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  • तुर्किये-पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य नजदीकी के बीच भारत की रणनीतिक तैयारी तेज, ग्रीस और साइप्रस के साथ रक्षा सहयोग का रोडमैप तैयार

    तुर्किये-पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य नजदीकी के बीच भारत की रणनीतिक तैयारी तेज, ग्रीस और साइप्रस के साथ रक्षा सहयोग का रोडमैप तैयार

    नई दिल्ली ।तुर्किये और पाकिस्तान के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग के बीच भारत ने अपनी सामरिक तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में कदम तेज किए हैं। इसके तहत भारत भूमध्यसागर क्षेत्र में अपनी पहुंच बढ़ाने और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को ध्यान में रखते हुए ग्रीस तथा साइप्रस के साथ रक्षा संबंधों का विस्तार कर रहा है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की साइप्रस और ग्रीस की चार दिवसीय यात्रा को इसी व्यापक रणनीतिक प्रयास के संदर्भ में देखा जा रहा है। इस दौरे का मुख्य जोर समुद्री सुरक्षा और रक्षा सहयोग पर है।

    भारत और तुर्किये के संबंधों में पाकिस्तान का मुद्दा लंबे समय से संवेदनशील रहा है। दोनों देशों के बीच बढ़ती सैन्य साझेदारी भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को प्रभावित करती है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्किये ने पाकिस्तान को बेयराक्तार ड्रोन दिए थे, जिनका पाकिस्तान ने सीमा पर इस्तेमाल किया। इसके अलावा तुर्किये पाकिस्तान के साथ मक्का रक्षा गठबंधन में भी शामिल है। अंकारा और इस्लामाबाद ने रक्षा उत्पादन तथा नौसैनिक सहयोग को भी बढ़ाया है। तुर्किये पाकिस्तान के लिए युद्धपोत निर्माण कार्यक्रम में भी भागीदारी कर रहा है।

    इस पृष्ठभूमि में भारत ने ग्रीस और साइप्रस के साथ अपने रक्षा संबंधों को मजबूत करने पर ध्यान दिया है। भारत और साइप्रस के बीच रक्षा सहयोग के लिए छह साल का विशेष रोडमैप तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच सामरिक सहयोग को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाना है। वहीं, ग्रीस के साथ भारत ने हाल ही में द्विपक्षीय सैन्य सहयोग योजना पर हस्ताक्षर किए हैं। रक्षा उद्योगों के बीच तालमेल बढ़ाने के लिए दोनों पक्षों ने एक साझा घोषणा पत्र का आदान-प्रदान भी किया है।

    ग्रीस की भौगोलिक स्थिति भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखती है। यह यूरोप के पूर्वी प्रवेश द्वार के रूप में अहम भूमिका निभाता है और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे के लिए भी महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। यह आर्थिक गलियारा भारत को यूरोपीय बाजारों से जोड़ने की योजना का हिस्सा है। ऐसे में ग्रीस के साथ बढ़ते संबंध केवल रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके व्यापक रणनीतिक और आर्थिक मायने भी हैं।

    आने वाले समय में भारत और ग्रीस सैन्य प्रशिक्षण, समुद्री निगरानी, रक्षा तकनीक तथा संयुक्त उत्पादन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। इन क्षेत्रों में तालमेल से दोनों देशों को अपनी क्षमताएं मजबूत करने और रक्षा उद्योगों के बीच साझेदारी को बढ़ावा देने का अवसर मिलेगा। समुद्री सुरक्षा पर सहयोग भी इस साझेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि भूमध्यसागर क्षेत्र में रणनीतिक गतिविधियां भारत के व्यापक अंतरराष्ट्रीय हितों से जुड़ी हुई हैं।

    भारत, ग्रीस और साइप्रस के बीच त्रिपक्षीय सामरिक सहयोग को तुर्किये-पाकिस्तान रक्षा साझेदारी के जवाब में एक महत्वपूर्ण विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। भारत के लिए इन दोनों देशों के साथ संबंध मजबूत करना अपनी रणनीतिक संभावनाओं का विस्तार करने का माध्यम है। रक्षा सचिव की यात्रा और हाल में हुए समझौतों से संकेत मिलता है कि भारत क्षेत्रीय समीकरणों पर नजर रखते हुए विभिन्न देशों के साथ सहयोग बढ़ा रहा है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में किसी प्रत्यक्ष सैन्य टकराव या नई सैन्य तैनाती की घोषणा नहीं की गई है। फिलहाल भारत का जोर रक्षा साझेदारी, सैन्य सहयोग और समुद्री सुरक्षा के जरिए अपने रणनीतिक विकल्प मजबूत करने पर है।

  • हूती हमलों के बीच सऊदी के साथ तुर्की, बोला- जरूरत पड़ी तो सैन्य और तकनीकी मदद देंगे

    हूती हमलों के बीच सऊदी के साथ तुर्की, बोला- जरूरत पड़ी तो सैन्य और तकनीकी मदद देंगे


    नई दिल्ली। यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब पर लगातार हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच तुर्की ने रियाद के समर्थन में बड़ा बयान दिया है। तुर्की के विदेश मंत्री हकन फिदान ने कहा कि सऊदी अरब को अगर सैन्य मदद की जरूरत पड़ती है तो अंकारा सहायता देने के लिए तैयार है। उन्होंने खास तौर पर तकनीकी सैन्य जरूरतों को पूरा करने की बात कही। यह बयान तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के बीच आया है।

    फिदान ने कहा कि सऊदी अरब की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर गंभीर हमले हो रहे हैं और इस मुद्दे पर तुर्की पूरी मजबूती के साथ रियाद के साथ खड़ा है। उन्होंने कहा कि तीनों देशों के बीच हुए रक्षा समझौते में गठबंधन का प्रावधान है। ऐसे में सऊदी अरब को किसी भी तरह की सैन्य जरूरत, विशेष रूप से तकनीकी सहायता की आवश्यकता होती है तो तुर्की उसे पूरा करने में पीछे नहीं हटेगा।

    क्या है मक्का संयुक्त रक्षा समझौता?

    तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच अगस्त में हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा। इसी समझौते को मौजूदा हूती हमलों के बीच पहली बड़ी परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है।

    हालांकि, समझौते के बावजूद अभी तक तुर्की या पाकिस्तान ने हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य अभियान शुरू करने की घोषणा नहीं की है। पाकिस्तान ने कहा है कि मक्का समझौते के तहत हूती हमलों के जवाब में तत्काल सैन्य कार्रवाई को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई है, लेकिन जरूरत के मुताबिक वह आगे कदम उठाएगा।

    ईरान-अमेरिका संघर्ष में सऊदी को घसीटना स्वीकार्य नहीं: फिदान

    तुर्की के विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि सऊदी अरब को अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे व्यापक संघर्ष का हिस्सा बनाया जाना स्वीकार्य नहीं है। उनके मुताबिक रियाद की इस युद्ध में शामिल होने की कोई इच्छा नहीं है।

    फिदान ने कहा कि तुर्की ने संघर्ष खत्म करने के उद्देश्य से सभी संबंधित पक्षों के सामने कई प्रस्ताव रखे हैं। उन्होंने कहा कि कई पहल की गई हैं, लेकिन अब संबंधित पक्षों को उन्हें स्वीकार करना होगा। उन्होंने नए प्रस्तावों की भी जानकारी देते हुए उम्मीद जताई कि सभी पक्ष उन्हें मानेंगे।

    हूतियों का रियाद पर मिसाइल-ड्रोन हमले का दावा

    इस बीच शनिवार को हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद में संवेदनशील ठिकानों को मिसाइल और ड्रोन से निशाना बनाने का दावा किया। यह दावा रियाद के मुख्य एयरपोर्ट के पास आग और धुएं का गुबार दिखाई देने के कुछ घंटे बाद किया गया।

    सऊदी अरब के अधिकारियों के मुताबिक, उसकी एयर डिफेंस प्रणाली ने रियाद की ओर आ रही एक मिसाइल को हवा में ही रोककर नष्ट कर दिया। अधिकारियों ने रातभर संभावित हवाई हमले को लेकर लोगों को अलर्ट पर रखा। शनिवार सुबह स्थिति सामान्य होने की जानकारी दी गई।

    पाकिस्तान ने भी सऊदी की सुरक्षा को लेकर जताई प्रतिबद्धता

    हूती हमलों के बीच पाकिस्तान की भूमिका पर भी नजर बनी हुई है। इस्लामाबाद ने सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, लेकिन अभी तक मक्का समझौते के तहत किसी संयुक्त सैन्य कार्रवाई की घोषणा नहीं की गई है। पाकिस्तान का कहना है कि उचित समय आने पर वह समझौते के तहत अपनी भूमिका निभाएगा।

    हूती हमलों के बढ़ने के साथ मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की व्यावहारिक भूमिका भी चर्चा में आ गई है। फिलहाल तुर्की ने सऊदी की सैन्य जरूरतों को पूरा करने की तैयारी जताई है, जबकि सीधे युद्ध में उतरने की घोषणा नहीं की है।

  • तुर्किए बोला, पाकिस्तान-सऊदी के साथ मक्का रक्षा समझौता ईरान के खिलाफ नहीं, जानें क्या है मकसद

    तुर्किए बोला, पाकिस्तान-सऊदी के साथ मक्का रक्षा समझौता ईरान के खिलाफ नहीं, जानें क्या है मकसद


    नई दिल्ली । 
    पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते को लेकर क्षेत्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। ईरान की ओर से इस समझौते पर आपत्ति जताए जाने के बाद तुर्किए ने अब अपना रुख स्पष्ट किया है। तुर्किए के विदेश मंत्री हकान फिदान ने कहा कि यह समझौता किसी भी तरह से ईरान के खिलाफ नहीं है।

    हकान फिदान ने शनिवार, 8 अगस्त 2026 को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के बीच हाल में हुआ मक्का रक्षा समझौता पूरी तरह रक्षात्मक प्रकृति का है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य किसी देश पर हमला करना या किसी राष्ट्र को समाप्त करना नहीं है।

    तुर्किए के विदेश मंत्री ने इस मामले में सऊदी अरब की स्थिति को भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि रियाद ने ईरान के खिलाफ किसी तरह के हमले या उसे तबाह करने की रणनीति नहीं बनाई है। सऊदी अरब का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में जारी हिंसा को रोकना और महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास स्थिरता कायम करना है।

    हकान फिदान के मुताबिक, सऊदी अरब पहले ही अमेरिका को यह संदेश दे चुका है कि ईरान के खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ाने से मौजूदा समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। रियाद ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी विवाद को बातचीत तथा समझौते के जरिए सुलझाने का समर्थन किया है।

    उन्होंने कहा कि सऊदी अरब की नीति क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाने के बजाय उसे कम करने की दिशा में है। इसी संदर्भ में मक्का में हुई हालिया बैठक को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां क्षेत्रीय सुरक्षा और मौजूदा परिस्थितियों पर चर्चा हुई थी।

    तुर्किए के विदेश मंत्री ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मक्का में हुई बैठक के दौरान क्राउन प्रिंस ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी। उनका कहना था कि सऊदी अरब ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को समाधान के तौर पर नहीं देखता।

    फिदान ने यह भी कहा कि यही संदेश बाद में मोहम्मद बिन सलमान और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई बातचीत के दौरान भी पहुंचाया गया। इससे संकेत मिलता है कि रियाद मौजूदा तनाव के बीच सैन्य विकल्प के बजाय बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता दे रहा है।

    मक्का रक्षा समझौते को लेकर ईरान की चिंता ऐसे समय सामने आई है, जब पश्चिम एशिया में पहले से ही कई स्तरों पर तनाव बना हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच मतभेदों के चलते क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बनी हुई है।

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की हिंसा या अस्थिरता का असर कच्चे तेल और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। ऐसे में सऊदी अरब की ओर से क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिए जाने को व्यापक आर्थिक और रणनीतिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

    तुर्किए की ओर से मक्का रक्षा समझौते को रक्षात्मक बताने का उद्देश्य इस समझौते को लेकर पैदा हुई आशंकाओं को स्पष्ट करना है। हकान फिदान के बयान के अनुसार, समझौते का घोषित उद्देश्य किसी विशेष देश के खिलाफ सैन्य अभियान चलाना नहीं, बल्कि संबंधित देशों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है।

    मौजूदा परिस्थितियों में तुर्किए का यह स्पष्टीकरण ईरान के साथ बढ़ते तनाव को सीमित रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। क्षेत्रीय देशों के लिए अब चुनौती सुरक्षा सहयोग और कूटनीतिक संवाद के बीच संतुलन बनाए रखने की है।

  • ईरान ने तुर्की की ओर दागी बैलिस्टिक मिसाइल, ईरानी राजदूत तलब

    ईरान ने तुर्की की ओर दागी बैलिस्टिक मिसाइल, ईरानी राजदूत तलब


    अंकारा। मध्य पूर्व में जारी युद्ध के बीच तनाव और बढ़ गया है। रिपोर्ट के मुताबिक Iran ने बुधवार को Turkey की दिशा में एक बैलिस्टिक मिसाइल दाग दी। हालांकि NATO की एयर डिफेंस प्रणाली ने मिसाइल को हवा में ही नष्ट कर दिया। इस घटना के बाद तुर्की में हड़कंप मच गया और इसे युद्ध में नाटो की पहली प्रत्यक्ष एंट्री के रूप में देखा जा रहा है।

    नाटो की प्रवक्ता Allison Hart ने बयान जारी कर कहा कि संगठन तुर्की को निशाना बनाए जाने की कड़ी निंदा करता है और अपने सभी सहयोगी देशों के साथ मजबूती से खड़ा है।

    इराक और सीरिया के एयरस्पेस से गुजरी मिसाइल

    तुर्की के रक्षा मंत्रालय के अनुसार ईरान की ओर से दागी गई बैलिस्टिक मिसाइल Iraq और Syria के हवाई क्षेत्र से गुजरते हुए तुर्की की ओर बढ़ रही थी। इससे पहले कि वह लक्ष्य तक पहुंचती, पूर्वी भूमध्यसागर क्षेत्र में तैनात नाटो एयर डिफेंस सिस्टम ने उसे मार गिराया।

    तुर्की प्रेसिडेंसी के कम्युनिकेशन निदेशालय ने बताया कि इंटरसेप्टर का मलबा देश के दक्षिणी प्रांत Hatay Province में गिरा। इस घटना में किसी के हताहत होने की खबर नहीं है।

    रणनीतिक सैन्य ठिकानों के पास गिरा मलबा

    जिस इलाके में मिसाइल का मलबा गिरा, वह तुर्की के प्रमुख सैन्य अड्डे Incirlik Air Base से लगभग 60 मील दूर बताया जा रहा है। वहीं तुर्की के Kürecik क्षेत्र में नाटो का एक महत्वपूर्ण अर्ली-वॉर्निंग रडार सिस्टम भी मौजूद है, जो बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली का अहम हिस्सा माना जाता है।

    तुर्की ने ईरानी राजदूत को किया तलब

    घटना के बाद तुर्की के विदेश मंत्री Hakan Fidan ने अपने ईरानी समकक्ष Abbas Araghchi से बातचीत कर कड़ी आपत्ति जताई। इसके साथ ही तुर्की ने Iran के राजदूत को विदेश मंत्रालय में तलब कर घटना पर जवाब मांगा।

    तुर्की के अधिकारियों ने चेतावनी दी कि देश के खिलाफ किसी भी दुश्मनी भरे कदम का जवाब देने का अधिकार उनके पास सुरक्षित है।

    विश्लेषकों का मानना है कि अगर ऐसे हमले जारी रहे तो यह संघर्ष और ज्यादा देशों को अपनी चपेट में ले सकता है, जिससे पूरे मध्य पूर्व और यूरोप की सुरक्षा स्थिति पर गंभीर असर पड़ सकता है।
  • इस्लामिक नाटो की तैयारी, सऊदी और तुर्की के बीच पक रही खिचड़ी

    इस्लामिक नाटो की तैयारी, सऊदी और तुर्की के बीच पक रही खिचड़ी


    अंकारा। बीते साल सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुई डिफेंस डील वैश्विक स्तर पर चर्चा का केंद्र बनी। दोनों देशों ने एक ऐसा सुरक्षा समझौता कर लिया है जिसके तहत एक देश पर हमले को दूसरे के विरुद्ध भी हमला माना जाएगा। यह समझौता काफी हद तक नाटो के उस अनुच्छेद की तरह है, जिसमें पश्चिमी देशों के इस समूह में किसी भी सदस्य पर हमले को पूरे समूह के खिलाफ हमला माना जाता है। अब पाक और सऊदी की इस डील से एक और मुस्लिम देश जुड़ना चाहता है और यह तीनों देश मिलकर इस्लामिक नाटो नाम की एक खिचड़ी पका रहे हैं।

    ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक तुर्की ने सऊदी-पाकिस्तान डिफेंस डील का हिस्सा बनने में बेहद दिलचस्पी दिखाई है और इसके लिए बैठकों का दौर भी जारी है। मामले से परिचित लोगों के मुताबिक यह गठबंधन स्वाभाविक रूप से आकार ले रहा है क्योंकि दक्षिण एशिया, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के रणनीतिक हित आपस में मिलते हैं। वहीं तीनों देशों के बीच पहले से ही साठ गांठ बनी हुई है।

    इस समूह का संभावित विस्तार इसीलिए भी अहम है क्योंकि तुर्की सिर्फ एक और क्षेत्रीय खिलाड़ी नहीं है। यह अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो गठबंधन का भी हिस्सा है और अमेरिका के बाद नाटो में दूसरी सबसे बड़ी सेना तुर्की की ही है।
    रक्षा संबंध पहले से ही मजबूत

    पाकिस्तान के साथ तुर्की के रक्षा संबंधों की बात की जाए तो वह बेहद अच्छे रहे हैं। तुर्की पाकिस्तानी नौसेना के लिए कार्वेट युद्धपोत बना रहा है, पाकिस्तान के दर्जनों F-16 लड़ाकू विमानों का आधुनिकीकरण किया है और सऊदी और पाक दोनों के साथ ड्रोन तकनीक साझा कर रहा है। वहीं सऊदी अरब और तुर्की शिया-बहुल ईरान को लेकर एकमत हैं और दोनों सैन्य टकराव के बजाय ईरानी शासन का समर्थन करते हैं। इसके अलावा दोनों देश एक स्थिर, सुन्नी-नेतृत्व वाले सीरिया का समर्थन करने और फिलिस्तीन को लेकर भी एकजुट हैं।
    क्या कह रहे विशेषज्ञ?

    अंकारा स्थित थिंक टैंक TEPAV के रणनीतिकार निहत अली ओजकान के मुताबिक इस समूह में तीनों देशों की भूमिका भी तय हो गई है।

    इस्लामिक नाटो को खड़ा करने में जहां सऊदी अरब वित्तीय सहायता देगा, वहीं पाकिस्तान अपने परमाणु हथियार, बैलिस्टिक मिसाइल और मैनपावर देगा। तुर्की अपनी सैन्य विशेषज्ञता और घरेलू रक्षा उद्योग का योगदान दे सकता है। ओजकान के मुताबिक, “जैसे-जैसे अमेरिका इस क्षेत्र में अपने और इजरायल के हितों को प्राथमिकता दे रहा है, बदलते समय में ये देश अपने दोस्तों और दुश्मनों की पहचान करने के लिए नए तरीके विकसित कर रहे हैं।”
    मिस्र ने भी दिखाई थी दिलचस्पी

    बीते साल कतर पर इजरायल के हमले के बाद दोहा में बुलाई गई आपात बैठक में भी मुस्लिम देशों ने अरब-नाटो पर भी चर्चा की थी। इस बैठक में पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी अरब और यूएई सहित 60 मुस्लिम देशों ने हिस्सा लिया था।

    बैठक के दौरान अरब देशों में सबसे बड़ी सेना रखने वाले मिस्र ने अरब-नाटो के प्रस्ताव को पुनर्जीवित करने पर अन्य देशों का समर्थन मांगा था। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक मिस्र ने इस समूह के लिए शुरुआत में 20,000 सैनिकों का योगदान देने की पेशकश भी की थी। वहीं मिस्र की राजधानी काहिरा को अरब-नाटो का मुख्यालय बनाने और एक मिस्र के एक हाई रैंक जनरल को कमांडर बनाने की भी पेशकश की गई थी।
    भारत के लिए चिंता?

    पाकिस्तान और तुर्की जैसे भारत के दुश्मनों का इस तरह के सैन्य संगठन से जुड़ना भारत के लिए एक खतरे की घंटी हो सकती है। खासकर ऐसे समय में जब बीते मई महीने में भारत और पाक के बीच बनी युद्ध जैसी स्थिति के दौरान तुर्की ने पाक को अपने कई अहम हथियार और ड्रोन दिए थे। हालांकि भारत के एयर डिफेंस सिस्टम्स ने भारत की हिफाजत की औक पाक के कायराना हमलों का माकूल जवाब दिया था। वहीं विश्लेषकों का मानना ​​है कि इस तरह के समझौते को सक्रिय करने का संकल्प महज बातचीत है और खाड़ी देशों के लिए इसे जमीनी हकीकत बनाना बेहद मुश्किल है।.