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  • ‘वंदे मातरम’ और सरकारी योजनाओं पर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का बड़ा बयान, लाभार्थियों की पात्रता पर उठाए सवाल

    ‘वंदे मातरम’ और सरकारी योजनाओं पर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का बड़ा बयान, लाभार्थियों की पात्रता पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम में आयोजित एक जनकल्याण कार्यक्रम के दौरान कई महत्वपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दों पर अपनी सरकार का पक्ष रखते हुए विपक्ष पर तीखे आरोप लगाए। अपने संबोधन में उन्होंने राष्ट्रभक्ति, सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता, सीमा सुरक्षा, सामाजिक कल्याण योजनाओं में कथित अनियमितताओं तथा सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाया। उनके बयान के बाद राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है।

    कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान के मुद्दे का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान देश के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कुछ लोगों को ‘वंदे मातरम’ बोलने या राष्ट्रगान के प्रति सम्मान व्यक्त करने में आपत्ति है, तो सरकारी योजनाओं के लाभ को लेकर भी चर्चा होना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि सरकार लाभार्थियों की पात्रता और प्रक्रियाओं को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए आवश्यक दस्तावेजी व्यवस्थाओं पर काम कर रही है।

    मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में सीमा सुरक्षा और जनसंख्या संबंधी विषयों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में केंद्र और राज्य स्तर पर निगरानी को मजबूत किया जा रहा है। उनके अनुसार सरकारी योजनाओं का लाभ केवल वास्तविक और पात्र नागरिकों तक पहुंचे, यह सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी कहा कि अवैध रूप से आने वाले लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने से रोकने के लिए विभिन्न स्तरों पर जांच और सत्यापन की प्रक्रिया को मजबूत किया जा रहा है।

    अपने संबोधन में शुभेंदु अधिकारी ने पूर्ववर्ती प्रशासन पर सरकारी धन के दुरुपयोग का आरोप भी लगाया। उन्होंने दावा किया कि विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाओं में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां वास्तविक पात्रता की जांच किए बिना लाभ वितरित किया गया। मुख्यमंत्री के अनुसार कुछ क्षेत्रों में ऐसे लाभार्थियों की पहचान हुई है, जिन्हें नियमों के अनुरूप सहायता नहीं मिलनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि सरकार ऐसे मामलों की समीक्षा कर रही है और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।

    उन्होंने छात्रवृत्ति वितरण और अन्य कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े कथित फर्जी खातों का भी जिक्र किया। मुख्यमंत्री का कहना था कि लाभार्थी डेटा के सत्यापन के दौरान कई संदिग्ध प्रविष्टियां सामने आई हैं, जिनकी जांच जारी है। उनका दावा है कि सरकारी संसाधनों का उपयोग केवल वास्तविक जरूरतमंद लोगों तक सीमित रखने के लिए प्रशासनिक स्तर पर व्यापक सुधार किए जा रहे हैं।

    रोजगार और ग्रामीण विकास के मुद्दे पर भी मुख्यमंत्री ने महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने कहा कि रोजगार उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार नए विकल्पों पर काम कर रही है और कार्यदिवसों को बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। इसके लिए बजटीय प्रावधान भी सुनिश्चित किए गए हैं ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का विस्तार किया जा सके।

    सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता को लेकर भी मुख्यमंत्री ने नई व्यवस्था का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भविष्य में अभ्यर्थियों को परीक्षा से संबंधित दस्तावेजों तक अधिक पहुंच दी जाएगी। उनका मानना है कि इससे भर्ती प्रक्रिया पर विश्वास बढ़ेगा और किसी भी प्रकार की अनियमितता की आशंका कम होगी। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक सुधारों का उद्देश्य केवल व्यवस्था को पारदर्शी बनाना ही नहीं, बल्कि युवाओं के विश्वास को मजबूत करना भी है।

    मुख्यमंत्री के इन बयानों के बाद राज्य की राजनीति में बहस तेज होने की संभावना है। आने वाले दिनों में विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया और सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदम इस मुद्दे को और अधिक चर्चा में ला सकते हैं।

  • डिजिटल कार्यप्रणाली से पारदर्शिता, त्वरित निर्णय एवं जवाबदेही होगी अधिक सुदृढ़: डीजीपी

    डिजिटल कार्यप्रणाली से पारदर्शिता, त्वरित निर्णय एवं जवाबदेही होगी अधिक सुदृढ़: डीजीपी


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) कैलाश मकवाणा ने कहा कि ई-आफिस प्रणाली के माध्यम से कार्यों में पारदर्शिता एवं गति आएगी, जिससे पुलिस कार्यप्रणाली और अधिक प्रभावी होगी। उन्होंने सभी इकाइयों को निर्देशित किया कि ई-आफिस का शत-प्रतिशत उपयोग सुनिश्चित किया जाए।

    डीजीपी मकवाणा बुधवार को पुलिस मुख्यालय भोपाल में आयोजित ऑनलाइन प्रशिक्षण सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने हाल ही में सम्पन्न नवरात्रि पर्व की व्यवस्थाओं की सराहना करते हुए आगामी हनुमान जयंती के अवसर पर विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश भी दिए।

    पुलिस विभाग में ई-आफिस प्रणाली के प्रभावी एवं अनिवार्य उपयोग को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यह ऑनलाइन प्रशिक्षण सत्र आयोजित किया गया था। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य पुलिस विभाग के समस्त कार्यालयों में डिजिटल कार्यप्रणाली को सुदृढ़ करते हुए कार्यों में पारदर्शिता, त्वरित निर्णय क्षमता एवं जवाबदेही को बढ़ाना है।

    प्रशिक्षण सत्र में प्रदेश के पुलिस आयुक्त इंदौर/भोपाल, समस्त पुलिस अधीक्षक, रेल पुलिस अधीक्षक (भोपाल, इंदौर, जबलपुर), प्रशिक्षण शालाओं के पुलिस अधीक्षक एवं समस्त सेनानी ऑनलाईन उपस्थित थे। साथ ही पुलिस मुख्यालय से अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक जयदीप प्रसाद, पुलिस महानिरीक्षक हरिनारायणचारी मिश्र, सहायक पुलिस महानिरीक्षक दीपक ठाकुर, ऋचा चौबे, एनआईसी से धर्मेंद्र जैन, सौरभ, देवेंद्र तिवारी सहित अन्य पुलिस अधिकारी उपस्थित रहे।

    डीजीपी ने कहा कि सभी अधिकारी स्वयं मौके पर जाकर प्रमुख भीड़भाड़ वाले स्थलों, विशेषकर धार्मिक स्थलों का निरीक्षण करें तथा आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करें। उन्होंने भीड़ प्रबंधन के दौरान एंट्री एवं एग्जिट मार्ग पृथक रखने, क्रॉस मूवमेंट रोकने, सीसीटीवी मॉनिटरिंग, मजबूत बैरिकेडिंग एवं सेक्टर आधारित व्यवस्था लागू करने के निर्देश दिए, साथ ही वीआईपी मूवमेंट के दौरान आमजन की आवाजाही बाधित न हो, इस पर विशेष ध्यान देने को कहा। पूर्व में घटित घटनाओं से सीख लेते हुए अधिकारियों को सतर्क एवं सक्रिय रहने के निर्देश भी दिए।

    अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक एससीआरबी जयदीप प्रसाद ने ई-आफिस की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि पुलिस मुख्यालय स्तर पर इसका 100 प्रतिशत उपयोग सुनिश्चित किया जा चुका है तथा इसे चरणबद्ध तरीके से प्रदेश के सभी कार्यालयों में लागू किया जा रहा है। उन्होंने डिजिटल कार्यप्रणाली को भविष्य की आवश्यकता बताते हुए सभी अधिकारियों से इसे प्राथमिकता के साथ अपनाने का आह्वान किया।

    एनआईसी से उपस्थित प्रशिक्षक अधिकारियों द्वारा ई आफिस प्रणाली के विभिन्न मॉड्यूल्स, फाइल प्रबंधन, नोटशीट, पत्राचार एवं अनुमोदन प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी दी गई तथा अधिकारियों के प्रश्नों के समाधान भी किए गए।

    बैठक में ई-विवेचना (e-Vivechana) ऐप के संबंध में भी जानकारी दी गई। समस्त पुलिस इकाइयों में पदस्थ विवेचकों को वितरित किए जा रहे ई-विवेचना टैबलेट के माध्यम से संपूर्ण अनुसंधान कार्य किए जाने तथा उनका प्रशिक्षण शीघ्र पूर्ण करने के निर्देश दिए गए। साथ ही घटना स्थल की फोटोग्राफी एवं वीडियोग्राफी हेतु ई-साक्ष्य ऐप, अनुसंधान की प्रभावी मॉनीटरिंग हेतु संदेश ऐप, तथा वर्ष 2016 से 2018 के लंबित चालानों के डेटा डिजिटाइजेशन हेतु उपलब्ध यूटिलिटी का उपयोग सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए।

    साथ ही, Measurement Collection Unit (MCU) के संबंध में भी आवश्यक निर्देश प्रदान किए गए। यह इकाई आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022 के अंतर्गत स्थापित एक विशेष सुविधा है, जिसके माध्यम से गिरफ्तार व्यक्तियों के बायोमेट्रिक डाटा जैसे फिंगरप्रिंट, आईरिस स्कैन, डीएनए सैंपल एवं फोटोग्राफ संग्रहित एवं विश्लेषित किए जाते हैं। इससे अपराधियों की पहचान एवं ट्रैकिंग प्रक्रिया आधुनिक एवं अधिक प्रभावी होगी।

  • बड़े पद पर सादगी की मिसाल बिहार के अफसरों की संपत्ति ने सबको किया हैरान

    बड़े पद पर सादगी की मिसाल बिहार के अफसरों की संपत्ति ने सबको किया हैरान


    नई दिल्ली । बिहार में प्रशासनिक पारदर्शिता की दिशा में उठाए गए एक कदम ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। राज्य के कई वरिष्ठ IAS और IPS अधिकारियों द्वारा अपनी संपत्ति सार्वजनिक करने के बाद जो तस्वीर सामने आई है वह चौंकाने वाली भी है और कहीं न कहीं सादगी की मिसाल भी पेश करती है। ऊंचे पदों पर बैठे इन अधिकारियों के पास न तो भारी भरकम संपत्ति है और न ही आलीशान जीवनशैली के संकेत हर जगह नजर आते हैं।

    बिहार के मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत के मामले में यह सामने आया कि उनकी पत्नी के पास उनसे अधिक संपत्ति है। उनके पास नकद राशि मात्र 15400 रुपये है जबकि बैंक खातों में सीमित जमा और थोड़े से निवेश हैं। उनके पास एक पुरानी कार और बहुत कम मात्रा में सोना है। इससे यह साफ होता है कि उच्च पद पर होने के बावजूद उनकी जीवनशैली बेहद साधारण है।

    वहीं बिहार के पुलिस महानिदेशक विनय कुमार का मामला भी चर्चा में है क्योंकि उनके पास नकद राशि बिल्कुल नहीं है। हालांकि उनके बैंक खातों में अच्छी खासी रकम जमा है और आभूषण के रूप में भी निवेश है। यह दर्शाता है कि आज के दौर में कई अधिकारी नकद रखने की बजाय डिजिटल और सुरक्षित निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं।

    कई अधिकारियों की संपत्ति में और भी दिलचस्प पहलू सामने आए हैं। जैसे अरविंद कुमार चौधरी के पास खुद की कोई कार नहीं है जबकि नर्मदेश्वर लाल के पास न तो जमीन है और न ही वाहन। यह ऐसे उदाहरण हैं जो आम धारणा को चुनौती देते हैं कि बड़े पदों पर बैठे लोगों के पास अपार संपत्ति होती ही है।

    इसी तरह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सचिव कुमार अनुपम के पास मात्र 5000 रुपये नकद हैं जबकि उनकी कुल बचत बैंक और अन्य योजनाओं में जमा है। यह भी एक संकेत है कि अब वित्तीय प्रबंधन का तरीका बदल रहा है और लोग नकद की बजाय निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं।

    कुछ अधिकारियों ने निवेश के अलग अलग तरीके अपनाए हैं। धर्मेंद्र सिंह के पास जहां बैंक बैलेंस और बॉन्ड निवेश है वहीं उनके पास दो गाय और दो बछड़े भी हैं जो पारंपरिक और ग्रामीण निवेश का उदाहरण पेश करते हैं। वहीं कुंदन कृष्णन ने शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड में निवेश कर आधुनिक वित्तीय योजना को अपनाया है।

    इस पूरी सूची में एक बात साफ तौर पर उभरकर सामने आती है कि बिहार के कई अधिकारी सादगी भरा जीवन जी रहे हैं और अपनी आय को सोच समझकर अलग अलग क्षेत्रों में निवेश कर रहे हैं। कहीं परंपरागत साधन हैं तो कहीं आधुनिक वित्तीय उपकरणों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

    यह खुलासा न सिर्फ पारदर्शिता को बढ़ावा देता है बल्कि आम लोगों के बीच यह संदेश भी देता है कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग भी सादगी और संतुलित जीवनशैली को अपनाते हैं। यह तस्वीर उस सोच को बदलने का काम करती है जिसमें अक्सर यह मान लिया जाता है कि ऊंचे पद का मतलब अत्यधिक संपत्ति और विलासिता ही होता है।

  • विदेशी नागरिकों के आधार पर सख्ती: वीजा खत्म होते ही होगा निष्क्रिय, OCI और नेपाल-भूटान नागरिकों के लिए 10 साल तक वैध

    विदेशी नागरिकों के आधार पर सख्ती: वीजा खत्म होते ही होगा निष्क्रिय, OCI और नेपाल-भूटान नागरिकों के लिए 10 साल तक वैध


    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने विदेशियों के आधार कार्ड की वैधता को लेकर नए सख्त नियम लागू कर दिए हैं। अब स्पष्ट कर दिया गया है कि भारत में वीजा लेकर रहने वाले सभी विदेशी नागरिकों का आधार कार्ड उनकी कानूनी स्थिति और वीजा की अवधि से सीधे जुड़ा रहेगा। इसका मतलब यह है कि वीजा समाप्त होते ही आधार कार्ड स्वतः निष्क्रिय डिएक्टिवेट कर दिया जाएगा जिससे फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल पर कड़ी रोक लगेगी।

    सरकार ने बताया कि ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया कार्डधारक जिनका भारतीय मूल से संबंध है और जिन्हें लंबी अवधि तक रहने की विशेष अनुमति प्राप्त है उनके आधार कार्ड 10 वर्षों तक मान्य रहेंगे। 10 साल के बाद उन्हें आधार को नवीनीकरण या अपडेट करवाना होगा। इस प्रकार OCI कार्डधारकों को स्थायी रूप से आधार से जुड़े लाभों और सेवाओं का फायदा मिलता रहेगा।

    लॉन्ग टर्म वीजा पर भारत में रह रहे अन्य विदेशी नागरिकों के आधार कार्ड केवल उनके वीजा की अवधि तक ही वैध होंगे। इसी तरह टूरिस्ट बिजनेस स्टूडेंट और अन्य श्रेणी के वीजा पर आने वाले विदेशी नागरिकों का आधार कार्ड भी वीजा समाप्त होते ही निष्क्रिय कर दिया जाएगा। यह कदम पारदर्शिता बढ़ाने और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

    नेपाल और भूटान के नागरिकों के लिए अलग व्यवस्था रखी गई है। भारत के साथ विशेष संबंध वाले इन देशों के नागरिकों के आधार कार्ड 10 वर्षों तक वैध रहेंगे। यह प्रावधान उन सुविधाओं और लंबी अवधि के प्रवास को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है ताकि उनके लिए आधार से जुड़े लाभ जारी रह सकें।

    सरकार का कहना है कि पिछली कुछ वर्षों में ऐसे मामले सामने आए थे जहां वीजा समाप्त होने के बावजूद विदेशी नागरिक फर्जी दस्तावेजों के आधार पर आधार बनवा लेते थे और देश में रहते थे। नई व्यवस्था के तहत अब आधार कार्ड की वैधता सीधे व्यक्ति की कानूनी स्थिति और वीजा अवधि से जुड़ी होगी। इससे सरकारी योजनाओं बैंकिंग सेवाओं और अन्य सुविधाओं में किसी भी तरह के दुरुपयोग पर रोक लगेगी।

    विभागीय अधिकारियों ने बताया कि आधार की निगरानी प्रणाली को और सख्त बनाया जाएगा। डिजिटल माध्यम और तकनीकी उपकरणों की मदद से वीजा समाप्त होते ही संबंधित आधार कार्ड स्वतः निष्क्रिय कर दिया जाएगा। इसके साथ ही यह सुनिश्चित किया जाएगा कि सभी विदेशी नागरिक केवल वैध आधार के माध्यम से ही सेवाओं का लाभ उठा सकें।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम न केवल सुरक्षा बढ़ाने में मदद करेगा बल्कि विदेशी नागरिकों और भारतीय नागरिकों के बीच पारदर्शिता और विश्वास को भी मजबूत करेगा। इससे फर्जी दस्तावेजों के खतरे को कम करने में मदद मिलेगी और आधार प्रणाली की विश्वसनीयता बनी रहेगी।

  • राज्य प्रशासनिक सेवा के 25 अधिकारियों को नहीं मिली पदोन्नति79 को मिलेगा लाभ

    राज्य प्रशासनिक सेवा के 25 अधिकारियों को नहीं मिली पदोन्नति79 को मिलेगा लाभ


    भोपाल । मध्य प्रदेश में राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के लिए विभागीय पदोन्नति समिति डीपीसी की बैठक शुक्रवार को मंत्रालय में आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता मुख्य सचिव अनुराग जैन ने कीजिसमें 79 अधिकारियों को पदोन्नति देने का निर्णय लिया गयाजबकि 25 अधिकारियों को विभागीय जांच और प्रतिकूल गोपनीय चरित्रावली के कारण पदोन्नति से रोक दिया गया। यह पदोन्नति 1 जनवरी 2026 से प्रभावी होगी।

    पदोन्नति प्रक्रिया

    बैठक में अधिकारियों के विभिन्न पदों पर पदोन्नति के लिए चर्चा की गई। डिप्टी कलेक्टर से संयुक्त कलेक्टर के पद के लिए 9 अधिकारियों पर विचार किया गयाजिनमें से 7 अधिकारियों को पदोन्नति दी गईजबकि दो के नाम रोके गए। इसी तरहसंयुक्त कलेक्टर से अतिरिक्त कलेक्टर के पद के लिए 72 अधिकारियों को पदोन्नति देने का निर्णय लिया गया। हालांकिइस श्रेणी में 13 अधिकारियों को विभिन्न कारणों से पदोन्नति के योग्य नहीं माना गया।इसके अतिरिक्तकुछ अधिकारियों को उच्च वेतनमान देने का भी निर्णय लिया गयाजबकि कुछ अधिकारियों की पदोन्नति रोकी गई।

    विभागीय जांच और प्रतिकूल गोपनीय चरित्रावली

    25 अधिकारियों के नाम पदोन्नति सूची से बाहर किए गएक्योंकि उनके खिलाफ विभागीय जांच चल रही थी या उनके गोपनीय चरित्रावली में प्रतिकूल प्रविष्टियां थीं। इन अधिकारियों के पदोन्नति का निर्णय फिलहाल रोक दिया गया है। यह निर्णय प्रशासनिक प्रक्रिया और पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए लिया गया हैताकि पदोन्नति केवल उन्हीं अधिकारियों को मिलेजिनकी कार्यक्षमता और चरित्र साफ-सुथरा हो।

    आइपीएस अधिकारियों के लिए पदोन्नति

    आइपीएस अधिकारियों के लिए पदोन्नति समिति की बैठक 19 दिसंबर को प्रस्तावित की गई है। इसमें तीन अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक को विशेष महानिदेशकदो पुलिस महानिरीक्षक को अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक16 पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारियों को उप पुलिस महानिरीक्षक और आठ अधिकारियों को सलेक्शन ग्रेड में पदोन्नति देने का प्रस्ताव है।

    भविष्य की दिशा

    पदोन्नति प्रक्रिया से यह साफ हो जाता है कि प्रशासनिक सेवा में पारदर्शिता और ईमानदारी को प्राथमिकता दी जा रही है। अधिकारियों के चयन में उनकी कार्यक्षमता के साथ-साथ उनके चरित्र का भी मूल्यांकन किया जा रहा है। हालांकिपदोन्नति से जुड़े विवाद और अड़चनों से बचने के लिए यह जरूरी होगा कि अधिकारियों के खिलाफ चल रही विभागीय जांच पूरी पारदर्शिता से पूरी की जाए। यह निर्णय निश्चित रूप से राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम हैजो उनके कार्यक्षेत्र में दक्षता और ईमानदारी को बढ़ावा देगा।