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  • टीबी समझकर शुरू कर दी दवा, निकली फेफड़ों की दूसरी बीमारी, डॉक्टरों ने बताई सही जांच की अहमियत

    टीबी समझकर शुरू कर दी दवा, निकली फेफड़ों की दूसरी बीमारी, डॉक्टरों ने बताई सही जांच की अहमियत


    नई दिल्ली । टीबी यानी क्षय रोग आज भी देश के सामने एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इस बीमारी के इलाज में सबसे बड़ी गलती बिना पुष्टि के दवा शुरू कर देना है। केवल एक्स-रे में दिखाई देने वाले धब्बों या सामान्य लक्षणों के आधार पर टीबी का इलाज शुरू करना मरीज के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। इससे न केवल वास्तविक बीमारी का इलाज देर से शुरू होता है बल्कि अनावश्यक दवाओं के दुष्प्रभाव भी झेलने पड़ सकते हैं। लखनऊ के सिविल अस्पताल में ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं जहां मरीजों को टीबी समझकर दवा दी गई लेकिन विस्तृत जांच में बीमारी कुछ और निकली।

    ऐसा ही एक मामला राजधानी के अहिमामऊ निवासी 46 वर्षीय प्रेमचंद का सामने आया। उन्हें लगातार खांसी सांस फूलने और वजन कम होने की शिकायत थी। एक निजी चिकित्सक ने एक्स-रे में फेफड़ों पर धब्बे देखकर टीबी की दवा शुरू कर दी। करीब एक सप्ताह तक दवा लेने के बावजूद उनकी तबीयत में कोई सुधार नहीं हुआ। बाद में सिविल अस्पताल में विस्तृत जांच कराई गई तो पता चला कि उन्हें टीबी नहीं बल्कि फेफड़ों में गांठ यानी लंग नोड्यूल की समस्या है। इसके बाद तुरंत टीबी की दवा बंद कर सही बीमारी का उपचार शुरू किया गया।

    वरिष्ठ क्षय रोग विशेषज्ञ डॉ. आशुतोष दुबे का कहना है कि एक्स-रे में दिखाई देने वाला हर धब्बा टीबी का संकेत नहीं होता। कई बार फेफड़ों का कैंसर ब्रोंकाइटिस अस्थमा या लंग नोड्यूल जैसी बीमारियां भी एक्स-रे में लगभग वैसी ही दिखाई देती हैं। उनके अनुसार लगभग 30 प्रतिशत मामलों में केवल एक्स-रे के आधार पर किया गया आकलन गलत साबित हो सकता है। इसलिए टीबी की पुष्टि के लिए बलगम जांच सीबीनॉट जीन एक्सपर्ट सीटी स्कैन और मरीज की पूरी चिकित्सीय पृष्ठभूमि का मूल्यांकन करना बेहद जरूरी होता है। सभी जांचों के बाद ही उपचार शुरू किया जाना चाहिए।

    विशेषज्ञों के मुताबिक समय पर सही जांच होने से टीबी का इलाज अब पहले की तुलना में अधिक प्रभावी हो गया है। वर्तमान में टीबी से ठीक होने की दर 90 प्रतिशत से अधिक पहुंच चुकी है। इसके बावजूद यदि मरीज बीच में दवा छोड़ देता है तो बीमारी मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी में बदल सकती है जिसका इलाज अधिक कठिन और लंबा होता है। यदि इसका भी उपचार अधूरा छोड़ दिया जाए तो एक्सटेंसिव ड्रग रेजिस्टेंट टीबी जैसी गंभीर स्थिति विकसित हो सकती है जिसका इलाज करीब दो वर्ष तक चल सकता है।

    डॉ. दुबे बताते हैं कि टीबी का जीवाणु परिस्थितियों के अनुसार खुद को बदलने की क्षमता रखता है। दवाओं से अधिकांश सक्रिय जीवाणु नष्ट हो जाते हैं लेकिन कुछ सुप्त अवस्था में मौजूद जीवाणु शरीर की प्रतिरक्षा क्षमता कमजोर होने पर फिर सक्रिय हो सकते हैं। यही वजह है कि डॉक्टर द्वारा निर्धारित पूरी अवधि तक नियमित रूप से दवा लेना बेहद जरूरी होता है।

    टीबी का संक्रमण मरीज के खांसने या छींकने से हवा में फैलने वाली संक्रमित बूंदों के माध्यम से फैलता है। बंद अंधेरे और नम वातावरण में यह जीवाणु लंबे समय तक सक्रिय रह सकता है। बिना मास्क और पर्याप्त दूरी के लंबे समय तक संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में रहने से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए समय पर जांच उपचार और सावधानी न केवल मरीज बल्कि पूरे समाज की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि धूम्रपान नशीले पदार्थों का सेवन कुपोषण मधुमेह एचआईवी कैंसर एनीमिया और कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों में टीबी का खतरा अधिक रहता है। यदि किसी व्यक्ति को दो सप्ताह से अधिक समय तक लगातार खांसी बुखार वजन कम होना भूख न लगना या बलगम में खून आने जैसी शिकायत हो तो तुरंत सरकारी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में जाकर टीबी की जांच करानी चाहिए। सरकार टीबी मरीजों को उपचार के दौरान हर महीने पोषण सहायता भी उपलब्ध कराती है ताकि इलाज नियमित रूप से जारी रखा जा सके।

    इसी बीच आधुनिक चिकित्सा तकनीक भी टीबी और फेफड़ों की अन्य बीमारियों की सटीक पहचान में मददगार साबित हो रही है। एंडोब्रोंकियल अल्ट्रासाउंड तकनीक के जरिए बिना किसी बड़ी सर्जरी के फेफड़ों के अंदर की जांच संभव हो गई है जिससे टीबी फेफड़ों के कैंसर और लिम्फ नोड्स से जुड़ी बीमारियों का शुरुआती चरण में ही सही पता लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सही जांच समय पर इलाज और जागरूकता ही टीबी मुक्त भारत की दिशा में सबसे प्रभावी कदम साबित होंगे।

  • किन लोगों को होता है टीबी का सबसे ज्यादा खतरा? समय रहते जांच कराना क्यों है जरूरी, जानिए

    किन लोगों को होता है टीबी का सबसे ज्यादा खतरा? समय रहते जांच कराना क्यों है जरूरी, जानिए


    नई दिल्ली । तपेदिक यानी टीबी (ट्यूबरकुलोसिस) आज भी भारत सहित दुनिया के कई देशों के लिए एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। यह एक संक्रामक बीमारी है, जो मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है, लेकिन समय पर इलाज न मिलने पर शरीर के अन्य अंगों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि टीबी का इलाज पूरी तरह संभव है, लेकिन इसके लिए बीमारी की शुरुआती पहचान और समय पर उपचार बेहद जरूरी है।

    राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के अनुसार, कुछ विशेष वर्गों के लोगों में टीबी संक्रमण का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में काफी अधिक होता है। ऐसे लोगों को अपनी सेहत को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतने और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराने की सलाह दी जाती है।

    सबसे अधिक जोखिम उन लोगों को होता है जो किसी टीबी मरीज के संपर्क में रहते हैं। यदि परिवार, घर या आसपास किसी व्यक्ति को सक्रिय टीबी है, तो संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे मामलों में नियमित स्क्रीनिंग और चिकित्सकीय सलाह बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

    कुपोषण से पीड़ित लोग भी टीबी की चपेट में जल्दी आ सकते हैं। शरीर में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता संक्रमण के खिलाफ लड़ने की ताकत को कम कर देती है। यही कारण है कि कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों में टीबी का खतरा अधिक पाया जाता है।

    जो लोग पिछले पांच वर्षों में टीबी से ठीक हो चुके हैं, उन्हें भी विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार कुछ मामलों में संक्रमण दोबारा सक्रिय हो सकता है। इसलिए ऐसे लोगों को नियमित जांच और डॉक्टर की सलाह का पालन करना चाहिए।

    एचआईवी से संक्रमित व्यक्तियों में भी टीबी का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। एचआईवी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देता है, जिससे टीबी का संक्रमण तेजी से फैल सकता है और गंभीर रूप ले सकता है।

    मधुमेह यानी डायबिटीज के मरीज भी इस बीमारी के प्रति अधिक संवेदनशील माने जाते हैं। यदि ब्लड शुगर लंबे समय तक नियंत्रित नहीं रहता, तो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इसी तरह 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में भी उम्र बढ़ने के साथ इम्युनिटी कमजोर होने लगती है, जिससे टीबी का जोखिम बढ़ जाता है।

    लंबे समय से धूम्रपान या शराब का सेवन करने वाले लोगों को भी विशेष सतर्क रहने की जरूरत है। धूम्रपान फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है, जबकि अत्यधिक शराब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देती है। इससे टीबी संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।

    भीड़भाड़ वाले इलाकों, झुग्गी बस्तियों, जेलों, अनाथालयों और वृद्धाश्रमों में रहने वाले लोगों में भी टीबी तेजी से फैल सकती है। खराब स्वच्छता, सीमित संसाधन और नजदीकी संपर्क संक्रमण के प्रसार को आसान बना देते हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को लगातार खांसी, बुखार, वजन कम होना, रात में ज्यादा पसीना आना, भूख कम लगना या लगातार थकान महसूस हो रही है, तो उसे तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। नियमित स्वास्थ्य जांच, पौष्टिक आहार, स्वच्छता, धूम्रपान और शराब से दूरी तथा समय पर उपचार ही टीबी से बचाव के सबसे प्रभावी उपाय हैं।

    टीबी एक गंभीर बीमारी जरूर है, लेकिन जागरूकता, समय पर जांच और सही इलाज से इसे पूरी तरह हराया जा सकता है। इसलिए जोखिम वाले वर्गों को अपनी सेहत के प्रति लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए और नियमित जांच को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए।

  • लेटेंट टीबी को न करें नजरअंदाज वरना बन सकती है एक्टिव टीबी का बड़ा खतरा

    लेटेंट टीबी को न करें नजरअंदाज वरना बन सकती है एक्टिव टीबी का बड़ा खतरा


    नई दिल्ली:टीबी यानी ट्यूबरकुलोसिस एक संक्रामक बीमारी है, जो Mycobacterium tuberculosis नामक बैक्टीरिया के कारण होती है और मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है। हालांकि यह दिमाग, हड्डियों, किडनी और शरीर के अन्य हिस्सों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। यह बीमारी हवा के जरिए फैलती है और समय पर इलाज न मिलने पर गंभीर रूप ले सकती है

    लेकिन टीबी की एक स्थिति ऐसी भी होती है, जिसे लेटेंट टीबी कहा जाता है। इस स्थिति में टीबी के बैक्टीरिया शरीर में मौजूद तो रहते हैं, लेकिन निष्क्रिय अवस्था में होते हैं। इसका मतलब यह है कि संक्रमित व्यक्ति को कोई लक्षण महसूस नहीं होते और न ही वह दूसरों में संक्रमण फैलाता है

    हर साल विश्व टीबी दिवस 24 मार्च को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य इस बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाना है। विशेषज्ञों के अनुसार लेटेंट टीबी को समझना बेहद जरूरी है, क्योंकि यह छुपी हुई स्थिति कभी भी सक्रिय टीबी में बदल सकती हैजब लेटेंट टीबी सक्रिय हो जाती है, तब इसके लक्षण सामने आने लगते हैं। इनमें लगातार खांसी, बुखार, वजन कम होना, रात में पसीना आना और थकान जैसे संकेत शामिल हैं। इसलिए अगर इन लक्षणों को नजरअंदाज किया जाए, तो यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है

    लेटेंट टीबी का खतरा उन लोगों में ज्यादा होता है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। इसमें एचआईवी संक्रमित, डायबिटीज के मरीज, कैंसर से पीड़ित लोग या लंबे समय से स्टेरॉयड दवाएं लेने वाले लोग शामिल हैं। इसके अलावा छोटे बच्चों और बुजुर्गों में भी इसका जोखिम अधिक होता हैविश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया की बड़ी आबादी लेटेंट टीबी से प्रभावित है और भारत जैसे देशों में इसका खतरा और अधिक है। इसलिए समय रहते इसकी जांच और इलाज बेहद जरूरी है

    लेटेंट टीबी की पहचान के लिए ब्लड टेस्ट या ट्यूबरकुलिन स्किन टेस्ट किया जाता है। अगर रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, तो डॉक्टर आमतौर पर 3 से 9 महीने तक दवाएं देते हैं, जिससे यह संक्रमण सक्रिय टीबी में बदलने से रोका जा सके

    बचाव के लिए जरूरी है कि अगर परिवार में किसी को लंबे समय तक खांसी, बुखार या अचानक वजन कम होने जैसी समस्या हो, तो तुरंत जांच कराई जाए। सही समय पर पहचान और इलाज से इस बीमारी को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता हैलेटेंट टीबी एक छिपा हुआ खतरा है, जिसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। समय पर जांच और उपचार ही इससे बचने का सबसे प्रभावी तरीका है

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