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  • कार्तिक मास 27 अक्टूबर से होगा शुरू, दिवाली से पहले मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए जानें पूजा और नियमों का महत्व

    कार्तिक मास 27 अक्टूबर से होगा शुरू, दिवाली से पहले मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए जानें पूजा और नियमों का महत्व

    नई दिल्ली: हिंदू धर्म में कार्तिक मास को बेहद शुभ और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इस महीने में भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी, सूर्य देव और चंद्रमा की विशेष पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक मास में सुबह सूर्योदय से पहले स्नान करना, तुलसी की पूजा करना और दीपक जलाना विशेष फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि इन परंपराओं का पालन करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और जीवन में सौभाग्य बढ़ता है। इस साल कार्तिक मास 27 अक्टूबर से शुरू होकर 24 नवंबर तक चलेगा। दिवाली समेत कई प्रमुख त्योहारों के नजदीक होने के कारण इस अवधि को पूजा-पाठ और धार्मिक गतिविधियों के लिए विशेष माना जा रहा है।

    कार्तिक मास शुरू होने से पहले आश्विन मास के शेष दिनों को भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। सर्वपितृ अमावस्या के बाद आश्विन शुक्ल पक्ष की शुरुआत होती है। इसी पक्ष में शारदीय नवरात्र मनाए जाते हैं, जो मां दुर्गा की आराधना को समर्पित हैं। नवरात्र के नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा की पूजा करते हैं और इसके बाद दशहरा मनाया जाता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, नवरात्र से ही खानपान और दैनिक दिनचर्या में कुछ बदलाव किए जा सकते हैं। इस दौरान घर की साफ-सफाई, सुबह जल्दी उठने और नियमित पूजा करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इन परंपराओं को अपनाने का उद्देश्य धार्मिक अनुशासन बनाए रखना और त्योहारों की तैयारी करना है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्र और कार्तिक मास के दौरान सात्विक भोजन को प्राथमिकता देना चाहिए। इस अवधि में लहसुन, प्याज, मांसाहार और शराब जैसी तामसिक मानी जाने वाली चीजों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। कुछ धार्मिक परंपराओं में बैंगन और मूली का सेवन करने से भी बचने की मान्यता है। कार्तिक मास में विशेष रूप से मछली नहीं खाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। मान्यता के अनुसार, इस महीने भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार का स्मरण किया जाता है, इसलिए मछली के सेवन से परहेज करने की सलाह दी जाती है। हालांकि, ये नियम धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित हैं, जिनका पालन श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार करते हैं।

    इस महीने में सुबह जल्दी उठकर स्नान करने और पूजा-पाठ करने का विशेष महत्व बताया गया है। श्रद्धालु स्नान के बाद मां दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की आराधना कर सकते हैं। शाम के समय तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक जलाने की परंपरा भी प्रचलित है। धार्मिक मान्यता है कि तुलसी पूजन से घर में शुभता आती है। इसके साथ ही घर के मुख्य द्वार पर शाम को दीपक जलाने को भी शुभ माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि दीपदान से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। दिवाली से पहले घर की साफ-सफाई करने के साथ-साथ नवरात्र के दौरान भी घर को स्वच्छ रखने पर जोर दिया जाता है।

    कार्तिक मास में पूजा-पाठ के अलावा मंत्र जाप और ध्यान करने की परंपरा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नियमित मंत्र जाप से मन एकाग्र होता है और ध्यान करने से मानसिक शांति प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है। श्रद्धालु अपनी दिनचर्या में कुछ समय इन गतिविधियों के लिए निर्धारित कर सकते हैं। सुबह जल्दी उठना, स्वच्छता बनाए रखना, सात्विक भोजन करना और शाम को दीपक जलाना इस अवधि की प्रमुख परंपराओं में शामिल हैं। दिवाली से पहले मां लक्ष्मी की पूजा की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं। कार्तिक मास में इन धार्मिक परंपराओं का पालन करने वाले श्रद्धालु इसे भक्ति, संयम और सकारात्मकता बढ़ाने का अवसर मानते हैं। हालांकि, मां लक्ष्मी की कृपा और सुख-समृद्धि से जुड़ी मान्यताएं धार्मिक आस्था का हिस्सा हैं।

  • गणेश जी ने तुलसी को क्यों दिया असुर से विवाह का श्राप? जानिए गणेश चतुर्थी पर तुलसी न चढ़ाने की वजह

    गणेश जी ने तुलसी को क्यों दिया असुर से विवाह का श्राप? जानिए गणेश चतुर्थी पर तुलसी न चढ़ाने की वजह


    नई दिल्ली। गणेश चतुर्थी का पर्व भगवान गणेश की आराधना और उनके स्वागत का विशेष अवसर माना जाता है। इस दिन घरों और पंडालों में गणपति बप्पा की स्थापना की जाती है और विधि विधान से पूजा अर्चना की जाती है। इस वर्ष गणेश चतुर्थी 14 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 14 सितंबर की सुबह 7 बजकर 6 मिनट से शुरू होकर 15 सितंबर की सुबह 7 बजकर 44 मिनट तक रहेगी। भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल में माना जाता है इसलिए 14 सितंबर को ही गणेश चतुर्थी का मुख्य पर्व मनाया जाएगा।

    भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा घास मोदक लाल फूल और कई तरह की पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। लेकिन एक ऐसी पवित्र मानी जाने वाली चीज भी है जिसे गणेश जी को चढ़ाना वर्जित माना गया है और वह है तुलसी। तुलसी को हिंदू धर्म में बेहद पवित्र पौधा माना जाता है और भगवान विष्णु की पूजा में इसका विशेष महत्व है। इसके बावजूद गणेश जी की पूजा में तुलसी पत्र नहीं चढ़ाया जाता। इसके पीछे एक रोचक पौराणिक कथा बताई जाती है।

    पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान गणेश नदी के किनारे गहरे ध्यान में लीन होकर तपस्या कर रहे थे। उसी दौरान देवी तुलसी वहां से गुजरीं। उन्होंने तपस्या में लीन गणेश जी के तेजस्वी और आकर्षक स्वरूप को देखा तो उनके मन में गणेश जी से विवाह करने की इच्छा उत्पन्न हो गई। देवी तुलसी ने गणेश जी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। उस समय गणेश जी ने स्वयं को ब्रह्मचारी बताते हुए उनके प्रस्ताव को स्वीकार करने से विनम्रता से इनकार कर दिया।

    गणेश जी के इनकार से देवी तुलसी नाराज हो गईं। क्रोध में उन्होंने गणेश जी को श्राप दे दिया कि उनकी इच्छा के विरुद्ध उनका विवाह होगा। देवी तुलसी के श्राप से गणेश जी भी क्रोधित हो गए और उन्होंने तुलसी को जवाब में श्राप दिया कि उनका विवाह किसी देवता से नहीं बल्कि एक असुर से होगा। यह सुनकर तुलसी जी को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने गणेश जी से क्षमा मांगी।

    देवी तुलसी की प्रार्थना सुनकर गणेश जी ने उन्हें क्षमा कर दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि भविष्य में तुलसी भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय होंगी और उनकी पूजा में तुलसी का विशेष महत्व होगा। हालांकि गणेश जी की पूजा में तुलसी का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी कथा के कारण आज भी गणेश जी को तुलसी पत्र अर्पित करना वर्जित माना जाता है।

    गणेश चतुर्थी पर भक्त भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए उनकी पूजा में विशेष रूप से दूर्वा अर्पित करते हैं। मान्यता है कि दूर्वा गणेश जी को अत्यंत प्रिय है और इसे अर्पित करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ऐसे में गणेश चतुर्थी के दिन पूजा करते समय तुलसी की जगह दूर्वा लाल फूल मोदक और अन्य प्रिय सामग्री अर्पित करने की परंपरा निभाई जाती है। हालांकि ये बातें धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं।