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  • 'घुटनों के बल पर लागू करेगी बीजेपी', यूजीसी बिल को लेकर पल्लवी पटेल ने सरकार को दी चुनौती

    'घुटनों के बल पर लागू करेगी बीजेपी', यूजीसी बिल को लेकर पल्लवी पटेल ने सरकार को दी चुनौती

    नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश विधानसभा में यूजीसी बिल को लेकर अपना दल कमेरावादी पार्टी नेता और सिराथू सीट से विधायक पल्लवी ने भारतीय जनता पार्टी पर जमकर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि इस सरकार ने जानबूझकर यूजीसी बिल को कोर्ट के दांवपेंच में फंसा दिया है. लेकिन, एक दिन यहीं सरकार घुटनों पर आकर इसे लागू करेगी.
    पल्लवी पटेल ने राज्यपाल के अभिभाषण पर अपनी बात रखते हुए कहा कि मैं भारतीय जनता पार्टी से पूछना चाहती हूं कि आपकी दृष्टि बदलाव, सुधार और रिफॉर्म क्या है? क्या आपकी नजर मे रिफॉर्म सिर्फ आंकड़ों तक सीमित है या सत्ता प्राप्ति तक सीमित है. क्योंकि, झूठे आंकड़े पेश करके सुधार विकास के दावे करके छवि नहीं सुधार सकते हैं.

    यूजीसी बिल को लेकर सरकार को घेरा
    सिराथू विधायक ने कहा कि जिस बदलाव, सुधार और रिफॉर्म की हम बात कर रहे हैं उसका उद्देश्य है न्याय, समानता और दक्षता है लेकिन, बीजेपी की सरकार ने इस विचार के उद्देश्य की धज्जियां उड़ा दी है.

    उन्होंने कहा कि अगर ऐसा नहीं है तो क्या कारण था कि देश के उच्च संस्थानों में समानता के भाव को उजागर करने के लिए जिस यूजीसी एक्ट 2026 को संसदीय समिति की संस्तुति के बाद और कोर्ट के निर्देशानुसार लाया गया क्यों आपने उसे लाकर पिछड़ा वंचित समाज को खुश होने का अवसर दिया और फिर सोची समझी रणनीति के तहत सड़कों पर तनाव पैदा करने का काम किया. इसके बाद इसे न्यायपालिका के पेचीदा घुमाव में फंसा दिया.

    भारतीय जनता पार्टी पर उठाए सवाल
    पल्लवी पटेल ने सवाल किया आपको ये करके क्या मिला? यूजीसी समानता अधिनियम के लागू होने के बाद यहां सालों से चले आ रहे वंचित और अगड़ा समाज की खाई को पाटा जा सकता था लेकिन आपने इस खाई को और गहरा कर दिया. ये तो वहीं बात हुई चित भी अपनी और पट भी अपनी.

    जितना सवाल आज इस सरकार पर उठ रहा है उतना है सवाल आज हम जन प्रतिनिधियों पर भी उठ रहा है. क्योंकि वंचित समाज आज उच्च शिक्षा और सम्मान के लिए अपने जनप्रतिनिधियों की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहा है. ये हम सबकी जिम्मेदारी है कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस पर चर्चा की जाए..

    ‘घुटनों पर आकर लागू करेगी सरकार’
    उन्होंने रामधारी सिंह दिनकर की कविता पढ़ते हुए कहा कि ‘जो तटस्थ है समय लिख देगा उसका भी अपराध..’ पल्लवी ने कहा कि मैं भविष्य वक्ता तो नहीं लेकिन याद रखिए जिस बीजेपी सरकार ने इस यूजीसी बिल को कोर्ट में फंसाकर का काम किया वहीं घुटनों पर आकर इस बिल को लागू करेगी. बीजेपी का हर कदम रिफॉर्म नहीं होता है.

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  • UGC बिल 2026 बना विवाद की वजह! सवर्ण समाज का विरोध, बृजभूषण शरण सिंह के बयान के 5 बड़े पॉइंट

    UGC बिल 2026 बना विवाद की वजह! सवर्ण समाज का विरोध, बृजभूषण शरण सिंह के बयान के 5 बड़े पॉइंट


    नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ( UGC ) की ओर से लागू किए गए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम- 2026’ को लेकर विवाद गहरा गया है। उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड तक विवाद की गूंज सुनाई दे रही है। सवर्ण समाज इस बिल के विरोध में खड़ा हो गया है। समानता को बढ़ावा देने और जातीय भेदभाव को खत्म करने वाले कानून को बड़े स्तर असमानता का कानून होने की दलील दी जा रही है। इसको लेकर लगातार केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले यूपी में पुलिस भर्ती परीक्षा में पेपर लीक का मामला ऐसा गरमाया था, युवा वर्ग नाराज हो गया।

    युवाओं की नाराजगी का खामियाजा उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को चुनावी रिजल्ट में भुगतना पड़ा। युवा वर्ग को नाराज करने का जोखिम सरकार लेने के मूड में नहीं दिख रहा है। वहीं, कानून को लेकर जब पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि अभी इसका अध्ययन कर रहा हूं। जो बोलूंगा, सोच-समझकर बोलूंगा। इससे साफ है कि सीनियर भाजपा नेता भी इस मामले में कोई भी बयान देने से बचते दिख रहे हैं।
    1. क्यों हो रहा है विरोध?
    यूजीसी की ओर से यूनिवर्सिटी और कॉलेज स्तर पर जातीय भेदभाव को खत्म करने के लिए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ लागू किया गया हैं। 15 जनवरी 2026 से यह रेगुलेशन पूरे देश में यूजीसी से संबद्ध सभी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों प्रभावी हुआ है। सवर्ण समाज से जुड़े संगठनों और समूहों ने इसके लागू होने के बाद ही विरोध शुरू किया था। दरअसल, नए रेगुलेशन में ओबीसी को भी जातीय भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया।

    एससी और एसटी छात्रों को पहले से ही कई अधिकार मिले हुए थे। वे भी इस दायरे में आ गए हैं। नए कानून के तहत इनके साथ-साथ ओबीसी छात्र, शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारी भेदभाव और उत्पीड़न की शिकायत सक्षम पदाधिकारी के समक्ष दर्ज करा सकते हैं।

    2. नए कोषांग के गठन के निर्देश
    यूजीसी ओर से लागू किए गए रेगुलेशन के तहत यूनिवर्सिटी और कॉलेज स्तर पर नए कोषांग का गठन किया जाना है। समान अवसर प्रकोष्ठ का गठन हर संस्थान में एससी, एसटी और ओबीसी छात्र, शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारियों के लिए किया जाना है। यूनिवर्सिटी लेवल पर समानता समिति होगी। इसमें एससी, एसटी के साथ-साथ ओबीसी, महिला और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिध सदस्य के तौर पर शामिल किए जाने हैं। हर छह माह में यह समिति रिपोर्ट तैयार कर यूजीसी को भेजेगी। इसके आधार पर यूनिवर्सिटी और कॉलेज की स्थिति को मापा जाएगा।

    3. सवर्ण समाज का विरोध क्यों?
    मामले में सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि इस कानून में कोई भी एससी, एसटी, ओबीसी छात्र, शिक्षक या शिक्षकेतर कर्मचारी हमारे खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकता है। इसके बाद हमें अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। बड़े स्तर पर इस नियम का दुरुपयोग किया जा सकता है। विश्वविद्यालयों में कुलपति और कॉलेजों में प्राचार्य सभी छात्रों की शिकायतों पर जब सुनवाई करते हैं तो फिर नई व्यवस्था से असमानता ही फैलेगी। सवर्ण वर्ग को अलग-थलग किए जाने की साजिश के तौर पर इस कानून को पेश किया जा रहा है।

    सवर्ण समाज की ओर से अपनी बात को उठाने के लिए यूनवर्सिटी स्तर पर फोरम तैयार किए गए हैं। इन फोरम का कहना है कि ओबीसी को यूनवर्सिटी में एडमिशन में आरक्षण 1990 से मिल रहा है। फैकल्टी नियुक्तियों में आरक्षण की व्यवस्था वर्ष 2010 से है। ऐसे में नए कानून से सवर्ण समाज को और अधिक दबाने की कोशिश की जा रही है।

    4. यति नरसिंहानंद से गरमाया विवाद
    मामले को लेकर पिछले दिनों डासना देवी मंदिर के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरि ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना देने की योजना बनाई। इसके लिए वे लाव-लश्कर के साथ गाजियाबाद से निकले तो दिल्ली बॉर्डर पर उन्हें रोक दिया गया। उन्होंने इस मुद्दे पर कहा कि हर वर्ग की बात हो रही है, लेकिन ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, भूमिहार और अन्य सवर्ण समाज के लोगों की बात क्यों नहीं की जा रही। उनके हितों की बात कहां होगी। अगर उनके साथ कुछ गलत होता है तो वे कहां पर शिकायत करेंगे। इस प्रकार के कानून उच्च शिक्षण संस्थानों में शैक्षणिक माहौल को खराब करेंगे।

    5. कानून वापस लिए जाने की चर्चा
    यूजीसी कानून का विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चुनावी साल से पहले विरोध को गहराता देख अब यूजीसी के स्तर पर इस कानून को लेकर विचार होने की बात कही जा रही है। माना जा रहा है कि यूजीसी इस कानून को वापस ले सकता है। इसके कड़े विरोध ने सरकार को अपनी इस नीति पर दोबारा विचार करने को मजबूर किया है।