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  • 26/11 आतंकी हमले के दोषी कसाब ने अदालत में क्यों लिया बॉलीवुड फिल्मों का नाम, उज्ज्वल निकम ने सुनाया मुकदमे से जुड़ा चौंकाने वाला किस्सा

    26/11 आतंकी हमले के दोषी कसाब ने अदालत में क्यों लिया बॉलीवुड फिल्मों का नाम, उज्ज्वल निकम ने सुनाया मुकदमे से जुड़ा चौंकाने वाला किस्सा


    नई दिल्ली । वर्ष 2008 में हुए मुंबई आतंकी हमले और उससे जुड़े मुकदमे को लेकर विशेष सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने कई अहम घटनाओं का जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि हमले के दोषी अजमल कसाब ने अदालत में अपना अपराध स्वीकार करने के बावजूद अपनी भूमिका को सीमित बताने की कोशिश की थी। कसाब ने दावा किया था कि वह मुंबई बॉलीवुड फिल्में देखने के शौक के कारण आया था। निकम के मुताबिक, आरोपी ने हत्याओं की जिम्मेदारी अपने साथी अबू इस्माइल पर डालने का प्रयास भी किया था।

    निकम ने बताया कि कसाब ने अदालत में कहा था कि वह मुंबई आया जरूर था, लेकिन लोगों की हत्या उसने नहीं की। उसके अनुसार, उसके साथ मौजूद अबू इस्माइल ने हत्याएं की थीं। उसने बॉलीवुड फिल्मों के प्रति अपने शौक को भी मुंबई आने की वजह बताया। निकम ने कसाब की इस दलील को स्वीकार नहीं किया और उसके खिलाफ उपलब्ध सबूत अदालत में पेश करने का निर्णय लिया। उनका कहना था कि आरोपी अपनी पूरी भूमिका स्वीकार नहीं कर रहा था और केवल अपने बयान के आधार पर उसे जिम्मेदारी से बचने नहीं दिया जा सकता था।

    कसाब से जुड़ा यह दावा पहले भी चर्चा में आया था। निकम ने एक अन्य कार्यक्रम में बताया था कि कसाब ने हिंदी फिल्मों का प्रशंसक होने और अमिताभ बच्चन के घर जाने की इच्छा का भी उल्लेख किया था। हालांकि, मुकदमे के दौरान उसके खिलाफ पेश किए गए सबूतों और घटनाओं के क्रम ने मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    निकम ने 26/11 हमले के दौरान ताज महल पैलेस होटल में आतंकवादियों और उनके हैंडलर्स के बीच हुई बातचीत का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, फोन पर हुई बातचीत को पकड़े जाने से जांचकर्ताओं को हमले के दौरान आतंकवादियों की गतिविधियों और उन्हें दिए जा रहे निर्देशों को समझने में मदद मिली। इस बातचीत को अभियोजन पक्ष ने सबूत के रूप में इस्तेमाल किया था।

    उन्होंने होटल में बंधक बनाए गए लोगों से जुड़ी एक घटना का उदाहरण दिया। निकम के मुताबिक, आतंकवादियों ने अपने हैंडलर्स को बताया था कि उनके कब्जे में तीन लोग हैं। इनमें एक क्लर्क, एक वेटर और एक शिक्षक बताया गया था। इसके बाद हैंडलर ने कथित शिक्षक से उसके स्कूल के बारे में पूछताछ करने और बंधकों के कपड़े उतरवाकर उन्हें केवल अंडरवियर में रखने का निर्देश दिया।

    निकम ने बताया कि हैंडलर को उस व्यक्ति के शिक्षक होने के दावे पर संदेह था। उसने हमलावर को उससे पूछताछ करने और मारपीट करने के लिए कहा। इसके बाद बंधक व्यक्ति ने अपनी वास्तविक पहचान बैंक के चेयरमैन के रूप में बताई। निकम के अनुसार, बाद में उन्होंने उस बैंक चेयरमैन का बयान दर्ज किया, लेकिन अदालत में गवाही देने के समय वह काफी डरे हुए थे।

    निकम ने बताया कि गवाह को भरोसा दिलाया गया कि उसके बयान के समर्थन में आतंकवादियों और उनके हैंडलर्स के बीच हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग मौजूद है। उन्होंने गवाही देने की जरूरत पर जोर दिया, क्योंकि संबंधित व्यक्ति ने कोई गलत काम नहीं किया था और उसकी गवाही मामले में महत्वपूर्ण हो सकती थी।

    इसी कानूनी लड़ाई और निकम के पेशेवर जीवन को फिल्म ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ में दिखाया गया है। फिल्म में राजकुमार राव ने उज्ज्वल निकम की भूमिका निभाई है, जबकि ललित प्रभाकर अजमल कसाब के किरदार में हैं। अविनाश अरुण ने फिल्म का निर्देशन किया है और वामिका गब्बी निकम की पत्नी ज्योति की भूमिका निभा रही हैं। फिल्म में उस मुकदमे और कानूनी संघर्ष को प्रस्तुत किया गया है, जिसने निकम को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।

    नवंबर 2008 में हुए मुंबई आतंकी हमलों में 166 लोगों की जान गई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे। कसाब इस हमले में पकड़ा गया एकमात्र जीवित आतंकवादी था। मुकदमे में दोषी ठहराए जाने के बाद उसे मौत की सजा सुनाई गई, जिसे वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा। यह मामला भारत के सबसे चर्चित आपराधिक मुकदमों में शामिल रहा है।

  • सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने बयां किया आर्म्स एक्ट की सजा के वक्त का पूरा कोर्ट रूम ड्रामा

    सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने बयां किया आर्म्स एक्ट की सजा के वक्त का पूरा कोर्ट रूम ड्रामा

    नई दिल्ली । वर्ष 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले ने देश के साथ-साथ पूरे फिल्म जगत को हिलाकर रख दिया था। इस ऐतिहासिक मुकदमे में सबसे चर्चित चेहरा रहे बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त की सजा और उनके अदालती संघर्ष की कहानियां आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। हाल ही में इस संवेदनशील मामले के विशेष सरकारी अभियोजक रहे वरिष्ठ वकील उज्ज्वल निकम ने एक साक्षात्कार में उस वक्त के अदालती माहौल और फैसले के दिन संजय दत्त की मानसिक स्थिति को लेकर बेहद चौंकाने वाले और अनसुने खुलासे किए हैं। निकम ने बताया कि फैसला सुनाए जाने के वक्त अभिनेता किस कदर डरे हुए थे और सजा का ऐलान होते ही अदालत कक्ष के भीतर वह पूरी तरह टूट गए थे।

    मुंबई की विशेष टाडा अदालत में चल रहे इस लंबे मुकदमे के दौरान पूरे देश की निगाहें संजय दत्त पर टिकी हुई थीं। उज्ज्वल निकम के अनुसार, फैसला आने वाले दिन अदालत कक्ष के भीतर भारी तनाव और सन्नाटा पसरा हुआ था। संजय दत्त को उस समय सबसे बड़ा डर इस बात का था कि क्या उन पर देशद्रोह या आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का ठप्पा लगेगा। जब अदालत ने उन्हें टाडा यानी आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां अधिनियम के तहत लगे गंभीर आरोपों से बरी कर दिया, तो उनके चेहरे पर कुछ पल के लिए राहत जरूर दिखी थी। लेकिन इसके तुरंत बाद जब गैर-कानूनी हथियार रखने के आरोप में आर्म्स एक्ट के तहत उन्हें दोषी ठहराया गया, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।

    उज्ज्वल निकम ने बताया कि टाडा के आरोपों से मुक्ति मिलने के बाद संजय दत्त को लगा था कि शायद वे पूरी तरह बच जाएंगे या उन्हें प्रोबेशन का लाभ मिल जाएगा। लेकिन कानून अपनी राह पर चल रहा था। जैसे ही न्यायाधीश ने आर्म्स एक्ट के तहत सजा की अवधि का ऐलान करना शुरू किया, संजय दत्त के शरीर में कंपन होने लगा। निकम ने उस दृश्य को याद करते हुए साझा किया कि अभिनेता के हाथ-पैर कांप रहे थे और वह अदालत में खड़े होने की स्थिति में भी नहीं दिख रहे थे। उनकी आंखें आंसुओं से भर गईं और वह पूरी तरह लाचार नजर आने लगे थे। एक ऐसा अभिनेता जिसे स्क्रीन पर हमेशा कड़े और मजबूत किरदारों में देखा गया था, वह कानून के सामने पूरी तरह बेबस खड़ा था।

    अभियोजन पक्ष के रूप में उज्ज्वल निकम ने संजय दत्त के खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत कड़ी सजा की वकालत की थी क्योंकि देश की सुरक्षा के दृष्टिकोण से प्रतिबंधित हथियार रखना एक अक्षम्य अपराध था। निकम ने खुलासा किया कि सजा के बाद संजय दत्त ने उनकी तरफ देखा था और उनकी आंखों में अपने भविष्य को लेकर एक गहरा डर और असमंजस साफ दिखाई दे रहा था। इस ऐतिहासिक मामले में संजय दत्त को पांच साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी, जिसके बाद उन्हें यरवदा जेल भेजा गया। उज्ज्वल निकम का यह संस्मरण न केवल एक वीआईपी आरोपी की न्यायिक प्रक्रिया के दौरान की मनोवैज्ञानिक स्थिति को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि कानून की नजर में कोई भी व्यक्ति अपने प्रभाव या शोहरत के बल पर बच नहीं सकता।