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  • अदाणी एनर्जी सॉल्यूशंस का दूसरी तिमाही में मुनाफा 145 प्रतिशत उछला, आय 51 प्रतिशत बढ़कर 10,239 करोड़ रुपये पहुंची

    अदाणी एनर्जी सॉल्यूशंस का दूसरी तिमाही में मुनाफा 145 प्रतिशत उछला, आय 51 प्रतिशत बढ़कर 10,239 करोड़ रुपये पहुंची

    नई दिल्ली । अदाणी एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में मजबूत वित्तीय प्रदर्शन दर्ज किया है। जुलाई से सितंबर 2026 के दौरान कंपनी का मुनाफा पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 145 प्रतिशत बढ़कर 1,364 करोड़ रुपये हो गया। इस दौरान कंपनी की कुल आय 51 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 10,239 करोड़ रुपये पर पहुंच गई। ट्रांसमिशन और ऊर्जा समाधान कारोबार में बेहतर प्रदर्शन को कंपनी की वृद्धि का प्रमुख आधार बताया गया है।

    कंपनी के परिचालन से प्राप्त आय में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। दूसरी तिमाही में यह सालाना आधार पर 51 प्रतिशत बढ़कर 7,167 करोड़ रुपये रही। इसी अवधि में कंपनी का एबिटडा 67 प्रतिशत बढ़कर 3,548 करोड़ रुपये हो गया, जबकि ऑपरेशनल एबिटडा में 68 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह 3,070 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। ये आंकड़े कंपनी के परिचालन प्रदर्शन में सुधार को दर्शाते हैं।

    वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में भी कंपनी ने मुनाफे और आय के मोर्चे पर बढ़त दर्ज की। अप्रैल से सितंबर की अवधि में कंपनी का समेकित मुनाफा सालाना आधार पर 137 प्रतिशत बढ़कर 2,600 करोड़ रुपये हो गया। वहीं, इस दौरान कुल आय 46 प्रतिशत बढ़कर 20,092 करोड़ रुपये दर्ज की गई। कंपनी के प्रबंधन ने पहली छमाही के वित्तीय और परिचालन प्रदर्शन को भविष्य की वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण बताया है।

    कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कंदर्प पटेल के अनुसार, पहली छमाही के दौरान वित्तीय प्रदर्शन के साथ परिचालन गतिविधियों में भी मजबूती रही। उन्होंने बताया कि विजाग और सतारा में रणनीतिक ट्रांसमिशन परिसंपत्तियों का अधिग्रहण कंपनी की विस्तार योजना का हिस्सा है। इन परिसंपत्तियों के जुड़ने से कंपनी की सक्रिय ऑर्डर बुक लगभग 87,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। यह ऑर्डर बुक भविष्य में परियोजनाओं के क्रियान्वयन और कारोबार के विस्तार के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    मुंबई के बिजली वितरण कारोबार में भी कंपनी ने वृद्धि दर्ज की। प्रबंधन के अनुसार, इस कारोबार में बेची गई बिजली की इकाइयों में लगभग 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। वहीं, स्मार्ट मीटरिंग कारोबार के तहत लगाए गए मीटरों की कुल संख्या बढ़कर लगभग 1.5 करोड़ हो गई है। स्मार्ट मीटरिंग कंपनी के ऊर्जा समाधान कारोबार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसमें बढ़ती गतिविधियां आय में योगदान दे रही हैं।

    कंपनी ने महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड यानी एमएसईडीसीएल के साथ 2.5 गीगावाट की चौबीसों घंटे बिजली आपूर्ति से संबंधित एक बड़ा अनुबंध भी हासिल किया है। प्रबंधन के मुताबिक, यह समझौता विभिन्न स्रोतों से ऊर्जा जुटाने और ग्राहकों को बिजली आपूर्ति बेहतर बनाने की कंपनी की क्षमता को मजबूत करता है। हालांकि, इस अनुबंध से होने वाली अतिरिक्त आय का विस्तृत ब्योरा जारी आंकड़ों में नहीं दिया गया है।

    कारोबार के अलग-अलग क्षेत्रों में दूसरी तिमाही के नतीजे भी सामने आए। ट्रांसमिशन कारोबार की परिचालन आय सालाना आधार पर 17 प्रतिशत बढ़कर 1,521 करोड़ रुपये रही। बिजली वितरण कारोबार, जिसमें एईएमएल और एमयूएल शामिल हैं, की आय दो प्रतिशत बढ़कर 3,181 करोड़ रुपये हो गई। स्मार्ट मीटरिंग से आय 129 प्रतिशत की तेज वृद्धि के साथ 267 करोड़ रुपये पर पहुंच गई, जबकि ऊर्जा समाधान कारोबार से आय 2,197 करोड़ रुपये दर्ज की गई।

    शेयर बाजार में अदाणी एनर्जी सॉल्यूशंस का शेयर बीएसई पर 1,293 रुपये के भाव पर बंद हुआ। उपलब्ध एक्सचेंज आंकड़ों के मुताबिक, शेयर का पिछले 52 सप्ताह का उच्चतम स्तर 1,789 रुपये और न्यूनतम स्तर 804.70 रुपये रहा है। कंपनी के तिमाही नतीजों में मुनाफे, आय और परिचालन लाभ में बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि भविष्य का प्रदर्शन परियोजनाओं के क्रियान्वयन और कारोबार के विस्तार पर निर्भर करेगा।

  • मोहन यादव से मिले हर्ष गोयनका, जबलपुर, रतलाम, सागर और उज्जैन में निवेश की संभावनाओं पर हुई अहम चर्चा

    मोहन यादव से मिले हर्ष गोयनका, जबलपुर, रतलाम, सागर और उज्जैन में निवेश की संभावनाओं पर हुई अहम चर्चा

    मध्यप्रदेश । मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मुंबई के होटल द सेंट रेजिस में आयोजित ‘मध्यप्रदेश में निवेश की संभावनाओं पर संवाद’ कार्यक्रम के तहत आरपीजी समूह के अध्यक्ष हर्ष गोयनका से मुलाकात की। बैठक में मध्यप्रदेश में विद्युत पारेषण, टायर निर्माण और सूचना प्रौद्योगिकी सहित विभिन्न क्षेत्रों में निवेश की संभावनाओं को लेकर चर्चा हुई। बातचीत के दौरान संभावित निवेश परियोजनाओं और उनके लिए उपयुक्त स्थानों पर भी विचार-विमर्श किया गया।

    बैठक में हर्ष गोयनका ने जबलपुर में निवेश कर विद्युत पारेषण क्षेत्र में काम करने की इच्छा व्यक्त की। इस दौरान मध्यप्रदेश की औद्योगिक अवसंरचना, भौगोलिक स्थिति, कुशल कार्यबल और राज्य सरकार की निवेश अनुकूल नीतियों के आधार पर नई औद्योगिक इकाइयां स्थापित करने की संभावनाओं पर चर्चा हुई। जबलपुर में ट्रांसमिशन क्षेत्र से जुड़े निवेश को लेकर आगे की संभावनाओं पर भी विचार किया गया।

    आरपीजी समूह ने मध्यप्रदेश में टायर निर्माण इकाई स्थापित करने की संभावना पर भी चर्चा की। इसके लिए राज्य की केंद्रीय भौगोलिक स्थिति और कच्चे माल की उपलब्धता को महत्वपूर्ण आधार के रूप में देखा गया। बातचीत में रतलाम, सागर और जबलपुर को संभावित निवेश स्थलों के तौर पर रखा गया। इन स्थानों पर उपलब्ध औद्योगिक सुविधाओं और अन्य आवश्यकताओं का आकलन करने के बाद आगे की संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है।

    सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में निवेश को लेकर भी बैठक में सकारात्मक चर्चा हुई। आरपीजी समूह की टीम ने संभावित निवेश स्थलों का दौरा कर वहां उपलब्ध सुविधाओं और व्यावसायिक संभावनाओं का आकलन करने की इच्छा जताई। इस क्रम में उज्जैन के आईटी बिल्ट-अप पार्क में उपलब्ध प्लग-एंड-प्ले सुविधाओं के इस्तेमाल की संभावना पर भी विचार किया गया। तैयार बुनियादी ढांचे के जरिए समूह को आईटी क्षेत्र में अपनी गतिविधियां शुरू करने का अवसर मिल सकता है।

    बैठक में संभावित परियोजनाओं के लिए उपयुक्त भूमि, आवश्यक अनुमतियों, निवेश प्रोत्साहनों और एकल-खिड़की व्यवस्था के जरिए सहयोग उपलब्ध कराने जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई। प्राथमिकता वाले निवेश प्रस्तावों और संभावित स्थानों की पहचान कर आगे की प्रक्रिया को आसान बनाने पर जोर दिया गया। इससे प्रस्तावित परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक प्रक्रियाओं पर विचार किया गया।

    आरपीजी समूह अवसंरचना, मोबिलिटी, टायर, सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स, ऊर्जा समाधान और उभरती प्रौद्योगिकियों सहित विभिन्न क्षेत्रों में काम करता है। समूह के प्रमुख व्यवसायों में केईसी इंटरनेशनल, सिएट और जेनसार टेक्नोलॉजीज शामिल हैं। समूह की वैश्विक उपस्थिति छह महाद्वीपों के 135 से अधिक देशों में बताई गई है।

    आरपीजी समूह का मध्यप्रदेश से लंबे समय से जुड़ाव रहा है। वर्ष 1951 से आरपीजी ट्रांसमिशन लिमिटेड के माध्यम से समूह की राज्य में उपस्थिति रही है। इसकी प्रमुख कंपनी केईसी इंटरनेशनल ने नीमच अंतरराज्यीय पारेषण प्रणाली सहित मध्यप्रदेश की विद्युत पारेषण अवसंरचना के विकास में योगदान दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और हर्ष गोयनका के बीच हुई बैठक में ट्रांसमिशन, टायर निर्माण और आईटी क्षेत्रों में निवेश की संभावनाओं को आगे बढ़ाने से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई।

  • भारत की बिजली मांग एक दशक में दोगुनी, पीक डिमांड 270.8 गीगावाट पहुंची; स्थापित क्षमता बढ़कर 552 गीगावाट हुई

    भारत की बिजली मांग एक दशक में दोगुनी, पीक डिमांड 270.8 गीगावाट पहुंची; स्थापित क्षमता बढ़कर 552 गीगावाट हुई

    नई दिल्ली । भारत के बिजली क्षेत्र में पिछले एक दशक के दौरान तेजी से विस्तार हुआ है। बढ़ती आर्थिक गतिविधियों, औद्योगिक विस्तार, शहरीकरण और घरेलू स्तर पर बिजली की बढ़ती खपत के बीच देश की अधिकतम बिजली मांग करीब दोगुनी हो गई है। सरकार के अनुसार, इस बढ़ती जरूरत को पूरा करने के लिए बिजली उत्पादन क्षमता के साथ-साथ ट्रांसमिशन नेटवर्क और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भी बड़े स्तर पर विस्तार किया गया है।

    वर्ष 2013-14 में भारत की अधिकतम बिजली मांग 135.9 गीगावाट थी। यह मांग 21 मई 2026 को बढ़कर 270.8 गीगावाट के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। सरकार के मुताबिक, बिजली मांग में यह वृद्धि देश में बढ़ती आर्थिक गतिविधियों, शहरीकरण, उद्योगों के विस्तार और घरों में बिजली के लगातार बढ़ते उपयोग से जुड़ी है।

    बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए देश की कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। मार्च 2014 में भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 249 गीगावाट थी। जुलाई 2026 तक यह बढ़कर 552 गीगावाट हो गई। इस दौरान जोड़ी गई क्षमता ने मौजूदा बिजली जरूरतों को पूरा करने के साथ भविष्य की मांग के लिए बिजली व्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दिया है।

    उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ बिजली के पारेषण ढांचे का भी विस्तार किया गया। अप्रैल 2014 में देश के ट्रांसमिशन नेटवर्क की लंबाई 2,91,336 सर्किट किलोमीटर थी। जुलाई 2026 तक यह बढ़कर 5,10,594 सर्किट किलोमीटर हो गई। नेटवर्क के विस्तार से राष्ट्रीय ग्रिड को अधिक एकीकृत बनाने और अलग-अलग क्षेत्रों के बीच बिजली के प्रवाह को सुगम करने में मदद मिली है। इससे बिजली आपूर्ति की विश्वसनीयता बढ़ाने में भी योगदान मिला है।

    भारत ने पारंपरिक बिजली ढांचे के विस्तार के साथ स्वच्छ ऊर्जा क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया है। अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी की रिन्यूएबल एनर्जी स्टैटिस्टिक्स 2026 रिपोर्ट के अनुसार, स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मामले में भारत चीन और अमेरिका के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है।

    31 मार्च 2026 तक भारत की कुल गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित बिजली क्षमता 283.46 गीगावाट थी। इसमें 274.68 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा और 8.78 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता शामिल थी। वित्त वर्ष 2025-26 में देश ने 55.3 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता जोड़ी। यह अब तक का सबसे बड़ा वार्षिक इजाफा बताया गया है और पिछले वित्त वर्ष की तुलना में लगभग दोगुना है।

    ऊर्जा क्षेत्र में भारत ने जलवायु लक्ष्यों के संदर्भ में भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। जून 2025 में देश की कुल स्थापित बिजली क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। इस तरह भारत ने पेरिस समझौते के तहत वर्ष 2030 के लिए निर्धारित इस लक्ष्य को तय समय सीमा से पांच वर्ष पहले ही हासिल कर लिया।

  • केन्या में अदाणी एनर्जी की ट्रांसमिशन परियोजना से भारत-अफ्रीका सहयोग को नई रफ्तार, ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी होगी मजबूत

    केन्या में अदाणी एनर्जी की ट्रांसमिशन परियोजना से भारत-अफ्रीका सहयोग को नई रफ्तार, ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी होगी मजबूत

    नई दिल्ली । केन्या में अदाणी एनर्जी को प्रस्तावित बिजली ट्रांसमिशन परियोजना की मंजूरी भारत और केन्या के बीच आर्थिक तथा रणनीतिक सहयोग के नए दौर का संकेत मानी जा रही है। लगभग 117 अरब केन्याई शिलिंग की इस परियोजना से केवल बिजली अवसंरचना को मजबूती मिलने की उम्मीद नहीं है, बल्कि इसे दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक विकास साझेदारी और निवेश सहयोग के विस्तार के रूप में भी देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल भारत की अफ्रीका नीति और केन्या की ऊर्जा विकास रणनीति के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

    केन्या ने पिछले कुछ वर्षों में जियोथर्मल, पवन और सौर ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। हालांकि उत्पादन क्षमता बढ़ने के बावजूद देश का बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क उसी गति से विकसित नहीं हो पाया, जिसके कारण उपलब्ध ऊर्जा का पूरा उपयोग संभव नहीं हो सका। प्रस्तावित आधुनिक ट्रांसमिशन नेटवर्क इस कमी को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और नवीकरणीय ऊर्जा को अधिक प्रभावी ढंग से उपभोक्ताओं तक पहुंचाने में सहायता करेगा।

    इस परियोजना को केन्या की व्यापक आर्थिक रणनीति का भी हिस्सा माना जा रहा है। लंबे समय तक अफ्रीका में बड़े बुनियादी ढांचा निवेश मुख्य रूप से पश्चिमी वित्तीय संस्थानों और चीन के सहयोग से संचालित होते रहे हैं। ऐसे समय में भारत की बढ़ती भागीदारी केन्या के लिए एक अतिरिक्त विकल्प प्रस्तुत करती है। इससे प्रतिस्पर्धी निवेश, तकनीकी विशेषज्ञता और विविध अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर उपलब्ध हो सकते हैं, जिससे परियोजनाओं के क्रियान्वयन में अधिक संतुलन और लचीलापन आने की संभावना है।

    विश्लेषकों का मानना है कि निजी क्षेत्र की भागीदारी इस मॉडल की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। निजी निवेश और तकनीकी दक्षता के माध्यम से बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को गति देने का प्रयास दोनों देशों के लिए दीर्घकालिक लाभ का आधार बन सकता है। इससे परियोजनाओं के वित्तपोषण, संचालन और तकनीकी प्रबंधन में भी नए विकल्प विकसित होने की संभावना है।

    भारत के लिए केन्या केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि पूर्वी अफ्रीका और हिंद महासागर क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी माना जाता है। दोनों देशों के बीच व्यापार, समुद्री संपर्क, निवेश और विकास सहयोग लगातार बढ़ रहा है। ऊर्जा अवसंरचना में निवेश को भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत अफ्रीकी देशों के साथ आर्थिक संबंधों को मजबूत करने, संपर्क बढ़ाने और दीर्घकालिक विकास सहयोग को प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

    भारत और केन्या के बीच ऐतिहासिक संबंध भी इस साझेदारी को मजबूत आधार प्रदान करते हैं। व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और भारतीय मूल के समुदाय की सक्रिय भूमिका ने दशकों से दोनों देशों के संबंधों को मजबूत बनाए रखा है। यही कारण है कि नई ऊर्जा परियोजनाओं को केवल व्यावसायिक निवेश नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और साझा विकास के प्रतीक के रूप में भी देखा जा रहा है।

    ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परियोजना निर्धारित समयसीमा के अनुसार आगे बढ़ती है तो इससे केन्या की बिजली आपूर्ति व्यवस्था अधिक सक्षम होगी और नवीकरणीय ऊर्जा के बेहतर उपयोग का मार्ग प्रशस्त होगा। साथ ही भारत और केन्या के बीच तकनीकी सहयोग, निवेश और आर्थिक संबंधों को भी नई गति मिलेगी। आने वाले वर्षों में इस प्रकार की परियोजनाएं दोनों देशों के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी को और अधिक मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।