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  • भोपाल में जल गुणवत्ता पर विवाद, यूनियन कार्बाइड क्षेत्र के पानी में फीकल कोलीफॉर्म मिलने का दावा

    भोपाल में जल गुणवत्ता पर विवाद, यूनियन कार्बाइड क्षेत्र के पानी में फीकल कोलीफॉर्म मिलने का दावा


    भोपाल । भोपाल में यूनियन कार्बाइड गैस त्रासदी प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। गैस पीड़ितों के चार संगठनों ने दावा किया है कि फैक्ट्री के आसपास की बस्तियों में लोगों को सीवेज से दूषित पानी की आपूर्ति की जा रही है जिससे बड़े स्तर पर स्वास्थ्य संकट पैदा होने का खतरा बढ़ गया है। संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो हालात किसी बड़े जलजनित रोग के प्रकोप में बदल सकते हैं।

    संगठनों ने बताया कि इस महीने प्रभावित इलाकों की 30 बस्तियों से पेयजल के 63 नमूने एकत्र किए गए थे। जांच रिपोर्ट के अनुसार इनमें से 43 नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मौजूदगी पाई गई। विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह के बैक्टीरिया की मौजूदगी इस बात का संकेत होती है कि पेयजल में मल या सीवेज का मिश्रण हो चुका है और ऐसा पानी स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

    भोपाल गैस पीड़ित महिला पुरुष संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष नवाब खान ने कहा कि जांच के नतीजे बेहद चिंताजनक हैं। उनका दावा है कि करीब 70 प्रतिशत नमूने दूषित पाए गए हैं और 30 में से 19 बस्तियों में लोगों तक असुरक्षित पानी पहुंच रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि बड़ा तालाब से सप्लाई किए गए पानी के अधिकांश नमूने और कोलार डैम से जुड़े कुछ नमूने भी जांच में दूषित मिले हैं।

    गैस पीड़ित संगठनों का आरोप है कि प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोग लंबे समय से दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। इसके कारण दस्त उल्टी टाइफाइड और अन्य जलजनित बीमारियों के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। उनका कहना है कि कई परिवार एक साथ बीमार पड़ रहे हैं और स्थानीय क्लीनिकों में संक्रमण से जुड़े मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

    संगठनों ने यह भी याद दिलाया कि वर्ष 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड परिसर के आसपास भूजल के रासायनिक प्रदूषण को गंभीर मानते हुए प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। इसके बाद पाइपलाइन के जरिए स्वच्छ पानी पहुंचाने की व्यवस्था करने की बात कही गई थी लेकिन उनका आरोप है कि जमीनी स्तर पर आज भी स्थिति संतोषजनक नहीं है।

    भोपाल गैस पीड़ित निराश्रित पेंशनभोगी संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष बालकृष्ण नामदेव ने कहा कि वर्ष 2018 में भी सुप्रीम कोर्ट ने सीवर लाइन और ड्रेनेज व्यवस्था को मजबूत करने के निर्देश दिए थे। नगर निगम ने तय समय में काम पूरा करने का भरोसा दिया था लेकिन कई साल बीत जाने के बाद भी अधिकांश क्षेत्रों में समस्या जस की तस बनी हुई है।

    भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉर्मेशन एंड एक्शन की रचना धींगरा ने मांग की कि दूषित पेयजल आपूर्ति के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े इस गंभीर मामले में लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती। साथ ही प्रभावित इलाकों में सीवर और ड्रेनेज परियोजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाए और पेयजल की गुणवत्ता की स्वतंत्र एवं नियमित निगरानी की व्यवस्था भी लागू की जाए ताकि भविष्य में इस तरह की स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो।

  • भोपाल में पानी पर बड़ा विवाद, गैस पीड़ित संगठनों का दावा- 63 में से 43 नमूने दूषित, कार्रवाई की मांग

    भोपाल में पानी पर बड़ा विवाद, गैस पीड़ित संगठनों का दावा- 63 में से 43 नमूने दूषित, कार्रवाई की मांग


    भोपाल । भोपाल में यूनियन कार्बाइड गैस त्रासदी पीड़ितों के चार संगठनों ने शहर में पेयजल आपूर्ति को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। संगठनों का दावा है कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के आसपास के कई इलाकों में लोगों को सीवेज से दूषित पानी सप्लाई किया जा रहा है। इसके चलते जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। संगठनों ने अपनी ओर से कराई गई पानी की जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक करते हुए कहा कि जांचे गए करीब 70 प्रतिशत नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म यानी मल से जुड़े बैक्टीरिया पाए गए हैं।

    भोपाल गैस पीड़ित महिला-पुरुष संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष नवाब खान के अनुसार इस महीने 30 बस्तियों से 63 पानी के नमूने एकत्र कर उनकी जांच कराई गई। इनमें से 43 नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म की पुष्टि हुई। उनका दावा है कि 30 में से 19 क्षेत्रों में लोगों तक दूषित पेयजल पहुंच रहा है। रिपोर्ट के अनुसार बड़ा तालाब से सप्लाई होने वाले पानी के लगभग 90 प्रतिशत नमूने तथा कोलार डैम से आने वाले पानी के करीब 25 प्रतिशत नमूने भी जांच में प्रभावित पाए गए।

    संगठनों का आरोप है कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से सटे इलाकों के निवासी लंबे समय से दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। उनका कहना है कि इसके कारण दस्त, उल्टी, टाइफाइड और अन्य जलजनित बीमारियों के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। कई परिवार एक साथ बीमार पड़ रहे हैं और निजी क्लीनिकों में भी टाइफाइड के मरीजों की संख्या बढ़ने की बात सामने आ रही है।

    भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संघ की अध्यक्ष रशीदा बी ने कहा कि वर्ष 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि यूनियन कार्बाइड परिसर का भूजल जहरीले रसायनों और भारी धातुओं से प्रदूषित हो चुका है। इसके बाद प्रभावित क्षेत्रों में पाइपलाइन के जरिए स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए गए थे।

    वहीं भोपाल गैस पीड़ित निराश्रित पेंशनभोगी संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष बालकृष्ण नामदेव ने आरोप लगाया कि वर्ष 2018 में भी पेयजल में मल मिलने की शिकायतों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल नगर निगम को सीवर लाइन और बेहतर ड्रेनेज व्यवस्था विकसित करने के निर्देश दिए थे। नगर निगम ने निर्धारित समय में काम पूरा करने का आश्वासन दिया था, लेकिन उनका दावा है कि वर्षों बाद भी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।

    भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉर्मेशन एंड एक्शन की रचना धींगरा ने इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए तो लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में सीवर और ड्रेनेज परियोजनाओं को प्राथमिकता से पूरा करने तथा पेयजल की गुणवत्ता की स्वतंत्र और नियमित निगरानी सुनिश्चित करने की भी मांग की।

    हालांकि इस मामले में नगर निगम या संबंधित सरकारी विभाग की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना अभी बाकी है। ऐसे में संगठनों के दावों की पुष्टि संबंधित एजेंसियों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

  • भोपाल के यूनियन कार्बाइड इलाके में 42 बस्तियों की बड़ी आबादी मल-मूत्र और रसायन मिला पानी पीने को मजबूर हालत बदतर

    भोपाल के यूनियन कार्बाइड इलाके में 42 बस्तियों की बड़ी आबादी मल-मूत्र और रसायन मिला पानी पीने को मजबूर हालत बदतर


    भोपाल । मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में यूनियन कार्बाइड कारखाने के आसपास बसी 42 बस्तियों की एक बड़ी आबादी अब भी गंदा और दूषित पानी पीने को मजबूर है। यह पानी मल-मूत्र और घातक रसायनों से भरा हुआ है जो न केवल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है बल्कि जानलेवा भी साबित हो सकता है। नगर निगम ने 2017 में इन बस्तियों में पाइपलाइन के जरिए जलापूर्ति शुरू की थी लेकिन यह पाइपलाइन नालियों से होकर गुजरती है जिससे पानी की गुणवत्ता पूरी तरह से प्रभावित हो गई है।

    गैस त्रासदी से पीड़ित इन इलाकों के लोग अब तक बेहतर पानी की सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गैस पीड़ित संगठनों की शिकायतों पर सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2012 में एक निगरानी समिति का गठन किया था। इस समिति ने इन बस्तियों में स्थित हैंडपंप और कुओं के पानी की जांच की और उसमें भारी मात्रा में हैवी मेटल डाइक्लोरोइथीन जैसे रसायन पाए गए।

    इसके बाद समिति ने नगर निगम को पेयजल के लिए पाइपलाइन डालने का निर्देश दिया। हालांकि यह पाइपलाइन नालियों से होकर गुजर रही थी जिसके कारण इसमें भारी मात्रा में ई. कोलाई बैक्टीरिया पाया गया। ई. कोलाई बैक्टीरिया सामान्यतः मलजल में पाया जाता है और यह इंसान के स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक होता है।

    2018 में किए गए पानी की जांच में यह खुलासा हुआ कि पाइपलाइन के पानी में ई. कोलाई बैक्टीरिया की मात्रा बहुत अधिक थी जो लोगों के लिए गंभीर संक्रमण का कारण बन सकता है। इसके बावजूद नगर निगम और प्रशासन की तरफ से कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए और आज भी लोग इस गंदे पानी को पीने को मजबूर हैं।

    गैस त्रासदी के पीड़ितों के लिए यह स्थिति और भी दर्दनाक है क्योंकि पहले ही वे जानलेवा गैसों से प्रभावित हुए थे और अब उन्हें दूषित पानी पीने के कारण नए स्वास्थ्य संकटों का सामना करना पड़ रहा है। इन बस्तियों के निवासी बार-बार प्रशासन से मदद की गुहार लगा रहे हैं लेकिन अब तक कोई सार्थक समाधान नहीं निकल सका है।

    इस संकट की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए गैस पीड़ित संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने कई बार प्रदर्शन भी किया है लेकिन शासन की ओर से कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं। 2017 में नगर निगम ने सर्वोच्च न्यायालय में एक शपथपत्र देकर जलापूर्ति में सुधार करने का वादा किया था लेकिन सात साल बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है।

    यह संकट सिर्फ पानी की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है बल्कि यह स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य और जीवन के लिए भी खतरा बन चुका है। नागरिक समाज और विपक्षी दल इस मुद्दे को लेकर सरकार पर लगातार दबाव बना रहे हैं ताकि इन 42 बस्तियों के लोगों को साफ पानी मिल सके और उनका स्वास्थ्य सुधारने के लिए ठोस कदम उठाए जा सकें।