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  • ग्लोबल वार्मिंग का खतरनाक असर: समुद्र का जलस्तर रिकॉर्ड स्तर पर, मुंबई-कोलकाता समेत करोड़ों लोगों के भविष्य पर संकट

    ग्लोबल वार्मिंग का खतरनाक असर: समुद्र का जलस्तर रिकॉर्ड स्तर पर, मुंबई-कोलकाता समेत करोड़ों लोगों के भविष्य पर संकट


    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र की नई चेतावनी ने ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे को एक बार फिर दुनिया के सामने गंभीर रूप से रख दिया है। समुद्र का लगातार बढ़ता जलस्तर अब केवल छोटे द्वीपीय देशों की समस्या नहीं रह गया है बल्कि भारत समेत दुनिया के बड़े और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण शहर भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि समुद्र के बढ़ते जलस्तर का असर भारत के कोलकाता और मुंबई जैसे महानगरों पर भी पड़ सकता है जहां लाखों लोगों के जीवन और संपत्ति पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

    रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर और बर्फ की विशाल परतें तेजी से पिघल रही हैं जबकि समुद्र का पानी गर्म होने के कारण उसका फैलाव भी बढ़ रहा है। इन दोनों कारणों से समुद्र का जलस्तर लगातार ऊपर जा रहा है। वर्ष 2024 में समुद्र के जलस्तर में सालाना बढ़ोतरी करीब छह मिलीमीटर दर्ज की गई जो अब तक के सबसे ऊंचे स्तरों में से एक बताई गई है। यह आंकड़ा भले ही छोटा दिखाई दे लेकिन लंबे समय में इसका असर करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ सकता है।

    पैसिफिक आइलैंड्स फोरम लीडर्स की 55वीं बैठक के दौरान जारी रिपोर्ट में दक्षिण एशिया के निचले डेल्टा क्षेत्रों को विशेष रूप से संवेदनशील बताया गया है। भारत के कोलकाता और मुंबई के साथ बांग्लादेश की राजधानी ढाका जैसे बड़े शहरों में समुद्र का जलस्तर बढ़ने से बड़े पैमाने पर विस्थापन का खतरा पैदा हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक इन क्षेत्रों में 1.4 करोड़ से अधिक लोगों के घर स्थायी रूप से पानी की चपेट में आने का जोखिम है। हालांकि इस स्थिति के लिए कोई निश्चित समय सीमा नहीं बताई गई है लेकिन चेतावनी साफ है कि यदि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार नहीं रोकी गई तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

    संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने कहा है कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर केवल तटीय क्षेत्रों की जमीन और इमारतों को प्रभावित करने वाली समस्या नहीं है। इसका सीधा असर लोगों की सेहत खाद्य सुरक्षा मानवाधिकार और सांस्कृतिक पहचान पर भी पड़ सकता है। जब किसी समुदाय को अपनी पुश्तैनी जमीन और घर छोड़ने पड़ते हैं तो वह केवल एक स्थान नहीं खोता बल्कि अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान भी खो सकता है। यही कारण है कि सरकारों को समुद्र के बढ़ते जलस्तर को अपनी विकास और शहरी योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना होगा।

    रिपोर्ट में हिमालय के ग्लेशियरों को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई है। दक्षिण एशिया में बड़ी संख्या में ग्लेशियर होने के कारण हिमालयी क्षेत्र को तीसरा ध्रुव भी कहा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार अगले 15 से 20 वर्षों में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से दक्षिण एशिया में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। इसके बाद पानी की उपलब्धता में कमी और सूखे जैसी स्थिति पैदा होने की आशंका है जिससे खेती और खाद्य सुरक्षा पर बड़ा असर पड़ सकता है।

    दुनिया भर में करीब 77 करोड़ लोग ऐसे तटीय इलाकों में रहते हैं जो समुद्र के उच्च ज्वार स्तर से पांच मीटर से भी कम ऊंचाई पर हैं। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से इन क्षेत्रों में रहने वाली आबादी के साथ परिवहन ऊर्जा जल आपूर्ति इमारतों और भूजल संसाधनों पर भी खतरा बढ़ रहा है। अनुमान है कि दुनिया भर में करीब 1.8 ट्रिलियन डॉलर मूल्य के इंफ्रास्ट्रक्चर पर इसका जोखिम मंडरा रहा है।

    संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट दुनिया के लिए साफ संदेश है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं बल्कि वर्तमान की चुनौती बन चुका है। अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो समुद्र का बढ़ता पानी आने वाले वर्षों में महानगरों से लेकर छोटे तटीय समुदायों तक की तस्वीर बदल सकता है।

  • दक्षिणी लेबनान में गहराया जल संकट, 7 लाख से अधिक लोग स्वच्छ पेयजल से वंचित; UN ने जताई गंभीर चिंता

    दक्षिणी लेबनान में गहराया जल संकट, 7 लाख से अधिक लोग स्वच्छ पेयजल से वंचित; UN ने जताई गंभीर चिंता


    नई दिल्ली। दक्षिणी लेबनान में संघर्ष के कारण बुनियादी ढांचे को पहुंचे भारी नुकसान ने मानवीय संकट को और गंभीर बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि जल आपूर्ति प्रणाली के क्षतिग्रस्त होने से लाखों लोगों के सामने स्वच्छ पेयजल, स्वास्थ्य और आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। संघर्ष प्रभावित इलाकों में लौट रहे विस्थापित परिवारों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।
    दक्षिणी लेबनान में संघर्ष के कारण बुनियादी ढांचे को पहुंचे भारी नुकसान ने मानवीय संकट को और गंभीर बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि जल आपूर्ति प्रणाली के क्षतिग्रस्त होने से लाखों लोगों के सामने स्वच्छ पेयजल, स्वास्थ्य और आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। संघर्ष प्रभावित इलाकों में लौट रहे विस्थापित परिवारों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।

    संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के समन्वय कार्यालय (ओसीएचए) के अनुसार, दक्षिण लेबनान जल प्राधिकरण द्वारा किए गए प्रारंभिक आकलन में सामने आया है कि दक्षिण और नबातियेह गवर्नरेट्स में जल आपूर्ति प्रणाली को हुए व्यापक नुकसान के कारण 7 लाख से अधिक लोगों की सुरक्षित पेयजल तक पहुंच बाधित हो गई है।

    यूएन का कहना है कि तालाबों, पंपिंग स्टेशनों, बोरहोल और अन्य जल सुविधाओं को हुए नुकसान ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। इसके कारण न केवल पीने के पानी की उपलब्धता प्रभावित हुई है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ गया है। कृषि गतिविधियां बाधित होने से हजारों परिवारों की आजीविका भी प्रभावित हो रही है।

    संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, संघर्ष के बाद अब तक 8.21 लाख से अधिक लोग अपने घरों और समुदायों में लौट चुके हैं, लेकिन करीब 3.60 लाख लोग अब भी विस्थापित हैं। इनमें लगभग 27 हजार लोग सामूहिक राहत शिविरों में रह रहे हैं और उन्हें भोजन, पानी, स्वास्थ्य सेवाओं तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं की जरूरत बनी हुई है।

    मानवीय एजेंसियों ने स्पष्ट किया है कि लोगों का अपने घर लौट आना इस बात का संकेत नहीं है कि उनकी समस्याएं समाप्त हो गई हैं। बड़ी संख्या में घर क्षतिग्रस्त हैं, जल और बिजली जैसी बुनियादी सेवाएं पूरी तरह बहाल नहीं हो सकी हैं और कई क्षेत्रों में आजीविका के साधन भी प्रभावित हुए हैं। ऐसे में राहत और पुनर्वास कार्यों में निरंतर निवेश की आवश्यकता है, ताकि प्रभावित समुदाय सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से सामान्य जीवन की ओर लौट सकें।

    इस बीच संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने भी लेबनान में आम नागरिकों की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने बेरूत में अपने दौरे के समापन पर कहा कि संघर्ष के दौरान अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के गंभीर उल्लंघन के आरोप सामने आए हैं और इनमें से कुछ मामलों को युद्ध अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और कानूनी प्रक्रिया अभी जारी है।

    टर्क के अनुसार, घनी आबादी वाले इलाकों में लगातार हवाई हमलों, गोलाबारी और विस्फोटक हथियारों के इस्तेमाल से बड़ी संख्या में आम नागरिकों की मौत हुई है, हजारों लोग घायल हुए हैं और व्यापक स्तर पर बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है। संयुक्त राष्ट्र ने बताया कि एक स्वतंत्र आकलन मिशन कथित उल्लंघनों से जुड़े साक्ष्य और जानकारियां एकत्र कर रहा है।

    लेबनानी अधिकारियों के हवाले से संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि 2 मार्च से शुरू हुए संघर्ष में 4,300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 12,200 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। मृतकों में 135 से अधिक स्वास्थ्यकर्मी तथा कई पत्रकार और मीडिया कर्मी भी शामिल हैं।

    संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि प्रभावित क्षेत्रों में मानवीय सहायता, जल आपूर्ति व्यवस्था की बहाली और पुनर्निर्माण कार्यों को प्राथमिकता दी जाए, ताकि लाखों लोगों को सुरक्षित पेयजल और आवश्यक सेवाएं दोबारा उपलब्ध कराई जा सकें।

  • संयुक्त राष्ट्र में भारत की दमदार पैरवी शांति निर्माण के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व और समान साझेदारी पर दिया जोर

    संयुक्त राष्ट्र में भारत की दमदार पैरवी शांति निर्माण के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व और समान साझेदारी पर दिया जोर


    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र महासभा में आयोजित उच्चस्तरीय बहस के दौरान भारत ने वैश्विक शांति निर्माण को लेकर अपना स्पष्ट और दूरदर्शी दृष्टिकोण दुनिया के सामने रखा। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी हरीश ने कहा कि किसी भी देश में स्थायी शांति तभी स्थापित की जा सकती है जब उसकी अगुवाई स्वयं उस देश के नेतृत्व के हाथों में हो और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बराबरी सम्मान तथा विश्वास के आधार पर आगे बढ़े। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अब पारंपरिक दाता और प्राप्तकर्ता वाले मॉडल से आगे बढ़ने का समय आ गया है।

    पी हरीश ने संयुक्त राष्ट्र में पहले पीसबिल्डिंग वीक के दौरान आयोजित शांति निर्माण आयोग के वार्षिक सत्र और संयुक्त राष्ट्र महासभा की उच्चस्तरीय बहस में भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि शांति निर्माण की पूरी प्रक्रिया मांग आधारित होनी चाहिए। इसका उद्देश्य संबंधित देशों की वास्तविक जरूरतों और प्राथमिकताओं के अनुरूप समाधान तैयार करना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका सहयोगी की होनी चाहिए न कि निर्णय थोपने वाले पक्ष की।

    उन्होंने कहा कि किसी भी शांति निर्माण अभियान की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब वह संबंधित देश की संस्थागत क्षमता को मजबूत करे और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए उसे आत्मनिर्भर बनाए। मजबूत संस्थाएं और सक्षम प्रशासन ही दीर्घकालिक शांति की सबसे बड़ी गारंटी हैं।

    भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने संयुक्त राष्ट्र की शांति निर्माण संरचना के बीस वर्ष पूरे होने का उल्लेख करते हुए कहा कि इस अवधि में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल हुई हैं। इनमें संयुक्त राष्ट्र की शांति निर्माण व्यवस्था की चौथी समीक्षा पहली राष्ट्रीय शांति निर्माण रणनीति की प्रस्तुति और पीसबिल्डिंग फंड के साथ पहला वार्षिक रणनीतिक संवाद शामिल है। उन्होंने इन पहलों को वैश्विक शांति प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया।

    उन्होंने यह भी चिंता जताई कि पिछले तीन वर्षों में पीसबिल्डिंग फंड के लिए स्वैच्छिक योगदान में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा वित्तीय स्थिति का भी शांति निर्माण कार्यक्रमों पर असर पड़ा है। भारत का मानना है कि सीमित संसाधनों का उपयोग सबसे अधिक उन देशों में किया जाना चाहिए जो संघर्ष के बाद पुनर्निर्माण की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। इससे उपलब्ध संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।

    पी हरीश ने कहा कि इस वर्ष आयोजित पीसबिल्डिंग वीक की थीम नवाचार समावेशन और प्रभाव के लिए साझेदारी वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में बेहद प्रासंगिक है। भारत भरोसे और समानता पर आधारित साझेदारी को शांति निर्माण की सबसे मजबूत नींव मानता है। उन्होंने कहा कि ऐसी साझेदारी तभी सफल होगी जब राष्ट्रीय स्वामित्व हर प्रक्रिया का मूल सिद्धांत बना रहेगा।

    भारत ने महिलाओं की भूमिका को भी शांति निर्माण का महत्वपूर्ण आधार बताया। पी हरीश ने हाल ही में भारत की मेजर अभिलाषा बराक को वर्ष 2025 का मिलिट्री जेंडर एडवोकेट ऑफ द ईयर सम्मान मिलने का उल्लेख करते हुए कहा कि यह महिलाओं शांति और सुरक्षा के प्रति भारत की मजबूत प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि भारत अपने राष्ट्र निर्माण के अनुभव और विकास मॉडल को दुनिया के साथ साझा करने के लिए पूरी तरह तैयार है तथा वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए सभी साझेदार देशों के साथ मिलकर काम करता रहेगा।

  • संयुक्त राष्ट्र में भारत का बड़ा संदेश 2030 तक एड्स को खत्म करने के वैश्विक संकल्प का समर्थन

    संयुक्त राष्ट्र में भारत का बड़ा संदेश 2030 तक एड्स को खत्म करने के वैश्विक संकल्प का समर्थन


    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र में आयोजित एचआईवी और एड्स पर उच्चस्तरीय बैठक में भारत ने वैश्विक एकजुटता और सहयोग की आवश्यकता पर जोर देते हुए वर्ष 2030 तक एड्स को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरे के रूप में समाप्त करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी हरीश ने इस अवसर पर भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर एचआईवी और एड्स के खिलाफ लड़ाई निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है और इस दिशा में सामूहिक प्रयासों को और मजबूत करने की जरूरत है।

    भारत ने बैठक में प्रस्तुत राजनीतिक घोषणा पत्र में व्यक्त वैश्विक एकजुटता की भावना का समर्थन करते हुए कहा कि पिछले दो दशकों में एचआईवी संक्रमण और एड्स से होने वाली मौतों को कम करने में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। हालांकि अभी भी असमानताओं, वित्तीय संसाधनों की कमी और नई वैश्विक चुनौतियों के कारण इस दिशा में हासिल उपलब्धियों पर खतरा बना हुआ है।

    पी हरीश ने कहा कि भारत वर्ष 2030 तक एड्स को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरे के रूप में समाप्त करने और उसके बाद भी इस क्षेत्र में प्रगति बनाए रखने के संकल्प के साथ पूरी मजबूती से खड़ा है। उन्होंने बताया कि भारत इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए राष्ट्रीय एड्स एवं यौन संचारित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के माध्यम से व्यापक स्तर पर कार्य कर रहा है। यह कार्यक्रम वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित योजना, सामुदायिक सहभागिता और एकीकृत स्वास्थ्य सेवाओं पर आधारित है।

    भारत ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि लगातार घरेलू निवेश और योजनाबद्ध प्रयासों की बदौलत देश में नए एचआईवी संक्रमण और एड्स से संबंधित मौतों में उल्लेखनीय कमी आई है। साथ ही रोकथाम, जांच, उपचार, देखभाल और परामर्श सेवाओं तक लोगों की पहुंच भी पहले की तुलना में काफी बढ़ी है।

    बैठक में भारत ने देश-आधारित रणनीतियों और टिकाऊ वित्तपोषण के महत्व को भी रेखांकित किया। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि प्रत्येक देश को अपनी स्थानीय परिस्थितियों और महामारी की प्रकृति के अनुरूप रणनीति तैयार करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। इसके साथ ही मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था और पूर्वानुमेय वित्तीय सहायता भी सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि लंबे समय तक सकारात्मक परिणाम प्राप्त किए जा सकें।

    भारत ने गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों को संक्रमण से बचाने के लिए अपनाई जा रही अपनी ट्रिपल एलिमिनेशन रणनीति का भी उल्लेख किया। इस पहल के तहत गर्भवती महिलाओं में एचआईवी, सिफलिस और हेपेटाइटिस-बी की सार्वभौमिक जांच, समय पर उपचार और संक्रमित बच्चों की नियमित निगरानी सुनिश्चित की जा रही है। भारत ने बच्चों में एड्स को समाप्त करने और संक्रमण के मातृ-शिशु प्रसार को रोकने के वैश्विक प्रयासों का भी समर्थन किया।

    इसके अलावा भारत ने एचआईवी, तपेदिक, वायरल हेपेटाइटिस और अन्य सह-संक्रमणों के खिलाफ एकीकृत स्वास्थ्य रणनीति अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत का मानना है कि ऐसी समेकित व्यवस्था स्वास्थ्य परिणामों को बेहतर बनाने के साथ-साथ संसाधनों के प्रभावी उपयोग में भी मदद करती है।

    भारत ने बैठक में सस्ती दवाओं, जांच सुविधाओं और नई चिकित्सा तकनीकों तक समान पहुंच सुनिश्चित करने की आवश्यकता को भी प्रमुखता से उठाया। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि विश्व व्यापार संगठन के टीआरआईपीएस समझौते के अंतर्गत उपलब्ध लचीले प्रावधानों का उपयोग विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, ताकि जीवनरक्षक दवाओं और स्वास्थ्य उत्पादों तक आम लोगों की पहुंच सुनिश्चित की जा सके।

    संयुक्त राष्ट्र में भारत की यह पहल वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा, समान स्वास्थ्य सेवाओं और एड्स मुक्त भविष्य के लिए उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। भारत ने स्पष्ट किया कि वह आने वाले वर्षों में भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर एचआईवी और एड्स के खिलाफ इस लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाता रहेगा।

  • UNSC सुधारों पर बड़ा दबाव: G4 की कोशिशें, चीन-पाकिस्तान की रुकावट

    UNSC सुधारों पर बड़ा दबाव: G4 की कोशिशें, चीन-पाकिस्तान की रुकावट




    नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधारों को लेकर एक बार फिर वैश्विक बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील वाले G4 समूह की मांग है कि परिषद का विस्तार किया जाए और नए स्थायी सदस्यों को शामिल किया जाए। भारत लंबे समय से स्थायी सीट की मांग करता आ रहा है।

    इस बीच संयुक्त राष्ट्र महासचिव António Guterres ने भी सुधारों का समर्थन करते हुए कहा है कि मौजूदा वैश्विक संस्थाएं आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को ठीक से नहीं दर्शातीं और इनमें बदलाव “अनिवार्य” है।

    UNSC का मौजूदा ढांचा
    वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 5 स्थायी सदस्य हैं:

    अमेरिका

    रूस

    चीन

    फ्रांस

    यूनाइटेड किंगडम

    इन सभी के पास वीटो पावर है, जो किसी भी प्रस्ताव को रोक सकती है। इसके अलावा 10 अस्थायी सदस्य होते हैं जिन्हें 2 साल के लिए चुना जाता है।

    G4 का नया प्रस्ताव क्या है?
    भारत और उसके सहयोगी देशों (G4) ने एक नया प्रस्ताव दिया है जिसमें शामिल हैं:

    UNSC का विस्तार कर 25–26 सदस्य करना

    11 स्थायी सदस्य बनाने का सुझाव

    नए सदस्यों को तुरंत वीटो पावर न देना

    लगभग 15 साल का “ट्रांजिशन पीरियड” जिसमें वीटो फ्रीज रहेगा

    समान जिम्मेदारी और जवाबदेही का ढांचा

    भारत की ओर से इस मुद्दे पर राजनयिक स्तर पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है।

    भारत की राह में सबसे बड़ी बाधा कौन?
    विश्लेषण के अनुसार भारत की स्थायी सदस्यता की राह में सबसे बड़ा अवरोध है:

    चीन
    एशिया में केवल वही एकमात्र वीटो पावर वाला देश है

    वह नहीं चाहता कि भारत जैसे नए प्रतिस्पर्धी को स्थायी सीट मिले

    UNSC विस्तार पर अक्सर विरोध या बाधा डालता रहा है

    पाकिस्तान
    भारत की सदस्यता का खुला विरोध करता है

    चीन के साथ मिलकर कई कूटनीतिक प्रयासों में रुकावट डालता है

    मुद्दा क्यों अटका हुआ है?
    UNSC सुधार के लिए:

    सभी स्थायी सदस्यों की सहमति जरूरी है

    किसी एक देश का वीटो भी पूरी प्रक्रिया रोक सकता है

    यही वजह है कि लंबे समय से सुधार प्रस्ताव अटके हुए हैं, जबकि भारत जैसे बड़े देशों की भूमिका वैश्विक स्तर पर लगातार बढ़ रही है।

  • सूडान में UN सुविधा केंद्र पर बड़ा हमला, 6 बांग्लादेशी शांतिरक्षकों की मौत

    सूडान में UN सुविधा केंद्र पर बड़ा हमला, 6 बांग्लादेशी शांतिरक्षकों की मौत


    काहिरा। युद्धग्रस्त सूडान में शनिवार को ड्रोन हमले ने संयुक्त राष्ट्र सुविधा को निशाना बनाया। इस हमले में छह बांग्लादेशी शांतिरक्षकों की मौत हो गई और आठ अन्य घायल हुए।

    हमले की जानकारी:
    स्थान: मध्य क्षेत्र कोर्डोफान, कदुगली शहर में यूएन लॉजिस्टिक्स बेस

    पीड़ित: सभी बांग्लादेशी नागरिक, यूएन अंतरिम सुरक्षा बल (UNISFA) में तैनात

    घायलों की संख्या: 8

    सूदानी सेना ने आरोप लगाया
    हमला रैपिड सपोर्ट फोर्सेस (RSF) द्वारा किया गया बताया गया।

    RSF सूडान का कुख्यात अर्धसैनिक समूह है, जो सेना के साथ दो साल से अधिक समय से सत्ता संघर्ष में लगा है।

    सेना ने कहा कि यह हमला विद्रोही मिलिशिया और उनके समर्थनकर्ताओं के विध्वंसक दृष्टिकोण को उजागर करता है।

    संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रिया
    UN महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इसे युद्ध अपराध करार दिया और जिम्मेदारों को जवाबदेह ठहराने की मांग की।

    गुटेरेस ने सूडान में तत्काल युद्धविराम और एक व्यापक, समावेशी राजनीतिक प्रक्रिया की आवश्यकता पर जोर दिया।

    सूडान का युद्ध परिदृश्य
    अप्रैल 2023 में सेना और RSF के बीच सत्ता संघर्ष ने खार्तूम और अन्य हिस्सों में खुला युद्ध पैदा किया।

    अब तक 40,000 से अधिक लोग मारे गए हैं।

    संघर्ष का केंद्र कोर्डोफान और दारफूर क्षेत्र है।

    युद्ध में शहर तबाह हुए, सामूहिक बलात्कार और जातीय हत्याएं हुईं, जिन्हें यूएन और अधिकार समूहों ने युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ अपराध बताया।

    हमले का वीडियो सामने आया
    सूडानी सेना ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें यूएन सुविधा के पास घने काले धुएं के गुबार दिखाई दे रहे हैं। यह दिखाता है कि हमला कितने व्यापक पैमाने पर हुआ।

    सूडान में जारी संघर्ष ने न केवल नागरिकों बल्कि शांति मिशन के जवानों को भी निशाना बनाया है। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा तत्काल युद्धविराम और राजनीतिक समाधान की जरूरत जताई जा रही है।