इसके रंग, डिजाइन और उस पर बने प्रतीकों को भी विशेष महत्व दिया जाता है। इस वर्ष रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त को मनाया जाएगा।

    राखी खरीदते समय बाजार में कई तरह के डिजाइन देखने को मिलते हैं। इनमें देवी-देवताओं की तस्वीर वाली राखी, ॐ और स्वास्तिक जैसे शुभ चिह्नों वाली राखी, सूती या रेशमी धागे की राखी के अलावा बच्चों के लिए कार्टून और आधुनिक डिजाइन भी शामिल हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन सभी का महत्व एक जैसा नहीं माना जाता।

    भगवान गणेश, भगवान कृष्ण या भगवान हनुमान की तस्वीर वाली राखी को पारंपरिक रूप से शुभ माना जाता है। मान्यता है कि ऐसी राखी भाई के जीवन में ईश्वर की कृपा और सुरक्षा का प्रतीक बन सकती है। हालांकि धार्मिक चित्र वाली राखी को रक्षाबंधन के बाद सम्मानपूर्वक रखने की सलाह दी जाती है और उसे इधर-उधर फेंकने से बचने की परंपरा बताई जाती है।

    ॐ और स्वास्तिक जैसे शुभ चिह्नों वाली राखी को भी धार्मिक दृष्टि से सकारात्मक माना जाता है। इन प्रतीकों का संबंध मंगल, शांति और समृद्धि से जोड़ा जाता है। ऐसी राखी चुनने वाले लोग इसकी पवित्रता और साफ-सफाई का ध्यान रखते हैं। धार्मिक प्रतीकों वाली वस्तुओं को सम्मान के साथ रखने की परंपरा भी भारतीय संस्कृति में रही है।

    साधारण सूती या रेशमी धागे की राखी को सबसे पारंपरिक विकल्पों में माना जाता है। इसमें किसी विशेष सजावट की जरूरत नहीं होती और यह भाई-बहन के स्नेह तथा रिश्ते की सरलता का प्रतीक मानी जाती है। पारंपरिक रूप से सादे और पवित्र धागे को रक्षाबंधन की भावना से जोड़ा जाता है।

    बच्चों के बीच कार्टून और फैंसी राखियों का चलन काफी बढ़ा है। अलग-अलग पात्रों और आकर्षक आकृतियों वाली ऐसी राखियां बच्चों को पसंद आती हैं। हालांकि धार्मिक दृष्टि से इनका कोई विशेष महत्व नहीं माना जाता। इन्हें मुख्य रूप से पसंद और सुविधा के आधार पर चुना जा सकता है।

    इवल आई यानी नजर से बचाने वाले प्रतीक वाली राखियों को लेकर भी अलग-अलग धारणाएं हैं। आधुनिक मान्यताओं में इसे बुरी नजर से सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है, लेकिन पारंपरिक वैदिक मान्यताओं में इसका कोई अनिवार्य धार्मिक महत्व नहीं है। इसलिए इसे न पूरी तरह शुभ माना जाता है और न ही अशुभ।

    काली राखी को लेकर कुछ धार्मिक मान्यताओं में सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। इसी तरह टूटी, खंडित या बहुत नुकीली डिजाइन वाली राखी से बचने की बात कही जाती है। राखी बांधते समय उसके टूट जाने को भी कुछ परंपराओं में अपशकुन माना जाता है। प्लास्टिक से बनी राखियों को लेकर भी पारंपरिक पसंद कम बताई जाती है।

    हालांकि राखी के शुभ या अशुभ प्रभाव को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। ये बातें मुख्य रूप से धार्मिक विश्वास, ज्योतिषीय मान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं पर आधारित हैं। इसलिए राखी चुनते समय भाई-बहन के रिश्ते की भावना, पसंद और सुविधा को प्राथमिकता देना सबसे महत्वपूर्ण है।

  • सावन के अंतिम सोमवार पर नाग पंचमी का दुर्लभ संयोग, 17 अगस्त को इस शुभ मुहूर्त में होगी पूजा

    सावन के अंतिम सोमवार पर नाग पंचमी का दुर्लभ संयोग, 17 अगस्त को इस शुभ मुहूर्त में होगी पूजा

    नई दिल्ली : सनातन परंपरा में सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का विशेष महत्व माना गया है। इस वर्ष नाग पंचमी का पावन पर्व 17 अगस्त को बेहद शुभ संयोग में मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार पंचमी तिथि का प्रारंभ 16 अगस्त की शाम से हो रहा है, लेकिन शास्त्रों में उदयातिथि की मान्यता के कारण यह पर्व 17 अगस्त को ही देशभर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा।

    धार्मिक विद्वानों के अनुसार इस बार नाग पंचमी पर सावन सोमवार का विशेष संयोग बन रहा है, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व और अधिक बढ़ गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नाग देवता भगवान शिव के अत्यंत प्रिय हैं और उनके गले का आभूषण हैं। यही कारण है कि इस दिन शिवजी के साथ-साथ नाग देव की उपासना करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और साधक को भय से मुक्ति मिलती है।

    इस साल पूजन के लिए सुबह का समय अत्यंत फलदायी बताया गया है। 17 अगस्त की सुबह 5 बजकर 51 मिनट से 8 बजकर 29 मिनट तक पूजा का सबसे उत्तम मुहूर्त रहेगा। इस अवधि में श्रद्धालु शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर स्थापित नाग देव का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक, रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सकते हैं।

    धार्मिक ग्रंथों और भविष्य पुराण में नाग पंचमी के महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि इस तिथि पर नाग लोक में विशेष उत्सव मनाया जाता है, इसलिए पृथ्वी लोक पर भी नाग देव की पूजा का विधान है। महाभारतकालीन राजा जनमेजय के नाग यज्ञ और आस्तिक मुनि द्वारा नागों की रक्षा की कथा भी इस पर्व से गहराई से जुड़ी हुई है, जो जीवों के प्रति दया और संरक्षण का संदेश देती है।

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिनकी कुंडली में कालसर्प दोष या राहु-केतु से जुड़े कष्ट होते हैं, उनके लिए इस दिन पूजा-पाठ और दान करना विशेष लाभप्रद माना जाता है। उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में, जिनमें मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्य शामिल हैं, घर के मुख्य द्वार पर गोबर से नाग देव की आकृति बनाकर पूजन करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि धार्मिक आस्था के साथ-साथ व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना भी आवश्यक है। कई स्थानों पर जीवित सर्पों को दूध पिलाने का प्रयास किया जाता है, जो वैज्ञानिक रूप से अनुचित है। इसलिए श्रद्धालुओं को सलाह दी जाती है कि वे किसी जीव को कष्ट दिए बिना केवल मंदिर में स्थापित प्रतिमा या चित्र की ही शास्त्रीय विधि से पूजा करें।

  • पूर्णिया के झंडा चौक पर 1947 की ऐतिहासिक रात से लगातार निभाई जा रही मध्यरात्रि ध्वजारोहण की अनोखी परंपरा।

    पूर्णिया के झंडा चौक पर 1947 की ऐतिहासिक रात से लगातार निभाई जा रही मध्यरात्रि ध्वजारोहण की अनोखी परंपरा।

    नई दिल्ली । स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जब पूरा देश 15 अगस्त की सुबह राष्ट्रीय ध्वज फहराने और जश्न की तैयारियों में जुटा होता है, वहीं बिहार के पूर्णिया जिले में एक अनोखी और ऐतिहासिक परंपरा दशकों से निभाई जा रही है। शहर के भट्ठा बाजार स्थित प्रसिद्ध झंडा चौक पर 14 अगस्त की मध्यरात्रि ठीक 12 बजकर 01 मिनट पर तिरंगा फहराया जाता है। स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी यह ऐतिहासिक और गौरवशाली परंपरा विगत 79 वर्षों से लगातार बिना किसी रुकावट के जारी है।

    इस अनूठी परंपरा की शुरुआत 14 अगस्त 1947 की उस ऐतिहासिक रात को हुई थी, जब पूरा देश आजादी की औपचारिक घोषणा का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। उस वक्त पूर्णिया के स्थानीय नागरिक और स्वतंत्रता सेनानी भट्ठा बाजार स्थित एक दुकान के बाहर रेडियो पर प्रसारित हो रहे समाचार सुन रहे थे। जैसे ही ऑल इंडिया रेडियो पर देश के स्वतंत्र होने की आधिकारिक घोषणा हुई, पूरा क्षेत्र देश भक्ति के जयकारों से गूंज उठा।

    स्वतंत्रता सेनानी रामेश्वर प्रसाद सिंह और उनके सहयोगियों ने तय किया कि आजादी की पहली सांस के साथ ही राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाएगा। उन्होंने तुरंत बांस और रस्सी की व्यवस्था की और रात ठीक 12:01 बजे तिरंगा फहरा दिया। इस ऐतिहासिक घटना के बाद ही उस स्थान का नाम औपचारिक रूप से ‘झंडा चौक’ रखा गया और वहां मौजूद लोगों ने हर वर्ष इस परंपरा को इसी समय दोहराने का सामूहिक संकल्प लिया।

    वर्ष 1947 में ली गई वह शपथ आज भी पूरी निष्ठा और राष्ट्रीय सम्मान के साथ निभाई जा रही है। शुरुआत करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के निधन के बाद उनकी अगली पीढ़ियां इस धरोहर और परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। स्थानीय नागरिक और सामाजिक कार्यकर्ता हर साल 14 अगस्त की रात झंडा चौक पर एकत्र होते हैं और घड़ी की सुई 12:01 पर पहुंचते ही राष्ट्रगान और देशभक्ति के नारों के साथ ध्वजारोहण करते हैं।

    मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों में स्वतंत्रता दिवस को लेकर अभूतपूर्व उत्साह देखा जा रहा है। भोपाल, इंदौर और ग्वालियर जैसे शहरों में जहां 15 अगस्त की सुबह प्रभात फेरियों और मुख्य समारोहों के साथ तिरंगा फहराया जाता है, वहीं बिहार के पूर्णिया की यह मध्यरात्रि ध्वजारोहण की परंपरा पूरे देश के लिए कौतूहल और प्रेरणा का विषय बनी रहती है।

    हर साल की तरह इस बार भी 14 अगस्त की देर रात झंडा चौक पर भारी संख्या में जनसैलाब उमड़ा। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के हाथों में राष्ट्रीय ध्वज नजर आया। रोशनी से जगमगाते चौराहे पर रात 12:01 बजते ही जैसे ही तिरंगा लहराया गया, पूरा माहौल भारत माता की जय और वंदे मातरम के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।

    यह ऐतिहासिक आयोजन केवल एक रस्म नहीं बल्कि उन अमर सेनानियों के प्रति श्रद्धांजलि है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। पूर्णिया वासियों के लिए यह क्षण अत्यंत गर्व और स्वाभिमान का प्रतीक है, जो नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और राष्ट्रीय इतिहास से जोड़े रखता है।

    स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभाग द्वारा भी इस वार्षिक आयोजन के अवसर पर सुरक्षा और व्यवस्था के व्यापक इंतजाम किए जाते हैं। 79 वर्षों से चली आ रही यह निष्ठा साबित करती है कि देशभक्ति का यह जज्बा आने वाले कई दशकों तक इसी तरह अमर रहेगा।

  • केसरिया रंग पर छिड़ा घमासान, भारतीय हॉकी की पहचान और नीली जर्सी के इतिहास पर उठा बड़ा सवाल।

    केसरिया रंग पर छिड़ा घमासान, भारतीय हॉकी की पहचान और नीली जर्सी के इतिहास पर उठा बड़ा सवाल।

    नई दिल्ली। खेल जगत में किसी भी राष्ट्रीय टीम की जर्सी केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि उसकी दशकों पुरानी पहचान, विरासत और प्रशंसकों के भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक होती है। भारतीय खेल इतिहास में ‘मैन इन ब्लू’ और ‘विमेन इन ब्लू’ की अवधारणा केवल एक शब्द नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर भारत की खेल पहचान बन चुकी है। आगामी एफआईएच विश्व कप से ठीक पहले हॉकी इंडिया द्वारा भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीम की प्राथमिक जर्सी का रंग पारंपरिक नीले से बदलकर केसरिया करने के फैसले ने देश में एक नया विवाद और गहन वैचारिक बहस छेड़ दी है।

    हॉकी इंडिया ने जर्सी का रंग बदलने के पीछे तकनीकी और खेल विज्ञान से जुड़े कारणों का हवाला दिया है। महासंघ का तर्क है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिताओं में अधिकांश सिंथेटिक एस्ट्रोटर्फ नीले रंग की होती हैं। मैचों के दौरान नीली जर्सी पहनकर खेलने से खिलाड़ियों के कपड़े नीले टर्फ के रंग में मिल जाते हैं, जिससे मैदान पर साथी खिलाड़ियों की दृश्यता में बाधा आती है और त्वरित निर्णय लेने में परेशानी होती है। सपोर्ट स्टाफ और खिलाड़ियों के परामर्श से दृश्यता में सुधार के उद्देश्य से ही यह बदलाव किया गया है।

    हालांकि, इस तकनीकी दलील के बावजूद खेल जगत के कई दिग्गजों और पूर्व कप्तानों ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। पूर्व दिग्गजों का कहना है कि भारतीय हॉकी का गौरवशाली इतिहास नीली जर्सी के साथ जुड़ा हुआ है और विश्व पटल पर भारत की पहचान इसी रंग से बनती रही है। खेल के अंतरराष्ट्रीय जानकारों का मानना है कि ब्राजील की पीली, न्यूजीलैंड की काली या इटली की नीली जर्सी की तरह भारतीय टीम का नीला रंग भी दशकों की मेहनत के बाद एक वैश्विक ब्रांड बना था, जिसे एक झटके में बदलना अनुचित है।

    राजनीतिक गलियारों में भी इस बदलाव को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। विपक्षी दलों के नेताओं ने इस फैसले को सांस्कृतिक और वैचारिक ब्रांडिंग का हिस्सा बताते हुए सवाल उठाए हैं, जबकि खेल प्रशासन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि खेलों में जर्सी के डिजाइन और रंग समय-समय पर बदलते रहे हैं और इस निर्णय को किसी राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।

    वैश्विक खेलों में जर्सी के रंग और राष्ट्रीय ध्वज के बीच अंतर होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन किसी स्थापित खेल राष्ट्र की प्राथमिक पहचान को अचानक बदल देना हमेशा से चर्चा का विषय बनता रहा है। 1928 से लेकर अब तक ओलंपिक और विश्व कप के मंचों पर भारतीय हॉकी ने जो स्वर्णिम अध्याय लिखे हैं, वे किसी एक रंग से कहीं बढ़कर हैं। फिलहाल, यह बहस केवल एक रंग तक सीमित न रहकर खेल की ब्रांडिंग, विरासत और संस्थागत फैसलों में पारदर्शिता के इर्द-गिर्द घूम रही है।

  • घुड़चढ़ी की रस्म का क्या है महत्व? शौर्य, जिम्मेदारी और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी अनोखी मान्यताएं

    घुड़चढ़ी की रस्म का क्या है महत्व? शौर्य, जिम्मेदारी और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी अनोखी मान्यताएं

    नई दिल्ली । भारतीय विवाह समारोहों में दूल्हे का घोड़ी पर सवार होकर बारात लेकर पहुंचना सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है। घुड़चढ़ी की यह रस्म आज भी अधिकांश क्षेत्रों में पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ निभाई जाती है। समय के साथ विवाह के तौर-तरीकों में कई बदलाव आए हैं, लेकिन दूल्हे की घोड़ी पर सवारी आज भी भारतीय शादियों की सबसे प्रमुख रस्मों में शामिल है। इस परंपरा के पीछे सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक मान्यताओं का विशेष महत्व माना जाता है।

    भारतीय समाज में घोड़ा और विशेष रूप से घुड़सवारी लंबे समय तक शौर्य, सम्मान और नेतृत्व का प्रतीक रहे हैं। प्राचीन काल में राजा, योद्धा और सेनापति घोड़े पर यात्रा करते थे। इसी कारण विवाह के अवसर पर दूल्हे का घोड़ी पर बैठकर आना इस बात का प्रतीक माना गया कि वह अब परिवार की नई जिम्मेदारियां संभालने के लिए तैयार है। विवाह केवल दो लोगों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का सामाजिक और सांस्कृतिक मिलन माना जाता है, इसलिए इस रस्म को सम्मानजनक स्थान मिला।

    घुड़चढ़ी को लेकर कई पारंपरिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। कुछ लोग इसे दूल्हे के आत्मविश्वास, संयम और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मानते हैं। वहीं, कई सांस्कृतिक व्याख्याओं के अनुसार यह रस्म विवाह से पहले दूल्हे के धैर्य और जिम्मेदारी का प्रतीकात्मक प्रदर्शन मानी जाती रही है। हालांकि इन मान्यताओं को ऐतिहासिक परंपराओं के रूप में देखा जाता है और इनके समर्थन में ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

    घोड़ी के चयन को लेकर भी अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं। लोक परंपराओं में माना जाता है कि घोड़ी अपेक्षाकृत शांत और नियंत्रित स्वभाव की होती है, इसलिए विवाह जैसे सार्वजनिक आयोजन में उसका उपयोग अधिक उपयुक्त माना गया। कुछ सांस्कृतिक व्याख्याएं इसे संवेदनशीलता और संतुलित व्यवहार का प्रतीक भी बताती हैं। हालांकि यह कहना कि घोड़ी का चयन किसी निश्चित वैज्ञानिक कारण से किया गया था, उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों से स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं होता।

    इतिहासकारों का मानना है कि पुराने समय में बारातें लंबी दूरी तय करके दूसरे गांव या नगर पहुंचती थीं। उस दौर में यात्रा अपेक्षाकृत कठिन और जोखिमपूर्ण होती थी। ऐसे में घोड़े या घोड़ी पर सवारी व्यावहारिक आवश्यकता भी थी। समय बीतने के साथ यह आवश्यकता धीरे-धीरे एक सांस्कृतिक परंपरा और विवाह की पहचान बन गई। आज परिवहन के आधुनिक साधन उपलब्ध होने के बावजूद घुड़चढ़ी की रस्म अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए हुए है।

    आधुनिक समय में इस परंपरा का स्वरूप पहले की तुलना में काफी बदल चुका है। कई स्थानों पर दूल्हा घोड़ी के बजाय बग्घी, विंटेज कार या अन्य वाहनों से भी विवाह स्थल तक पहुंचता है। फिर भी पारंपरिक परिवारों में घुड़चढ़ी को शुभ माना जाता है और इसे विवाह संस्कार का महत्वपूर्ण हिस्सा समझा जाता है। यह रस्म भारतीय समाज की उन सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती है, जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं और आज भी उत्सव, सम्मान तथा सामाजिक एकता का संदेश देती हैं। इसलिए घुड़चढ़ी को केवल एक औपचारिक रस्म नहीं, बल्कि भारतीय विवाह संस्कृति की ऐतिहासिक विरासत और प्रतीकात्मक परंपरा के रूप में देखा जाता है।

  • पूजा में नैवेद्य अर्पित करने की सही विधि: बीज वाले फलों के भोग से जुड़े नियम और ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

    पूजा में नैवेद्य अर्पित करने की सही विधि: बीज वाले फलों के भोग से जुड़े नियम और ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

    नई दिल्ली। सनातन धर्म और हिंदू धार्मिक मान्यताओं में पूजा-पाठ के दौरान देवी-देवताओं को नैवेद्य यानी भोग अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार बिना भोग लगाए कोई भी पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती है। ईश्वर को प्रसन्न करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार मिठाई, खीर और विभिन्न प्रकार के ताजे फलों का अर्पण करते हैं। हालांकि, पूजा में फलों के चुनाव और उन्हें अर्पित करने के सही तरीकों को लेकर अक्सर श्रद्धालुओं के मन में संशय रहता है। विशेषकर बीज वाले फलों को भगवान के समक्ष चढ़ाने के नियमों को लेकर धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान किया गया है।

    धार्मिक विद्वानों और शास्त्रों के अनुसार पूजा-पाठ में फलों का अर्पण अत्यंत सात्विक और उत्तम माना जाता है। मौसम के अनुसार उपलब्ध ताजे फलों का भोग लगाने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। जहां तक बीज वाले फलों का प्रश्न है, तो ऐसे फलों को भगवान को अर्पित किया जा सकता है, परंतु इसके लिए एक निश्चित विधि का पालन करना आवश्यक है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति स्वयं भोजन ग्रहण करते समय या बच्चों को फल देते समय बीज अलग करता है, उसी प्रकार पूर्ण श्रद्धा और भाव के साथ भगवान को भी बीज निकालकर ही फल अर्पित करने चाहिए।

    भोग लगाने की विधि में शुद्धता और भाव का सबसे अधिक महत्व होता है। बड़े या अधिक बीज वाले फल जैसे आम, तरबूज या अन्य मौसमी फलों का भोग लगाते समय पहले उन्हें अच्छी तरह स्वच्छ जल से धोना चाहिए। इसके बाद पूजा के समय ही उन्हें काटकर उनके बीजों को अलग कर देना चाहिए। पहले से काटकर रखे गए बासी या दूषित फलों को पूजा में चढ़ाना वर्जित माना गया है। इसके अलावा, भगवान विष्णु या उनके अवतारों को भोग अर्पित करते समय उसमें तुलसी का पत्ता रखना अत्यंत शुभ और अनिवार्य माना जाता है।

    पूजा-पाठ में नैवेद्य अर्पित करते समय भक्त के मन का भाव पूरी तरह से निष्काम और अहंकार रहित होना चाहिए। शास्त्रों में स्पष्ट किया गया है कि भोग केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति समर्पण और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। इसलिए सही नियमों का पालन करते हुए, स्वच्छता और मर्यादा के साथ अर्पित किया गया साधारण सा भोग भी भगवान सहर्ष स्वीकार करते हैं और साधक पर अपनी कृपा बरसाते हैं।

  • स्लोवाकिया में प्रधानमंत्री मोदी का पारंपरिक ‘ब्रेड और नमक’ से स्वागत, सांस्कृतिक सम्मान की अनोखी परंपरा बनी आकर्षण का केंद्र

    स्लोवाकिया में प्रधानमंत्री मोदी का पारंपरिक ‘ब्रेड और नमक’ से स्वागत, सांस्कृतिक सम्मान की अनोखी परंपरा बनी आकर्षण का केंद्र

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्लोवाकिया दौरे ने भारत और यूरोप के बीच कूटनीतिक संबंधों को नई चर्चा दी है। स्लोवाकिया की राजधानी ब्रातिस्लावा पहुंचने पर प्रधानमंत्री मोदी का जिस पारंपरिक तरीके से स्वागत किया गया, उसने न केवल राजनीतिक बल्कि सांस्कृतिक स्तर पर भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया। स्लोवाक परंपरा के अनुसार उन्हें ‘ब्रेड और नमक’ भेंट कर सम्मानित किया गया, जिसे वहां अतिथि सत्कार, मित्रता और सद्भावना का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है।

    स्लोवाकिया की स्वतंत्रता के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली आधिकारिक यात्रा मानी जा रही है। ऐसे में इस दौरे को दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रधानमंत्री के आगमन पर स्लोवाकिया के वरिष्ठ अधिकारियों ने उनका स्वागत किया और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुरूप सम्मान प्रदान किया।

    ब्रातिस्लावा पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री मोदी का भारतीय समुदाय के लोगों ने भी उत्साहपूर्वक स्वागत किया। बड़ी संख्या में मौजूद भारतीय मूल के लोगों ने उनका अभिनंदन किया और भारत तथा स्लोवाकिया के बीच बढ़ती मित्रता पर खुशी व्यक्त की। इस दौरान दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंधों की झलक भी देखने को मिली।

    प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपने स्वागत को लेकर प्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि ‘ब्रेड और नमक’ की यह परंपरा स्लोवाकिया की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का सुंदर प्रतीक है। उन्होंने इसे मित्रता, सम्मान और सद्भावना के उन मूल्यों का प्रतिनिधि बताया जिन्हें दोनों देश महत्व देते हैं। उनके अनुसार ऐसी परंपराएं देशों के बीच लोगों से लोगों के संबंधों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

    पूर्वी और मध्य यूरोप के कई देशों में ‘ब्रेड और नमक’ से स्वागत करने की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार ब्रेड समृद्धि, जीवन और खुशहाली का प्रतीक है, जबकि नमक सम्मान, सुरक्षा और स्थायी संबंधों का प्रतिनिधित्व करता है। किसी विशिष्ट अतिथि को इन दोनों वस्तुओं का उपहार देना अत्यंत सम्मानजनक माना जाता है।

    स्लोवाकिया के अलावा रूस, पोलैंड, यूक्रेन, सर्बिया और अन्य कई स्लाव देशों में भी यह परंपरा आज तक जीवित है। महत्वपूर्ण राष्ट्रीय नेताओं, राजनयिकों और विशिष्ट मेहमानों के स्वागत में इस रीति का उपयोग किया जाता है। इसे केवल औपचारिक स्वागत नहीं बल्कि विश्वास और मित्रता का प्रतीकात्मक संदेश माना जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि कूटनीतिक यात्राओं में सांस्कृतिक प्रतीकों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। ऐसे अवसर देशों के बीच केवल राजनीतिक संवाद तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक पहचान और आपसी सम्मान को भी सामने लाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के स्वागत में अपनाई गई यह परंपरा भी इसी व्यापक सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

    भारत और स्लोवाकिया के बीच व्यापार, प्रौद्योगिकी, निवेश और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री की यह यात्रा दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा देने वाली मानी जा रही है। स्वागत समारोह में दिखाई गई सांस्कृतिक आत्मीयता ने इस यात्रा को और अधिक विशेष बना दिया है।

    विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की सांस्कृतिक परंपराएं देशों के बीच विश्वास और सौहार्द का वातावरण तैयार करती हैं। ब्रातिस्लावा में प्रधानमंत्री मोदी का ‘ब्रेड और नमक’ से हुआ स्वागत इसी संदेश को मजबूत करता है कि कूटनीति केवल समझौतों तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह सांस्कृतिक सम्मान और मानवीय जुड़ाव से भी संचालित होती है।

  • MP में 9 दिन लगेगा कुंवारों के देवता बिल्लम बावजी का दरबार, पान और नारियल अर्पित कर लगाई जाती है शादी की अर्जी

    MP में 9 दिन लगेगा कुंवारों के देवता बिल्लम बावजी का दरबार, पान और नारियल अर्पित कर लगाई जाती है शादी की अर्जी

    नीमच । मध्यप्रदेश के नीमच जिले के जावद में कुंवारों के देवता के रूप में प्रसिद्ध बिल्लम बावजी का अनोखा दरबार हर साल रंग पंचमी से शुरू होकर रंग तेरस तक चलता है। इस दौरान हजारों अविवाहित युवक-युवतियां और उनके परिजन विवाह की मनोकामना लेकर बावजी के दर्शन करने पहुंचते हैं।

    करीब 30 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के अनुसार, बावजी की प्रतिमा को गणेश मंदिर की कुई से लाकर जावद के पुरानी धान मंडी क्षेत्र में स्थापित किया जाता है। इसके बाद नौ दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना और मन्नतों का दौर चलता है।

    स्थानीय मान्यता है कि यहां पान और नारियल अर्पित कर अर्जी लगाने से विवाह में आ रही बाधाएं दूर हो जाती हैं और जल्द ही योग्य जीवनसाथी मिल जाता है। जिस युवक या युवती की शादी की अर्जी लगाई जाती है, उसे चढ़ाया हुआ पान खाना होता है। इसके बाद शीघ्र ही विवाह का रिश्ता तय होने की बात कही जाती है। कई श्रद्धालुओं ने बावजी की कृपा से मनोकामना पूरी होने के उदाहरण साझा भी किए हैं।

    बताया जाता है कि करीब 30 वर्ष पहले गणेश मंदिर की कुई की सफाई के दौरान यह प्रतिमा मिली थी। इसके बाद इसे कुई के थारे पर विराजित कर दिया गया और धीरे-धीरे इसकी ख्याति कुंवारों के देवता के रूप में फैलने लगी। आज यह दरबार लोगों की आस्था का केंद्र बन चुका है।

    हर साल देश के कोने-कोने से हजारों युवक-युवतियां अपने जीवनसाथी की कामना लेकर बावजी के दरबार में माथा टेकते हैं। नौ दिन तक चलने वाले इस अनोखे उत्सव में पान, नारियल और अर्जी के माध्यम से मनोकामनाएं पूरी होने की उम्मीद के साथ श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं। बल्लम बावजी का यह दरबार न केवल विवाह की कामना के लिए बल्कि आस्था और परंपरा का प्रतीक भी बन चुका है।

  • विदिशा में बैलगाड़ी बारात का जादू, भोपाल में काम वाली की संतान से लूट की सनसनी

    विदिशा में बैलगाड़ी बारात का जादू, भोपाल में काम वाली की संतान से लूट की सनसनी

    विदिशा में आज एक अनोखी बारात निकली जिसने सबका दिल जीत लिया। आधुनिक जमाने में जहां बारातें कार और बाइक्स से निकलती हैं, वहीं सिरोंज के मंडी रोड पर निकली इस बारात में पूरी तरह पुराने रीति-रिवाजों की झलक थी। आगे घोड़े पर सवार दूल्हा राजा की शानदार सवारी और पीछे फूलों से सजाई गई 10 से 12 बैलगाड़ियां, जिनमें बाराती बैठकर पुराने जमाने की यादें ताजा कर रहे थे। बैलगाड़ियां धीरे-धीरे चल रही थीं और ढोल-नगाड़ों की थाप के साथ माहौल मनमोहक बन रहा था।

    दूल्हा डॉ. प्रशांत ने बताया कि उनके पापा ने इस बारात की प्लानिंग दो महीने पहले से की थी। उन्होंने कहा कि यह बारात अनोखी और सबके लिए यादगार रही। इस बारात का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और यूजर्स इसे सादगी और संस्कृति की जीत बता रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि आधुनिकता के बीच भी अपनी जड़ों से जुड़े रहना कितना खूबसूरत अनुभव है।

    वहीं, भोपाल में टीटी नगर थाना इलाके के पॉश कॉलोनी 98 क्वार्टर में दिनदहाड़े एक सनसनीखेज लूट की घटना सामने आई। चौंकाने वाली बात यह है कि आरोपी काम वाली बाई का बेटा निकला। जानकारी के अनुसार, आरोपी गोलू रैकवार अपने दोस्त के साथ पीड़िता के घर में घुसा और हाथ-पैर बांधकर चाकू की नोक पर अलमारी खोलने को कहा। चाबी देने से इंकार करने पर उन्होंने रॉड की मदद से अलमारी तोड़ी और डेढ़ लाख रुपए नकद, मोबाइल और लैपटॉप लेकर भाग गए।

    पीड़िता बीमार होने के कारण घर पर थी और माइनिंग विभाग में कार्यरत हैं। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए कुछ ही घंटे में आरोपी को पकड़ लिया। यह आरोपी कुछ दिन पहले 307 के केस में जमानत पर आया था। पुलिस अब आरोपी से नकदी और अन्य सामान की रिकवरी के बाद पूछताछ कर रही है। इस घटना ने शहर में सनसनी फैला दी है और लोगों में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

    मध्यप्रदेश में आज दो बिल्कुल अलग रंग देखने को मिले, विदिशा की बैलगाड़ी बारात ने संस्कृति और परंपरा का जश्न मनाया, वहीं भोपाल की लूट ने सुरक्षा और अपराध की गंभीरता को उजागर किया।

  • कोट्टनकुलंगरा श्रीदेवी मंदिर में पुरुष श्रद्धालुओं का अनोखा सोलह श्रृंगार देवी से मनचाही मुराद की परंपरा

    कोट्टनकुलंगरा श्रीदेवी मंदिर में पुरुष श्रद्धालुओं का अनोखा सोलह श्रृंगार देवी से मनचाही मुराद की परंपरा



    नई दिल्ली । केरल के कोल्लम जिले में स्थित कोट्टनकुलंगरा श्रीदेवी मंदिर अपनी एक अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है जिसमें पुरुष श्रद्धालुओं को पूजा से पहले महिलाओं की तरह सोलह श्रृंगार करना अनिवार्य माना जाता है। इस परंपरा का पालन करने वाले श्रद्धालु देवी की आराधना से पहले साड़ी पहनते हैं चूड़ियां पहनते हैं बिंदी लगाते हैं और अन्य श्रृंगार सामग्री से खुद को सजाते हैं। इस अनूठी परंपरा के चलते यह मंदिर देश-विदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है।

    परंपरा का महत्व

    कोट्टनकुलंगरा मंदिर की इस परंपरा को श्रद्धा और आस्था का प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और यहां आने वाले श्रद्धालु इसे पूरे समर्पण के साथ निभाते हैं। पुरुष श्रद्धालु जब पूजा के लिए तैयार होते हैं तो वे स्वयं को पूरी तरह से सजाते हैं जैसे महिलाएं पारंपरिक रूप से सोलह श्रृंगार करती हैं। इस पूजा में श्रद्धालु देवी भाग्यवती से अच्छी नौकरी स्वास्थ्य विवाह और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। यह परंपरा पूरी तरह से समाज में समर्पण और ईश्वर के प्रति श्रद्धा को बढ़ावा देने के लिए मानी जाती है। इस परंपरा के कारण मंदिर में हर साल श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में भीड़ रहती है जो इस अनुभव को एक अलग ही रूप में अपनाते हैं।

    मंदिर के आकर्षण

    कोट्टनकुलंगरा श्रीदेवी मंदिर के अद्वितीय रीति-रिवाज और परंपराओं ने इसे एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में स्थापित किया है। यहां पर लोग न केवल पूजा-अर्चना करने आते हैं बल्कि इस अनोखी परंपरा का पालन करने के लिए भी दूर-दूर से आते हैं। मंदिर का वातावरण बेहद शांतिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण होता है जहां पर हर किसी को अपने व्यक्तिगत आस्थाओं का पालन करने का पूरा अवसर मिलता है।

    सोलह श्रृंगार

    सोलह श्रृंगार का पालन करने से जुड़े कई महत्व हैं जो महिलाओं के सौंदर्य और आंतरिक शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं। इस परंपरा के तहत पुरुष श्रद्धालु स्वयं को साड़ी पहनकर सजाते हैं जो उन्हें पारंपरिक रूप से महिलाओं के साथ जोड़ता है और ईश्वर के साथ एक अद्वितीय संबंध स्थापित करता है। यह एक अद्भुत दृष्टिकोण है जो पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता को बढ़ावा देने की कोशिश करता है साथ ही आस्था के द्वारा सभी को एकजुट करने का कार्य करता है।

    कोट्टनकुलंगरा श्रीदेवी मंदिर की यह परंपरा न केवल श्रद्धा का प्रतीक है बल्कि यह यह भी दर्शाती है कि धार्मिक आस्थाएं और सांस्कृतिक परंपराएं समय के साथ बदल सकती हैं। पुरुषों द्वारा सोलह श्रृंगार करने की यह परंपरा एक नई सोच और धार्मिक समर्पण की दिशा में एक कदम है। इस मंदिर की विशेषता और परंपरा को देखकर यह कहा जा सकता है कि यहाँ आस्था और आचरण का अद्वितीय संगम है जो सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।