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  • टेक्सास कोर्ट ने 46 अरब डॉलर की बॉर्डर वॉल योजना पर लगाई अस्थायी रोक, बिग बेंड में निर्माण पर फिलहाल ब्रेक

    टेक्सास कोर्ट ने 46 अरब डॉलर की बॉर्डर वॉल योजना पर लगाई अस्थायी रोक, बिग बेंड में निर्माण पर फिलहाल ब्रेक


    नई दिल्ली:
    डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की 46 अरब डॉलर की बॉर्डर वॉल योजना को टेक्सास की संघीय अदालत से झटका लगा है। अदालत ने बिग बेंड इलाके में बॉर्डर वॉल और उससे जुड़ी अन्य बुनियादी सुविधाओं के निर्माण पर फिलहाल अस्थायी रोक लगा दी है। इस परियोजना के तहत अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर 30 फीट ऊंची स्टील की दीवारें बनाने के साथ वाहनों को रोकने वाले बैरियर, सड़कें और आधुनिक निगरानी तकनीक लगाए जाने की योजना है।

    यह रोक फिलहाल अस्थायी है। बिग बेंड इलाके में जमीन मालिकों और पर्यावरण समूहों के विरोध के बीच अदालत का यह आदेश आया है। निर्माण का विरोध करने वालों का कहना है कि बिग बेंड का इलाका इतना दूर-दराज और दुर्गम है कि वह अपने आप में अवैध आव्रजन को रोकने का काम करता है।

    टेक्सास की संघीय अदालत ने शुक्रवार को यह आदेश जारी किया। जज कैथलीन कार्डोने ने अपने फैसले में कहा कि वादी अपने दावों में सफल होते दिखाई दे रहे हैं और यदि रोक नहीं लगाई गई तो उन्हें गंभीर नुकसान हो सकता है। अदालत का आदेश ऐसे समय आया है, जब प्रशासन ने कुछ ही सप्ताह पहले बिग बेंड सेक्टर में बॉर्डर वॉल के पहले पैनल लगाए थे।

    यानी निर्माण शुरू होने के कुछ समय बाद ही उस पर अस्थायी रोक लगा दी गई। अदालत के आदेश के तहत ट्रंप प्रशासन को बिग बेंड क्षेत्र में बॉर्डर वॉल के साथ दूसरी बुनियादी सुविधाओं के निर्माण से भी फिलहाल रोका गया है।

    इस मामले में जमीन मालिकों, कारोबारियों और पर्यावरण समूहों ने परियोजना का विरोध किया था। विरोध करने वालों का आरोप है कि प्रशासन ने नियमों को किनारे रखकर कई छूट दीं और कानून का उल्लंघन किया। इन समूहों का कहना है कि बिग बेंड की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए वहां इस तरह की सीमा दीवार की जरूरत पर सवाल उठते हैं।

    निर्माण का विरोध करने वाले पक्षों के अनुसार, इलाके की दुर्गमता पहले से ही अवैध आव्रजन को रोकने में भूमिका निभाती है। इस मामले में जमीन मालिकों और पर्यावरण समूहों ने निर्माण कार्य के खिलाफ कानूनी कदम उठाया था, जिसके बाद अदालत ने अस्थायी रोक का आदेश दिया।

    यह मामला सेंटर ऑफ बायोलॉजिकल डायवर्सिटी की ओर से दायर किया गया था। संगठन की ओर से लाइकेन जोर्डहल ने अदालत के फैसले को पूरी जीत बताया और इसे बिग बेंड, टेक्सास तथा संविधान के लिए ऐतिहासिक दिन करार दिया।

    वहीं, अदालत के आदेश से फिलहाल 46 अरब डॉलर की व्यापक योजना के तहत बिग बेंड क्षेत्र में प्रस्तावित निर्माण कार्य प्रभावित हुआ है। परियोजना में सीमा पर दीवार के अलावा वाहनों को रोकने वाले बैरियर, सड़कें और निगरानी की आधुनिक तकनीक शामिल है। फिलहाल अदालत की अस्थायी रोक के कारण इस क्षेत्र में इन निर्माण गतिविधियों को आगे बढ़ाने पर विराम लगा है।
  • ट्रंप प्रशासन की 46 अरब डॉलर की बॉर्डर योजना पर कोर्ट की रोक, टेक्सास में दीवार निर्माण अस्थायी रूप से रुका

    ट्रंप प्रशासन की 46 अरब डॉलर की बॉर्डर योजना पर कोर्ट की रोक, टेक्सास में दीवार निर्माण अस्थायी रूप से रुका


    नई दिल्ली। टेक्सास की एक फेडरल कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन की दक्षिणी सीमा पर बॉर्डर वॉल और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की योजना को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने राज्य के बिग बेंड इलाके में प्रस्तावित निर्माण कार्यों पर अस्थायी रोक लगा दी है। यह मामला स्थानीय लैंडओनर्स, कारोबारियों और पर्यावरणविदों की आपत्तियों से जुड़ा है, जिन्होंने इस परियोजना को चुनौती दी थी।

    यह प्रोजेक्ट ट्रंप प्रशासन की करीब 46 अरब डॉलर की व्यापक सीमा सुरक्षा योजना का हिस्सा है। इसके तहत अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर करीब 30 फीट ऊंची स्टील की दीवारें, व्हीकल बैरियर्स, सड़कें और सर्विलांस टेक्नोलॉजी लगाने की योजना है।

    जज ने कहा- वादियों को गंभीर नुकसान का खतरा
    फेडरल जज कैथलीन कार्डोने ने अपने आदेश में कहा कि मामले में वादी अपने दावों में सफल होते हुए दिखाई दे रहे हैं और यदि निर्माण पर रोक नहीं लगाई गई तो उन्हें गंभीर नुकसान हो सकता है। इसी आधार पर कोर्ट ने फिलहाल बिग बेंड सेक्टर में निर्माण गतिविधियों को आगे बढ़ाने से प्रशासन को रोक दिया।

    कोर्ट के आदेश पर अमेरिकी कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन (CBP) और डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।

    दूर-दराज इलाका होने से सुरक्षा पहले से मजबूत होने का दावा
    बॉर्डर वॉल का विरोध कर रहे स्थानीय पक्षों का तर्क है कि बिग बेंड इलाका बेहद दूर-दराज और दुर्गम है। उनके मुताबिक, इस भौगोलिक स्थिति के कारण यहां अवैध तरीके से सीमा पार करना पहले ही कठिन है, इसलिए इस इलाके में भारी-भरकम बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत पर सवाल उठते हैं।

    याचिकाकर्ताओं ने प्रशासन पर निर्माण परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए नियमों में कई तरह की छूट देने और कानूनी प्रक्रियाओं को दरकिनार करने का आरोप लगाया है। हालांकि, ये आरोप मामले में पक्षकारों के दावे हैं और अंतिम कानूनी निष्कर्ष कोर्ट के आगे के फैसले पर निर्भर करेगा।

    पर्यावरण संगठन ने फैसले को बताया बड़ी जीत
    मामले में याचिका दायर करने वाले सेंटर फॉर बायोलॉजिकल डायवर्सिटी के लाइकेन जोर्डहल ने कोर्ट के आदेश का स्वागत किया। उन्होंने इसे पूरी जीत बताते हुए कहा कि अंतिम फैसला आने तक निर्माण के लिए इस्तेमाल हो रहे बुलडोजर वापस लौटेंगे।

    जोर्डहल ने इसे बिग बेंड, टेक्सास और अमेरिकी संविधान के लिए ऐतिहासिक दिन बताया। वहीं, कोर्ट की मौजूदा रोक फिलहाल अस्थायी है और इससे परियोजना पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।

    कुछ हफ्ते पहले शुरू हुआ था निर्माण
    कोर्ट का यह आदेश ऐसे समय आया है, जब ट्रंप प्रशासन के बिग बेंड सेक्टर में बॉर्डर वॉल के पहले पैनल लगाए जाने के कुछ सप्ताह ही हुए हैं। प्रशासन की व्यापक योजना के तहत दक्षिणी सीमा पर दीवार के साथ-साथ वाहन अवरोधक, सड़कें और निगरानी से जुड़ी तकनीक विकसित करने का प्रस्ताव है।

    अब कोर्ट की अस्थायी रोक के कारण बिग बेंड इलाके में इन निर्माण गतिविधियों को आगे बढ़ाने पर फिलहाल ब्रेक लग गया है। मामले में आगे होने वाली सुनवाई और अंतिम फैसला यह तय करेगा कि इस हिस्से में प्रस्तावित निर्माण को स्थायी रूप से आगे बढ़ाया जा सकेगा या नहीं।

  • व्हाइट हाउस मीडिया बैन पर कोर्ट में सुनवाई, जज बोले- संस्थानों को पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं मिला

    व्हाइट हाउस मीडिया बैन पर कोर्ट में सुनवाई, जज बोले- संस्थानों को पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं मिला


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से CNN, MS NOW और Politico को व्हाइट हाउस से बैन किए जाने का मामला अब अदालत पहुंच गया है। सुनवाई के दौरान अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट जज टिमोथी केली ने प्रशासन के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि मीडिया संस्थानों को बैन से पहले अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।

    जज केली ने फिलहाल इस मामले में कोई तत्काल आदेश जारी नहीं किया है। उन्होंने कहा कि वह जल्द फैसला सुनाएंगे। तीनों मीडिया संस्थानों ने अदालत से मांग की है कि उनकी व्हाइट हाउस प्रेस एक्सेस अंतिम कानूनी निर्णय आने तक तुरंत बहाल की जाए।

    जज ने पुराने अदालती फैसलों का किया उल्लेख

    सुनवाई के दौरान जज टिमोथी केली ने अमेरिकी कोर्ट ऑफ अपील्स के दो पुराने फैसलों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इन फैसलों के मुताबिक व्हाइट हाउस की प्रेस एक्सेस वापस लेने से पहले पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को उचित प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।

    केली ने यह भी कहा कि भले ही सरकार इन पुराने अदालती फैसलों को गलत मानती हो, लेकिन डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज के तौर पर उन्हें फिलहाल इन्हीं कानूनी मिसालों का पालन करना होगा।

    उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि यदि मीडिया बैन पहले ही लागू कर दिया गया था, तो उसके बाद भेजे गए पत्र किस तरह संबंधित संस्थानों को पहले से नोटिस देने और अपना जवाब रखने का अवसर प्रदान कर सकते हैं।

    ट्रंप प्रशासन ने सुरक्षा को बनाया आधार

    ट्रंप प्रशासन की ओर से अदालत में दलील दी गई कि व्हाइट हाउस में मीडिया की पहुंच कोई कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि एक सुविधा है। सरकार का कहना है कि राष्ट्रपति को सुरक्षा और प्रशासनिक कारणों से मीडिया संस्थानों की पहुंच सीमित करने का अधिकार है।

    सरकारी वकील ने यह भी दावा किया कि तीनों मीडिया संस्थानों की कुछ रिपोर्टों से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े हुए थे। प्रशासन ने अपनी दलील के समर्थन में मिसाइल भंडार, व्हाइट हाउस में बन रहे बॉलरूम और रिपब्लिकन पार्टी के मिडटर्म कन्वेंशन से जुड़ी रिपोर्टों का हवाला दिया।

    मीडिया संस्थानों ने फर्स्ट अमेंडमेंट का दिया हवाला

    CNN, MS NOW और Politico ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर किया है। तीनों संस्थानों का कहना है कि व्हाइट हाउस का बैन अमेरिकी संविधान के फर्स्ट अमेंडमेंट में दिए गए प्रेस और अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के साथ-साथ उचित कानूनी प्रक्रिया के अधिकार का उल्लंघन करता है।

    मीडिया संस्थानों ने आरोप लगाया है कि ट्रंप प्रशासन ने उन रिपोर्टों के चलते कार्रवाई की, जो राष्ट्रपति को पसंद नहीं थीं।

    यह विवाद ट्रंप और अमेरिकी मीडिया के बीच लंबे समय से चले आ रहे टकराव के बीच सामने आया है। बैन के बाद कई बड़े अमेरिकी टीवी नेटवर्क ने इसके विरोध में व्हाइट हाउस की साझा वीडियो कवरेज रोकने का कदम भी उठाया था।

    2018 के जिम एकोस्टा मामले की भी चर्चा

    मौजूदा विवाद की तुलना 2018 में CNN के पत्रकार जिम एकोस्टा से जुड़े मामले से भी की जा रही है। उस समय भी जज टिमोथी केली ने व्हाइट हाउस को एकोस्टा का प्रेस पास बहाल करने का आदेश दिया था। अदालत ने उस मामले में माना था कि प्रेस पास वापस लेने से पहले उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।

    अब एक बार फिर व्हाइट हाउस और मीडिया से जुड़े मामले की सुनवाई जज केली के सामने है। फिलहाल अदालत ने CNN, MS NOW और Politico पर लगाया गया बैन हटाने का आदेश नहीं दिया है। मामले में जज केली के अगले फैसले का इंतजार है।

  • ट्रंप प्रशासन के वीजा नियम पर कोर्ट की रोक, विदेशी छात्रों और पत्रकारों को मिली राहत

    ट्रंप प्रशासन के वीजा नियम पर कोर्ट की रोक, विदेशी छात्रों और पत्रकारों को मिली राहत


    वॉशिंगटन। अमेरिका में ट्रंप प्रशासन को संघीय अदालत से झटका लगा है। बोस्टन के एक फेडरल जज ने विदेशी छात्रों, एक्सचेंज विजिटर्स और पत्रकारों के अमेरिका में रहने की अवधि सीमित करने वाले नए नियम पर रोक लगा दी है। अमेरिकी जिला जज एफ. डेनिस सेलॉर ने यूनियनों और उच्च शिक्षा की वकालत करने वाले संगठनों के गठबंधन के पक्ष में फैसला सुनाया। यह आदेश नए नियम के लागू होने से ठीक एक दिन पहले आया।

    जज बोले- पांच दशक पुरानी व्यवस्था बदलने का तर्क कमजोर
    जज सेलॉर ने कहा कि डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने नियम में बदलाव के लिए पर्याप्त मजबूत तर्क नहीं दिए। विभाग ने वीजा व्यवस्था में धोखाधड़ी रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया था, लेकिन अदालत के मुताबिक DHS ने नियम बदलने से जुड़ी समस्याओं का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया और आसान विकल्पों पर भी विचार नहीं किया।

    पूर्व रिपब्लिकन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश द्वारा नियुक्त जज ने कहा कि प्रस्तावित नियम अमेरिका में करीब पांच दशक से चली आ रही व्यवस्था को बदल देता। मौजूदा व्यवस्था के तहत विदेशी छात्र अपने कोर्स की अवधि पूरी होने तक अमेरिका में रह और काम कर सकते हैं। अदालत ने इस व्यवस्था के योगदान को भी रेखांकित किया। जज के मुताबिक, इससे करोड़ों छात्रों और शोधकर्ताओं को विज्ञान, मेडिकल और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर मिला और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी बड़ा फायदा हुआ।

    क्या बदलाव करना चाहता था ट्रंप प्रशासन?
    DHS ने जुलाई में नया नियम प्रस्तावित किया था, जिसमें अमेरिका में विदेशी नागरिकों के रहने की अवधि के लिए निश्चित समयसीमा तय करने का प्रावधान था। इसके तहत विदेशी छात्रों के F वीजा और सांस्कृतिक एक्सचेंज विजिटर्स के J वीजा की अवधि अधिकतम चार साल तक सीमित की जानी थी। इसके अलावा विदेशी पत्रकारों को दिए जाने वाले I वीजा, जो कई वर्षों तक वैध रहते हैं, उनकी अवधि घटाकर केवल 240 दिन करने का प्रस्ताव था। नियम का मकसद वीजा व्यवस्था में धोखाधड़ी रोकना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को नियंत्रित करना बताया गया था।

    21 लाख से ज्यादा वीजा धारकों पर पड़ सकता था असर
    उपलब्ध जानकारी के मुताबिक अमेरिका में फिलहाल करीब 16 लाख F वीजा और 5 लाख J वीजा धारक हैं। ऐसे में प्रस्तावित बदलाव का असर बड़ी संख्या में विदेशी छात्रों और एक्सचेंज विजिटर्स पर पड़ सकता था। जज सेलॉर ने उच्च शिक्षा संस्थानों पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर भी चिंता जताई। उनके मुताबिक, नई नीति लागू होने पर बड़े विश्वविद्यालयों में विदेशी छात्रों के दाखिले कम हो सकते हैं और संस्थानों को करोड़ों डॉलर का नुकसान उठाना पड़ सकता है।

    MIT-हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालयों पर असर की आशंका
    फैसले में अमेरिका के प्रमुख रिसर्च विश्वविद्यालयों का भी उल्लेख किया गया। जज ने कहा कि MIT और हार्वर्ड जैसे संस्थानों में स्नातक स्तर पर बड़ी संख्या में विदेशी छात्र अध्ययन करते हैं। अदालत के मुताबिक, विदेशी छात्रों की संख्या में बड़ी गिरावट का असर सिर्फ विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अमेरिकी उच्च शिक्षा व्यवस्था और अर्थव्यवस्था को भी नुकसान हो सकता है। जज ने इसे संभावित रूप से विनाशकारी बताया।

    इस तरह अदालत की रोक ने फिलहाल विदेशी छात्रों, एक्सचेंज विजिटर्स और पत्रकारों के लिए प्रस्तावित नई समयसीमा को लागू होने से रोक दिया है। मामले में अदालत की आगे की कार्रवाई और प्रशासन की अगली रणनीति पर अब नजर रहेगी।

  • अमेरिकी सेना की मदद करने वाले अफगान परिवार को भी नहीं बख्शा, ट्रंप प्रशासन ने दर्जनों प्रवासियों को अफ्रीका भेजा

    अमेरिकी सेना की मदद करने वाले अफगान परिवार को भी नहीं बख्शा, ट्रंप प्रशासन ने दर्जनों प्रवासियों को अफ्रीका भेजा


    नई दिल्ली। अमेरिकी सेना के साथ काम करने वाले परिवार से ताल्लुक रखने वाले एक अफगान नागरिक समेत दर्जनों प्रवासियों को ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका से निकालकर अफ्रीकी देश सेंट्रल अफ्रीकी गणराज्य भेज दिया। शनिवार (29 अगस्त) को हुई इस निर्वासन उड़ान में 12 अफगान और 8 ईरानी नागरिकों के अलावा नेपाल और निकारागुआ के कई नागरिक भी शामिल थे। अफगान नागरिक के वकील और मानवाधिकार संगठनों ने इसकी जानकारी दी है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, निर्वासित किए गए अफगान नागरिक की उम्र करीब 20 साल है। उसके वकील अल्मा डेविड के अनुसार, अमेरिकी अदालत ने उसे अफगानिस्तान भेजे जाने से सुरक्षा दी थी, क्योंकि वहां उसे तालिबान से खतरा था। अदालत में पेश दस्तावेजों के मुताबिक, अमेरिकी सेना के समर्थन में उसके भाइयों द्वारा किए गए काम की वजह से अफगानिस्तान में उसके परिवार को तालिबान की धमकियां मिली थीं।

    एक भाई अमेरिकी सेना के साथ काम कर चुका, दूसरे की तालिबान ने की हत्या

    अल्मा डेविड के मुताबिक, अफगान नागरिक का एक भाई अमेरिका में रहता है और अफगान नेशनल आर्मी में काम कर चुका है। यह सेना 2021 में तालिबान के सत्ता में आने से पहले अमेरिकी सेना के साथ मिलकर काम करती थी। उसके एक अन्य भाई ने अमेरिकी प्रशिक्षण लेकर पायलट के तौर पर काम किया था, लेकिन तालिबान ने उसकी हत्या कर दी थी।

    इसके बावजूद अफगान नागरिक को अमेरिका में रहने की अनुमति नहीं मिली और उसे निर्वासन की कार्रवाई का सामना करना पड़ा।

    12 अफगान और 8 ईरानी नागरिकों को भेजा गया

    शनिवार को सेंट्रल अफ्रीकी गणराज्य की राजधानी बांगुई पहुंची निर्वासन उड़ान में 12 अफगान और 8 ईरानी नागरिक शामिल थे। इसके अलावा नेपाल और निकारागुआ के कई नागरिकों को भी इसी उड़ान से भेजा गया। ह्यूमन राइट्स फर्स्ट की नीति, शरणार्थी और अप्रवासी अधिकार निदेशक सावी अरवे ने इसकी जानकारी दी।

    मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने कई गुप्त समझौतों के तहत हजारों प्रवासियों को करीब दो दर्जन ऐसे देशों में भेजा है, जो उनके अपने देश नहीं हैं। इसे प्रशासन की व्यापक इमिग्रेशन कार्रवाई का हिस्सा माना जा रहा है।

    जून के बाद सेंट्रल अफ्रीकी गणराज्य के लिए दूसरी उड़ान

    इमिग्रेशन वकीलों का कहना है कि इस प्रक्रिया के जरिए कुछ शरण मांगने वालों को कानूनी रास्ते से अप्रत्यक्ष रूप से उन देशों में वापस भेजा जा रहा है, जहां से वे भागे थे।

    शनिवार की उड़ान जून के बाद सेंट्रल अफ्रीकी गणराज्य के लिए ऐसी दूसरी निर्वासन उड़ान थी। जून में भेजी गई उड़ान में करीब दो दर्जन प्रवासी शामिल थे। इनमें एक ईरानी महिला भी थी, जिसने अपने देश में उत्पीड़न का सामना करने की बात कही थी।

    मानवाधिकार संगठनों ने ट्रंप प्रशासन की इस नीति को लेकर चिंता जताई है और सवाल उठाया है कि ऐसे लोगों को उन देशों में भेजना कितना सुरक्षित है, जहां उन्हें उत्पीड़न या खतरे का सामना करना पड़ सकता है।

  • US: ट्रंप प्रशासन का भारतीयों पर एक और प्रहार…. F-1 छात्र वीजा में की भारी कटौती

    US: ट्रंप प्रशासन का भारतीयों पर एक और प्रहार…. F-1 छात्र वीजा में की भारी कटौती


    वाशिंगटन।
    ट्रंप प्रशासन (Trump Administration) ने बीते साल भारतीय और चीनी छात्रों को जारी किए जाने वाले एफ-1 छात्र वीजा (F-1 Student Visa) में भारी कटौती की है। सेंटर फॉर इमिग्रेशन स्टडीज (Center for Immigration Studies) की रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में 2025 में भारतीय और चीनी नागरिकों को जारी किए छात्र वीजा की संख्या में पिछले वर्षों की तुलना में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।

    2024-25 शैक्षणिक सत्र में अमेरिका के उच्च शिक्षण संस्थानों में 11,77,766 विदेशी छात्र पढ़ रहे थे। इनमें भारत के 3,63,019 और चीन के 2,65,919 छात्र शामिल थे। दोनों देशों के छात्र मिलाकर कुल विदेशी छात्रों का 53 प्रतिशत हिस्सा थे।


    अमेरिका में ओपीटी योजना भी प्रभावित

    डिग्री पूरी करने के बाद ओपीटी कार्यक्रम के तहत विदेशी छात्रों को अमेरिका में काम करने की अनुमति मिलती है। वीजा कटौती से ये योजना भी प्रभावित हुई। आईआईई के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में 2,94,253 विदेशी छात्र ओपीटी के तहत काम कर रहे थे। इनमें भारत के 1,43,740 और चीन के 61,981 छात्र शामिल थे। 2024 में ओपीटी के तहत काम करने वाले 1,65,524 विदेशी छात्रों में से 68 प्रतिशत भारत और चीन के नागरिक थे। इनमें 79,331 भारतीय और 33,807 चीनी छात्र शामिल थे।

    सीआईएस का कहना है कि यदि भारत और चीन से आने वाले छात्रों की संख्या घटती है तो ओपीटी के माध्यम से अमेरिकी श्रम बाजार में आने वाले विदेशी पेशेवरों की संख्या भी प्रभावित हो सकती है।


    22 हजार भारतीयों को बीते वर्ष जारी हुआ वीजा

    रिपोर्ट की मानें तो बीते साल मई से अगस्त के बीच 22149 भारतीयों को एफ-1 छात्र वीजा जारी किए गए। साल 2024 में इसी अवधि के दौरान अमेरिकी प्रशासन द्वारा 58,694 वीजा जारी किए गए थे, यानी 62 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी। चीनी छात्रों की बात करें तो मई-अगस्त 2025 के दौरान चीनी छात्रों को 40,034 वीजा जारी किए गए। 2024 में ये संख्या 61,075 वीजा जारी हुए थे। इसमें 34 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।


    OPT पर बड़े प्रस्ताव की तैयारी

    खबर है कि अगर अब अगर कोई छात्र ग्रेजुएशन के बाद अमेरिका में ही रहकर काम करना चाहता है, तो उसे 1 लाख डॉलर की मोटी फीस सरकार को देनी होगी। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। वॉल स्ट्रीट जनरल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शिक्षा के बाद काम की फीस के अलावा नए वीजा नियम भी जारी किए गए हैं। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय छात्र पढ़ाई के बाद लंबे समय तक अमेरिका में नहीं रह सकेंगे। हालांकि, इस पर अब तक अंतिम मुहर नहीं लगाई गई है।

    OPT का मतलब एक अस्थायी नौकरी से है, जो F-1 वीजा पर अमेरिका पहुंचे छात्र के पढ़ाई के क्षेत्र से जुड़ी होती है। पात्र छात्र 12 महीने का ओपीटी काम हासिल कर सकते हैं।

    मौजूदा व्यवस्था है कि जब तक पढ़ाई चल रही है और वीजा के नियमों का पालन किया जा रहा है, तब तक छात्र अमेरिका में रह सकता है। अगर उसकी पढ़ाई लंबी चलती है, तो समय को नियमों का पालन कर बढ़ाया जाता है। अब यह व्यवस्था खत्म होने जा रही है।

  • अमेरिका में स्वास्थ्य बीमा नियमों पर सियासी संग्राम ट्रंप प्रशासन के खिलाफ 25 राज्यों का मुकदमा

    अमेरिका में स्वास्थ्य बीमा नियमों पर सियासी संग्राम ट्रंप प्रशासन के खिलाफ 25 राज्यों का मुकदमा


    नई दिल्ली। अमेरिका में सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना मेडिकेड के नए नियमों को लेकर कानूनी और राजनीतिक विवाद गहरा गया है। 25 राज्यों और वॉशिंगटन डीसी ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर किया है। इन राज्यों का आरोप है कि नए कार्य संबंधी नियम जरूरतमंद लोगों के लिए स्वास्थ्य बीमा हासिल करना कठिन बना देंगे और कई पात्र नागरिक भी योजना के लाभ से वंचित हो सकते हैं।

    विवाद की शुरुआत अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत काम करने वाली सेंटर्स फॉर मेडिकेयर एंड मेडिकेड सर्विसेज की ओर से जारी अंतरिम नियमों के बाद हुई। राज्यों का कहना है कि प्रशासन ने पिछले वर्ष बने कानून की सीमा से आगे बढ़कर नए प्रावधान लागू किए हैं और कानून की ऐसी व्याख्या की है जिससे लाभार्थियों पर अतिरिक्त शर्तें लागू हो रही हैं।

    नए नियमों के अनुसार एक जनवरी से 19 से 64 वर्ष की आयु के वे लोग जो मेडिकेड विस्तार योजना के तहत आते हैं उन्हें हर महीने कम से कम 80 घंटे काम करना होगा या सामुदायिक सेवा करनी होगी अथवा आधे समय तक पढ़ाई करना अनिवार्य होगा। हालांकि गंभीर रूप से बीमार लोगों नशा मुक्ति कार्यक्रम में शामिल व्यक्तियों और कुछ अन्य श्रेणियों को छूट देने का प्रावधान रखा गया है।

    सबसे बड़ा विवाद गंभीर स्वास्थ्य स्थिति की नई परिभाषा को लेकर है। पहले कानून में विकलांगता गंभीर बीमारी या नशे की लत से जूझ रहे लोगों को छूट देने की व्यवस्था थी लेकिन नए नियमों में कहा गया है कि बीमारी इतनी गंभीर होनी चाहिए जिससे व्यक्ति की काम करने पढ़ाई करने या सामुदायिक सेवा करने की क्षमता काफी हद तक प्रभावित हो। तभी उसे छूट मिल सकेगी।

    मुकदमा दायर करने वाले राज्यों का कहना है कि इस नई शर्त के कारण कैंसर मरीज दिव्यांग मानसिक रोगी और अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों को अपनी पात्रता साबित करने के लिए अतिरिक्त दस्तावेज और लंबी कागजी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। इससे कई ऐसे लोग भी स्वास्थ्य बीमा से वंचित हो सकते हैं जो वास्तव में इसके हकदार हैं।

    राज्यों ने यह भी आरोप लगाया है कि लंबे समय तक चर्चा के बाद अचानक नियम बदल दिए गए जिससे प्रशासनिक स्तर पर नई व्यवस्था लागू करना मुश्किल हो गया है। साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि गंभीर बीमारी का प्रमाण किस प्रक्रिया के तहत स्वीकार किया जाएगा।

    दूसरी ओर ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इन नियमों का उद्देश्य सरकारी योजनाओं के दुरुपयोग को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि लाभ वास्तव में पात्र और जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे। हालांकि मुकदमा दायर होने के बाद स्वास्थ्य विभाग और सेंटर्स फॉर मेडिकेयर एंड मेडिकेड सर्विसेज की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

    न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स ने नए नियमों पर चिंता जताते हुए कहा कि कैंसर दिव्यांगता मानसिक बीमारी या नशे की लत से उबर रहे लोगों को इलाज पाने के लिए अनावश्यक कागजी कार्रवाई में नहीं उलझाया जाना चाहिए। उनके अनुसार इन बदलावों से हजारों जरूरतमंद लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच प्रभावित हो सकती है।

  • नेपाल में अमेरिका की बढ़ती सक्रियता, चीन की बढ़ी चिंता क्या बन रहा नया भू-राजनीतिक मोर्चा?

    नेपाल में अमेरिका की बढ़ती सक्रियता, चीन की बढ़ी चिंता क्या बन रहा नया भू-राजनीतिक मोर्चा?




    नई दिल्ली। नेपाल में हाल के राजनीतिक बदलावों के बाद United States की सक्रियता तेजी से बढ़ती दिख रही है। अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों के लगातार दौरे और कूटनीतिक संपर्कों ने क्षेत्रीय राजनीति को नया मोड़ दे दिया है। खासकर चीन और भारत के बीच स्थित नेपाल अब बड़ी भू-रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका की अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर पब्लिक डिप्लोमेसी सराह बी. रोजर्स के नेपाल दौरे की तैयारी ने इस गतिविधि को और तेज कर दिया है। इससे पहले भी कई वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी काठमांडू का दौरा कर चुके हैं। इस बढ़ती कूटनीतिक हलचल को लेकर China ने भी सतर्क रुख अपनाया है और अपनी रणनीतिक निगरानी बढ़ा दी है।

    विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल में बढ़ती अमेरिकी रुचि का एक कारण क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा रणनीति हो सकता है। वहीं चीन का फोकस तिब्बती मुद्दों और अपने क्षेत्रीय हितों की सुरक्षा पर है। इसी वजह से नेपाल में दोनों देशों की गतिविधियां बढ़ती जा रही हैं।

    नेपाल सरकार फिलहाल सभी पक्षों के साथ संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में यह देश अमेरिका और चीन के बीच कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा का अहम केंद्र बन सकता है।

  • Dollar vs Yuan: चीन की बढ़ती आर्थिक ताकत से अमेरिका चिंतित, युआन के बढ़ते असर पर ट्रंप प्रशासन को चेतावनी

    Dollar vs Yuan: चीन की बढ़ती आर्थिक ताकत से अमेरिका चिंतित, युआन के बढ़ते असर पर ट्रंप प्रशासन को चेतावनी


    नई दिल्ली। वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर की बादशाहत को अब चीन की करेंसी युआन से चुनौती मिलती दिखाई दे रही है। चीन लगातार अपने वित्तीय प्रभाव को बढ़ाने और डॉलर के विकल्प के तौर पर युआन को स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, जिसे लेकर अमेरिका में चिंता बढ़ गई है। इसी बीच अमेरिकी सीनेटरों के एक द्विदलीय समूह ने सीनेट में प्रस्ताव पेश कर ट्रंप प्रशासन को चेतावनी दी है कि चीन समानांतर वैश्विक वित्तीय ढांचा खड़ा करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

    अमेरिकी सांसदों ने जताई चिंता
    रिपब्लिकन सीनेटर टेड बड और डेमोक्रेट सीनेटर जीन शाहीन द्वारा पेश प्रस्ताव में कहा गया है कि अमेरिकी डॉलर का वैश्विक रिजर्व करेंसी बने रहना अमेरिका की आर्थिक ताकत और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।

    सीनेटरों ने चेतावनी दी कि चीन युआन के जरिए ऐसा वित्तीय नेटवर्क तैयार कर रहा है, जो भविष्य में अमेरिका और उसके सहयोगियों के प्रभाव को कमजोर कर सकता है।

    डॉलर की हिस्सेदारी में गिरावट
    प्रस्ताव में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि 1999 में वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी करीब 71% थी, जो 2025 की तीसरी तिमाही तक घटकर 56.82% रह गई है। हालांकि युआन की हिस्सेदारी अभी भी सीमित है, लेकिन चीन लगातार उसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भुगतान प्रणाली में आगे बढ़ा रहा है।

    चीन कैसे बढ़ा रहा है युआन का असर?
    अमेरिकी सांसदों ने कहा कि चीन अपनी Belt and Road Initiative (BRI) के जरिए विकासशील देशों में भारी निवेश कर आर्थिक निर्भरता बढ़ा रहा है। 2013 से अब तक चीन इस परियोजना के तहत दुनिया भर में 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा निवेश कर चुका है।

    इसके अलावा चीन का Cross-Border Interbank Payment System (CIPS) भी तेजी से बढ़ रहा है, जिसे SWIFT सिस्टम के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक 1700 से ज्यादा बैंक अब इस नेटवर्क से जुड़ चुके हैं।

    अमेरिका को किस बात का डर?
    अमेरिकी सांसदों का मानना है कि यदि भविष्य में ताइवान या हिंद-प्रशांत क्षेत्र में कोई बड़ा संकट पैदा होता है, तो चीन का वैकल्पिक वित्तीय नेटवर्क पश्चिमी देशों की आर्थिक पकड़ को कमजोर कर सकता है।

    इसी वजह से अमेरिका अब अपने सहयोगी देशों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने और विकासशील देशों में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की रणनीति पर जोर दे रहा है।

    वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ रही प्रतिस्पर्धा
    विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में डॉलर और युआन के बीच आर्थिक प्रभाव की यह प्रतिस्पर्धा वैश्विक व्यापार, निवेश और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर बड़ा असर डाल सकती है।

  • अमेरिका भारत पर फिर से टैरिफ लगाने की तैयारी में, 16 ट्रेडिंग पार्टनर्स की सेक्शन 301 जांच शुरू

    अमेरिका भारत पर फिर से टैरिफ लगाने की तैयारी में, 16 ट्रेडिंग पार्टनर्स की सेक्शन 301 जांच शुरू


    नई दिल्ली। अमेरिकी ट्रम्प प्रशासन ने भारत और चीन सहित 16 प्रमुख ट्रेडिंग पार्टनर्स के खिलाफ नई जांच शुरू कर दी है। यह कार्रवाई ‘सेक्शन 301’ के तहत की जा रही है, जो अमेरिकी ट्रेड एक्ट ऑफ 1974 का हिस्सा है और अमेरिका को उन देशों पर एकतरफा टैरिफ या प्रतिबंध लगाने की शक्ति देती है, जो अमेरिकी कंपनियों और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को नुकसान पहुंचा रहे हों।

    इस कदम के पीछे पिछली घटनाओं का संदर्भ है। फरवरी में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा लगाए गए ग्लोबल टैरिफ को अवैध करार दिया था। इसके बाद ट्रम्प प्रशासन ने 150 दिनों के लिए 10% का अस्थायी टैरिफ लागू किया। अब नई जांच के माध्यम से प्रशासन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि टैरिफ का दबाव जारी रहे और ट्रेडिंग पार्टनर्स को बातचीत की मेज पर लाया जा सके।

    यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जेमिसन ग्रीर ने बताया कि यह जांच भारत, चीन, यूरोपीय संघ (EU), जापान, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको, वियतनाम, ताइवान, थाईलैंड, मलेशिया, कंबोडिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, स्विट्जरलैंड और नॉर्वे पर केंद्रित है। अगर जांच में इन देशों की नीतियां अनुचित व्यापार व्यवहार के तहत पाई गईं, तो उन पर भारी टैरिफ लगाया जा सकता है।

    जांच का मुख्य फोकस उन देशों पर है, जो जरूरत से अधिक उत्पादन कर अमेरिकी बाजार में सस्ते दाम पर माल बेचते हैं, जिससे अमेरिकी कंपनियों को नुकसान होता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी देश में जूतों की फैक्ट्री सालाना 100 जूते बना सकती है, लेकिन घरेलू मांग केवल 20 जूते की है, तो शेष 80 जूते सस्ते दाम पर अमेरिका में भेज दिए जाते हैं। अमेरिका इसे मार्केट डंपिंग और अनुचित व्यापार व्यवहार मानता है।

    भारत के लिए यह चिंता का विषय है। 2024 में भारत का अमेरिका के साथ गुड्स ट्रेड सरप्लस 58,216 मिलियन डॉलर था, जो 2025 में घटकर 45,801 मिलियन डॉलर रह गया। इस कमी के बावजूद भारत इस जांच की सूची में शामिल है। यदि भारत की नीतियां ‘अनुचित’ पाई गईं, तो भारतीय सामानों पर भारी टैरिफ या प्रतिबंध लग सकते हैं।

    इसके अलावा, अमेरिका फोर्स्ड लेबर पर भी अलग जांच कर रहा है। इसका उद्देश्य है बंधुआ मजदूरी से बने सामानों के आयात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना। पहले ही उइगर फोर्स्ड लेबर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत चीन के शिनजियांग क्षेत्र से आने वाले सोलर पैनल और अन्य सामानों पर कार्रवाई की जा चुकी है। अब यह कार्रवाई अन्य देशों पर भी लागू हो सकती है।

    जांच की टाइमलाइन भी निर्धारित कर दी गई है। 15 अप्रैल तक आम जनता और कंपनियों से सुझाव मांगे गए हैं, इसके बाद 5 मई के आसपास सार्वजनिक सुनवाई होगी। लक्ष्य है कि जुलाई में अस्थायी टैरिफ खत्म होने से पहले नए टैरिफ प्रस्ताव और जांच के नतीजे तैयार हो जाएं।

    जेमिसन ग्रीर ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ट्रम्प टैरिफ लगाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग और रोजगार को बचाना है। साथ ही ट्रेडिंग पार्टनर्स को चेतावनी दी गई है कि वे मौजूदा व्यापार समझौतों का पालन करें, अन्यथा भारी टैक्स या प्रतिबंध झेलना पड़ेगा।

    विशेषज्ञों का कहना है कि इस जांच का असर टेक्सटाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग गुड्स और कृषि उत्पादों की कीमतों पर पड़ेगा। व्यवसायियों, निर्यातकों और आयातकों को अमेरिकी पॉलिसी पर लगातार नजर रखनी होगी, क्योंकि जुलाई के बाद अमेरिकी बाजार में कीमतों और टैरिफ में बड़े बदलाव संभव हैं।

    यह कदम व्यापार के वैश्विक परिदृश्य में भारत और अन्य देशों के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी है। यदि व्यापारिक नीतियों में सुधार नहीं हुआ, तो अमेरिकी टैरिफ की मार व्यापार घाटे और निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति पर गहरा असर डाल सकती है।