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  • 2020 दिल्ली दंगा साजिश केस में अदालत का बड़ा फैसला, UAPA मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत अर्जी नामंजूर

    2020 दिल्ली दंगा साजिश केस में अदालत का बड़ा फैसला, UAPA मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत अर्जी नामंजूर

    नई दिल्ली। वर्ष 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा साजिश मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है। दोनों आरोपियों ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत दर्ज मामले में ट्रायल कोर्ट से नियमित जमानत की मांग की थी, लेकिन अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और मामले की प्रकृति को देखते हुए फिलहाल उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया।

    यह मामला दिल्ली दंगा साजिश केस की एफआईआर संख्या 59/2020 से संबंधित है। इस प्रकरण की जांच दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल कर रही है। जांच एजेंसी का आरोप है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध में चल रहे प्रदर्शनों की आड़ में व्यापक स्तर पर हिंसा भड़काने की कथित साजिश रची गई थी। इन्हीं आरोपों के आधार पर UAPA तथा भारतीय दंड संहिता की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

    अदालत के समक्ष दायर जमानत याचिकाओं में दोनों आरोपियों की ओर से नियमित जमानत देने का अनुरोध किया गया था। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने मामले की गंभीरता, आरोपों की प्रकृति और जांच से जुड़े विभिन्न पहलुओं का उल्लेख करते हुए जमानत का विरोध किया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने जमानत याचिकाएं स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

    दिल्ली दंगा साजिश मामला पिछले कई वर्षों से देश के चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल रहा है। इस मामले में कई आरोपियों के खिलाफ विस्तृत जांच की गई है और विभिन्न चरणों में अदालत के समक्ष आरोपपत्र भी प्रस्तुत किए जा चुके हैं। कानूनी प्रक्रिया के दौरान कई बार जमानत और अन्य याचिकाओं पर सुनवाई होती रही है, जिससे यह मामला लगातार न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बना हुआ है।

    फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा के दौरान 50 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी, जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे। हिंसा के दौरान अनेक मकान, दुकानें, वाहन और अन्य संपत्तियां भी क्षतिग्रस्त हुई थीं। इसके बाद पुलिस ने घटनाक्रम की विस्तृत जांच शुरू की और कथित बड़ी साजिश के पहलू को भी जांच के दायरे में शामिल किया।

    कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि UAPA के तहत दर्ज मामलों में जमानत संबंधी प्रावधान सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में अधिक कठोर होते हैं। ऐसे मामलों में अदालत उपलब्ध साक्ष्यों, आरोपों की गंभीरता और कानून में निर्धारित शर्तों के आधार पर निर्णय लेती है। इसलिए प्रत्येक जमानत याचिका का मूल्यांकन मामले के तथ्यों और न्यायिक मानकों के अनुरूप किया जाता है।

    अदालत के ताजा फैसले के बाद दोनों आरोपियों के लिए फिलहाल ट्रायल कोर्ट से राहत का रास्ता बंद हो गया है। हालांकि भारतीय न्यायिक व्यवस्था के तहत उनके पास उच्च न्यायालय अथवा अन्य सक्षम न्यायिक मंचों पर कानूनी उपाय अपनाने का विकल्प उपलब्ध रहेगा। मामले की आगे की सुनवाई और ट्रायल निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार जारी रहेगा।

  • आतंकवाद के खिलाफ भारत की बड़ी कार्रवाई, जैश-लश्कर से जुड़े 23 आतंकियों को UAPA के तहत घोषित किया व्यक्तिगत आतंकवादी

    आतंकवाद के खिलाफ भारत की बड़ी कार्रवाई, जैश-लश्कर से जुड़े 23 आतंकियों को UAPA के तहत घोषित किया व्यक्तिगत आतंकवादी


    नई दिल्ली ।
    केंद्र सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी कार्रवाई को और मजबूत करते हुए जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े 23 व्यक्तियों को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत व्यक्तिगत आतंकवादी घोषित कर दिया है। गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना के माध्यम से इन सभी के नाम अधिनियम की चौथी अनुसूची में शामिल किए गए हैं। सरकार का कहना है कि यह कदम आतंकवादी नेटवर्क के खिलाफ कानूनी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई को और प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

    गृह मंत्रालय के अनुसार सूची में शामिल अधिकांश व्यक्ति पाकिस्तान या पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में सक्रिय बताए गए हैं। इन पर भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों की साजिश रचने, आतंकियों की भर्ती करने, प्रशिक्षण देने, हथियारों और विस्फोटकों की आपूर्ति कराने, घुसपैठ में सहायता देने तथा ड्रोन के माध्यम से हथियार भेजने जैसे गंभीर आरोप हैं। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार ये सभी विभिन्न आतंकी संगठनों के संचालन और विस्तार में अलग-अलग भूमिकाएं निभाते रहे हैं।

    सरकार का मानना है कि UAPA के तहत किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत आतंकवादी घोषित किए जाने से उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया और अधिक प्रभावी हो जाती है। इससे संबंधित एजेंसियों को आतंकवादी गतिविधियों के वित्तीय, लॉजिस्टिक और परिचालन नेटवर्क पर कार्रवाई करने में भी सहायता मिलती है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सूचना साझा करने की प्रक्रिया को भी मजबूती मिलती है।

    अधिसूचना में शामिल कई व्यक्तियों पर सुरक्षा प्रतिष्ठानों पर हमलों की साजिश, सीमा पार से आतंकियों की घुसपैठ, हथियारों की आपूर्ति तथा भारत में सक्रिय आतंकी मॉड्यूल को सहायता उपलब्ध कराने के आरोप लगाए गए हैं। कुछ व्यक्तियों के बारे में यह भी कहा गया है कि वे लंबे समय से पाकिस्तान में रहकर प्रतिबंधित आतंकी संगठनों के लिए संचालन, भर्ती और प्रशिक्षण संबंधी गतिविधियों का संचालन कर रहे हैं।

    गृह मंत्रालय के अनुसार सूची में ऐसे व्यक्तियों को भी शामिल किया गया है जिन पर ड्रोन के माध्यम से हथियार और गोला-बारूद भारत भेजने, आतंकी हमलों की योजना तैयार करने तथा युवाओं को आतंकी संगठनों से जोड़ने का आरोप है। इसके अलावा कुछ नाम ऐसे भी हैं जिनके विभिन्न अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों से संपर्क होने का दावा किया गया है।

    सरकार लगातार आतंकवाद के वित्तपोषण, भर्ती तंत्र और सीमा पार से संचालित आतंकी ढांचे के खिलाफ बहुस्तरीय रणनीति पर काम कर रही है। इसी नीति के तहत समय-समय पर प्रतिबंधित संगठनों और उनसे जुड़े व्यक्तियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जाती रही है। हालिया निर्णय को भी उसी अभियान की महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि व्यक्तिगत आतंकवादी घोषित किए जाने के बाद संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी कार्रवाई की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इससे सुरक्षा एजेंसियों को आतंकवादी नेटवर्क के खिलाफ समन्वित कार्रवाई करने में सहायता मिलेगी। सरकार ने स्पष्ट किया है कि देश की सुरक्षा के लिए खतरा बनने वाले संगठनों और उनसे जुड़े व्यक्तियों के विरुद्ध भविष्य में भी इसी प्रकार की कड़ी कार्रवाई जारी रहेगी।

  • सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: जमानत अधिकार है, जेल अपवाद होना चाहिए; उमर खालिद मामले पर पुराने फैसले पर उठे सवाल

    सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: जमानत अधिकार है, जेल अपवाद होना चाहिए; उमर खालिद मामले पर पुराने फैसले पर उठे सवाल

    नई दिल्ली ।
    सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगा साजिश मामले में आरोपी उमर खालिद की जमानत को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए न्यायिक दृष्टिकोण पर नई बहस को जन्म दिया है। अदालत ने अपने ही पुराने रुख पर अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठाते हुए कहा कि जमानत देना नियम होना चाहिए और किसी आरोपी को जेल में रखना केवल अपवाद के रूप में ही उचित माना जा सकता है। यह टिप्पणी उस समय सामने आई जब अदालत एक अन्य गंभीर मामले की सुनवाई कर रही थी, लेकिन इसके दौरान दिल्ली दंगा मामले और उससे जुड़े कानूनी पहलुओं पर भी विस्तार से चर्चा हुई। कोर्ट की इस टिप्पणी ने न केवल कानूनी समुदाय बल्कि राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया है।

    सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि पहले दिए गए कुछ निर्णयों में सभी महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों पर पर्याप्त रूप से विचार नहीं किया गया था। विशेष रूप से उन मामलों का उल्लेख किया गया जिनमें कठोर कानूनों के तहत लंबे समय तक आरोपी जेल में रहते हैं लेकिन उनके खिलाफ मुकदमे की प्रक्रिया धीमी होती है। अदालत ने यह भी माना कि जब किसी आरोपी के मौलिक अधिकारों का प्रश्न उठता है, तो अदालतों को अधिक संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और जमानत के सिद्धांत को प्राथमिकता देनी चाहिए। इस संदर्भ में पूर्व के एक बड़े संवैधानिक फैसले का उल्लेख करते हुए यह कहा गया कि कठोर कानूनों के तहत भी जमानत देने की संभावना बनी रहनी चाहिए यदि परिस्थितियाँ उपयुक्त हों।

    दिल्ली दंगा मामले में उमर खालिद पर 2020 की हिंसा से जुड़े गंभीर आरोप हैं और वह लंबे समय से न्यायिक हिरासत में हैं। इस मामले में उनकी जमानत याचिकाएं कई बार विभिन्न स्तरों पर खारिज की जा चुकी हैं। ट्रायल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक अलग-अलग अवसरों पर उनकी याचिकाओं पर विचार हुआ, लेकिन किसी भी स्तर पर उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बावजूद हाल की न्यायिक टिप्पणी ने यह संकेत दिया है कि भविष्य में ऐसे मामलों में जमानत के सिद्धांत को लेकर न्यायिक दृष्टिकोण और अधिक संतुलित हो सकता है।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बड़े न्यायिक पीठों द्वारा दिए गए फैसलों का पालन छोटी पीठों के लिए आवश्यक है, और किसी भी प्रकार की व्याख्या ऐसी नहीं होनी चाहिए जो मूल निर्णय की भावना को कमजोर करे। इस टिप्पणी ने न्यायिक अनुशासन और निर्णयों की व्याख्या को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया है। साथ ही, अदालत ने यह भी संकेत दिया कि कठोर कानूनों के तहत दर्ज मामलों में सजा दर और दोषसिद्धि के आंकड़ों पर भी विचार किया जाना चाहिए ताकि जमानत संबंधी निर्णय अधिक संतुलित और न्यायसंगत हो सकें।

    यह पूरा मामला केवल एक व्यक्ति की जमानत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्याय व्यवस्था में जमानत की अवधारणा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की शक्तियों के बीच संतुलन को लेकर एक व्यापक बहस को सामने लाता है। अदालत की हालिया टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि भविष्य में ऐसे मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण और अधिक स्पष्ट और अधिकार-आधारित हो सकता है, जहां स्वतंत्रता को प्राथमिकता देते हुए न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता को भी संतुलित रखा जाएगा।

  • केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव 2026 के लिए मतदान जारी, मतदाता कतारों में दिखाई दिए

    केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव 2026 के लिए मतदान जारी, मतदाता कतारों में दिखाई दिए


    नई दिल्ली/केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों के लिए मतदान गुरुवार सुबह 7 बजे से शुरू हो गया है। असम में 126 सीटों, केरल में 140 सीटों और पुडुचेरी में 30 सीटों के लिए मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे हैं। मतदान शाम 5 बजे तक चलेगा और नतीजों की घोषणा 4 मई को होगी। इन चुनावों में कुल 1,899 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं और राज्य-केन्द्रीय स्तर पर राजनीतिक संतुलन पर बड़ा असर डालने की संभावना है।

    केरल में इस बार 883 उम्मीदवार मैदान में हैं, यानी प्रति सीट औसतन छह से सात प्रत्याशी चुनावी मुकाबले में हैं। हालांकि, बागी और निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या के कारण कई निर्वाचन क्षेत्र बेहद प्रतिस्पर्धी बन गए हैं। कुल 27 लाख मतदाता राज्य के 30,000 से अधिक मतदान केंद्रों में फैले हुए हैं। मतदाता सुबह से ही अपने मतदान केंद्रों पर कतारों में खड़े नजर आए। केरल में तीन मुख्य गठबंधन- लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ), यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) और नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) के बीच कड़ा मुकाबला है। एलडीएफ लगातार पांचवीं बार सत्ता में बने रहने का लक्ष्य लेकर चुनाव लड़ रहा है, जबकि यूडीएफ और एनडीए उसे चुनौती दे रहे हैं।

    पुडुचेरी में कुल 9.50 लाख से अधिक मतदाता हैं, जिनमें 24,919 प्रथम बार वोट डालने वाले शामिल हैं। यहां कुल 294 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश चार क्षेत्रों- पुडुचेरी, कराईकल, माहे और यानम से मिलकर बना है। वर्तमान में ‘ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस’ (AINRC) के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में है, जिसकी कमान मुख्यमंत्री एन. रंगासामी के हाथों में है और भाजपा का समर्थन उसे प्राप्त है।

    असम विधानसभा चुनाव में कुल 722 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें 59 महिलाएं शामिल हैं। लगभग 2.5 करोड़ पंजीकृत मतदाता इन चुनावों में भाग लेने के लिए योग्य हैं। राज्य ने मतदान प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए 31,490 मतदान केंद्र स्थापित किए हैं। असम में यह चुनाव अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा अपनी सत्ता बरकरार रखने का प्रयास कर रही है, जबकि कांग्रेस सरकार में वापसी की कोशिश कर रही है। यह चुनाव 2023 में हुए परिसीमन के बाद पहला चुनाव है, जिससे क्षेत्रीय राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव की संभावना है।

    मतदाताओं की सक्रिय भागीदारी और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता इस बार भी चर्चा का केंद्र बनी हुई है। तीनों राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सुबह से ही मतदान केंद्रों के बाहर लंबी कतारें देखने को मिलीं, जो लोकतंत्र में नागरिकों की मजबूत भागीदारी को दर्शाती हैं। इस चुनाव का परिणाम न केवल राज्य सरकारों के भविष्य को तय करेगा बल्कि देश के राजनीतिक संतुलन पर भी प्रभाव डालेगा।

  • दिल्ली दंगों में SC का बड़ा फैसला: उमर खालिद और शरजील इमाम को नहीं मिली जमानत, 5 आरोपियों को मिली राहत

    दिल्ली दंगों में SC का बड़ा फैसला: उमर खालिद और शरजील इमाम को नहीं मिली जमानत, 5 आरोपियों को मिली राहत


    नई दिल्ली । 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हिंसा में 53 लोगों की जान चली गई थी और सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। दंगों के बाद दिल्ली पुलिस ने उमर खालिद शरजील इमाम समेत सात अन्य लोगों पर आरोप लगाया था कि उन्होंने दंगे पूर्व-योजना के तहत आयोजित किए थे। पुलिस ने इन पर भारतीय दंड संहिता और की गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था। पुलिस का कहना था कि यह हिंसा एक सोची-समझी साजिश का परिणाम थी न कि एक आकस्मिक घटना।

    सुप्रीम कोर्ट का फैसला 5 जनवरी 2026

    5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों के मामले में जमानत याचिकाओं पर बड़ा फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट की बेंच जिसमें जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया शामिल थे ने 7 आरोपियों में से 5 को जमानत दे दी जबकि उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी।

    क्यों नहीं मिली जमानत

    अदालत ने उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका को मामले में केंद्रीय और गंभीर बताया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल लंबे समय तक जेल में रहने के कारण जमानत नहीं दी जा सकती। अदालत ने प्रत्येक आरोपी के मामले को अलग-अलग आधार पर तौला और फिर अपना फैसला सुनाया।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत देने के मामले में अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार का हवाला केवल तभी दिया जा सकता है, जब इसका आधार ठोस साक्ष्य और कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ा हो। यदि आरोप गंभीर हैं और साक्ष्य मजबूत हैं तो जीवन के अधिकार के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती।

    अतीत के फैसले का संदर्भ

    उमर खालिद शरजील इमाम और अन्य आरोपियों के खिलाफ यह मामला काफी लंबा खींच चुका है। इन आरोपियों को 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश रचने का आरोप है और वे पांच साल से अधिक समय से जेल में हैं। 10 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने इस मामले में जमानत पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट ने भी इन आरोपियों को जमानत देने से मना कर दिया था। 2 सितंबर 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी जिसके बाद इन आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    अन्य आरोपियों की जमानत

    सुप्रीम कोर्ट ने बाकी 5 आरोपियों को जमानत देने का फैसला सुनाया। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इन आरोपियों की जमानत से ट्रायल प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा और मामले की सुनवाई जारी रहेगी।

    फैसले का महत्व

    यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह दर्शाता है कि न्यायपालिका गंभीर साजिशों और सामूहिक हिंसा के मामलों में जमानत देने में बेहद सावधान रहती है, विशेष रूप से जब आरोप UAPA जैसे कड़े कानूनों के तहत होते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि संवैधानिक अधिकारों को हमेशा कानूनी ढांचे और साक्ष्यों के संदर्भ में समझा जाएगा न कि केवल व्यक्तिगत कठिनाई या जेल में लंबे समय तक रहने के आधार पर।

    आगे क्या होगा

    उमर खालिद और शरजील इमाम अब ट्रायल कोर्ट में फिर से जमानत याचिका दायर कर सकते हैं। ट्रायल की प्रक्रिया अभी भी जारी रहेगी और अदालत भविष्य में साक्ष्यों और मामलों की गंभीरता के आधार पर निर्णय लेगी। यह मामला अब भी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है और अदालत के फैसले ही इन आरोपियों के भविष्य का निर्धारण करेंगे।

  • NIA की चार्जशीट में साजिद जट्ट को पहलगाम हमले का मास्टरमाइंड बताया सात आतंकवादियों के नाम शामिल

    NIA की चार्जशीट में साजिद जट्ट को पहलगाम हमले का मास्टरमाइंड बताया सात आतंकवादियों के नाम शामिल


    नई दिल्ली । चर्चित जांच एजेंसी ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के मामले में अपनी चार्जशीट दायर की है जिसमें सात आरोपियों का नाम शामिल है। इन आरोपियों में प्रमुख पाकिस्तानी आतंकवादी साजिद जट्ट को पहलगाम हमले का मास्टरमाइंड बताया गया है। चार्जशीट में लश्कर-ए-तैयबा और द रेजिस्टेंस फ्रंट के आतंकवादी संगठनों का नाम भी शामिल है जो पाकिस्तान के प्रायोजित आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। इस हमले में 25 पर्यटक और एक स्थानीय नागरिक की मौत हुई थी। चार्जशीट में यह बताया गया है कि पाकिस्तान से इस हमले की साजिश रची गई और इसमें लश्कर और TRF की भूमिका अहम रही। एनआईए के मुताबिक आतंकवादियों ने धर्म आधारित टार्गेट हत्याएं की थीं और भारतीय सुरक्षा बलों के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण समय था।

    एनआईए द्वारा दायर 1597 पन्नों की चार्जशीट में पाकिस्तान के तीन मारे गए आतंकियों के नाम भी शामिल हैं जिनकी पहचान फैसल जट्ट उर्फ सुलेमान शाह हबीब ताहिर उर्फ जिब्रान और हमजा अफगानी के रूप में हुई है। इन तीन आतंकवादियों को भारतीय सुरक्षा बलों ने जुलाई में श्रीनगर के दाचीगाम में ऑपरेशन महादेव के दौरान मार गिराया था।

    कौन है साजिद जट्ट

    चार्जशीट में लश्कर के टॉप कमांडर साजिद जट्ट को मुख्य साजिशकर्ता बताया गया है। उनका पूरा नाम सैफुल्लाह साजिद जट्ट है और वह पाकिस्तान के पंजाब राज्य के कसूर जिले का रहने वाला है। साजिद जट्ट लश्कर-ए-तैयबा का तीसरा सबसे बड़ा कमांडर माना जाता है और हाफिज सईद के बाद वह इस संगठन में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों में से एक हैं।

    साजिद जट्ट को द रेजिस्टेंस फ्रंट का चीफ भी बताया जाता है जो जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देता है। TRF ने ही पहलगाम आतंकी हमले को अंजाम दिया था। भारत सरकार ने साल 2023 में TRF को यूएपीए के तहत बैन कर दिया था। एनआईए ने साजिद जट्ट पर 10 लाख रुपये का इनाम भी घोषित कर रखा है।

    चार्जशीट में साजिद जट्ट के अलावा अन्य चार आतंकवादियों पर भी आरोप लगाए गए हैं जिनमें भारतीय न्याय संहिता शस्त्र अधिनियम 1959 और गैरकानूनी गतिविधियां अधिनियम 1967 के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत आरोप लगाए गए हैं। इसके अलावा भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप में दो स्थानीय कश्मीरियों परवेज अहमद और बशीर अहमद को भी गिरफ्तार किया गया था। इन दोनों को आतंकवादियों को पनाह देने और उनकी मदद करने के आरोप में 22 जून को एनआईए ने गिरफ्तार किया था।

    एनआईए ने अपनी जांच में यह पुष्टि की कि दोनों स्थानीय कश्मीरी आरोपियों ने हमले में शामिल तीन पाकिस्तानी आतंकवादियों की पहचान की और यह भी बताया कि ये आतंकवादी लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े हुए थे। इसके अलावा एनआईए ने पाकिस्तान के प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ अपनी सख्त कार्रवाई जारी रखने का संकल्प लिया है।

    इस चार्जशीट से यह स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान लगातार भारतीय सीमा में आतंकवादी गतिविधियों को प्रायोजित कर रहा है और ऐसे आतंकवादियों की मदद करने में स्थानीय कश्मीरी भी शामिल हो रहे हैं। एनआईए की यह कार्रवाई इस बात को भी उजागर करती है कि भारत आतंकवाद के खिलाफ अपनी कार्रवाई में कोई कसर नहीं छोड़ने वाला है।

  • 148 लोगों की मौत वाली रेल दुर्घटना में आरोपियों को नहीं मिलेगी जमानत, SC का कड़ा फैसला

    148 लोगों की मौत वाली रेल दुर्घटना में आरोपियों को नहीं मिलेगी जमानत, SC का कड़ा फैसला


    नई दिल्‍ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने ‘जेल नहीं, जमानत'(Bail) के सिद्धांत में अपवाद को जोड़ते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता(Personal freedom) का अधिकार संरक्षित तो है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की संप्रभुता से जुड़े मामलों में केवल इसी आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती। विशेषकर गैरकानूनी(illegal) गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA जैसे कानूनों के तहत दर्ज मामलों में अदालत को व्यापक राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखना होगा।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. के. सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी सीबीआई की उस अपील पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा दिए गए जमानत आदेश को चुनौती दी गई थी। यह मामला 9 जून 2010 को पश्चिम बंगाल में हुई भीषण रेल दुर्घटना से जुड़ा है, जब रेलवे ट्रैक से छेड़छाड़ किए जाने के कारण ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई और एक मालगाड़ी से टकरा गई। इस हादसे में 148 लोगों की मौत हुई थी और 170 से अधिक यात्री घायल हुए थे। पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले में माओवादियों द्वारा रेलवे ट्रैक उखाड़ने से ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई थी और एक मालगाड़ी से टकरा गई थी। निर्दोष लोगों की मौतों के अलावा, सरकार को सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान से करीब 25 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।

    राष्ट्रीय हित सर्वोपरि
    पीठ ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है। यह राष्ट्रीय हित, संप्रभुता और देश की अखंडता जैसे उच्चतर उद्देश्यों के अधीन है। अदालत ने कहा कि न्याय की तराजू को एक ओर संविधान द्वारा प्रदत्त अनुच्छेद 21 के अधिकार और दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे ‘न्यायसंगत अपवादों’ के बीच संतुलन बनाना होता है।

    फैसले को लिखते हुए जस्टिस संजय करोल ने कहा कि कुछ मामले अपनी प्रकृति और प्रभाव के कारण व्यापक दृष्टिकोण की मांग करते हैं, जहां मुद्दा केवल किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का होता है।

    माओवादी साजिश और भारी नुकसान
    अदालत के अनुसार, यह रेल हादसा माओवादी कैडरों द्वारा अंजाम दी गई साजिश का नतीजा था। इसका उद्देश्य झारग्राम क्षेत्र में राज्य पुलिस और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की संयुक्त तैनाती को वापस लेने के लिए सरकार पर दबाव बनाना था। इस घटना में न केवल बड़ी संख्या में निर्दोष यात्रियों की जान गई और लोग घायल हुए, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति को भी करीब 25 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा।

    विरोध का अधिकार, लेकिन हिंसा नहीं
    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर नागरिक को सरकार की नीतियों के खिलाफ कानून के दायरे में रहकर विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन निर्दोष लोगों की जान लेने वाली बर्बर और अमानवीय हरकतों को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि ट्रेन पटरियों से छेड़छाड़ कर लगभग 150 यात्रियों की मौत का कारण बनने वाले कृत्य को किसी भी लोकतांत्रिक अधिकार के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

    12 साल की कैद पर भी जमानत नहीं
    आरोपियों की ओर से यह दलील भी दी गई थी कि वे 12 साल से अधिक समय से जेल में हैं, इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436A के तहत उन्हें जमानत मिलनी चाहिए। इस धारा के अनुसार, यदि कोई अंडरट्रायल आरोपी किसी अपराध की अधिकतम सजा के आधे से अधिक समय तक जेल में रह चुका हो, तो उसे जमानत दी जा सकती है।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि आतंकवादी कृत्यों जैसे अपराधों में संभावित सजा मृत्युदंड तक हो सकती है। ऐसे में 12 साल की कैद को धारा 436A के तहत जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता।

    UAPA में उलटा बोझ और निष्पक्ष सुनवाई
    अदालत ने UAPA के तहत आरोपियों पर डाले गए ‘रिवर्स बर्डन’ (उलटे बोझ) का भी उल्लेख किया, जिसमें आरोपी को खुद अपनी बेगुनाही साबित करनी होती है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट्स को निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में आरोपियों को उनके खिलाफ इस्तेमाल होने वाले सभी दस्तावेज समय पर उपलब्ध कराए जाएं, ताकि वे अपनी रक्षा की तैयारी कर सकें और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो सके।

    शीघ्र सुनवाई के निर्देश
    15 साल से अधिक पुराने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल को तेजी से पूरा करने का आदेश दिया है, ताकि न्याय में और देरी न हो। इस फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में जमानत के सिद्धांतों को स्पष्ट करने और ‘बेल, नॉट जेल’ के व्यापक सिद्धांत पर एक महत्वपूर्ण अपवाद के रूप में देखा जा रहा है।