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  • राम मंदिर चढ़ावा मामले में निष्पक्ष जांच की मांग, मनीष तिवारी बोले- करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा है पूरा मामला

    राम मंदिर चढ़ावा मामले में निष्पक्ष जांच की मांग, मनीष तिवारी बोले- करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा है पूरा मामला

    नई दिल्ली । कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने राम मंदिर से जुड़े कथित चढ़ावा गबन मामले, यूनिफॉर्म सिविल कोड और सिंधु जल संधि सहित कई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि राम मंदिर से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होना आवश्यक है, क्योंकि यह मामला करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था और विश्वास से जुड़ा हुआ है।

    राम मंदिर में कथित चढ़ावा गबन को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले के बयान के बाद प्रतिक्रिया देते हुए तिवारी ने कहा कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए। उनके अनुसार यदि किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता हुई है तो उसकी पूरी सच्चाई सामने आनी चाहिए, ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास बना रहे और धार्मिक संस्थाओं की गरिमा पर कोई प्रश्नचिह्न न लगे।

    उन्होंने कहा कि अयोध्या स्थित रामलला का मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। ऐसे में इस प्रकार के किसी भी विवाद का निष्पक्ष समाधान आवश्यक है। उनका कहना था कि जांच पूरी पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए ताकि किसी भी तरह के संदेह की स्थिति समाप्त हो सके और तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आएं।

    महाराष्ट्र में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की दिशा में ड्राफ्टिंग कमेटी गठित किए जाने के निर्णय पर भी मनीष तिवारी ने अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान में यूनिफॉर्म सिविल कोड का उल्लेख किया गया है, न कि कॉमन सिविल कोड का। उनके अनुसार दोनों अवधारणाओं को एक समान मानना उचित नहीं है और इस विषय पर संवैधानिक प्रावधानों को सही संदर्भ में समझने की आवश्यकता है।

    तिवारी ने यह भी कहा कि पहले जब इस विषय पर चर्चा हुई थी, तब यह स्पष्ट किया गया था कि कुछ विशेष समुदायों और अनुसूचित जनजातियों को इसके दायरे से बाहर रखने का विचार सामने आया था। उनका तर्क था कि यदि विभिन्न समुदायों के पारंपरिक और प्रथागत कानूनों को अलग रखा जाता है तो फिर इसे वास्तविक अर्थों में समान नागरिक संहिता कहना कठिन होगा। उन्होंने इस विषय पर व्यापक संवाद और संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

    सिंधु जल संधि और पाकिस्तान के साथ संबंधों पर पूछे गए प्रश्न के जवाब में कांग्रेस सांसद ने कहा कि आतंकवाद के मुद्दे पर देश की नीति लंबे समय से स्पष्ट रही है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई के मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक सहमति मौजूद है और इस दिशा में सरकार को प्रभावी ढंग से अपनी नीति लागू करनी चाहिए।

    तिवारी ने कहा कि आतंकवाद और सामान्य संबंध साथ-साथ नहीं चल सकते। उनके अनुसार भारत की सुरक्षा और राष्ट्रीय हित सर्वोच्च प्राथमिकता हैं तथा सीमा पार से आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों के विरुद्ध सख्त रुख बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि इस विषय पर देश के भीतर व्यापक सहमति बनी हुई है और सरकार को उसी भावना के अनुरूप आगे बढ़ना चाहिए।

    राम मंदिर विवाद, यूनिफॉर्म सिविल कोड और सिंधु जल संधि जैसे मुद्दों पर दिए गए मनीष तिवारी के बयान ऐसे समय सामने आए हैं जब ये तीनों विषय राष्ट्रीय राजनीति और सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में बने हुए हैं। उनके बयान को विपक्ष के दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है, जबकि इन मुद्दों पर आगे भी राजनीतिक बहस जारी रहने की संभावना है।

  • महाराष्ट्र में भी लागू होगा UCC…. ड्राफ्ट तैयार करने के सरकार बनाएगी कमेटी

    महाराष्ट्र में भी लागू होगा UCC…. ड्राफ्ट तैयार करने के सरकार बनाएगी कमेटी


    मुंबई।
    महाराष्ट्र (Maharashtra) में यूनिफॉर्म सिविल कोड (Uniform Civil Code- UCC) लागू करने की दिशा में राज्य सरकार एक अहम कदम उठाने जा रही है. जानकारी के मुताबिक कानून का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए जल्द ही एक कमेटी का गठन किया जाएगा.

    अधिकारियों ने शुक्रवार को बताया कि महाराष्ट्र सरकार (Government of Maharashtra) यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए कानून का ड्राफ्ट तैयार करने हेतु दो हफ्ते के भीतर एक कमेटी बना सकती है. उन्होंने जानकारी दी कि कमेटी के गठन और इसके काम करने के दायरे को अभी फाइनल किया जाना बाकी है।

    जानकारी के मुताबिक एक अधिकारी ने जानकारी दी कि यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए कानून का ड्राफ्ट तैयार करने वाली कमेटी बनाने का प्रोसेस चल रहा है और अगले दो हफ्तों के भीतर इसका गठन कर दिया जाएगा।

    बता दें कि पिछले हफ्ते ही गृह राज्य मंत्री योगेश कदम ने विधानसभा में जानकारी दी थी कि महाराष्ट्र में यूसीसी लागू किया जाएगा और इस कानून का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज की अगुवाई में कमेटी बनाई जाएगी.

    यूनिफॉर्म सिविल कोड एक संवैधानिक निर्देश है, जिसका मकसद सभी नागरिकों के लिए शादी, तलाक, विरासत और एडॉप्शन जैसे मामलों में एक समान कानून लागू करना है. कानून की नजर में सब एक समान होते हैं. शादी, तलाक, एडॉप्शन, उत्तराधिकार, विरासत लेकिन सबसे बढ़कर लैंगिक समानता वो कारण है, जिस वजह से यूनिफार्म सिविल कोड की जरूरत महसूस की जाती रही है।

    यूसीसी का मतलब है कि शादी, तलाक, बच्चा गोद लेने और संपत्ति के बंटवारे जैसे मामलों में सभी नागरिकों पर एक समान कानून लागू हो, चाहे उनका धर्म या जाति कुछ भी हो. जिस राज्य में समान नागरिक संहिता लागू होगी, वहां इन मामलों में सभी धर्मों के लोगों के लिए एक ही कानूनी व्यवस्था लागू होगी।

  • मध्यप्रदेश में UCC लागू करने की तैयारी तेज शादी लिव इन और तलाक के लिए बनेंगे एक समान कानून गुजरात मॉडल पर तैयार ड्राफ्ट

    मध्यप्रदेश में UCC लागू करने की तैयारी तेज शादी लिव इन और तलाक के लिए बनेंगे एक समान कानून गुजरात मॉडल पर तैयार ड्राफ्ट


    मध्यप्रदेश । मध्यप्रदेश में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम बढ़ा दिया है। राज्य के लिए यूसीसी का प्रारूप तैयार हो चुका है और इसे मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के समक्ष प्रस्तुत भी किया गया है। मुख्यमंत्री की ओर से दिए गए सुझावों को शामिल करने के बाद समिति अंतिम ड्राफ्ट सरकार को सौंपेगी। माना जा रहा है कि यह कानून लागू होने के बाद शादी तलाक लिव इन रिलेशनशिप उत्तराधिकार और वसीयत जैसे पारिवारिक मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था लागू करेगा।

    सूत्रों के अनुसार मध्यप्रदेश का प्रस्तावित यूसीसी काफी हद तक गुजरात में लागू समान नागरिक संहिता के मॉडल पर आधारित है। बताया जा रहा है कि ड्राफ्ट के अधिकांश प्रावधान गुजरात कानून से प्रेरित हैं। सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव यह है कि धर्म परिवर्तन कर चुके आदिवासी भी इस कानून के दायरे में आएंगे जबकि अपनी पारंपरिक जनजातीय रीति रिवाजों का पालन करने वाले आदिवासियों को इससे बाहर रखा जाएगा।

    प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार धार्मिक परंपराओं में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। सभी समुदाय अपनी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार विवाह कर सकेंगे। हिंदू विवाह के फेरे मुस्लिम निकाह सिख आनंद कारज ईसाई चर्च विवाह और अन्य मान्य पद्धतियां पहले की तरह जारी रहेंगी। अंतर केवल इतना होगा कि विवाह से जुड़े कानूनी अधिकार और जिम्मेदारियां सभी नागरिकों के लिए समान होंगी।

    ड्राफ्ट में प्रत्येक विवाह का पंजीकरण अनिवार्य करने का प्रावधान रखा गया है। विवाह होने के 60 दिन के भीतर उसका रजिस्ट्रेशन कराना होगा। यदि निर्धारित समय में पंजीकरण नहीं हो पाता है तो बाद में तय प्रक्रिया के तहत इसे कराया जा सकेगा। हालांकि केवल रजिस्ट्रेशन न होने से विवाह अमान्य नहीं माना जाएगा लेकिन नियमों का उल्लंघन करने पर कानूनी कार्रवाई संभव होगी। नई शादियों के साथ पहले से हुए विवाह और तलाक का भी सरकारी रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा ताकि भविष्य में दस्तावेजों और कानूनी विवादों में पारदर्शिता बनी रहे।

    यूसीसी के तहत पति पत्नी और बच्चों के अधिकारों को लेकर भी समान नियम प्रस्तावित किए गए हैं। भरण पोषण की परिभाषा केवल भोजन और आवास तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि शिक्षा स्वास्थ्य वस्त्र और अन्य आवश्यक जरूरतें भी इसमें शामिल होंगी। अदालत परिस्थितियों के अनुसार स्थायी गुजारा भत्ता तय कर सकेगी। बच्चों की अभिरक्षा और देखभाल से जुड़े मामलों में भी समान कानूनी प्रावधान लागू होंगे।

    संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में भी एक समान नियम लागू करने की तैयारी है। यदि कोई व्यक्ति बिना वसीयत के निधन करता है तो उसकी संपत्ति का बंटवारा तय कानूनी प्रक्रिया के अनुसार होगा। गर्भ में पल रहे बच्चे के अधिकारों को भी मान्यता दी जाएगी। वहीं यदि कोई व्यक्ति मृतक की हत्या का दोषी पाया जाता है तो उसे संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलेगा। बीमारी या शारीरिक दिव्यांगता के आधार पर किसी भी उत्तराधिकारी के अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकेंगे।

    ड्राफ्ट में वसीयत तैयार करने उसे संशोधित करने या निरस्त करने की प्रक्रिया भी स्पष्ट की गई है। यदि किसी वसीयत के पीछे दबाव धोखाधड़ी या जबरदस्ती साबित होती है तो उसे अमान्य माना जाएगा। संपत्ति विवाद की स्थिति में अदालत संपत्ति की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठा सकेगी और जरूरत पड़ने पर संरक्षक नियुक्त कर सकेगी।

    प्रस्तावित कानून के तहत शादी तलाक और अन्य पारिवारिक मामलों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। इसके लिए रजिस्ट्रार जनरल और रजिस्ट्रार की नियुक्ति होगी। यदि किसी व्यक्ति का आवेदन अस्वीकार किया जाता है तो उसे अपील का अधिकार भी मिलेगा। रिकॉर्ड में छेड़छाड़ झूठी जानकारी देने या फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करने पर दंड का प्रावधान भी रखा गया है। सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से पारिवारिक मामलों में पारदर्शिता बढ़ेगी और सभी नागरिकों को समान कानूनी संरक्षण मिल सकेगा।

  • बंगाल: शुभेंदु अधिकारी का धर्मांतरण विरोधी कानून, UCC और NRC लागू करने का ऐलान, विपक्ष ने साधा निशाना

    बंगाल: शुभेंदु अधिकारी का धर्मांतरण विरोधी कानून, UCC और NRC लागू करने का ऐलान, विपक्ष ने साधा निशाना


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री और भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने शुक्रवार को बड़ा राजनीतिक ऐलान करते हुए कहा कि राज्य सरकार जल्द ही धर्मांतरण के खिलाफ सख्त कानून लाएगी। इसके साथ ही उन्होंने समान नागरिक संहिता (UCC) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लागू करने की प्रतिबद्धता भी दोहराई। उनके इस बयान के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा ने भाजपा सरकार पर विपक्ष को डराने और दमनकारी कानून लाने का आरोप लगाया।

    रवींद्र सदन में ‘वंदे मातरम्’ गीत की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि सीमा पार से होने वाली अवैध घुसपैठ राज्य की जनसांख्यिकी में बदलाव और कथित “लव जिहाद” जैसी समस्याओं का प्रमुख कारण है।

    उन्होंने कहा, “हमें थोड़ा समय दीजिए। बंगाल में धर्मांतरण विरोधी कानून, समान नागरिक संहिता (UCC) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) निश्चित रूप से लागू किए जाएंगे। जो लोग अवैध रूप से भारत में प्रवेश कर देश की संस्कृति और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन रहे हैं, उन्हें वापस भेजा जाएगा।”

    मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत नागरिकता प्रदान की जाएगी। इसके अलावा उन्होंने घोषणा की कि वर्ष 1975 के आपातकाल का विरोध करने वाले लोकतंत्र सेनानियों को 9 अगस्त को राज्य स्तर पर सम्मानित किया जाएगा। इस दौरान उन्होंने अपने विधानसभा क्षेत्र भवानीपुर में भाजपा के नए कार्यालय का उद्घाटन भी किया।

    महुआ मोइत्रा का जवाब
    मुख्यमंत्री के बयान और विधानसभा में प्रस्तावित विधेयकों को लेकर टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने कालीघाट स्थित ममता बनर्जी के आवास पर हुई बैठक के बाद सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं को डराने की कोशिश कर रही है, लेकिन जनता की आवाज को दबाया नहीं जा सकता।

    महुआ मोइत्रा ने प्रस्तावित **बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026** को बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को केवल संदेह के आधार पर बिना न्यायिक सुनवाई के एक वर्ष तक हिरासत में रखा जा सकता है।

    उन्होंने दावा किया कि यह प्रस्तावित कानून आपातकाल के दौरान लागू रहे मीसा (MISA) और मौजूदा यूएपीए (UAPA) से भी अधिक कठोर है तथा इसमें पर्याप्त न्यायिक सुरक्षा प्रावधान नहीं हैं।

    भाजपा ने किया पलटवार
    टीएमसी के आरोपों को खारिज करते हुए भाजपा नेताओं ने कहा कि विपक्ष सत्ता खोने के बाद जनता के बीच भ्रम और भय का माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है। भाजपा का कहना है कि प्रस्तावित **एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026** का उद्देश्य गुजरात और उत्तर प्रदेश की तर्ज पर संगठित अपराध, सिंडिकेट राज, जबरन वसूली और राजनीतिक हिंसा पर प्रभावी नियंत्रण करना है। भाजपा के अनुसार, प्रस्तावित कानून में दंगों और हिंसक प्रदर्शनों के दौरान सरकारी एवं निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों से क्षति की भरपाई कराने का भी प्रावधान किया गया है।

  • एमपी में UCC का ड्राफ्ट तैयार: लिव-इन में जन्मे बच्चों को मिलेगा संपत्ति में अधिकार, मानसून सत्र में आ सकता है कानून

    एमपी में UCC का ड्राफ्ट तैयार: लिव-इन में जन्मे बच्चों को मिलेगा संपत्ति में अधिकार, मानसून सत्र में आ सकता है कानून


    भोपाल । मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की दिशा में सरकार तेजी से आगे बढ़ रही है। उत्तराखंड के बाद अब मध्य प्रदेश भी इस महत्वपूर्ण सामाजिक और कानूनी सुधार को लागू करने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हालिया बयान से संकेत मिले हैं कि आगामी मानसून सत्र में यूसीसी विधेयक विधानसभा में पेश किया जा सकता है। इसके लिए गठित समिति ने प्रारंभिक ड्राफ्ट तैयार कर लिया है और विभिन्न वर्गों से सुझाव लेने की प्रक्रिया जारी है।

    सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में गठित सात सदस्यीय समिति ने यूसीसी का मसौदा तैयार किया है। समिति राज्यभर में जाकर विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और नागरिक संगठनों से संवाद कर रही है। साथ ही सरकार ऑनलाइन माध्यम से भी लोगों की राय ले रही है ताकि कानून को व्यापक जनसमर्थन और सामाजिक स्वीकार्यता मिल सके।

    प्रस्तावित यूसीसी का ढांचा मुख्य रूप से विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे विषयों पर आधारित होगा। सरकार का उद्देश्य अलग-अलग समुदायों में लागू व्यक्तिगत कानूनों के कारण उत्पन्न होने वाली कानूनी जटिलताओं को समाप्त कर सभी नागरिकों के लिए एक समान व्यवस्था लागू करना है।

    ड्राफ्ट का सबसे चर्चित पहलू लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़ा है। प्रस्ताव के अनुसार लिव-इन संबंधों को कानूनी पहचान देने के साथ उनका पंजीकरण या घोषणा अनिवार्य की जा सकती है। यदि ऐसे संबंध टूटते हैं तो महिला को भरण-पोषण और आर्थिक सहायता का अधिकार मिलेगा। इसके अलावा इन संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों को भी पूर्ण कानूनी संरक्षण प्रदान किया जाएगा। उन्हें माता-पिता की संपत्ति में वैधानिक उत्तराधिकार और अन्य कानूनी अधिकार प्राप्त होंगे, जिससे उनके अधिकारों को लेकर किसी प्रकार का विवाद न रहे।

    यूसीसी का एक प्रमुख उद्देश्य लैंगिक समानता सुनिश्चित करना भी है। प्रस्तावित कानून के तहत महिलाओं और पुरुषों को संपत्ति, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों में समान अधिकार दिए जाएंगे। तलाक की प्रक्रिया को भी एक समान कानूनी ढांचे में लाने की तैयारी है। किसी भी धर्म के व्यक्ति द्वारा लिया गया तलाक तभी मान्य होगा जब उसका विधिवत पंजीकरण किया जाएगा। तलाक के बाद भरण-पोषण और गुजारा भत्ते के नियम भी सभी समुदायों के लिए समान होंगे।

    सरकार का दावा है कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित किए बिना नागरिकों के समान अधिकारों को मजबूत करेगा। संविधान के समानता संबंधी प्रावधानों और नीति निर्देशक तत्वों के अनुरूप इसे तैयार किया जा रहा है ताकि सभी नागरिकों को एक समान कानूनी संरक्षण मिल सके।

    हालांकि प्रस्तावित यूसीसी को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता देने के प्रस्ताव पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यह व्यवस्था भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों से मेल नहीं खाती। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि आदिवासी समुदाय को इस कानून के दायरे से बाहर रखा जाता है तो इसे समान नागरिक संहिता कैसे कहा जा सकता है।

    इन तमाम बहसों के बीच मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने स्पष्ट किया है कि सरकार यूसीसी को लेकर गंभीर है। उन्होंने संकेत दिए हैं कि यदि सभी प्रक्रियाएं समय पर पूरी हो जाती हैं तो मानसून सत्र में यह विधेयक विधानसभा में पेश कर पारित कराया जा सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में यूसीसी मध्य प्रदेश की राजनीति और सामाजिक विमर्श का सबसे बड़ा विषय बनने जा रहा है।

  • धार्मिक मुद्दों के राजनीतिक इस्तेमाल पर ओवैसी ने उठाए सवाल, UCC, NEET और महंगाई पर सरकारों को घेरा

    धार्मिक मुद्दों के राजनीतिक इस्तेमाल पर ओवैसी ने उठाए सवाल, UCC, NEET और महंगाई पर सरकारों को घेरा

    नई दिल्ली/ हैदराबाद में आयोजित ईद मिलाप कार्यक्रम के दौरान AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक बार फिर कई राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी है। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि अजान और नमाज जैसे धार्मिक विषयों को अक्सर राजनीतिक रूप से इस तरह उठाया जाता है, जिससे एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने का माहौल बनता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सार्वजनिक बहसों में ऐसे मुद्दों को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया जाता है, जबकि देश के असली मुद्दे रोजगार, शिक्षा और महंगाई हैं, जिन पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो पाती।

    ओवैसी ने अपने भाषण में सड़क पर नमाज पढ़ने के मुद्दे का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कोई रोजमर्रा की स्थिति नहीं होती, बल्कि केवल कुछ विशेष अवसरों जैसे जुमे या ईद पर सीमित समय के लिए होता है। इसके बावजूद इसे लगातार एक बड़े विवाद के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उन्होंने कहा कि देश में विभिन्न धार्मिक आयोजनों और जुलूसों के दौरान भी सड़कें अस्थायी रूप से बंद की जाती हैं और व्यवस्था बनाई जाती है, लेकिन उन मामलों पर विवाद उतना नहीं होता जितना नमाज को लेकर देखा जाता है।

    उन्होंने यह भी कहा कि यदि सार्वजनिक स्थानों के उपयोग को लेकर कोई नियम बनाया जाता है, तो वह सभी धर्मों और समुदायों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। उनके अनुसार किसी भी प्रकार की असमानता समाज में भ्रम और असंतोष पैदा करती है। उन्होंने तर्क दिया कि लोगों को धार्मिक मुद्दों की बजाय उन विषयों पर अधिक ध्यान देना चाहिए जो उनके दैनिक जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं, जैसे महंगाई और बेरोजगारी।

    अपने संबोधन में ओवैसी ने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर के कई महत्वपूर्ण मुद्दे, जैसे परीक्षा प्रणाली से जुड़े विवाद और छात्रों की समस्याएं, अक्सर उतनी गंभीरता से नहीं उठाई जातीं जितनी धार्मिक बहसें दिखाई जाती हैं। उन्होंने कहा कि लाखों छात्रों और उनके परिवारों पर असर डालने वाले विषयों को अधिक प्राथमिकता मिलनी चाहिए, क्योंकि ये सीधे भविष्य से जुड़े मुद्दे हैं।

    यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर भी उन्होंने अपनी आपत्तियां दोहराईं और कहा कि किसी भी कानून को समानता के नाम पर लागू करते समय सभी समुदायों के साथ एक जैसा व्यवहार होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि किसी नीति में चयनात्मक तरीके से छूट या सख्ती अपनाई जाती है, तो यह सामाजिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

    हिंदू त्योहारों के दौरान मांस और अंडे की बिक्री पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का उल्लेख करते हुए ओवैसी ने कहा कि यदि धार्मिक भावनाओं के आधार पर ऐसे कदम उठाए जाते हैं, तो सभी समुदायों के लिए एक समान दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी धर्म की आलोचना करना नहीं, बल्कि सभी के लिए समान व्यवहार की मांग करना है।

    महंगाई और बढ़ती ईंधन कीमतों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि आम लोगों की सबसे बड़ी समस्या रोजमर्रा के खर्चों में बढ़ोतरी है, जो सीधे पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इन मुद्दों पर गंभीर और निरंतर चर्चा की आवश्यकता है, क्योंकि यही विषय आम नागरिक के जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं।

  • यूसीसी पर अमित शाह का बड़ा बयान, बोले- वनवासियों की परंपराओं से नहीं होगी छेड़छाड़, धर्मांतरण पर भी दी सख्त चेतावनी

    यूसीसी पर अमित शाह का बड़ा बयान, बोले- वनवासियों की परंपराओं से नहीं होगी छेड़छाड़, धर्मांतरण पर भी दी सख्त चेतावनी

    नई दिल्ली ।यूनिफॉर्म सिविल कोड और जनजातीय समाज को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बड़ा बयान देते हुए वनवासी समाज को आश्वस्त करने की कोशिश की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर जो आशंकाएं फैलाई जा रही हैं, उनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है और जनजातीय समुदाय की परंपराओं, अधिकारों तथा सांस्कृतिक पहचान पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ेगा। उनके इस बयान के बाद यूसीसी को लेकर चल रही बहस को नया आयाम मिल गया है।

    एक बड़े जनजातीय सांस्कृतिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि समाज में एक भ्रम फैलाया जा रहा है कि यूसीसी लागू होने के बाद जनजातीय समुदाय अपनी संस्कृति और पारंपरिक जीवनशैली से वंचित हो जाएगा। उन्होंने इस धारणा को पूरी तरह गलत बताते हुए कहा कि वनवासी समाज के अधिकारों और परंपराओं की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता है और किसी भी स्थिति में उनके सांस्कृतिक मूल्यों के साथ हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।

    उन्होंने कहा कि जहां-जहां यूसीसी लागू किया गया है, वहां जनजातीय समाज को विशेष प्रावधानों के तहत अलग रखा गया है। उनके अनुसार इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्थानीय परंपराएं, सामाजिक ढांचे और सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित बनी रहे। उन्होंने वनवासी समाज से अपील करते हुए कहा कि उन्हें किसी भी प्रकार की आशंका या भ्रम में आने की आवश्यकता नहीं है।

    इस दौरान गृह मंत्री ने धर्मांतरण के विषय पर भी स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अपने धर्म और परंपरा के अनुसार सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार है। लेकिन लालच, दबाव या किसी अन्य माध्यम से धर्म परिवर्तन कराना स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने लोगों से अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मूल पहचान की रक्षा करने का संदेश भी दिया।

    अपने संबोधन के दौरान उन्होंने भारतीय परंपराओं और धार्मिक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए वनवासी समाज और सनातन संस्कृति के ऐतिहासिक संबंधों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता में जनजातीय समाज की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है और सामाजिक एकता की भावना को मजबूत करने में उनका योगदान विशेष रहा है।

    इसके अलावा उन्होंने जनजातीय क्षेत्रों में विकास और बदलाव को लेकर भी कई बातें रखीं। उन्होंने कहा कि अब दूरस्थ और वन क्षेत्रों में विकास के नए अवसर पैदा हो रहे हैं और सरकार इन क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के जरिए जनजातीय समाज को आगे बढ़ाने की दिशा में काम किया जा रहा है।

    यूसीसी और जनजातीय अधिकारों को लेकर दिया गया यह बयान राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाले समय में यह विषय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बना रह सकता है, क्योंकि इससे कानून, संस्कृति और सामाजिक संरचना जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हुए हैं।

  • असम में समान नागरिक संहिता की एंट्री से गरमाई सियासत, विपक्ष के विरोध के बीच सरकार का बड़ा फैसला

    असम में समान नागरिक संहिता की एंट्री से गरमाई सियासत, विपक्ष के विरोध के बीच सरकार का बड़ा फैसला


    नई दिल्ली । असम की राजनीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक मोड़ उस समय देखने को मिला जब राज्य सरकार ने विधानसभा के विशेष सत्र में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी विधेयक को आधिकारिक रूप से सदन के पटल पर प्रस्तुत कर दिया। इस कदम के साथ असम नागरिक कानूनों में एकरूपता की दिशा में बढ़ने वाला तीसरा भाजपा शासित राज्य बन गया है। सरकार की ओर से इसे सामाजिक सुधार और समान अधिकारों की दिशा में एक मजबूत पहल बताया जा रहा है, जबकि विपक्ष ने इस विधेयक को लेकर गंभीर सवाल उठाते हुए सदन के भीतर जोरदार विरोध दर्ज कराया। विधेयक पेश होते ही विधानसभा का माहौल गर्म हो गया और राजनीतिक बहस तेज हो गई।

    सरकार के दूसरे कार्यकाल में इस कानून को विशेष प्राथमिकता दी गई थी। लंबे समय से इस पर मंथन चल रहा था और कैबिनेट स्तर पर मंजूरी मिलने के बाद आखिरकार इसे विधानसभा के सामने रखा गया। सरकार का दावा है कि इस कानून का उद्देश्य नागरिक जीवन से जुड़े विभिन्न नियमों में समानता स्थापित करना और समाज में मौजूद कुछ पुरानी व्यवस्थाओं को नए कानूनी ढांचे के अनुरूप ढालना है। हालांकि इस फैसले के सामने आते ही विपक्ष ने इसे जल्दबाजी में लिया गया निर्णय बताया और व्यापक चर्चा की मांग उठाई।

    विपक्षी दलों का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले कानून पर राज्य के विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और अन्य संबंधित समूहों से विस्तृत बातचीत की जानी चाहिए थी। उनका मानना है कि समाज के अलग-अलग वर्गों की राय शामिल किए बिना ऐसे बड़े कानून को लागू करना उचित नहीं माना जा सकता। इसी मुद्दे को लेकर सदन के भीतर तीखी बहस और विरोध का माहौल देखने को मिला। राजनीतिक गलियारों में भी इस फैसले को लेकर चर्चाएं लगातार तेज हो गई हैं।

    इस विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण बात यह मानी जा रही है कि राज्य के मूल निवासी और आदिवासी समाज को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। असम की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने यह कदम उठाया है। माना जा रहा है कि इस फैसले के जरिए राज्य के पारंपरिक ढांचे और जनजातीय पहचान को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है। सामाजिक संतुलन बनाए रखने की दिशा में इसे एक रणनीतिक कदम के रूप में भी देखा जा रहा है।

    विधेयक में कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं जिनका सीधा संबंध नागरिक जीवन से है। इसमें बहुविवाह जैसी प्रथाओं पर रोक, विवाह के लिए समान कानूनी आयु, शादियों और तलाक के अनिवार्य पंजीकरण, महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबरी के अधिकार और लिव-इन संबंधों के लिए कानूनी प्रावधान जैसे विषय शामिल बताए जा रहे हैं। सरकार इसे समाज में समानता और पारदर्शिता बढ़ाने वाला कदम बता रही है।

    फिलहाल पूरे देश की नजरें अब इस विधेयक की आगामी प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में सदन के भीतर इस पर चर्चा और राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है। यह स्पष्ट है कि असम का यह कदम केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में राष्ट्रीय स्तर पर भी इस विषय पर नई बहस को जन्म दे सकता है।