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  • रूस ने चली क्रिप्टो वाली चाल, डॉलर के दबदबे को चुनौती; क्या ट्रंप की आर्थिक धमकियों का निकलेगा तोड़?

    रूस ने चली क्रिप्टो वाली चाल, डॉलर के दबदबे को चुनौती; क्या ट्रंप की आर्थिक धमकियों का निकलेगा तोड़?


    नई दिल्ली।
    दुनिया की आर्थिक ताकत सिर्फ हथियारों और सैन्य क्षमता से तय नहीं होती, बल्कि वैश्विक कारोबार में किस मुद्रा का दबदबा है, यह भी किसी देश की ताकत को तय करता है। पिछले कई दशकों से अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भुगतान व्यवस्था का सबसे बड़ा आधार रहा है। तेल-गैस की खरीद से लेकर देशों के बीच बड़े कारोबारी लेनदेन तक, डॉलर की भूमिका बेहद अहम रही है। इसी वजह से अमेरिका को आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए दूसरे देशों पर दबाव बनाने की ताकत भी मिलती है।

    अब रूस ने इसी व्यवस्था से अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में एक और कदम बढ़ाया है। रूस ने विदेशी व्यापार में क्रिप्टोकरेंसी के इस्तेमाल को कानूनी दायरे में लाने का रास्ता खोल दिया है। रूस का यह कदम पश्चिमी प्रतिबंधों और डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था के विकल्प तलाशने की उसकी लंबे समय से चल रही कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है।

    विदेशी व्यापार में क्रिप्टो का रास्ता खुला

    नए प्रावधानों के तहत रूसी कंपनियों को कुछ अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में डिजिटल करेंसी के इस्तेमाल की अनुमति मिल सकती है। यानी रूस और किसी दूसरे देश की कंपनी आपसी सहमति से कुछ भुगतान डॉलर के बजाय क्रिप्टो के माध्यम से कर सकती हैं।

    रूस के लिए इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने उस पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। पश्चिमी बैंकिंग व्यवस्था और डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए रूस लगातार वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों की तलाश करता रहा है।

    डॉलर की ताकत सिर्फ मुद्रा नहीं, पूरा सिस्टम है

    अमेरिका की आर्थिक ताकत केवल डॉलर की वैश्विक मांग से नहीं आती। इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और भुगतान व्यवस्था का भी बड़ा योगदान है। यदि किसी देश की इस व्यवस्था तक पहुंच सीमित कर दी जाए तो उसके लिए विदेशों से पैसा भेजना और प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है।

    रूस पिछले कुछ वर्षों में इसी चुनौती का सामना कर रहा है। ऐसे में डिजिटल करेंसी उसके लिए एक वैकल्पिक भुगतान माध्यम बन सकती है। क्रिप्टो आधारित लेनदेन में पारंपरिक बैंकिंग चैनलों पर निर्भरता कुछ मामलों में कम हो सकती है।

    क्या इससे अमेरिका के आर्थिक दबदबे को चुनौती मिलेगी?

    अगर आने वाले समय में अधिक देश डॉलर के अलावा स्थानीय मुद्राओं, डिजिटल करेंसी या क्रिप्टो के जरिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने लगते हैं तो डॉलर की वैश्विक मांग पर असर पड़ सकता है। रूस के साथ चीन, ईरान और दूसरे देश भी वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं।

    हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर का दबदबा तुरंत खत्म हो जाएगा। आज भी वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी मुद्रा की भूमिका बेहद मजबूत है। इसलिए क्रिप्टो या स्थानीय मुद्राओं के बढ़ते इस्तेमाल को डॉलर के लिए तत्काल खतरे के बजाय लंबी अवधि में उभरते विकल्प के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा।

    भारत के लिए क्या बदल सकता है?

    भारत भी कई देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। रूस के साथ रुपये और रूबल में व्यापार की व्यवस्था को लेकर भी प्रयास किए गए हैं।

    अगर भविष्य में डिजिटल करेंसी और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा स्वीकार्य होती हैं, तो भारत के लिए भी डॉलर पर निर्भरता कम करने के कुछ नए रास्ते खुल सकते हैं। इससे कुछ लेनदेन में मुद्रा बदलने की लागत और भुगतान में लगने वाला समय कम करने की संभावना बन सकती है।

    लेकिन भारत की नीति निजी क्रिप्टोकरेंसी के बजाय अपने सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी ई-रुपये पर ज्यादा केंद्रित है। भारत में क्रिप्टो को आधिकारिक मुद्रा का दर्जा नहीं मिला है और इसके इस्तेमाल पर कड़े टैक्स नियम लागू हैं।

    क्रिप्टो के साथ जोखिम भी कम नहीं

    क्रिप्टोकरेंसी को अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा माध्यम बनाने में सबसे बड़ी चुनौतियों में इसकी कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव भी शामिल है। बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी की कीमत कम समय में काफी ऊपर-नीचे हो सकती है। ऐसे में अरबों डॉलर के व्यापार के लिए इसका इस्तेमाल जोखिम भरा हो सकता है।

    इसी वजह से भविष्य में स्टेबलकॉइन या सरकार समर्थित डिजिटल करेंसी ज्यादा व्यावहारिक विकल्प बन सकती हैं। इसके लिए सिर्फ कानूनी मंजूरी पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियम, भरोसा, सुरक्षा और मजबूत तकनीकी ढांचा भी जरूरी होगा।

    दुनिया को रूस का क्या संदेश?

    रूस का कदम वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते बदलाव की ओर इशारा करता है। चीन अपनी मुद्रा युआन के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ब्रिक्स देशों के बीच भी वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों और स्थानीय मुद्राओं में कारोबार को लेकर चर्चा होती रही है।

    ऐसे में क्रिप्टोकरेंसी, डिजिटल करेंसी और नई भुगतान तकनीकें आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक राजनीति का अहम हिस्सा बन सकती हैं। हालांकि, सिर्फ क्रिप्टो के इस्तेमाल से अमेरिकी आर्थिक दबदबा खत्म हो जाएगा, यह दावा फिलहाल जल्दबाजी होगा। लेकिन रूस का कदम यह जरूर दिखाता है कि दुनिया एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही है, जिसमें किसी एक देश की मुद्रा और भुगतान प्रणाली पर निर्भरता कम हो।

  • Gold Rate: ट्रंप के सख्त रुख से सोने पर दबाव, चांदी अब तक 1.87 लाख रुपये तक टूटी

    Gold Rate: ट्रंप के सख्त रुख से सोने पर दबाव, चांदी अब तक 1.87 लाख रुपये तक टूटी

    नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय हालात के बीच कीमती धातुओं में उतार-चढ़ाव जारी है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के ताजा बयान के बाद सोने की कीमतों में एक बार फिर नरमी देखने को मिली है। वहीं चांदी में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है और यह अपने उच्चतम स्तर से करीब 1.87 लाख रुपये तक सस्ती हो चुकी है।

    दरअसल, मध्य पूर्व में जारी तनाव के चलते बाजार लगातार प्रभावित हो रहा है। अमेरिका और Iran के बीच टकराव खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। ट्रंप ने साफ कहा है कि जब तक ईरान के साथ समझौता नहीं होता, तब तक ब्लॉकेड हटाने का सवाल ही नहीं है। दूसरी ओर ईरान ने भी संकेत दिया है कि यदि ब्लॉकेड जारी रहा, तो वह Strait of Hormuz को नहीं खोलेगा। इस तनातनी ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा दी है।

    इसी माहौल का असर सोने पर दिखा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में 21 अप्रैल, मंगलवार को कॉमैक्स गोल्ड करीब 4 डॉलर टूटकर 4,816.77 डॉलर प्रति औंस पर आ गया।

    घरेलू वायदा बाजार Multi Commodity Exchange of India (MCX) पर भी कमजोरी देखने को मिली। 5 जून डिलीवरी वाला सोना 41 रुपये फिसलकर 1,52,799 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया।

    चांदी में गिरावट और ज्यादा तेज रही। MCX पर चांदी 4,568 रुपये टूटकर 2,52,574 रुपये प्रति किलोग्राम पर कारोबार करती दिखी। सोमवार को बाजार खुलते ही चांदी में भारी बिकवाली देखने को मिली थी। अगर इसके ऑल टाइम हाई से तुलना करें, तो कीमत करीब 1,87,552 रुपये तक नीचे आ चुकी है। उल्लेखनीय है कि MCX पर चांदी इससे पहले 4.20 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थी।

    विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक तनाव और अमेरिकी नीति संकेतों के चलते आने वाले दिनों में सोना-चांदी की कीमतों में इसी तरह उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

  • फिर चर्चा में ट्रंप का ‘नोबेल कनेक्शन’: मचाडो बोलीं—वह ऐसे नेता…

    फिर चर्चा में ट्रंप का ‘नोबेल कनेक्शन’: मचाडो बोलीं—वह ऐसे नेता…

    वॉशिंगटन। डोनाल्ड ट्रंप और नोबेल पुरस्कार को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इस बार वजह बनी हैं कोरिना मचाडो, जिन्होंने ट्रंप की खुलकर तारीफ करते हुए उन्हें ऐसा नेता बताया है, जिसने वेनेजुएला की आज़ादी के लिए जोखिम उठाया।
    मचाडो ने क्या कहा?

    मैड्रिड में आयोजित एक कार्यक्रम में मचाडो ने कहा कि दुनिया ट्रंप को ऐसे नेता के रूप में देखती है, जिन्होंने वेनेजुएला को तानाशाही से मुक्त कराने के प्रयास में अपने देश के नागरिकों की जान तक खतरे में डाली।
    उन्होंने यह भी साफ किया कि अपने फैसलों को लेकर उन्हें कोई पछतावा नहीं है।

    ‘नोबेल पदक’ को लेकर क्यों मचा विवाद?

    रिपोर्ट्स के अनुसार, 2025 में मचाडो को नोबेल शांति पुरस्कार मिला था, जिसके बाद उन्होंने अपना पदक ट्रंप को सौंप दिया।

    इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी।

    हालांकि, नोबेल समिति ने स्पष्ट किया कि

    पुरस्कार किसी एक व्यक्ति को ही दिया जाता है
    इसे न ट्रांसफर किया जा सकता है, न साझा

    यानी पदक भले किसी के पास हो, लेकिन सम्मान का अधिकार मूल विजेता के पास ही रहता है।

    ट्रंप और नोबेल—पुराना रिश्ता

    ट्रंप लंबे समय से नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर चर्चा में रहे हैं।

    उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कई अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को रोकने का दावा करते हुए खुद को इस पुरस्कार का दावेदार बताया था।

    लेकिन समिति ने तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए उनके नाम पर विचार नहीं किया।

    वेनेजुएला की राजनीति भी बनी वजह

    इस पूरे मामले के पीछे निकोलस मादुरो सरकार के खिलाफ अमेरिकी रुख भी एक अहम कारण रहा। मचाडो ने इसे वेनेजुएला के लिए ऐतिहासिक बताया, जबकि कई विशेषज्ञ इसे राजनीतिक रणनीति मानते हैं।

    ट्रंप और नोबेल पुरस्कार को लेकर विवाद नया नहीं है, लेकिन मचाडो के ताजा बयान ने इसे फिर सुर्खियों में ला दिया है। यह मामला सिर्फ एक पदक का नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, छवि और प्रभाव की जंग का हिस्सा बन चुका है।
  • होर्मुज पर ट्रंप की नीति से भड़के अमेरिकी सांसद, युद्ध खर्च पर भी उठाए सवाल

    होर्मुज पर ट्रंप की नीति से भड़के अमेरिकी सांसद, युद्ध खर्च पर भी उठाए सवाल

    वॉशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपने ही देश में आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। डेमोक्रेटिक सांसद क्रिस मर्फी ने ट्रंप की रणनीति पर तीखा हमला करते हुए इसे “पागलपन” करार दिया है।

    मर्फी ने कहा कि युद्ध शुरू होने से पहले होर्मुज स्ट्रेट खुला हुआ था, लेकिन अब अमेरिका उस समस्या को सुलझाने की कोशिश कर रहा है जिसे उसने खुद पैदा किया है। उन्होंने दावा किया कि ईरान के साथ संघर्ष पर अमेरिका प्रतिदिन करीब दो अरब डॉलर खर्च कर रहा है, जो बेहद बड़ी राशि है।

    सांसद ने यह भी कहा कि युद्ध में अमेरिकी नागरिकों की जान जा रही है और देश में कई परिवार अपने प्रियजनों को खो चुके हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर संघर्ष जारी रहा तो ऐसी संख्या और बढ़ सकती है। साथ ही वैश्विक स्तर पर ईंधन और अन्य वस्तुओं की कीमतों में तेज उछाल का भी जिक्र किया।

    होर्मुज पर बढ़ा तनाव
    अमेरिका और Israel के हमलों के बाद ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर सख्ती बढ़ा दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेहरान कुछ मित्र देशों के जहाजों को ही गुजरने दे रहा है और अन्य टैंकरों पर हमले या शुल्क लगाने की चेतावनी दे रहा है।

    इस बीच ट्रंप ने ईरान को जलडमरूमध्य खोलने के लिए दी गई समयसीमा बढ़ाते हुए कहा कि फिलहाल ईरानी ऊर्जा संयंत्रों पर बमबारी टाली जाएगी। हालांकि दोनों देशों के बीच युद्धविराम वार्ता अभी भी गतिरोध में बताई जा रही है।
    ईरान के Islamic Revolutionary Guard Corps ने दावा किया कि उसने होर्मुज से गुजरने की कोशिश कर रहे तीन जहाजों को चेतावनी देकर वापस भेज दिया। गार्ड्स के अनुसार यह मार्ग “दुश्मन देशों” से जुड़े जहाजों के लिए बंद है।

    क्षेत्र में बढ़ते सैन्य जमावड़े के बीच अमेरिका ने अतिरिक्त सैनिक तैनात किए हैं, जबकि इजरायल ने दक्षिणी लेबनान में Hezbollah के खिलाफ कार्रवाई तेज करने के लिए और सैनिक भेजे हैं। इससे पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

  • ईरान छोड़ ट्रंप का नया टारगेट, अब इस देश पर अमेरिका का निशाना

    ईरान छोड़ ट्रंप का नया टारगेट, अब इस देश पर अमेरिका का निशाना


    वाशिंगटन । इस समय पूरी दुनिया की नजरें मिडिल ईस्ट पर टिकी हुई हैं। ईरान में जारी विरोध-प्रदर्शनों और तेहरान पर संभावित हमले की अटकलों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना फोकस बदल दिया है। अब उनकी नजरें सात समंदर पार नहीं, बल्कि पड़ोसी देश मैक्सिको पर हैं, जहां ड्रग कार्टेलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात हो रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन मैक्सिको पर दबाव डाल रहा है कि वह अमेरिकी सेना को अपनी सीमा में प्रवेश की अनुमति दे।

    दरअसल, अमेरिका मैक्सिको में मादक पदार्थों (खासकर फेंटानिल) के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों में अपनी सेना को शामिल करने की मांग कर रहा है। दूसरी तरफ मैक्सिको की सरकार विदेशी सैन्य हस्तक्षेप को सिरे से नकार रही है। अमेरिकी अधिकारी विशेष अभियान दलों के सैनिकों या सीआईए अधिकारियों को मैक्सिकन सैनिकों के साथ मिलकर ऑपरेशन चलाने की मंजूरी मांग रहे हैं।

    न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका मैक्सिको की धरती पर फेंटानिल की प्रयोगशालाओं को नष्ट करने के मकसद से चलाए जा रहे अभियानों में अमेरिकी सैन्य बलों की भागीदारी के लिए मैक्सिको से मंजूरी हासिल करने के प्रयास तेज कर रहा है। अमेरिकी अधिकारी चाहते हैं कि संदिग्ध फेंटानिल उत्पादन स्थलों पर छापेमारी के दौरान मैक्सिकन सैनिकों के साथ विशेष अभियान दल के सैनिक या सीआईए अधिकारी शामिल हों। यह अनुरोध दोनों देशों के बीच फेंटानिल संकट को लेकर हुई उच्च-स्तरीय सुरक्षा वार्ताओं के बाद आया है।

    बता दें कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ्तारी के तुरंत बाद ट्रंप ने मैक्सिको को चेतावनी दी थी कि वह अगला निशाना बन सकता है। उन्होंने कहा था कि अब हम ड्रग तस्करों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने जा रहे हैं। मैक्सिको पर ड्रग तस्करों का कब्जा है। उस देश की हालत देखना बेहद दुखद है, लेकिन ड्रग तस्करों का ही राज है और वे हर साल हमारे देश में 2.5 लाख से 3 लाख लोगों की जान ले रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया था कि अमेरिका इन ड्रग कार्टेलों से निपटने के लिए मैक्सिको में जमीनी ठिकानों पर हमला कर सकता है।

    इन धमकियों के बावजूद मैक्सिकन राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम ने अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के विचार को पूरी तरह खारिज कर दिया है। उन्होंने ट्रंप के साथ सुरक्षा और मादक पदार्थों की तस्करी को लेकर हुई ‘अच्छी बातचीत’ के बाद अपना विरोध दोहराया है। शीनबाम ने पहले भी ट्रंप की ओर से सैन्य कार्रवाई के प्रस्तावों को ठुकरा दिया था और मैक्सिकन ड्रग कार्टेलों के खिलाफ प्रयासों में विदेशी सैन्य भागीदारी से लगातार इनकार किया है।