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  • तुर्किए बोला, पाकिस्तान-सऊदी के साथ मक्का रक्षा समझौता ईरान के खिलाफ नहीं, जानें क्या है मकसद

    तुर्किए बोला, पाकिस्तान-सऊदी के साथ मक्का रक्षा समझौता ईरान के खिलाफ नहीं, जानें क्या है मकसद


    नई दिल्ली । 
    पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते को लेकर क्षेत्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। ईरान की ओर से इस समझौते पर आपत्ति जताए जाने के बाद तुर्किए ने अब अपना रुख स्पष्ट किया है। तुर्किए के विदेश मंत्री हकान फिदान ने कहा कि यह समझौता किसी भी तरह से ईरान के खिलाफ नहीं है।

    हकान फिदान ने शनिवार, 8 अगस्त 2026 को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के बीच हाल में हुआ मक्का रक्षा समझौता पूरी तरह रक्षात्मक प्रकृति का है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य किसी देश पर हमला करना या किसी राष्ट्र को समाप्त करना नहीं है।

    तुर्किए के विदेश मंत्री ने इस मामले में सऊदी अरब की स्थिति को भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि रियाद ने ईरान के खिलाफ किसी तरह के हमले या उसे तबाह करने की रणनीति नहीं बनाई है। सऊदी अरब का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में जारी हिंसा को रोकना और महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास स्थिरता कायम करना है।

    हकान फिदान के मुताबिक, सऊदी अरब पहले ही अमेरिका को यह संदेश दे चुका है कि ईरान के खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ाने से मौजूदा समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। रियाद ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी विवाद को बातचीत तथा समझौते के जरिए सुलझाने का समर्थन किया है।

    उन्होंने कहा कि सऊदी अरब की नीति क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाने के बजाय उसे कम करने की दिशा में है। इसी संदर्भ में मक्का में हुई हालिया बैठक को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां क्षेत्रीय सुरक्षा और मौजूदा परिस्थितियों पर चर्चा हुई थी।

    तुर्किए के विदेश मंत्री ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मक्का में हुई बैठक के दौरान क्राउन प्रिंस ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी। उनका कहना था कि सऊदी अरब ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को समाधान के तौर पर नहीं देखता।

    फिदान ने यह भी कहा कि यही संदेश बाद में मोहम्मद बिन सलमान और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई बातचीत के दौरान भी पहुंचाया गया। इससे संकेत मिलता है कि रियाद मौजूदा तनाव के बीच सैन्य विकल्प के बजाय बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता दे रहा है।

    मक्का रक्षा समझौते को लेकर ईरान की चिंता ऐसे समय सामने आई है, जब पश्चिम एशिया में पहले से ही कई स्तरों पर तनाव बना हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच मतभेदों के चलते क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बनी हुई है।

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की हिंसा या अस्थिरता का असर कच्चे तेल और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। ऐसे में सऊदी अरब की ओर से क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिए जाने को व्यापक आर्थिक और रणनीतिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

    तुर्किए की ओर से मक्का रक्षा समझौते को रक्षात्मक बताने का उद्देश्य इस समझौते को लेकर पैदा हुई आशंकाओं को स्पष्ट करना है। हकान फिदान के बयान के अनुसार, समझौते का घोषित उद्देश्य किसी विशेष देश के खिलाफ सैन्य अभियान चलाना नहीं, बल्कि संबंधित देशों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है।

    मौजूदा परिस्थितियों में तुर्किए का यह स्पष्टीकरण ईरान के साथ बढ़ते तनाव को सीमित रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। क्षेत्रीय देशों के लिए अब चुनौती सुरक्षा सहयोग और कूटनीतिक संवाद के बीच संतुलन बनाए रखने की है।

  • ईरान ने तुर्की की ओर दागी बैलिस्टिक मिसाइल, ईरानी राजदूत तलब

    ईरान ने तुर्की की ओर दागी बैलिस्टिक मिसाइल, ईरानी राजदूत तलब


    अंकारा। मध्य पूर्व में जारी युद्ध के बीच तनाव और बढ़ गया है। रिपोर्ट के मुताबिक Iran ने बुधवार को Turkey की दिशा में एक बैलिस्टिक मिसाइल दाग दी। हालांकि NATO की एयर डिफेंस प्रणाली ने मिसाइल को हवा में ही नष्ट कर दिया। इस घटना के बाद तुर्की में हड़कंप मच गया और इसे युद्ध में नाटो की पहली प्रत्यक्ष एंट्री के रूप में देखा जा रहा है।

    नाटो की प्रवक्ता Allison Hart ने बयान जारी कर कहा कि संगठन तुर्की को निशाना बनाए जाने की कड़ी निंदा करता है और अपने सभी सहयोगी देशों के साथ मजबूती से खड़ा है।

    इराक और सीरिया के एयरस्पेस से गुजरी मिसाइल

    तुर्की के रक्षा मंत्रालय के अनुसार ईरान की ओर से दागी गई बैलिस्टिक मिसाइल Iraq और Syria के हवाई क्षेत्र से गुजरते हुए तुर्की की ओर बढ़ रही थी। इससे पहले कि वह लक्ष्य तक पहुंचती, पूर्वी भूमध्यसागर क्षेत्र में तैनात नाटो एयर डिफेंस सिस्टम ने उसे मार गिराया।

    तुर्की प्रेसिडेंसी के कम्युनिकेशन निदेशालय ने बताया कि इंटरसेप्टर का मलबा देश के दक्षिणी प्रांत Hatay Province में गिरा। इस घटना में किसी के हताहत होने की खबर नहीं है।

    रणनीतिक सैन्य ठिकानों के पास गिरा मलबा

    जिस इलाके में मिसाइल का मलबा गिरा, वह तुर्की के प्रमुख सैन्य अड्डे Incirlik Air Base से लगभग 60 मील दूर बताया जा रहा है। वहीं तुर्की के Kürecik क्षेत्र में नाटो का एक महत्वपूर्ण अर्ली-वॉर्निंग रडार सिस्टम भी मौजूद है, जो बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली का अहम हिस्सा माना जाता है।

    तुर्की ने ईरानी राजदूत को किया तलब

    घटना के बाद तुर्की के विदेश मंत्री Hakan Fidan ने अपने ईरानी समकक्ष Abbas Araghchi से बातचीत कर कड़ी आपत्ति जताई। इसके साथ ही तुर्की ने Iran के राजदूत को विदेश मंत्रालय में तलब कर घटना पर जवाब मांगा।

    तुर्की के अधिकारियों ने चेतावनी दी कि देश के खिलाफ किसी भी दुश्मनी भरे कदम का जवाब देने का अधिकार उनके पास सुरक्षित है।

    विश्लेषकों का मानना है कि अगर ऐसे हमले जारी रहे तो यह संघर्ष और ज्यादा देशों को अपनी चपेट में ले सकता है, जिससे पूरे मध्य पूर्व और यूरोप की सुरक्षा स्थिति पर गंभीर असर पड़ सकता है।
  • इस्लामिक नाटो की तैयारी, सऊदी और तुर्की के बीच पक रही खिचड़ी

    इस्लामिक नाटो की तैयारी, सऊदी और तुर्की के बीच पक रही खिचड़ी


    अंकारा। बीते साल सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुई डिफेंस डील वैश्विक स्तर पर चर्चा का केंद्र बनी। दोनों देशों ने एक ऐसा सुरक्षा समझौता कर लिया है जिसके तहत एक देश पर हमले को दूसरे के विरुद्ध भी हमला माना जाएगा। यह समझौता काफी हद तक नाटो के उस अनुच्छेद की तरह है, जिसमें पश्चिमी देशों के इस समूह में किसी भी सदस्य पर हमले को पूरे समूह के खिलाफ हमला माना जाता है। अब पाक और सऊदी की इस डील से एक और मुस्लिम देश जुड़ना चाहता है और यह तीनों देश मिलकर इस्लामिक नाटो नाम की एक खिचड़ी पका रहे हैं।

    ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक तुर्की ने सऊदी-पाकिस्तान डिफेंस डील का हिस्सा बनने में बेहद दिलचस्पी दिखाई है और इसके लिए बैठकों का दौर भी जारी है। मामले से परिचित लोगों के मुताबिक यह गठबंधन स्वाभाविक रूप से आकार ले रहा है क्योंकि दक्षिण एशिया, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के रणनीतिक हित आपस में मिलते हैं। वहीं तीनों देशों के बीच पहले से ही साठ गांठ बनी हुई है।

    इस समूह का संभावित विस्तार इसीलिए भी अहम है क्योंकि तुर्की सिर्फ एक और क्षेत्रीय खिलाड़ी नहीं है। यह अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो गठबंधन का भी हिस्सा है और अमेरिका के बाद नाटो में दूसरी सबसे बड़ी सेना तुर्की की ही है।
    रक्षा संबंध पहले से ही मजबूत

    पाकिस्तान के साथ तुर्की के रक्षा संबंधों की बात की जाए तो वह बेहद अच्छे रहे हैं। तुर्की पाकिस्तानी नौसेना के लिए कार्वेट युद्धपोत बना रहा है, पाकिस्तान के दर्जनों F-16 लड़ाकू विमानों का आधुनिकीकरण किया है और सऊदी और पाक दोनों के साथ ड्रोन तकनीक साझा कर रहा है। वहीं सऊदी अरब और तुर्की शिया-बहुल ईरान को लेकर एकमत हैं और दोनों सैन्य टकराव के बजाय ईरानी शासन का समर्थन करते हैं। इसके अलावा दोनों देश एक स्थिर, सुन्नी-नेतृत्व वाले सीरिया का समर्थन करने और फिलिस्तीन को लेकर भी एकजुट हैं।
    क्या कह रहे विशेषज्ञ?

    अंकारा स्थित थिंक टैंक TEPAV के रणनीतिकार निहत अली ओजकान के मुताबिक इस समूह में तीनों देशों की भूमिका भी तय हो गई है।

    इस्लामिक नाटो को खड़ा करने में जहां सऊदी अरब वित्तीय सहायता देगा, वहीं पाकिस्तान अपने परमाणु हथियार, बैलिस्टिक मिसाइल और मैनपावर देगा। तुर्की अपनी सैन्य विशेषज्ञता और घरेलू रक्षा उद्योग का योगदान दे सकता है। ओजकान के मुताबिक, “जैसे-जैसे अमेरिका इस क्षेत्र में अपने और इजरायल के हितों को प्राथमिकता दे रहा है, बदलते समय में ये देश अपने दोस्तों और दुश्मनों की पहचान करने के लिए नए तरीके विकसित कर रहे हैं।”
    मिस्र ने भी दिखाई थी दिलचस्पी

    बीते साल कतर पर इजरायल के हमले के बाद दोहा में बुलाई गई आपात बैठक में भी मुस्लिम देशों ने अरब-नाटो पर भी चर्चा की थी। इस बैठक में पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी अरब और यूएई सहित 60 मुस्लिम देशों ने हिस्सा लिया था।

    बैठक के दौरान अरब देशों में सबसे बड़ी सेना रखने वाले मिस्र ने अरब-नाटो के प्रस्ताव को पुनर्जीवित करने पर अन्य देशों का समर्थन मांगा था। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक मिस्र ने इस समूह के लिए शुरुआत में 20,000 सैनिकों का योगदान देने की पेशकश भी की थी। वहीं मिस्र की राजधानी काहिरा को अरब-नाटो का मुख्यालय बनाने और एक मिस्र के एक हाई रैंक जनरल को कमांडर बनाने की भी पेशकश की गई थी।
    भारत के लिए चिंता?

    पाकिस्तान और तुर्की जैसे भारत के दुश्मनों का इस तरह के सैन्य संगठन से जुड़ना भारत के लिए एक खतरे की घंटी हो सकती है। खासकर ऐसे समय में जब बीते मई महीने में भारत और पाक के बीच बनी युद्ध जैसी स्थिति के दौरान तुर्की ने पाक को अपने कई अहम हथियार और ड्रोन दिए थे। हालांकि भारत के एयर डिफेंस सिस्टम्स ने भारत की हिफाजत की औक पाक के कायराना हमलों का माकूल जवाब दिया था। वहीं विश्लेषकों का मानना ​​है कि इस तरह के समझौते को सक्रिय करने का संकल्प महज बातचीत है और खाड़ी देशों के लिए इसे जमीनी हकीकत बनाना बेहद मुश्किल है।.