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  • पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में ईरान को शामिल होने का आधिकारिक प्रस्ताव मिला है।

    पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में ईरान को शामिल होने का आधिकारिक प्रस्ताव मिला है।

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच पश्चिम एशिया में मुस्लिम देशों के बीच रणनीतिक सहयोग को लेकर गतिविधियां तेज हो गई हैं। इसी क्रम में मक्का एग्रीमेंट में ईरान को शामिल करने की संभावना ने क्षेत्रीय राजनीति में नई चर्चा शुरू कर दी है। तेहरान को इस समझौते में शामिल होने के लिए आधिकारिक न्योता दिए जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि ईरान ने अभी इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है और बताया जा रहा है कि इस पर विचार किया जा रहा है।

    मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की पहले ही हस्ताक्षर कर चुके हैं। समझौते का प्रमुख प्रावधान यह है कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला होने की स्थिति में इसे सभी संबंधित देशों पर हमला माना जाएगा। ऐसे में यह समझौता क्षेत्रीय सुरक्षा और सामूहिक रक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ईरान के संभावित जुड़ाव से इस व्यवस्था का दायरा और राजनीतिक महत्व दोनों बढ़ सकते हैं।

    ईरानी मीडिया में सामने आई जानकारी के अनुसार, ईरान को मक्का एग्रीमेंट में शामिल होने का प्रस्ताव मिला है। ईरानी संसद से जुड़ी समाचार एजेंसी के प्रमुख मेहदी रहीमी के हवाले से बताया गया कि तेहरान के सामने रखे गए प्रस्ताव पर फिलहाल विचार-विमर्श चल रहा है। अभी तक ईरानी पक्ष की ओर से समझौते में शामिल होने को लेकर अंतिम निर्णय की जानकारी सामने नहीं आई है।

    इस बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर के तेहरान दौरे को लेकर भी क्षेत्रीय स्तर पर नजरें टिकी हुई हैं। रिपोर्टों के मुताबिक उनका ईरान दौरा क्षेत्र में शांति स्थापित करने और मौजूदा तनाव को कम करने की कोशिशों से जुड़ा बताया जा रहा है। ऐसे समय में यह यात्रा महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बना हुआ है और पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति संवेदनशील बनी हुई है।

    मक्का समझौते को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। उन्होंने पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के समझौते में शामिल होने का स्वागत करते हुए इसे साहसिक और ऐतिहासिक कदम बताया। हालांकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर उनके दावों ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है।

    ईरान के संभावित जुड़ाव का असर केवल रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं रहने की संभावना है। यदि तेहरान इस प्रस्ताव को स्वीकार करता है तो पश्चिम एशिया में सुरक्षा समीकरणों पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के साथ ईरान का एक साझा रक्षा ढांचे में आना क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण बदलाव माना जा सकता है।

    वहीं बांग्लादेश ने भी इस घटनाक्रम को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। बांग्लादेश के नवनियुक्त विदेश मामलों के राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने समझौते को लेकर बयान दिया है। साथ ही बांग्लादेशी पक्ष ने पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंधों को बातचीत के माध्यम से मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ने के संकेत दिए हैं। ऐसे में मक्का एग्रीमेंट अब केवल तीन देशों के बीच रक्षा सहयोग का विषय नहीं रह गया है, बल्कि पश्चिम एशिया और मुस्लिम देशों की व्यापक रणनीतिक राजनीति से भी जुड़ता दिखाई दे रहा है।

  • सऊदी-पाक-तुर्की के ‘मक्का पैक्ट’ में ईरान की एंट्री? न्योता मिलने की खबर से पश्चिम एशिया में हलचल

    सऊदी-पाक-तुर्की के ‘मक्का पैक्ट’ में ईरान की एंट्री? न्योता मिलने की खबर से पश्चिम एशिया में हलचल


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आने की खबर है। ईरान को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए ‘मक्का पैक्ट’ में शामिल होने का न्योता मिलने का दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक ईरान इस प्रस्ताव पर विचार कर रहा है। हालांकि, अभी तक ईरान, सऊदी अरब, पाकिस्तान या तुर्की में से किसी भी देश ने इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

    यह दावा शनिवार को अल मयादीन ने ईरानी संसद की समाचार एजेंसी ‘खानेह मेल्लत’ के प्रमुख मेहदी रहीमी के हवाले से किया। रहीमी के मुताबिक ईरान को मक्का समझौते में शामिल होने का प्रस्ताव मिला है और इस पर फिलहाल विचार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा के लिए साझा व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

    अगर यह खबर सही साबित होती है तो इसे पश्चिम एशिया की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा, क्योंकि सऊदी अरब और ईरान लंबे समय तक एक-दूसरे के क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी रहे हैं।

    क्या है ‘मक्का पैक्ट’?

    सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने 7 अगस्त को मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे सभी तीन देशों पर हमला माना जाएगा।

    समझौते का उद्देश्य आपसी रक्षा सहयोग को मजबूत करना है। इसके तहत सैन्य तालमेल, संयुक्त सैन्य अभ्यास और रक्षा उद्योग में सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम किया जाएगा।

    तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने समझौते के आपसी रक्षा प्रावधान की तुलना NATO के अनुच्छेद 5 से की थी। हालांकि, तीनों देशों ने स्पष्ट किया था कि यह समझौता किसी विशेष देश को निशाना बनाकर नहीं किया गया है।

    ईरान ने पहले नहीं जताई थी आपत्ति

    मक्का पैक्ट के गठन के बाद ईरान ने इस पर खुलकर विरोध नहीं जताया था। 10 अगस्त को ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा था कि तेहरान को समझौते से चिंता की कोई वजह नजर नहीं आती। उन्होंने माना था कि क्षेत्रीय देशों को अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत महसूस हो रही है।

    ऐसे में अब ईरान को इसी सुरक्षा समझौते में शामिल होने का न्योता मिलने की खबर सामने आना चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि, ईरान का इसमें शामिल होना पश्चिम एशिया की रणनीतिक राजनीति में बड़ा बदलाव होगा।

    सऊदी और ईरान की रही है पुरानी प्रतिद्वंद्विता

    सऊदी अरब और ईरान के बीच लंबे समय से क्षेत्रीय वर्चस्व को लेकर खींचतान रही है। इसका असर यमन और खाड़ी क्षेत्र की राजनीति में भी दिखाई देता रहा है। यमन में सऊदी अरब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता रहा है, जबकि ईरान के हूती विद्रोहियों से संबंध बताए जाते हैं।

    हालांकि, 2023 में चीन की मध्यस्थता से दोनों देशों ने राजनयिक रिश्ते बहाल किए थे। इसके बाद संबंधों में कुछ नरमी आई, लेकिन क्षेत्र में जारी तनाव के बीच दोनों देशों के रिश्तों में चुनौतियां बनी हुई हैं।

    ऐसे में यदि ईरान के ‘मक्का पैक्ट’ में शामिल होने की खबर की आधिकारिक पुष्टि होती है, तो यह पश्चिम एशिया के शक्ति समीकरण में महत्वपूर्ण बदलाव साबित हो सकता है। फिलहाल मामला न्योते की रिपोर्ट तक सीमित है और सभी संबंधित देशों की आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।

  • भारत से तनाव के बीच बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके की चुनौतियां पाकिस्तान की सुरक्षा रणनीति पर भारी

    भारत से तनाव के बीच बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके की चुनौतियां पाकिस्तान की सुरक्षा रणनीति पर भारी

    नई दिल्ली । पाकिस्तान इस समय कई स्तरों पर सुरक्षा और रणनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। भारत के साथ जारी तनाव के अलावा बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और अफगानिस्तान से जुड़े मुद्दे उसकी आंतरिक और बाहरी सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। इसी बीच ईरान और उसके समर्थक समूहों से जुड़ी संभावित परिस्थितियां भी पाकिस्तान के सामने अतिरिक्त दबाव पैदा कर रही हैं।

    हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच मक्का रक्षा समझौते ने क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को लेकर चर्चा बढ़ा दी है। इस समझौते को व्यापक इस्लामी सुरक्षा ढांचे की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान के लिए इसकी वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने मौजूदा सुरक्षा संकटों से किस तरह निपटता है।

    पाकिस्तान के सामने सबसे प्रमुख चुनौती भारत से जुड़ा सुरक्षा तनाव है। पिछले वर्ष मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सैन्य कार्रवाई में पाकिस्तान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाए जाने का दावा किया गया था। इसके बाद पाकिस्तान के रक्षा ढांचे और एयरबेस की क्षमता को लेकर भी सवाल उठे।

    पाकिस्तान के भीतर बलूचिस्तान लंबे समय से सुरक्षा संकट का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। अलगाववादी गतिविधियों और हिंसक घटनाओं ने इस क्षेत्र में सरकार के नियंत्रण को चुनौती दी है। खैबर पख्तूनख्वा में भी आतंकवादी गतिविधियां पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों के लिए लगातार परेशानी का कारण बनी हुई हैं।

    पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी राजनीतिक और सामाजिक असंतोष से जूझ रहा है। दूसरी ओर अफगानिस्तान के साथ सीमा और सुरक्षा संबंधी तनाव पाकिस्तान के लिए अलग चुनौती पेश करता है। इन परिस्थितियों के बीच ईरान के साथ क्षेत्रीय समीकरण भी महत्वपूर्ण हो गए हैं, खासकर तब जब मध्य पूर्व में तनाव का प्रभाव आसपास के देशों पर पड़ रहा है।

    तुर्की और सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग पाकिस्तान को राजनीतिक और रणनीतिक समर्थन दे सकता है, लेकिन इससे उसकी सभी आंतरिक समस्याओं का समाधान अपने आप नहीं हो जाता। तुर्की नाटो का सदस्य है और उसकी अपनी मजबूत सैन्य क्षमता है। सऊदी अरब के लिए भी ईरान और हूती गतिविधियों से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियां लंबे समय से महत्वपूर्ण रही हैं।

    भारत ने भी क्षेत्रीय स्तर पर अपने रक्षा और रणनीतिक संबंधों को मजबूत किया है। ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया के साथ भारत के संबंधों में रक्षा सहयोग का महत्व बढ़ा है। इजरायल के साथ भारत की सैन्य और तकनीकी साझेदारी भी लंबे समय से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

    ऐसे में मक्का रक्षा समझौता पाकिस्तान को एक व्यापक सुरक्षा ढांचे से जोड़ने की कोशिश जरूर है, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती उसके अपने घरेलू हालात हैं। यदि बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके जैसे क्षेत्रों में अस्थिरता बनी रहती है, तो बाहरी रक्षा सहयोग के बावजूद पाकिस्तान पर सुरक्षा और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।

    पाकिस्तान के लिए आने वाला समय इस लिहाज से महत्वपूर्ण रहेगा कि वह इन अलग-अलग मोर्चों पर एक साथ बढ़ते दबाव को किस तरह नियंत्रित करता है। सऊदी अरब और तुर्की का समर्थन उसके लिए रणनीतिक सहारा हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए आंतरिक सुरक्षा, राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक क्षमता को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी होगा।

  • सऊदी-पाक-तुर्की की डिफेंस डील में बड़ा ट्विस्ट, ईरान पर तुर्की ने साफ किया अपना रुख

    सऊदी-पाक-तुर्की की डिफेंस डील में बड़ा ट्विस्ट, ईरान पर तुर्की ने साफ किया अपना रुख


    नई दिल्ली। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हाल में हुए रक्षा समझौते को लेकर तस्वीर अब कुछ बदलती नजर आ रही है। तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता ईरान या किसी अन्य खास देश को निशाना बनाकर नहीं किया गया है। उनके बयान के बाद इस डिफेंस डील के उद्देश्य और आपसी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को लेकर नए सवाल उठने लगे हैं।

    शुक्रवार को सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते को लेकर यह बात सामने आई थी कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला होने की स्थिति में इसे तीनों पर हमला माना जाएगा।

    ‘इस्लामिक NATO’ के नाम से हो रही चर्चा
    यह समझौता तेल संपन्न सऊदी अरब, परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान और NATO की दूसरी सबसे बड़ी सेना वाले तुर्की को एक सुरक्षा ढांचे में लाता है। तुर्की का रक्षा उद्योग तेजी से विकसित हुआ है और उसके ड्रोन भी दुनियाभर में चर्चा में रहे हैं। इसी वजह से तीनों सुन्नी बहुल देशों के इस गठजोड़ की तुलना NATO से की जा रही है और इसे कई जगह ‘इस्लामिक NATO’ कहा जा रहा है। माना जा रहा था कि क्षेत्र में ईरान से जुड़े सुरक्षा तनाव के बीच यह समझौता सऊदी अरब के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच साबित हो सकता है।

    तुर्की ने कहा- किसी खास देश को दुश्मन नहीं माना
    अब तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने सरकारी समाचार एजेंसी अनादोलु एजेंसी को दिए इंटरव्यू में इस समझौते को लेकर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। उन्होंने कहा कि तीनों देश किसी विशेष राष्ट्र को तब तक अपना दुश्मन नहीं मानते, जब तक वह उनके खिलाफ शत्रुतापूर्ण कार्रवाई न करे। फिदान के मुताबिक, समझौते में किसी साझा खतरे को लेकर किसी खास देश का नाम निर्धारित नहीं किया गया है। उनका कहना था कि जो देश तुर्की पर हमला नहीं करता, उसे तुर्की अपना निशाना नहीं मानता।

    NATO के अनुच्छेद 5 से कैसे अलग है व्यवस्था?
    फिदान ने समझौते में आपसी रक्षा से जुड़ी व्यवस्था को तकनीकी तौर पर NATO के अनुच्छेद 5 के समान बताया। NATO के अनुच्छेद 5 के तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला होने को सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है। हालांकि, तुर्की के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि इस नए समझौते में सैन्य मदद अपने आप सक्रिय नहीं होगी। यदि किसी सदस्य देश पर हमला होता है, तो उसे औपचारिक तौर पर अन्य दो देशों से सहायता मांगनी होगी। इसके बाद खतरे की स्थिति और उसके स्तर के आधार पर सहायता का स्वरूप तय किया जा सकता है। इसमें खुफिया जानकारी साझा करना, लॉजिस्टिक सहायता देना या जरूरत पड़ने पर सैन्य टुकड़ियां भेजना शामिल हो सकता है।

    दूसरे देशों को भी जोड़ने की तैयारी
    फिदान ने यह भी बताया कि कुछ अन्य देशों ने इस समझौते का हिस्सा बनने में रुचि दिखाई है। हालांकि उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन उम्मीद जताई कि मिस्र अगले चरण में इस व्यवस्था से जुड़ सकता है।

    समझौते के तहत तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री तथा उनके सैन्य प्रमुख नियमित रूप से समिति की बैठक करेंगे। इसके अलावा तीनों देशों के बीच समन्वय के लिए एक सचिवालय स्थापित किया जाएगा, जिसका मुख्यालय सऊदी अरब में होगा। इस तरह मक्का में हुआ यह रक्षा समझौता भले ही तीन देशों के बीच सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है, लेकिन तुर्की के ताजा बयान से यह साफ हो गया है कि इसका लक्ष्य किसी एक देश, खासकर ईरान के खिलाफ मोर्चा बनाना नहीं है।

  • भारत-पाक तनाव के बीच तुर्की का संदेश, कहा- कई देशों के पाकिस्तान से मजबूत रिश्ते

    भारत-पाक तनाव के बीच तुर्की का संदेश, कहा- कई देशों के पाकिस्तान से मजबूत रिश्ते


    नई दिल्ली । भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव के बाद तुर्की एक बार फिर अपने बयानों को लेकर चर्चा में है। पाकिस्तान के साथ करीबी संबंध रखने वाले तुर्की ने साफ कहा है कि वह अकेला ऐसा देश नहीं है जिसके इस्लामाबाद के साथ अच्छे रिश्ते हैं। तुर्की का मानना है कि भारत को इस मुद्दे को अलग नजरिए से देखने की जरूरत है और दोनों देशों को आपसी सहयोग बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।

    तुर्की के विदेश मंत्री Hakan Fidan ने एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में भारत और पाकिस्तान को लेकर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि भारत और तुर्की के बीच कोई सीमा विवाद या ऐतिहासिक दुश्मनी नहीं है, इसलिए दोनों देशों के संबंध बेहतर होने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं।

    फिदान ने कहा कि तुर्की के पाकिस्तान के साथ ऐतिहासिक और मित्रतापूर्ण संबंध हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह भारत के खिलाफ है। उनके अनुसार दुनिया के कई अन्य देशों के भी पाकिस्तान से अच्छे रिश्ते हैं और किसी एक संबंध को लेकर पूरे द्विपक्षीय रिश्ते प्रभावित नहीं होने चाहिए।

    तुर्की के विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि कई देशों के बीच मतभेद होने के बावजूद वे सहयोग के रास्ते तलाशते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि तुर्की के रूस, अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों के साथ विभिन्न मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन इसके बावजूद संवाद और सहयोग जारी रहता है। उनका मानना है कि भारत और तुर्की को भी इसी तरह सकारात्मक एजेंडे पर आगे बढ़ना चाहिए।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत में तुर्की की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। विशेष रूप से पाकिस्तान के साथ उसके रक्षा और रणनीतिक सहयोग को लेकर भारत में चिंता जताई जाती रही है। मीडिया रिपोर्टों में पहले यह दावा भी किया गया था कि भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान तुर्की ने पाकिस्तान को तकनीकी और सैन्य सहायता उपलब्ध कराई थी। हालांकि इन दावों पर विभिन्न पक्षों की अलग-अलग राय रही है।

    भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की पृष्ठभूमि में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद शुरू हुए सैन्य अभियान और उसके बाद दोनों देशों के बीच बढ़ी तनातनी को भी देखा जा रहा है। इसी संदर्भ में तुर्की के बयान को क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और तुर्की के बीच व्यापार, निवेश, पर्यटन और वैश्विक मंचों पर सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन पाकिस्तान को लेकर दोनों देशों के दृष्टिकोण में अंतर समय-समय पर रिश्तों में तनाव का कारण बनता रहा है।

  • अर्मेनिया में युद्ध के बीच फंसी उज्जैन की महिला पहलवान प्रियांशी प्रजापत सुरक्षित लौटीं, सीएम मोहन यादव ने किया त्वरित हस्तक्षेप

    अर्मेनिया में युद्ध के बीच फंसी उज्जैन की महिला पहलवान प्रियांशी प्रजापत सुरक्षित लौटीं, सीएम मोहन यादव ने किया त्वरित हस्तक्षेप

    नई दिल्ली। अर्मेनिया में आयोजित कुश्ती वर्ल्ड चैंपियनशिप में हिस्सा लेने गई उज्जैन की प्रियांशी प्रजापत पिछले चार दिनों से युद्ध के कारण फंसी थीं। अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव के चलते उनका दुबई के रास्ते भारत लौटना असंभव हो गया।

    इस मुश्किल समय में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पहलवान से लाइव बातचीत कर उनकी सुरक्षित वापसी के लिए तुरंत कदम उठाए। सीएम के निर्देश और मध्यप्रदेश कुश्ती संघ के सहयोग से प्रियांशी को अर्मेनिया से तुर्की और कजाकिस्तान के मार्ग से भारत लाया गया। गुरुवार सुबह प्रियांशी देश लौट आईं और उनके परिवार व खेल प्रेमियों में खुशी की लहर दौड़ गई।

    प्रियांशी मध्यप्रदेश की एकमात्र खिलाड़ी थीं जो इस विश्व चैम्पियनशिप में प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर रही थीं। उनकी सुरक्षित वापसी ने राज्य सरकार के त्वरित और प्रभावी हस्तक्षेप की अहमियत को भी दर्शाया।

    इन हालात में उनके पिता ने मध्यप्रदेश कुश्ती संघ के अध्यक्ष नारायण यादव से संपर्क किया और मदद के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को सूचित किया। मुख्यमंत्री ने तुरंत हस्तक्षेप किया और प्रियांशी से ऑनलाइन बातचीत कर उन्हें युद्ध के खतरनाक हालात में सुरक्षित मार्ग से लौटने का भरोसा दिया।

    सीएम के निर्देशों और मध्यप्रदेश कुश्ती संघ के सहयोग से प्रियांशी को अर्मेनिया से तुर्की और कजाकिस्तान के मार्ग से सुरक्षित भारत लाया गया। गुरुवार सुबह वे देश लौट आईं, और उनके परिवार, प्रशिक्षक और खेल प्रेमियों में खुशी की लहर दौड़ गई। प्रियांशी की वापसी ने राज्य सरकार की तत्परता और संकट प्रबंधन क्षमता को उजागर किया।

    प्रियांशी इस चैम्पियनशिप में मध्यप्रदेश की एकमात्र प्रतिनिधि खिलाड़ी थीं। उनके साथियों और प्रशिक्षकों ने बताया कि यह उनका सपना था कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश का नाम रोशन करें, लेकिन युद्ध और अंतरराष्ट्रीय तनाव ने उन्हें अचानक कठिनाई में डाल दिया। इस बीच मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सक्रिय भूमिका और त्वरित निर्णय ने उनकी जान को सुरक्षित रखने में अहम योगदान दिया।

    प्रियांशी के सुरक्षित लौटने के बाद प्रदेश की खेल प्रतिष्ठा भी बढ़ी है। युवा खिलाड़ी और उनके परिवार ने मुख्यमंत्री और मध्यप्रदेश कुश्ती संघ को धन्यवाद दिया। इसके अलावा, इस घटना ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय संकट में राज्य सरकार और खेल संस्थाएं मिलकर खिलाड़ियों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती हैं।

    प्रियांशी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि यह चार दिन उनके जीवन के सबसे तनावपूर्ण रहे। उन्होंने बताया कि दुबई और अर्मेनिया में युद्ध के कारण भय का माहौल था, लेकिन उन्हें विश्वास था कि मुख्यमंत्री और संबंधित अधिकारी उनकी मदद करेंगे। उन्होंने कहा, “मुख्यमंत्री ने मुझे व्यक्तिगत रूप से आश्वस्त किया और सही मार्ग से भारत लौटने में मदद की। यह अनुभव यादगार तो है, लेकिन काफी डराने वाला भी रहा।”

    इस घटना ने यह संदेश भी दिया कि खेल और खिलाड़ियों की सुरक्षा के लिए प्रशासनिक तत्परता बेहद जरूरी है। प्रियांशी अब सुरक्षित हैं और अपने परिवार के साथ हैं, जबकि मध्यप्रदेश सरकार की इस सक्रिय भूमिका को खेल जगत में सराहा जा रहा है।

  • तुर्किए ने तोड़ा पाकिस्तान का इस्लामिक नाटो सपना, द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित रह गया रक्षा समझौता

    तुर्किए ने तोड़ा पाकिस्तान का इस्लामिक नाटो सपना, द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित रह गया रक्षा समझौता

    इस्लामाबाद। पाकिस्तान के करीबी साथी तुर्किए ने इस्लामाबाद की महत्वाकांक्षा,मध्य-पूर्व में इस्लामिक नाटो बनाने की योजना, को झटका दे दिया है। अंकारा ने स्पष्ट किया है कि वह सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ किसी बहुपक्षीय रक्षा गठबंधन में शामिल नहीं होगा। पाकिस्तान ने हाल ही में सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता किया था, और उस समय यह उम्मीद जताई जा रही थी कि इसमें जल्द ही तुर्किए और अजरबैजान जैसे देश भी शामिल हो सकते हैं। लेकिन तुर्किए ने साफ कर दिया कि फिलहाल सभी चर्चाएँ केवल रणनीतिक और द्विपक्षीय सहयोग तक ही सीमित हैं।

    एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार, तुर्किए के रक्षा अधिकारी स्पष्ट हैं कि राष्ट्रपति एर्दोगान की सरकार न तो बहुपक्षीय समझौते में शामिल है और न ही इस पर विचार कर रही है। उनका कहना है कि वर्तमान में पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ संबंध केवल रणनीतिक उद्देश्यों तक ही सीमित हैं। सऊदी अरब भी किसी बहुपक्षीय रक्षा ढांचे के पक्ष में नहीं है और केवल द्विपक्षीय समझौतों को ही प्राथमिकता देती है।

    पाकिस्तानी सेना की चुनौतियां
    तुर्किए के सुरक्षा सूत्रों ने पाकिस्तान की सेना की सीमित संसाधन क्षमता पर चिंता व्यक्त की है।

    पाकिस्तान पहले से ही तीन सीमाओं, भारत, अफगानिस्तान और ईरान—पर सक्रिय है और आंतरिक स्तर पर भी कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। तुर्किए के अधिकारियों के अनुसार, हाल ही में सऊदी अरब के साथ समझौता पाकिस्तानी सेना को और भी अधिक बंटवारा कर रहा है, जिससे बहुपक्षीय रक्षा जिम्मेदारियों को निभाना कठिन हो जाएगा।

    तकनीकी निर्भरता और आर्थिक सीमाएं
    पाकिस्तान की अधिकांश सैन्य तकनीक चीन पर निर्भर है, विशेष रूप से एयर डिफेंस और एयरफोर्स क्षेत्र में। तुर्किए के अनुसार, पाकिस्तान की एकमात्र प्रमुख रणनीतिक ताकत उसकी परमाणु क्षमता है। इसके अलावा आर्थिक दबाव और सीमित वित्तीय संसाधन भी बहुपक्षीय गठबंधन की संभावना को चुनौती देते हैं।

    तुर्किए ने जोर दिया कि पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय रक्षा सहयोग मजबूत है। अंकारा पहले से ही पाकिस्तान को सैन्य उपकरण, ड्रोन तकनीक और वायु रक्षा प्रणाली उपलब्ध करा रहा है। दोनों देश साझा रणनीतिक उद्देश्यों के लिए प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास और क्षमता निर्माण पर काम कर रहे हैं, लेकिन कोई बहुपक्षीय समझौता नहीं हुआ।

    इस्लामिक नाटो का सपना अधर में
    पाकिस्तान के पीएम और सेना प्रमुख मुनीर ने मध्य-पूर्व में इस्लामिक नाटो बनाने का प्रयास किया था, जिसमें सऊदी अरब के साथ हालिया रक्षा समझौते ने संभावनाओं को बढ़ाया। 30 जनवरी को तुर्किए के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ सेल्चुक बायरक्तारओग्लू की पाकिस्तान यात्रा के दौरान यह प्रचार हुआ कि जल्द ही बहुपक्षीय समझौते की घोषणा होगी। लेकिन यात्रा के बाद केवल द्विपक्षीय रणनीतिक सहयोग पर सहमति बनी, कोई बहुपक्षीय रक्षा गठबंधन नहीं बनाया गया।

  • Turkiye: इकलौता मुस्लिम देश जहां घटती जनसंख्या का संकट.. रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंची जन्म दर

    Turkiye: इकलौता मुस्लिम देश जहां घटती जनसंख्या का संकट.. रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंची जन्म दर


    अंकारा।
    पड़ोसी पाकिस्तान (Neighboring Pakistan) का मददगार देश तुर्किये (Turkey) तेजी से एक गंभीर जनसांख्यिकीय संकट (Demographic crisis) की ओर बढ़ रहा है। यह संभवत: दुनिया का इकलौता ऐसा मुस्लिम मुल्क (Muslim country) है, जहां आबादी तेजी से गिर रही है और यही बात वहां के हुक्मरानों को परेशान कर रही है। तुर्की सांख्यिकीय संस्थान के अनुसार, 2024 में तुर्की की कुल प्रजनन दर गिरकर 1.48 प्रति महिला रह गई है। यह जनसंख्या प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से काफी नीचे है। संस्थान के मुताबिक, 25 साल पहले यानी 2001 में यह दर 2.38 थी, जो पिछले 11 वर्षों से लगातार गिर रही है और अब गिरकर 1.48 पर पहुंच गई है।

    देश में जन्म दर में आई ऐतिहासिक गिरावट ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने इसे देश के अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा और तबाही करार दिया है। उपराष्ट्रपति सेवडेट यिलमाज़ ने चेतावनी दी है कि तुर्किये का तथाकथित “जनसांख्यिकीय अवसर काल” (Demographic Dividend) 2035 से पहले ही खत्म हो सकता है। बुधवार को जनसंख्या नीति बोर्ड की बैठक से पहले यिलमाज़ ने कहा कि देश अब एक “डेमोग्राफिक टर्निंग पॉइंट” पर खड़ा है और सरकार इस मुद्दे को अस्तित्व से जुड़ा सवाल मानती है। यह वही शब्दावली है जिसका इस्तेमाल राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन लंबे समय से करते आ रहे हैं।


    जन्म दर रिकॉर्ड निचले स्तर पर

    तुर्किये की कुल प्रजनन दर (Fertility Rate) 2017 में 2.08 था जो 2024 में गिरकर 1.48 पर पहुंच गया है। यह दर न सिर्फ आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी 2.1 से काफी कम है, बल्कि वैश्विक औसत 2.25 से भी नीचे है। यिलमाज़ के मुताबिक, “पिछले 10 वर्षों में जन्म दर में सबसे तेज गिरावट वाले देशों में तुर्किये दुनिया में पांचवें स्थान पर है।” जनसांख्यिकीय अवसर काल वह समय होता है जब कामकाजी आबादी, आश्रित आबादी (बच्चे और बुज़ुर्ग) से कहीं अधिक होती है। इससे आर्थिक विकास को रफ्तार मिलती है। लेकिन यिलमाज़ ने चेताया कि, “अगर मौजूदा रुझान जारी रहे, तो यह अवसर 2035 से काफी पहले खत्म हो सकता है।”


    बुज़ुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही

    हालांकि तुर्किये की आबादी अब 8.6 करोड़ से ज्यादा है और यह यूरोप में सबसे अधिक है, लेकिन देश तेजी से बूढ़ा हो रहा है। 2024 में 65 वर्ष से ऊपर की आबादी 10.6% थी। हालांकि कुछ प्रांतों में यह आंकड़ा 20% से ज्यादा है। संयुक्त राष्ट्र के मानकों के अनुसार, तुर्किये अब “अत्यधिक वृद्ध आबादी” वाले देशों की श्रेणी में आ चुका है।

    अनुमान है कि 2050 तक हर चौथा व्यक्ति 65+ होगा और 2075 तक हर तीसरा शख्स 65+ होगा। अनुमान के मुताबिक, 2100 तक हर 10 में से 4 लोग बुज़ुर्ग होंगे। इसका सीधा असर पेंशन, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं के पलायन के कारण बुज़ुर्गों का अनुपात राष्ट्रीय औसत से भी अधिक हो चुका है। सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए तीन बच्चों की पॉलिसी लागू की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तीन या उससे अधिक बच्चों वाली जन्म दर वाले प्रांतों की संख्या 2017 में 10 थी जो 2024 में सिर्फ़ 1 रह गई है।


    सरकार की पहल

    इस बीच, राष्ट्रपति एर्दोगन ने पिछले साल 2025 को “परिवार वर्ष” घोषित किया था। इसके अलावा 2026–2035 को “परिवार और जनसंख्या दशक” घोषित किया गया है। आबादी बढ़ाने के लिए सरकार ने इसके अलावा कई प्रोत्साहन योजनाओं की भी घोषणा की है। इसके तहत पहले बच्चे के जन्म पर 5,000 लीरा का एकमुश्त भुगतान और दूसरे बच्चे के लिए मासिक भत्ता भुगतान की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा नवविवाहित जोड़ों को 150,000 लीरा तक का ब्याज मुक्त ऋण दिया जा रहा है, जिसमें पहले दो साल कोई भुगतान नहीं करना होगा। राष्ट्रपति एर्दोगन लंबे समय से तुर्की के परिवारों से कम से कम 3 बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं ताकि देश की जनसांख्यिकीय शक्ति बनी रहे। इसके अलावा सरकार ने युवाओं के लिए सामाजिक आवास, मातृत्व और बाल भत्ते में बढ़ोतरी की भी व्यवस्था की है।


    क्यों घट रही है जन्म दर?

    विशेषज्ञों और रिपोर्टों के अनुसार, जन्म दर घटने के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। इनमें सबसे अहम आर्थिक कारण हैं। तुर्किये में उच्च मुद्रास्फीति (Inflation), आवास की बढ़ती लागत और नौकरी की असुरक्षा के कारण युवा परिवार शुरू करने से डर रहे हैं। इसके अलावा महिलाओं के बीच उच्च शिक्षा का स्तर बढ़ा है, जिससे वे शादी और बच्चों के बजाय करियर को प्राथमिकता दे रही हैं। शहरों में रहने वाले परिवारों की संख्या बढ़ रही है, जहां ग्रामीण इलाकों की तुलना में बच्चों की संख्या कम होती है। इसके अलावा आर्थिक दबाव और जीवन-यापन की बढ़ती लागत भी इसकी एक अहम वजह है। बता दें कि चीन-जापान भी इसी तरह की समस्या का सामना कर रहा है।

  • तुर्किये में लीबिया के प्रतिनिधिमंडल को लेकर लौट रहा प्लेन क्रैश…आर्मी चीफ समेत 7 लोगों की मौत

    तुर्किये में लीबिया के प्रतिनिधिमंडल को लेकर लौट रहा प्लेन क्रैश…आर्मी चीफ समेत 7 लोगों की मौत


    अंकारा।
    तुर्किये (Turkey) में बड़ा विमान हादसा (Major Plane Crash) हो गया है। लीबिया (Libya ) के प्रधानमंत्री अब्दुल-हमीद दबीबे (Prime Minister Abdul-Hamid Dbeibeh) ने तुर्किये में हुए विमान हादसे में देश के सैन्य प्रमुख (मिलिट्री चीफ) मुहम्मद अली अहमद अल-हद्दाद (Military Chief Muhammad Ali Ahmed Al-Haddad) समेत सात लोगों की मौत की पुष्टि की है। यह हादसा मंगलवार शाम उस समय हुआ, जब लीबियाई प्रतिनिधिमंडल तुर्किये की राजधानी अंकारा से आधिकारिक दौरे के बाद अपने देश लौट रहा था।

    प्रधानमंत्री दबीबा की ओर से जारी बयान में इस घटना को दुर्घटनापूर्ण और बेहद दुखद बताते हुए कहा कि यह लीबिया के लिए एक बड़ी क्षति है। उन्होंने मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना भी व्यक्त की। लीबिया के सैन्य प्रमुख, चार अन्य अधिकारियों और तीन चालक दल के सदस्यों को ले जा रहा एक निजी विमान राजधानी अंकारा से उड़ान भरने के बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें सवार सभी लोगों की मौत हो गई। लीबियाई अधिकारियों ने बताया कि दुर्घटना का कारण विमान में तकनीकी खराबी थी।


    तकनीकी खराबी के कारण टूटा संपर्क

    लीबिया के अधिकारियों के अनुसार उड़ान भरने के करीब 30 मिनट बाद विमान से संपर्क पूरी तरह टूट गया। प्रारंभिक जानकारी में कहा गया है कि यह संपर्क तकनीकी खराबी के कारण समाप्त हुआ। तुर्किये के अधिकारियों ने बताया कि लीबियाई प्रतिनिधिमंडल दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उच्च स्तरीय रक्षा वार्ता के लिए अंकारा में था।

    मलबा बरामद, हादसे की पुष्टि
    इससे पहले के गृह मंत्री अली येरलिकाया ने बताया था कि लीबियाई मिलिट्री चीफ और चार अन्य लोगों को ले जा रहे फाल्कन-50 श्रेणी के निजी जेट का मलबा अंकारा के पास बरामद कर लिया गया है। हालांकि, बाद में लीबिया के प्रधानमंत्री ने सभी के मारे जाने की आधिकारिक पुष्टि कर दी।

    इस दुर्घटना में मारे गए अन्य चार अधिकारी लीबिया के जमीनी बलों के प्रमुख जनरल अल-फितौरी गरैबिल, सैन्य विनिर्माण प्राधिकरण के प्रमुख ब्रिगेडियर जनरल महमूद अल-कतावी, चीफ ऑफ स्टाफ के सलाहकार मोहम्मद अल-असावी दियाब और चीफ ऑफ स्टाफ के कार्यालय में कार्यरत सैन्य फोटोग्राफर मोहम्मद उमर अहमद महजूब थे। तीनों चालक दल के सदस्यों की पहचान तुरंत पता नहीं चल पाई।

    उड़ान के तुरंत बाद हुआ हादसा
    तुर्किये के गृह मंत्री के मुताबिक, विमान ने मंगलवार शाम करीब 8:30 बजे अंकारा के एसेनबोगा एयरपोर्ट से उड़ान भरी थी। करीब 40 मिनट बाद एयर ट्रैफिक कंट्रोल का विमान से संपर्क टूट गया। इससे पहले विमान ने अंकारा के दक्षिण में स्थित हायमाना जिले के पास इमरजेंसी लैंडिंग का सिग्नल भेजा था। स्थानीय टीवी चैनलों पर दिखाए गए सुरक्षा कैमरा फुटेज में हायमाना क्षेत्र के आसमान में अचानक तेज रोशनी दिखाई दी, जिसे संभावित विस्फोट के रूप में देखा गया।

    तुर्किये दौरे पर थे अल-हद्दाद
    मुहम्मद अली अहमद अल-हद्दाद तुर्की के आधिकारिक दौरे पर अंकारा आए थे, जहां उन्होंने तुर्की के रक्षा मंत्री यासर गुलर और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की थी। अल-हद्दाद पश्चिमी लीबिया के शीर्ष सैन्य कमांडर थे और संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में चल रहे लीबिया की बंटी हुई सेना को एकजुट करने के प्रयासों में उनकी अहम भूमिका मानी जाती थी।

    एयरपोर्ट बंद, उड़ानें डायवर्ट
    हादसे की खबर के बाद अंकारा एयरपोर्ट को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया और कई उड़ानों को अन्य स्थानों पर डायवर्ट किया गया। फिलहाल हादसे के कारणों की जांच जारी है। इस घटना को लीबिया की सुरक्षा और राजनीति के लिहाज से गंभीर झटका माना जा रहा है।