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  • मध्यप्रदेश में UCC लागू करने की तैयारी तेज शादी लिव इन और तलाक के लिए बनेंगे एक समान कानून गुजरात मॉडल पर तैयार ड्राफ्ट

    मध्यप्रदेश में UCC लागू करने की तैयारी तेज शादी लिव इन और तलाक के लिए बनेंगे एक समान कानून गुजरात मॉडल पर तैयार ड्राफ्ट


    मध्यप्रदेश । मध्यप्रदेश में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम बढ़ा दिया है। राज्य के लिए यूसीसी का प्रारूप तैयार हो चुका है और इसे मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के समक्ष प्रस्तुत भी किया गया है। मुख्यमंत्री की ओर से दिए गए सुझावों को शामिल करने के बाद समिति अंतिम ड्राफ्ट सरकार को सौंपेगी। माना जा रहा है कि यह कानून लागू होने के बाद शादी तलाक लिव इन रिलेशनशिप उत्तराधिकार और वसीयत जैसे पारिवारिक मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था लागू करेगा।

    सूत्रों के अनुसार मध्यप्रदेश का प्रस्तावित यूसीसी काफी हद तक गुजरात में लागू समान नागरिक संहिता के मॉडल पर आधारित है। बताया जा रहा है कि ड्राफ्ट के अधिकांश प्रावधान गुजरात कानून से प्रेरित हैं। सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव यह है कि धर्म परिवर्तन कर चुके आदिवासी भी इस कानून के दायरे में आएंगे जबकि अपनी पारंपरिक जनजातीय रीति रिवाजों का पालन करने वाले आदिवासियों को इससे बाहर रखा जाएगा।

    प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार धार्मिक परंपराओं में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। सभी समुदाय अपनी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार विवाह कर सकेंगे। हिंदू विवाह के फेरे मुस्लिम निकाह सिख आनंद कारज ईसाई चर्च विवाह और अन्य मान्य पद्धतियां पहले की तरह जारी रहेंगी। अंतर केवल इतना होगा कि विवाह से जुड़े कानूनी अधिकार और जिम्मेदारियां सभी नागरिकों के लिए समान होंगी।

    ड्राफ्ट में प्रत्येक विवाह का पंजीकरण अनिवार्य करने का प्रावधान रखा गया है। विवाह होने के 60 दिन के भीतर उसका रजिस्ट्रेशन कराना होगा। यदि निर्धारित समय में पंजीकरण नहीं हो पाता है तो बाद में तय प्रक्रिया के तहत इसे कराया जा सकेगा। हालांकि केवल रजिस्ट्रेशन न होने से विवाह अमान्य नहीं माना जाएगा लेकिन नियमों का उल्लंघन करने पर कानूनी कार्रवाई संभव होगी। नई शादियों के साथ पहले से हुए विवाह और तलाक का भी सरकारी रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा ताकि भविष्य में दस्तावेजों और कानूनी विवादों में पारदर्शिता बनी रहे।

    यूसीसी के तहत पति पत्नी और बच्चों के अधिकारों को लेकर भी समान नियम प्रस्तावित किए गए हैं। भरण पोषण की परिभाषा केवल भोजन और आवास तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि शिक्षा स्वास्थ्य वस्त्र और अन्य आवश्यक जरूरतें भी इसमें शामिल होंगी। अदालत परिस्थितियों के अनुसार स्थायी गुजारा भत्ता तय कर सकेगी। बच्चों की अभिरक्षा और देखभाल से जुड़े मामलों में भी समान कानूनी प्रावधान लागू होंगे।

    संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में भी एक समान नियम लागू करने की तैयारी है। यदि कोई व्यक्ति बिना वसीयत के निधन करता है तो उसकी संपत्ति का बंटवारा तय कानूनी प्रक्रिया के अनुसार होगा। गर्भ में पल रहे बच्चे के अधिकारों को भी मान्यता दी जाएगी। वहीं यदि कोई व्यक्ति मृतक की हत्या का दोषी पाया जाता है तो उसे संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलेगा। बीमारी या शारीरिक दिव्यांगता के आधार पर किसी भी उत्तराधिकारी के अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकेंगे।

    ड्राफ्ट में वसीयत तैयार करने उसे संशोधित करने या निरस्त करने की प्रक्रिया भी स्पष्ट की गई है। यदि किसी वसीयत के पीछे दबाव धोखाधड़ी या जबरदस्ती साबित होती है तो उसे अमान्य माना जाएगा। संपत्ति विवाद की स्थिति में अदालत संपत्ति की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठा सकेगी और जरूरत पड़ने पर संरक्षक नियुक्त कर सकेगी।

    प्रस्तावित कानून के तहत शादी तलाक और अन्य पारिवारिक मामलों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। इसके लिए रजिस्ट्रार जनरल और रजिस्ट्रार की नियुक्ति होगी। यदि किसी व्यक्ति का आवेदन अस्वीकार किया जाता है तो उसे अपील का अधिकार भी मिलेगा। रिकॉर्ड में छेड़छाड़ झूठी जानकारी देने या फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करने पर दंड का प्रावधान भी रखा गया है। सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से पारिवारिक मामलों में पारदर्शिता बढ़ेगी और सभी नागरिकों को समान कानूनी संरक्षण मिल सकेगा।

  • एमपी में UCC का ड्राफ्ट तैयार: लिव-इन में जन्मे बच्चों को मिलेगा संपत्ति में अधिकार, मानसून सत्र में आ सकता है कानून

    एमपी में UCC का ड्राफ्ट तैयार: लिव-इन में जन्मे बच्चों को मिलेगा संपत्ति में अधिकार, मानसून सत्र में आ सकता है कानून


    भोपाल । मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की दिशा में सरकार तेजी से आगे बढ़ रही है। उत्तराखंड के बाद अब मध्य प्रदेश भी इस महत्वपूर्ण सामाजिक और कानूनी सुधार को लागू करने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हालिया बयान से संकेत मिले हैं कि आगामी मानसून सत्र में यूसीसी विधेयक विधानसभा में पेश किया जा सकता है। इसके लिए गठित समिति ने प्रारंभिक ड्राफ्ट तैयार कर लिया है और विभिन्न वर्गों से सुझाव लेने की प्रक्रिया जारी है।

    सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में गठित सात सदस्यीय समिति ने यूसीसी का मसौदा तैयार किया है। समिति राज्यभर में जाकर विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और नागरिक संगठनों से संवाद कर रही है। साथ ही सरकार ऑनलाइन माध्यम से भी लोगों की राय ले रही है ताकि कानून को व्यापक जनसमर्थन और सामाजिक स्वीकार्यता मिल सके।

    प्रस्तावित यूसीसी का ढांचा मुख्य रूप से विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे विषयों पर आधारित होगा। सरकार का उद्देश्य अलग-अलग समुदायों में लागू व्यक्तिगत कानूनों के कारण उत्पन्न होने वाली कानूनी जटिलताओं को समाप्त कर सभी नागरिकों के लिए एक समान व्यवस्था लागू करना है।

    ड्राफ्ट का सबसे चर्चित पहलू लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़ा है। प्रस्ताव के अनुसार लिव-इन संबंधों को कानूनी पहचान देने के साथ उनका पंजीकरण या घोषणा अनिवार्य की जा सकती है। यदि ऐसे संबंध टूटते हैं तो महिला को भरण-पोषण और आर्थिक सहायता का अधिकार मिलेगा। इसके अलावा इन संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों को भी पूर्ण कानूनी संरक्षण प्रदान किया जाएगा। उन्हें माता-पिता की संपत्ति में वैधानिक उत्तराधिकार और अन्य कानूनी अधिकार प्राप्त होंगे, जिससे उनके अधिकारों को लेकर किसी प्रकार का विवाद न रहे।

    यूसीसी का एक प्रमुख उद्देश्य लैंगिक समानता सुनिश्चित करना भी है। प्रस्तावित कानून के तहत महिलाओं और पुरुषों को संपत्ति, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों में समान अधिकार दिए जाएंगे। तलाक की प्रक्रिया को भी एक समान कानूनी ढांचे में लाने की तैयारी है। किसी भी धर्म के व्यक्ति द्वारा लिया गया तलाक तभी मान्य होगा जब उसका विधिवत पंजीकरण किया जाएगा। तलाक के बाद भरण-पोषण और गुजारा भत्ते के नियम भी सभी समुदायों के लिए समान होंगे।

    सरकार का दावा है कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित किए बिना नागरिकों के समान अधिकारों को मजबूत करेगा। संविधान के समानता संबंधी प्रावधानों और नीति निर्देशक तत्वों के अनुरूप इसे तैयार किया जा रहा है ताकि सभी नागरिकों को एक समान कानूनी संरक्षण मिल सके।

    हालांकि प्रस्तावित यूसीसी को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता देने के प्रस्ताव पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यह व्यवस्था भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों से मेल नहीं खाती। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि आदिवासी समुदाय को इस कानून के दायरे से बाहर रखा जाता है तो इसे समान नागरिक संहिता कैसे कहा जा सकता है।

    इन तमाम बहसों के बीच मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने स्पष्ट किया है कि सरकार यूसीसी को लेकर गंभीर है। उन्होंने संकेत दिए हैं कि यदि सभी प्रक्रियाएं समय पर पूरी हो जाती हैं तो मानसून सत्र में यह विधेयक विधानसभा में पेश कर पारित कराया जा सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में यूसीसी मध्य प्रदेश की राजनीति और सामाजिक विमर्श का सबसे बड़ा विषय बनने जा रहा है।

  • समान नागरिक संहिता पर जनमत संग्रह की तैयारी, रतलाम में समिति करेगी संवाद

    समान नागरिक संहिता पर जनमत संग्रह की तैयारी, रतलाम में समिति करेगी संवाद


    रतलाम। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर राज्य सरकार द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति गुरुवार को रतलाम पहुंचेगी। समिति का उद्देश्य आम जनता, विशेषज्ञों और विभिन्न सामाजिक संगठनों से राय एवं सुझाव प्राप्त करना है, जिन्हें आगे राज्य सरकार को भेजा जाएगा। यह महत्वपूर्ण बैठक 4 जून को शासकीय डॉ. लक्ष्मीनारायण पांडेय मेडिकल कॉलेज के ऑडिटोरियम में सुबह 11 बजे से आयोजित की जाएगी।

    विभिन्न वर्गों से मांगे जाएंगे सुझाव
    इस बैठक में समिति के सदस्य उज्जैन के प्रोफेसर डॉ. गोपाल शर्मा और इंदौर की शोभा पैठनकर शामिल होंगे। बैठक में जिले के सांसद, विधायक, मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, शांति समिति के सदस्य, रेडक्रॉस सोसायटी के पदाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, अधिवक्ता संघ के सदस्य तथा राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के प्रोफेसर सहित विभिन्न वर्गों के नागरिक शामिल होंगे। समिति सभी प्रतिभागियों से समान नागरिक संहिता से जुड़े मुद्दों पर विचार और सुझाव एकत्र करेगी, ताकि एक व्यापक दृष्टिकोण तैयार किया जा सके।

    सुझाव सीधे राज्य सरकार को भेजे जाएंगे
    बैठक में प्राप्त सभी सुझावों को संकलित कर राज्य शासन को भेजा जाएगा। इसके आधार पर आगे की नीति निर्माण प्रक्रिया में सहायता मिलेगी। अधिकारियों के अनुसार, यह प्रक्रिया पारदर्शी और व्यापक जनभागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की जा रही है।

    प्रशासन ने की तैयारियां तेज
    बैठक की तैयारियों को लेकर जिला प्रशासन ने व्यापक इंतजाम किए हैं। अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी (एडीएम) डॉ. शालिनी श्रीवास्तव ने बैठक स्थल का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया और संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए।

    निरीक्षण के दौरान बैठक व्यवस्था, पार्किंग, सुरक्षा, पेयजल, विद्युत व्यवस्था सहित सभी जरूरी सुविधाओं की समीक्षा की गई। इस अवसर पर शहर एसडीएम आर्ची हरित, नगर निगम आयुक्त अनिल भाना और तहसीलदार शहर ऋषभ ठाकुर सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे।

  • असम में यूसीसी बिल पर बढ़ा राजनीतिक विवाद, ओवैसी ने उठाए संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों के सवाल

    असम में यूसीसी बिल पर बढ़ा राजनीतिक विवाद, ओवैसी ने उठाए संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों के सवाल

    नई दिल्ली । असम में समान नागरिक संहिता को लेकर राजनीतिक बहस लगातार तेज होती जा रही है। राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में संबंधित विधेयक पेश किए जाने के बाद अब इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। इसी क्रम में हैदराबाद से सांसद और एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi ने प्रस्तावित व्यवस्था पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने इस कानून के कई प्रावधानों को लेकर सवाल उठाए और कहा कि यह मुद्दा केवल कानून का नहीं बल्कि संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक संरचना से भी जुड़ा हुआ है। उनके बयान के बाद इस विषय पर राजनीतिक चर्चा और तेज हो गई है।

    असम सरकार द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव के तहत विवाह, तलाक, विरासत और पारिवारिक कानूनों से जुड़े कई प्रावधानों में समान व्यवस्था लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार बहुविवाह और एक से अधिक विवाह को गैर-कानूनी बनाए जाने का प्रावधान रखा गया है। इसके अलावा उत्तराधिकार और संपत्ति से जुड़े मामलों में महिलाओं को समान अधिकार देने की भी बात कही गई है। सरकार का मानना है कि ऐसे प्रावधान सामाजिक समानता और कानूनी स्पष्टता को बढ़ावा देंगे।

    हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी असहमति व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की व्यवस्था कुछ समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों और धार्मिक परंपराओं को प्रभावित कर सकती है। उनके अनुसार कानून यदि समानता के उद्देश्य से लाया जा रहा है तो उसका दायरा और प्रभाव भी सभी वर्गों पर एक जैसा होना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि कुछ वर्गों या समुदायों को विशेष छूट दी जाती है तो फिर समानता के सिद्धांत पर बहस स्वाभाविक हो जाती है।

    ओवैसी ने यह भी कहा कि संविधान के अंतर्गत विभिन्न समुदायों को अपनी संस्कृति और परंपराओं की रक्षा का अधिकार प्राप्त है। उनके अनुसार किसी भी कानून को लागू करते समय संवैधानिक संतुलन और सामाजिक विविधता का ध्यान रखना जरूरी है। उन्होंने विरासत और उत्तराधिकार के मामलों को लेकर भी अपनी चिंताएं सामने रखीं और कहा कि इन विषयों पर व्यापक चर्चा आवश्यक है।

    दूसरी ओर, राज्य सरकार का कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य नागरिकों को एक समान कानूनी ढांचे के अंतर्गत लाना और महिलाओं को अधिक सुरक्षा एवं अधिकार उपलब्ध कराना है। प्रस्ताव में विवाह पंजीकरण को अनिवार्य करने और वैवाहिक नियमों को अधिक स्पष्ट बनाने जैसे प्रावधान भी शामिल किए गए हैं। इस मुद्दे ने अब राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले दिनों में इस विषय पर और अधिक प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना जताई जा रही है, क्योंकि यह मुद्दा केवल कानून तक सीमित नहीं बल्कि समाज और संवैधानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।