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  • चुनाव में जीत के लिए भी ट्रंप के भरोसे नेतन्याहू, समर्थन बढ़ाने के लिए तीन दिन में दो बार किया फोन

    चुनाव में जीत के लिए भी ट्रंप के भरोसे नेतन्याहू, समर्थन बढ़ाने के लिए तीन दिन में दो बार किया फोन


    तेल अवीव।
    इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर चुनावी जीत के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन की उम्मीद कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में पिछड़ने के अनुमानों के बीच नेतन्याहू ने पिछले तीन दिनों में ट्रंप से दो बार फोन पर बात कर समर्थन बढ़ाने की मांग की। हालांकि, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने इन दावों से इनकार किया है। व्हाइट हाउस ने भी इस संबंध में पूछे गए सवालों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

    एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, मामले की जानकारी रखने वाले एक अमेरिकी और एक इजरायली सूत्र ने नेतन्याहू की ओर से अतिरिक्त समर्थन मांगे जाने की जानकारी दी है। अमेरिकी सूत्र के मुताबिक, व्हाइट हाउस ने इस कोशिश को नेतन्याहू की ‘हताशा की निशानी’ के रूप में देखा। रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि इजरायली प्रधानमंत्री को चुनावी मुकाबले में अपनी स्थिति कमजोर होने की चिंता है।

    हालांकि, लिकुड पार्टी की प्रवक्ता नेटा मोल्चो ने इन दावों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने हाल के दिनों में या ट्रंप के समर्थन वाले बयान से पहले उनसे मदद नहीं मांगी थी।

    ट्रंप पहले ही कर चुके हैं नेतन्याहू का समर्थन

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर नेतन्याहू के समर्थन में बयान दे चुके हैं। उन्होंने इजरायली मतदाताओं को आगाह करते हुए कहा था कि नेतन्याहू की चुनावी हार का असर अमेरिका और इजरायल के संबंधों पर पड़ सकता है।

    एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बावजूद नेतन्याहू की ओर से ट्रंप से और समर्थन देने का अनुरोध किया गया। इजरायली सूत्र ने बताया कि नेतन्याहू की ओर से सुझाव दिया गया था कि ट्रंप इजरायली पत्रकारों से फोन पर बातचीत करें और चुनाव अभियान के प्रति अपना समर्थन जाहिर करें।

    इसी दौरान नेतन्याहू ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी फोन पर बातचीत की थी। हालांकि, इस बातचीत के बाद प्रधानमंत्री मोदी की ओर से इजरायल के चुनाव को लेकर कोई समर्थन संदेश जारी नहीं किया गया।

    पहले भी विदेशी नेताओं के साथ दिखा चुके हैं नजदीकी

    नेतन्याहू इससे पहले भी चुनाव प्रचार के दौरान विदेशी नेताओं के साथ अपने संबंधों को प्रमुखता देते रहे हैं। पिछले चुनावों में इजरायल की इमारतों पर प्रधानमंत्री मोदी, डोनाल्ड ट्रंप और अन्य विदेशी नेताओं के साथ उनकी तस्वीरों वाले पोस्टर लगाए गए थे। इन तस्वीरों के जरिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय नेताओं के साथ अपने संबंधों को चुनाव प्रचार में जगह दी थी।

    सर्वेक्षणों में बहुमत से दूर दिख रहा नेतन्याहू का गठबंधन

    नेतन्याहू की चिंता की एक प्रमुख वजह चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के अनुमान हैं। रिपोर्ट के अनुसार, तीन सर्वेक्षणों में 120 सदस्यीय इजरायली संसद नेसेट में उनके गठबंधन को बहुमत के आंकड़े से पीछे रहने का अनुमान जताया गया है।

    इन सर्वेक्षणों में नेतन्याहू के गठबंधन को करीब 50 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। यह उनके मौजूदा गठबंधन की सीटों की संख्या से 17 कम है। उनकी प्रमुख पार्टी लिकुड, जिसके पास वर्तमान में 32 सीटें हैं, के घटकर करीब 20 सीटों पर सिमटने का अनुमान लगाया गया है।

    हालांकि, नेतन्याहू समर्थक चैनल 14 के सर्वेक्षण में तस्वीर अलग दिखाई गई है। सप्ताह की शुरुआत में जारी इस सर्वेक्षण में नेतन्याहू के गठबंधन को 60 सीटें और लिकुड पार्टी को 30 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया था।

    इस तरह अलग-अलग सर्वेक्षणों में नेतन्याहू के गठबंधन की संभावनाओं को लेकर अंतर दिखाई दे रहा है। चुनाव में उनकी पार्टी और सहयोगी दलों का प्रदर्शन ही तय करेगा कि वे सत्ता में बने रह पाते हैं या नहीं।

  • टाटा संस में एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर विवाद… कानूनी खर्च का भुगतान नहीं करेगा ट्रस्ट

    टाटा संस में एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर विवाद… कानूनी खर्च का भुगतान नहीं करेगा ट्रस्ट


    नई दिल्ली।
    टाटा एजुकेशन एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट (टीईडीटी) (Tata Education and Development Trust – TEDT) के ट्रस्टी मेहली मिस्त्री (Mehli Mistry) ने साफ कर दिया है कि ट्रस्ट टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बोर्ड के बीच एन चंद्रशेखरन (N. Chandrasekaran) की दोबारा नियुक्ति को लेकर चल रहे विवाद से जुड़े किसी भी कानूनी खर्च का भुगतान नहीं करेगा। टीईडीटी के कोष का अनुमान करीब 5,000 करोड़ रुपये बताया गया है। मेहली ने टाटा ट्रस्ट्स के सीईओ सिद्धार्थ शर्मा को ईमेल भेजकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। इसकी प्रति टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल एन टाटा और टीईडीटी के दूसरे ट्रस्टी जेएन मिस्त्री को भी भेजी गई है।

    मेहली ने कहा कि ट्रस्टी, टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच चल रहा मुकदमा पिछले 150 वर्षों में अभूतपूर्व है। उन्होंने विवाद में शामिल लोगों के अनुभव या रवैये पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए टीईडीटी के रुख को स्पष्ट किया। उनका कहना है कि टीईडीटी टाटा संस का शेयरधारक नहीं है और इसलिए इन विवादों से अलग है।


    क्या अभी टीईडीटी का पैसा इस विवाद में खर्च हो रहा है?

    मेहली मिस्त्री के ईमेल में यह नहीं कहा गया है कि टीईडीटी का पैसा फिलहाल इस विवाद से जुड़े कानूनी खर्च में इस्तेमाल किया जा रहा है। ईमेल में ऐसा भी नहीं कहा गया है कि इस तरह के खर्च का कोई प्रस्ताव सामने आया है। उनकी आपत्ति इस आशंका पर आधारित है कि टीईडीटी से भविष्य में ऐसे कानूनी खर्च उठाने को कहा जा सकता है। मेहली ने मांग की है कि उनका ईमेल 20 नवंबर 2026 को होने वाली टीईडीटी बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की अगली बैठक में रखा जाए और रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए।


    चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर विवाद क्यों बढ़ा?

    चंद्रशेखरन ने 12 अगस्त को टाटा संस बोर्ड को बताया था कि वह मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को खत्म होने के बाद दोबारा नियुक्ति के लिए अपना नाम पेश नहीं करेंगे। इसके बाद सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (एसडीटीटी) ने उनके फैसले का सम्मान करते हुए नए चेयरमैन के चयन के लिए चयन समिति बनाने की प्रक्रिया शुरू करने का फैसला किया। लेकिन 17 सितंबर को टाटा संस बोर्ड ने 4:1 के मतदान से चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए फिर नियुक्त करने को मंजूरी दे दी। नोएल टाटा ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया।


    टाटा ट्रस्ट्स की हिस्सेदारी इस विवाद में क्यों अहम?

    विवाद में टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में बहुमत हिस्सेदारी भी अहम है। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 फीसदी इक्विटी शेयर पूंजी है। दो प्रमुख ट्रस्टों में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के पास 27.98 फीसदी और सर रतन टाटा ट्रस्ट के पास 23.56 फीसदी हिस्सेदारी है। दोनों की संयुक्त हिस्सेदारी 51.54 फीसदी है। बाकी हिस्सेदारी अन्य संबद्ध टाटा ट्रस्ट्स के पास है। टीईडीटी, सर रतन टाटा ट्रस्ट से जुड़ा एक संबद्ध ट्रस्ट है, लेकिन मेहली ने स्पष्ट किया है कि टीईडीटी खुद टाटा संस का शेयरधारक नहीं है।


    क्या टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर भी अलग विवाद है?

    चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के मुद्दे के साथ टाटा संस के भविष्य के स्वामित्व को लेकर भी मतभेद सामने आए हैं। टाटा ट्रस्ट्स ने 17 सितंबर को कहा था कि उसने टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने पर सहमति नहीं दी है। ट्रस्ट्स ने कहा कि लिस्टिंग के अलावा दूसरे विकल्पों पर भी विचार किया जाना चाहिए और फैसला लेने से पहले सभी उपलब्ध विकल्पों की जांच और समीक्षा होनी चाहिए। ट्रस्ट्स ने टाटा संस को गैर-सूचीबद्ध कंपनी बनाए रखने की अपनी स्थिति दोहराई और उसकी धर्मार्थ बहुमत हिस्सेदारी की भूमिका का भी उल्लेख किया।

  • बाबा नीम करौली के पैतृक घर पर विवाद, पोतियों ने लगाए अवैध कब्जे के आरोप; जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित

    बाबा नीम करौली के पैतृक घर पर विवाद, पोतियों ने लगाए अवैध कब्जे के आरोप; जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित

    नई दिल्ली । बाबा नीम करौली महाराज के फिरोजाबाद स्थित अकबरपुर गांव के पैतृक घर को लेकर विवाद बढ़ गया है। उनकी पोतियों ने जिला प्रशासन के सामने शिकायत देकर एक ट्रस्ट पर संपत्ति पर अवैध कब्जे का आरोप लगाया है। मामले की जांच के लिए जिला प्रशासन ने अपर जिलाधिकारी (न्यायिक) अरविंद कुमार द्विवेदी की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की है। समिति में टूंडला उपजिलाधिकारी दिव्या सिंह और जिला पर्यटन अधिकारी विशाल श्रीवास्तव को भी शामिल किया गया है।

    विवाद अकबरपुर गांव में स्थित मकान नंबर 154 और आसपास की संरचनाओं से जुड़ा है। यही स्थान संत के जन्मस्थान के रूप में जाना जाता है। वर्तमान में इस स्थल को पर्यटक आकर्षण के तौर पर विकसित किया जा रहा है। यहां संत का ध्यान कक्ष, भोजन क्षेत्र, अतिथि क्वार्टर और शयनकक्ष जैसी संरचनाएं मौजूद हैं।

    पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, विवाद 24 अगस्त को हुए एक पारिवारिक कार्यक्रम के बाद सामने आया। आरोप है कि संत के दिवंगत बेटे धर्म नारायण शर्मा की छह बेटियों को घर के कमरों में ठहरने की अनुमति नहीं दी गई। यह मकान एक डुप्लेक्स है और करीब 4000 वर्ग फुट क्षेत्रफल वाले भूखंड पर बना हुआ है।

    मामले को लेकर छह पोतियों सुनीता शर्मा, अर्चना शर्मा, वंदना शर्मा, भावना रावत, रितु तिवारी और ऋचा रावत ने जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा। उन्होंने पैतृक निवास को ट्रस्ट के नियंत्रण से मुक्त करने की मांग की है। भावना रावत के पति मनोज रावत ने बताया कि संपत्ति से जुड़े दस्तावेज जांच समिति को सौंपे जा चुके हैं।

    श्री नीम करौली महाराज ट्रस्ट की अध्यक्ष वर्तमान में संत की बेटी गिरिजा देवी भटेले हैं। उनकी दिवंगत पत्नी रामबेटी पहले ट्रस्ट की अध्यक्ष रह चुकी हैं। शिकायत के बाद अब संपत्ति से जुड़े दावों और दस्तावेजों की जांच प्रशासनिक समिति करेगी।

    हालांकि, परिवार के एक अन्य सदस्य धनंजय शर्मा ने इन आरोपों से दूरी बनाई है। वह संत के दूसरे दिवंगत बेटे अनेक सिंह शर्मा के बेटे हैं। उनका कहना है कि संपत्ति बाबा नीम करौली की इच्छा के अनुसार ट्रस्ट को सौंपी गई थी। उन्होंने परिवार के बीच पैदा हुए विवाद पर चिंता जताते हुए मामले को आपसी सहमति से सुलझाने की अपील की है।

    वहीं ट्रस्ट के सचिव संजय गुप्ता ने किसी भी अवैध कब्जे या ट्रस्ट के भीतर विवाद से इनकार किया है। उनका कहना है कि उन्हें धर्म नारायण शर्मा ने नियुक्त किया था और वह संस्था की सेवा करते रहेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जिला प्रशासन की ओर से उन्हें अब तक कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है।

    पैतृक घर से जुड़ा यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब बाबा नीम करौली महाराज के जीवन पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ रिलीज होने के बाद चर्चा में है। सात अगस्त 2026 को रिलीज हुई इस फिल्म ने एक महीने के भीतर दुनिया भर में 150 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की है।

    अब पैतृक संपत्ति को लेकर लगाए गए आरोपों की जांच तीन सदस्यीय समिति करेगी। जांच के दौरान संपत्ति से जुड़े दस्तावेजों, ट्रस्ट के नियंत्रण और परिवार की ओर से किए गए दावों की स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है। फिलहाल प्रशासनिक जांच शुरू होने के बाद इस विवाद के आगे की दिशा समिति की रिपोर्ट पर निर्भर करेगी।

  • राम मंदिर ट्रस्ट में बड़ा बदलाव, शिकायतों के बाद हटाए गए तीन कर्मचारियों की वापसी; संदीप गुप्ता को फिर मिली पुरानी जिम्मेदारी

    राम मंदिर ट्रस्ट में बड़ा बदलाव, शिकायतों के बाद हटाए गए तीन कर्मचारियों की वापसी; संदीप गुप्ता को फिर मिली पुरानी जिम्मेदारी

    नई दिल्ली । राम मंदिर ट्रस्ट की व्यवस्थाओं में बदलाव के बीच अलग-अलग शिकायतों और आरोपों के चलते मंदिर की जिम्मेदारियों से हटाए गए तीन कर्मचारियों की वापसी हो गई है। नए पूर्णकालिक महासचिव स्वामी गोविंद देव गिरि के आगमन के बाद संदीप गुप्ता, केडी तिवारी और बजरंग पाठक को उनके पुराने दायित्वों के साथ बहाल किया गया है। इस फैसले के बाद मंदिर की आंतरिक व्यवस्थाओं में पुराने कर्मचारियों की भूमिकाएं फिर से बहाल होने का सिलसिला सामने आया है।

    इन तीनों कर्मचारियों को अलग-अलग मामलों के बाद मंदिर की व्यवस्थाओं से हटाया गया था। संदीप गुप्ता तीर्थ यात्री सेवा केंद्र में लॉकर व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। लॉकर में सामान रखने को लेकर एक विदेशी महिला से उनकी कहासुनी हुई थी, जिसके बाद महिला ने ट्रस्ट को शिकायत दी थी। शिकायत के आधार पर तत्कालीन अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन ने संदीप को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। जवाब से संतुष्ट नहीं होने के बाद उन्हें काम से हटा दिया गया था।

    संदीप गुप्ता शहीद कारसेवक वासुदेव गुप्ता के बेटे हैं। मंदिर में उन्हें काम दिए जाने के पीछे परिवार की आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखा गया था। नए पूर्णकालिक महासचिव स्वामी गोविंद देव गिरि के आने के बाद संदीप की बहाली की सिफारिश की गई। इसके बाद उन्हें दोबारा उसी स्थान पर तैनात कर दिया गया और पुरानी जिम्मेदारी सौंप दी गई।

    दूसरी ओर, बजरंग पाठक प्रसाद व्यवस्था के प्रभारी थे। रामजन्मभूमि परिसर में तैनात एक महिला क्षेत्राधिकारी ने अपने मेहमानों के लिए प्रसाद दिलाने की सिफारिश की थी। बजरंग पाठक ने इसके लिए ट्रस्ट से आदेश लाने की बात कही और सिफारिश के आधार पर प्रसाद उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया। इसके बाद क्षेत्राधिकारी ने ट्रस्ट से उनकी शिकायत की थी।

    शिकायत के बाद तत्कालीन अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन ने रामलला के आभूषणों और दानदाताओं से प्राप्त वस्तुओं की देखरेख करने वाले केडी तिवारी तथा प्रसाद व्यवस्था प्रभारी बजरंग पाठक को राम मंदिर से हटाकर बाग बिजैसी स्थित तीर्थ क्षेत्र पुरम भेज दिया था। केडी तिवारी ने वहां अपनी नई तैनाती पर काम शुरू कर दिया था, जबकि बजरंग पाठक ने आदेश का पालन नहीं किया और कारसेवक पुरम में सेवा देते रहे। इसके बाद उन्हें भी व्यवस्था से बाहर कर दिया गया था।

    अब स्वामी गोविंद देव गिरि के फैसले के बाद केडी तिवारी और बजरंग पाठक की भी राम मंदिर की पुरानी जिम्मेदारियों पर वापसी हो गई है। इससे मंदिर की व्यवस्थाओं में कर्मचारियों की जिम्मेदारियों को लेकर नए प्रशासनिक दौर की शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं।

    इस बीच चढ़ावा प्रकरण के बाद महासचिव पद से त्यागपत्र देने वाले विहिप के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपतराय और पूर्व ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र भी तीर्थ यात्री सेवा केंद्र पहुंचे। दोनों ने कर्मचारियों से मुलाकात कर उनका हालचाल जाना। उन्होंने कर्मचारियों से कहा कि किसी भी तरह की परेशानी या समस्या होने पर उन्हें इसकी जानकारी दी जाए। दोनों ने करीब एक घंटे तक सेवा केंद्र में कर्मचारियों के साथ समय बिताया।

  • धार्मिक शुचिता को ध्यान में रखते हुए रामलला के अर्चक अब बिना सिलाई वाले पीत वस्त्रों में नजर आएंगे।

    धार्मिक शुचिता को ध्यान में रखते हुए रामलला के अर्चक अब बिना सिलाई वाले पीत वस्त्रों में नजर आएंगे।


    नई दिल्ली । 
    अयोध्या स्थित भव्य राम जन्मभूमि मंदिर में श्रीरामलला की पूजा-अर्चना व्यवस्था को और अधिक सुव्यवस्थित तथा मर्यादित बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला लिया गया है। मंदिर ट्रस्ट द्वारा तय की गई नई व्यवस्था के अंतर्गत अब गर्भगृह में सेवा देने वाले सभी अर्चक एक समान पारंपरिक वेशभूषा में नजर आएंगे। यह नया ड्रेस कोड 15 अगस्त से प्रभावी रूप से लागू किया जाएगा।

    नए ड्रेस कोड के दिशानिर्देशों के अनुसार, ग्रीष्म ऋतु के दौरान सभी अर्चक नीचे पीली धोती और ऊपर बिना सिला हुआ पीला रेशमी अंगवस्त्र धारण करेंगे। कंधों पर रखा जाने वाला यह अंगवस्त्र पूरी तरह से बिना सिलाई का होगा। धार्मिक परंपराओं में गर्भगृह की पवित्रता और शुचिता को बनाए रखने के लिए बिना सिले रेशमी वस्त्रों के उपयोग को विशेष रूप से प्राथमिकता दी जाती है।

    मौसम में परिवर्तन के अनुसार पुजारियों के परिधान सामग्री में बदलाव किया जाएगा, लेकिन वस्त्रों का रंग पीला ही रहेगा। आगामी शीत ऋतु के आगमन पर मौसम के अनुकूल पीले रंग के ऊनी वस्त्र उपलब्ध कराए जाएंगे। धार्मिक न्यास समिति के अनुसार, सनातन और वैष्णव परंपराओं में सूती अथवा सिले हुए कपड़ों की तुलना में रेशमी और ऊनी वस्त्रों को पूजा-अर्चना के दौरान सर्वाधिक शुद्ध माना गया है।

    पूजा-अर्चना में संलग्न पुजारियों का कार्य समय और रोस्टर प्रत्येक माह की अमावस्या और पूर्णिमा तिथियों के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। रोस्टर में बदलाव के साथ ही नए वस्त्र कोड का पालन अनिवार्य कर दिया गया है। मंदिर प्रबंधन ने स्पष्ट किया है कि इस पहल का उद्देश्य पूजा व्यवस्था में एकरूपता और धार्मिक मर्यादाओं का पूर्ण पालन सुनिश्चित करना है।

    अयोध्या में रामलला के नए ड्रेस कोड और धार्मिक अनुष्ठानों की शुचिता को लेकर देश भर के श्रद्धालुओं में विशेष श्रद्धा देखी जा रही है। मध्य प्रदेश के इंदौर, भोपाल और उज्जैन जैसे सांस्कृतिक शहरों के राम भक्तों और धार्मिक विद्वानों ने भी इस पारंपरिक पहल का स्वागत किया है। मध्य प्रदेश के प्रमुख मंदिरों में भी इस प्रकार की वैदिक परंपराओं का विशेष ध्यान रखा जाता है।

    श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा मंदिर परिसर की सुरक्षा, प्रबंधन और दान व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए लगातार समीक्षा बैठकें की जा रही हैं। पूर्व में सामने आई व्यवस्थात्मक कमियों को दूर करते हुए प्रबंधन में कई व्यापक सुधार किए गए हैं, जिसमें कर्मचारियों और अर्चकों की कार्यशैली को और अधिक अनुशासित बनाना शामिल है।

    वैदिक आचार्यों और धार्मिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि पवित्र गर्भगृह के भीतर मर्यादा और शुचिता का पालन सर्वोपरि होता है। बिना सिले वस्त्र धारण कर पूजा-अर्चना करने की यह प्राचीन पद्धति राम मंदिर की भव्यता और सनातन संस्कृति के गौरव को और अधिक प्रगाढ़ बनाएगी।

    इस नए नियम के लागू होने के बाद मंदिर आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को रामलला के दर्शन के साथ-साथ अर्चकों की एकरूप और सात्विक वेशभूषा का अनूठा अनुभव प्राप्त होगा, जो मंदिर की पावन छवि को एक नया आयाम प्रदान करेगा।

  • नेपाल में फीकी पड़ी बालेन शाह का चमक…. महज दो माह में टूटने लगा Gen Z का भरोसा!

    नेपाल में फीकी पड़ी बालेन शाह का चमक…. महज दो माह में टूटने लगा Gen Z का भरोसा!


    काठमांडु।
    नेपाल (Nepal) में पारंपरिक राजनेताओं (Traditional Politicians) के खिलाफ जेनरेशन जेड (Gen-Z) के आंदोलन के रूप में देखे गए ऐतिहासिक चुनावों के जरिए सत्ता में आए बालेन शाह (Balen Shah) की सरकार के लिए शुरुआती उम्मीदें और चमक अब फीकी पड़ती नजर आ रही हैं। महज दो महीने के भीतर ही सरकार चौतरफा विवादों, अदालती झटकों और कूटनीतिक मोर्चों पर आलोचनाओं से घिर गई है। संसद सत्र को टालकर अध्यादेशों की बाढ़ लाने और आलोचनाओं पर प्रधानमंत्री शाह की चुप्पी ने उनके समर्थकों को भी निराश किया है।

    बालेन शाह की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के पास 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में 181 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत है, लेकिन नेशनल असेंबली (ऊपरी सदन) में उनका एक भी सदस्य नहीं है। विधायी संशोधन और कानून पारित करने के लिए उच्च सदन की भूमिका अनिवार्य होती है।

    इस विधायी गतिरोध से बचने के लिए शाह सरकार ने एक विवादास्पद रास्ता चुना। 30 अप्रैल को शुरू होने वाले निचले सदन के सत्र को 11 मई तक टाल दिया गया और इस 12 दिनों के अंतराल में सरकार ने आठ अध्यादेश पारित कर दिए। समर्थकों का मानना है कि यह उस सुधार के एजेंडे के साथ विश्वासघात है जिसके दम पर वे सत्ता में आए थे।


    न्यायपालिका से जुड़ा विवाद

    सबसे बड़ा विवाद संवैधानिक परिषद से जुड़े अध्यादेश को लेकर हुआ। यह परिषद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीशों और अन्य संवैधानिक निकायों के प्रमुखों की नियुक्ति की सिफारिश करती है। नए अध्यादेश के जरिए प्रधानमंत्री को वीटो पावर दे दी गई। इसके तहत यदि किसी नाम पर टाई होता है, तो पीएम का फैसला अंतिम होगा और वे बहुमत के फैसले को भी पलट सकते हैं। परिषद के दो सदस्यों उच्च सदन के अध्यक्ष नारायण दहाल और भीष्मराज आंगदाम्बे ने इस पर असहमति जताई।

    राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने भी इसे पुनर्विचार के लिए वापस भेजा था, लेकिन सरकार द्वारा बिना बदलाव के दोबारा भेजे जाने पर उन्हें इसे मंजूरी देनी पड़ी। अध्यादेश के तुरंत बाद परिषद ने डॉ. मनोज शर्मा को मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की, जिससे कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सपना मल्ला प्रधान सहित तीन वरिष्ठ न्यायाधीश पीछे छूट गए। नेपाल की पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने इसप कहा, “बालेन को इस कृत्य की कीमत चुकानी होगी, जो देश की 15 मिलियन महिलाओं का अपमान है।”


    सुप्रीम कोर्ट का झटका

    प्रशासन को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने के नाम पर सरकार ने एक अन्य अध्यादेश के जरिए संवैधानिक निकायों, राज्य बोर्डों, अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों में तैनात करीब 1,600 लोगों की नियुक्तियां रद्द कर दीं। इसके साथ ही, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्र संगठनों और कर्मचारी यूनियनों पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया गया। हालांकि, नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने इस अध्यादेश पर रोक लगा दी है, जो शाह सरकार के लिए एक बड़ा कानूनी झटका है। इससे पहले कोर्ट ने बिना पुनर्वास के सुकुम्बासी (भूमिहीन निवासियों) को हटाने पर भी रोक लगाई थी।


    संसद में बर्ताव और स्थानीय स्तर पर विरोध

    11 मई को शुरू हुए संसद सत्र के पहले ही दिन पीएम बालेन शाह सफेद कैनवास जूते पहनकर पहुंचे, जिसे संसदीय मर्यादा के लिहाज से बहुत अनौपचारिक माना गया। इसके बाद वे राष्ट्रपति के अभिभाषण के बीच में ही अचानक सदन से बाहर निकल गए और बुधवार को बिना किसी सूचना के संसद से गायब रहे, जिसके कारण विपक्ष के हंगामे के बाद सदन को स्थगित करना पड़ा।

    काठमांडू घाटी में बागमती नदी के किनारे चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान दो भूमिहीन लोगों की आत्महत्या के बाद मानवीय संकट गहरा गया। तीखी आलोचना के बाद शाह ने सोशल मीडिया पर सफाई दी कि सरकार सच्चे भूमिहीनों के पुनर्वास के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन फर्जी भूमिहीनों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी थी।

    इसके अतिरिक्त, देश के शीर्ष उद्योगपतियों को भ्रष्टाचार के आरोप में हिरासत में लेने के फैसले से घरेलू और विदेशी निवेशकों में डर का माहौल बन गया है, जिसे संभालने के लिए अब वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले को डैमेज कंट्रोल करना पड़ रहा है।

    अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मोर्चे पर भी नई सरकार अनुभवहीन साबित हो रही है। बालेन शाह ने अप्रैल में 17 देशों के राजदूतों से मुलाकात कर बहुपक्षीय संबंधों का भरोसा दिया था। लेकिन इसके तुरंत बाद भारत और चीन ने नेपाल के क्षेत्रीय दावे की अनदेखी करते हुए लिपुलेख के रास्ते कैलाश मानसरोवर सड़क खोलने की घोषणा कर दी, जिस पर काठमांडू को विरोध पत्र भेजना पड़ा।

    बालेन शाह ने संकल्प लिया है कि वे एक साल तक कोई विदेशी दौरा नहीं करेंगे और केवल मंत्रियों या उससे ऊपर के स्तर के गणमान्य व्यक्तियों से ही मिलेंगे। इसी कूटनीतिक कड़े रुख के कारण भारत के विदेश सचिव विवेक मिस्री ने अपना नेपाल दौरा स्थगित कर दिया।

  • खुशहाल रिलेशनशिप के लिए जरूरी टिप्स छोटी आदतें लाएंगी बड़ा बदलाव

    खुशहाल रिलेशनशिप के लिए जरूरी टिप्स छोटी आदतें लाएंगी बड़ा बदलाव


    नई दिल्ली:  आज की तेज रफ्तार जिंदगी में रिश्तों को संभालना पहले से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है काम का दबाव बदलती प्राथमिकताएं और डिजिटल दुनिया में बढ़ती दूरी अक्सर लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव को कमजोर कर देती है ऐसे में एक मजबूत और खुशहाल रिश्ता बनाए रखने के लिए कुछ बुनियादी बातों को अपनाना बेहद जरूरी हो जाता है

    किसी भी रिश्ते की नींव मजबूत कम्युनिकेशन पर टिकी होती है जब दो लोग खुलकर अपने विचार भावनाएं और परेशानियां एक दूसरे के साथ साझा करते हैं तो गलतफहमियों की गुंजाइश काफी कम हो जाती है अक्सर लोग छोटी बातों को नजरअंदाज कर देते हैं या मन में दबाकर रखते हैं जो बाद में बड़े विवाद का रूप ले लेती हैं इसलिए सही समय पर खुलकर बातचीत करना रिश्ते को स्वस्थ बनाए रखने का पहला कदम है

    भरोसा हर रिश्ते की सबसे अहम कड़ी होती है यह एक ऐसा धागा है जो दो लोगों को गहराई से जोड़ता है एक बार अगर विश्वास टूट जाए तो उसे दोबारा बनाना आसान नहीं होता इसलिए ईमानदारी और पारदर्शिता को हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए छोटे छोटे झूठ भी लंबे समय में रिश्ते को कमजोर कर सकते हैं

    व्यस्त दिनचर्या के बावजूद एक दूसरे के लिए समय निकालना बेहद जरूरी है साथ बिताए गए पल चाहे कितने ही छोटे क्यों न हों वे रिश्ते में नजदीकियां बढ़ाते हैं कभी साथ बैठकर बातचीत करना या एक साथ समय बिताना भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करता है

    हर व्यक्ति की सोच और स्वभाव अलग होता है इसलिए एक दूसरे का सम्मान करना और उनकी भावनाओं को समझना रिश्ते को संतुलित बनाए रखता है असहमति होना स्वाभाविक है लेकिन उसे संभालने का तरीका ही रिश्ते की दिशा तय करता है धैर्य और समझदारी से बात करने पर बड़े से बड़ा विवाद भी आसानी से सुलझाया जा सकता है

    रिश्तों में छोटी छोटी खुशियों का भी बड़ा महत्व होता है एक प्यारी सी तारीफ एक छोटा सा सरप्राइज या एक स्नेहभरा संदेश भी दिन को खास बना सकता है ऐसे छोटे प्रयास रिश्ते में ताजगी बनाए रखते हैं और अपनापन बढ़ाते हैं

    किसी भी रिश्ते में झगड़े होना सामान्य बात है लेकिन जरूरी यह है कि उन्हें सही तरीके से सुलझाया जाए गुस्से में प्रतिक्रिया देने के बजाय शांत रहकर समाधान पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि भावनाओं में बहकर लिया गया फैसला अक्सर रिश्ते को नुकसान पहुंचा सकता है

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि खुद का ख्याल रखना भी उतना ही जरूरी है जब व्यक्ति मानसिक और भावनात्मक रूप से संतुलित होता है तभी वह किसी रिश्ते को बेहतर तरीके से निभा सकता है आत्मसम्मान और अपनी खुशी को बनाए रखना एक स्वस्थ और लंबे समय तक चलने वाले रिश्ते की पहचान है

    मजबूत रिश्ते का आधार प्यार विश्वास समय और समझदारी पर टिका होता है यदि इन बातों को जीवन में अपनाया जाए तो कोई भी रिश्ता न केवल टिकाऊ बन सकता है बल्कि उसमें हमेशा खुशियां और संतुलन बना रह सकता है

  • असफल वंशज पर न पार्टी नेताओं को भरोसा, न सहयोगियों को… कांग्रेस के सियासी घमासान पर BJP का तंज

    असफल वंशज पर न पार्टी नेताओं को भरोसा, न सहयोगियों को… कांग्रेस के सियासी घमासान पर BJP का तंज


    नई दिल्ली
    । कांग्रेस पार्टी (Congress Party) के लिए सोमवार का दिन उलझनों भरा रहा। मणिशंकर अय्यर (Mani Shankar Aiyar.) जैसे नेता ने पार्टी हाई कमान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया, तो वहीं असम के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा (Bhupen Bora) ने भी पार्टी को अपना इस्तीफा भेज दिया। उन्होंने पार्टी हाई कमान पर उन्हें नजर अंदाज करने का आरोप लगाया था। इस उठा पटक के बीच भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) ने राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के नेतृत्व के ऊपर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। भाजपा की तरफ से राहुल गांधी को एक ‘असफल वंशज’ करार देते हुए कहा गया कि उन पर न तो उनकी पार्टी के नेताओं को भरोसा है और न ही उनके सहयोगियों को भरोसा है।

    दिन भर से कांग्रेस पार्टी के अंदर जारी घमासान पर भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने जमकर तंज कसा। उन्होंने कहा, “तृणमूल कांग्रेस कहती है राहुल को हटाओ, ममता को लाओ, ‘इंडी-गठबंधन’ को बचाओ। असम के कांग्रेस नेता भूपेन बोरा ने इस्तीफा दिया। मणिशंकर अय्यर कहते हैं कि कांग्रेस केरल हारेगी और विजयन जीतेंगे।” भाजपा नेता ने सवाल किया कि क्या यह समझने के लिए और सबूतों की जरूरत है कि न तो गांधी की अपनी पार्टी के नेता और न ही उनके सहयोगी उन्हें गंभीरता से लेते हैं। भाजपा नेता ने अपने हमले को और भी तीखा करते हुए कहा, “राहुल गांधी के पास न तो जनमत है और न ही संगत… वह बस एक असफल विशेषाधिकार प्राप्त वंशवादी हैं।”

    आपको बता दें, खबर लिखे जाने तक असम के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने इस्तीफे को वापस ले लिया था। इसके अलावा मणिशंकर अय्यर को लेकर कांग्रेस पार्टी की तरफ से कहा गया कि वह अब पार्टी में नहीं है, ऐसे में उनके बयान को पार्टी से जोड़ने का कोई मतलब नहीं है। दरअसल, मणिशंकर अय्यर ने कहा था कि उन्हें विश्वास है कि केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन अपने पद पर बने रहेंगे। इसके अलावा उन्होंने प्रवक्ता पवन खेड़ा और शशि थरूर पर भी निशाना साधा था। उनके इस बयान को लेकर कांग्रेस पार्टी की तरफ से जबरदस्त विरोध देखने को मिला था। पार्टी की तरफ से कांग्रेस से संबंध न होने की बात पर पूर्व सांसद ने कहा कि उन्हें केवल अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ही पार्टी से निकाल सकते हैं।

    कांग्रेस पार्टी ने भले ही खुद को इस बयान से दूर कर लिया हो लेकिन भाजपा ने हमला बोलने का कोई मौका नहीं छोड़ा। प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर लिखा, “कांग्रेस नेताओं द्वारा राहुल गांधी को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया है। राहुल गांधी को कांग्रेस के कट्टर वफादार मणिशंकर अय्यर ने खुलेआम नकार दिया।”

    भंडारी ने कहा, ”अय्यर हों या तृणमूल कांग्रेस या भूपेन बोरा सब जानते हैं। राहुल गांधी राजनीतिक ‘पप्पू’ हैं। कांग्रेस में अपना पूरा जीवन बिताने वाले वफादार अब खुलेआम राहुल गांधी के खिलाफ बोल रहे हैं।”

    दरअसल, यह पूरा मामला कांग्रेस के पूर्व सांसद मणिशंकर अय्यर के बयान के बाद शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने कांग्रेस नेताओं के ऊपर निशाना साधा। उन्होंने पवन खेड़ा, केसी वेणुगोपाल और शशि थरूर को भी अपने निशाना पर लिया। इसके अलावा असम से पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष भूपेन के इस्तीफे ने भी कांग्रेस पार्टी के दिन को बर्बाद करने की कोशिश की। मणिशंकर के मामले पर कांग्रेस पार्टी की तरफ से तीखी टिप्पणी आई, जिसमें कहा गया कि मणिशंकर अय्यर अब पार्टी में नहीं है, तो उस पर उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि वह नेहरू वादी और राजीववादी हैं लेकिन राहुलवादी नहीं है। इतना ही नहीं अय्यर ने कहा कि उन्हें पार्टी से निकालने का अधिकार केवल कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को है।