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  • क्रेडिट कार्ड से पेमेंट के बाद पैसा वापस पाने के लिए रिफंड या चार्जबैक, जानें सही विकल्प

    क्रेडिट कार्ड से पेमेंट के बाद पैसा वापस पाने के लिए रिफंड या चार्जबैक, जानें सही विकल्प


    नई दिल्ली । क्रेडिट कार्ड से ऑनलाइन खरीदारी करना सुविधाजनक है, लेकिन कई बार ऑर्डर रद्द होने, सामान नहीं मिलने, गलत बिलिंग या भुगतान से जुड़ी समस्या के कारण ग्राहकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में पैसे वापस पाने के लिए रिफंड और चार्जबैक दो प्रमुख विकल्प हैं। हालांकि, दोनों की प्रक्रिया, इस्तेमाल करने का तरीका और समय अलग-अलग होता है। इसलिए शिकायत की प्रकृति के अनुसार सही विकल्प चुनना जरूरी है।

    क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने के बाद यदि ग्राहक किसी सामान को वापस करता है या ऑर्डर रद्द कर देता है, तो वह संबंधित विक्रेता या कंपनी से रिफंड मांग सकता है। इसी तरह, बिल में कोई गलती मिलने पर भी ग्राहक विक्रेता से भुगतान वापस करने का अनुरोध कर सकता है। रिफंड की प्रक्रिया आमतौर पर मर्चेंट यानी विक्रेता की ओर से शुरू की जाती है। इसके बाद संबंधित राशि ग्राहक के क्रेडिट कार्ड खाते में वापस जमा होती है।

    उदाहरण के तौर पर, यदि किसी ग्राहक ने ऑनलाइन 7,000 रुपये का सामान खरीदा और बाद में ऑर्डर रद्द कर दिया, तो वह संबंधित ई-कॉमर्स कंपनी से पैसे वापस मांग सकता है। रिफंड का अनुरोध स्वीकार होने के बाद राशि वापस आने में कुछ कार्यदिवस लग सकते हैं। यह अवधि विक्रेता की प्रक्रिया और भुगतान व्यवस्था पर निर्भर करती है। ऐसे में ग्राहक को ऑर्डर की जानकारी, भुगतान की रसीद और कंपनी के साथ हुई बातचीत का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना चाहिए।

    दूसरी ओर, चार्जबैक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें ग्राहक किसी विवादित क्रेडिट कार्ड लेनदेन को लेकर अपने कार्ड जारी करने वाले बैंक से शिकायत करता है। इसका इस्तेमाल उस समय किया जा सकता है, जब विक्रेता उचित रिफंड देने से इनकार कर दे, शिकायत का जवाब नहीं दे या भुगतान करने के बावजूद सामान अथवा सेवा उपलब्ध न कराए। यदि खाते में कोई अनधिकृत लेनदेन दिखाई देता है या धोखाधड़ी का संदेह होता है, तो ग्राहक को बैंक को तुरंत सूचित करना चाहिए।

    चार्जबैक की प्रक्रिया में बैंक विवादित भुगतान की जांच करता है। इस दौरान ग्राहक से लेनदेन का विवरण, भुगतान की रसीद, ऑर्डर से जुड़े दस्तावेज और विक्रेता के साथ हुई बातचीत के प्रमाण मांगे जा सकते हैं। जांच के दौरान विक्रेता को भी अपने पक्ष में सबूत देने का अवसर मिल सकता है। इसलिए केवल शिकायत दर्ज कराने से पैसा वापस मिलने की गारंटी नहीं होती। बैंक उपलब्ध तथ्यों और लागू नियमों के आधार पर निर्णय लेता है। निर्धारित समयसीमा के भीतर शिकायत करना भी महत्वपूर्ण है।

    रिफंड और चार्जबैक के बीच सबसे बड़ा अंतर यह है कि रिफंड के लिए ग्राहक सीधे विक्रेता से संपर्क करता है, जबकि चार्जबैक के लिए बैंक के माध्यम से विवाद उठाया जाता है। रिफंड की अवधि विक्रेता की प्रक्रिया पर निर्भर करती है, जबकि चार्जबैक की जांच में कई सप्ताह लग सकते हैं। इसलिए सामान्य ऑर्डर रद्द होने या सामान लौटाने की स्थिति में पहले रिफंड मांगना उचित रहता है। यदि विक्रेता समस्या का समाधान नहीं करता, तो ग्राहक बैंक से चार्जबैक की प्रक्रिया के बारे में जानकारी ले सकता है।

    इन दोनों प्रक्रियाओं का अनुरोध करने से आमतौर पर क्रेडिट स्कोर पर सीधा असर नहीं पड़ता। हालांकि, विवाद के दौरान क्रेडिट कार्ड के बकाया बिल का भुगतान रोकना या निर्धारित तारीख के बाद भुगतान करना स्कोर को प्रभावित कर सकता है। इसलिए ग्राहक को बैंक से भुगतान संबंधी निर्देश स्पष्ट करने चाहिए और केवल विवादित राशि के आधार पर पूरे बिल को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सही दस्तावेज सुरक्षित रखना, समय पर शिकायत करना और बैंक की प्रक्रिया का पालन करना पैसे वापस पाने में मददगार हो सकता है।