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  • ‘समुद्री डकैती और गुंडागर्दी नहीं चलेगी’, ईरान की अमेरिका को सख्‍त चेतावनी

    ‘समुद्री डकैती और गुंडागर्दी नहीं चलेगी’, ईरान की अमेरिका को सख्‍त चेतावनी


    तेहरान।
    ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। ईरान ने अमेरिका पर ‘समुद्री डकैती और गुंडागर्दी’ का आरोप लगाते हुए चेतावनी दी है कि अगर कथित समुद्री नाकेबंदी जारी रही तो जल्द ही उसे “व्यावहारिक और अभूतपूर्व सैन्य कार्रवाई” का सामना करना पड़ेगा।

    ईरान के सरकारी मीडिया के मुताबिक, एक वरिष्ठ सुरक्षा सूत्र ने कहा कि देश की सशस्त्र सेनाएं अब और संयम बरतने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि धैर्य की सीमा होती है और यदि अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट में अपनी ‘गैरकानूनी’ गतिविधियां जारी रखता है, तो उसे कड़ा जवाब दिया जाएगा।

    अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरानी जहाजों की जब्ती को लेकर भी विवाद गहरा गया है। संयुक्त राष्ट्र में ईरान के स्थायी प्रतिनिधि अमीर सईद इरावानी ने इस कार्रवाई को “कानूनी व्यापार में अवैध हस्तक्षेप” करार दिया है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद को लिखे पत्र में कहा कि अमेरिकी कदम ‘समुद्री डकैती’ के समान हैं।

    दूसरी ओर, वॉशिंगटन डीसी की जिला अटॉर्नी जीनीन पिरो ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर दो जहाज ‘एमटी मजेस्टिक’ और ‘एमटी टिफनी’ को जब्त करने की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि इन जहाजों में मौजूद लगभग 3.8 मिलियन बैरल ईरानी तेल को कब्जे में लिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट में यह नाकेबंदी उस समय लागू की, जब 11 और 12 अप्रैल को पाकिस्तान के इस्लामाबाद में ईरान के साथ हुई वार्ता किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी।

    गौरतलब है कि 8 अप्रैल को ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच युद्धविराम लागू हुआ था, जो करीब 40 दिनों तक चले संघर्ष के बाद संभव हो पाया। यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ था, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई शहरों पर हमले किए थे, जिसमें शीर्ष नेतृत्व, सैन्य अधिकारी और नागरिकों की जान गई थी। इसके जवाब में ईरान ने इजरायल और मध्य पूर्व में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। साथ ही, होर्मुज स्ट्रेट पर अपनी रणनीतिक पकड़ को और मजबूत कर लिया, जिससे क्षेत्र में तनाव लगातार बना हुआ है।

  • होर्मुज से जहाजों पर 20 लाख डॉलर टोल की खबर पर मचा हड़कंप, भारत पर टैक्स को लेकर सरकार ने दिया जवाब

    होर्मुज से जहाजों पर 20 लाख डॉलर टोल की खबर पर मचा हड़कंप, भारत पर टैक्स को लेकर सरकार ने दिया जवाब


    नई दिल्ली।
    अमेरिका के साथ सीजफायर के बाद ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर भारी शुल्क वसूलने की संभावित योजना को लेकर वैश्विक हलचल तेज हो गई है। खबरों के अनुसार ईरान की संसद में मंगलवार को एक प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है, जिसके तहत इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर 20 लाख डॉलर तक का टोल लगाया जा सकता है।

    भारत-ईरान टोल चर्चा पर सरकार का स्पष्ट बयान
    इस मुद्दे पर भारत सरकार ने स्थिति साफ करते हुए कहा है कि ईरान के साथ इस तरह के किसी टोल टैक्स को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि भारत और ईरान के बीच इस विषय पर कोई चर्चा नहीं हुई है।

    होर्मुज में आंशिक संचालन की तैयारी

    रिपोर्ट्स के मुताबिक बुधवार को ईरानी अधिकारी ने संकेत दिए कि शुक्रवार से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सीमित स्तर पर जहाजों की आवाजाही शुरू हो सकती है। यह मार्ग युद्ध के दौरान लगभग छह सप्ताह तक बाधित रहा था, हालांकि कुछ मित्र देशों के जहाजों को गुजरने की अनुमति दी गई थी, जिनमें भारत भी शामिल था।

    20 लाख डॉलर तक हो सकता है शुल्क

    सूत्रों के अनुसार ईरान स्थायी शांति व्यवस्था के तहत इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर भारी शुल्क लगाने पर विचार कर रहा है। अनुमान है कि यह शुल्क लगभग 20 लाख डॉलर प्रति ट्रांजिट तक हो सकता है, जो मौजूदा शिपिंग लागत के बराबर माना जा रहा है।

    ईरान और ओमान दोनों की भूमिका
    रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि इस प्रस्तावित व्यवस्था के तहत ईरान और ओमान दोनों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क वसूलने का अधिकार मिल सकता है। इस आय का उपयोग क्षेत्रीय पुनर्निर्माण और आर्थिक जरूरतों के लिए किए जाने की बात कही जा रही है।

    भारत को पहले मिली थी राहत
    युद्ध के दौरान ईरान ने कुछ मित्र देशों को सुरक्षित मार्ग से गुजरने की अनुमति दी थी, जिनमें भारत का नाम भी शामिल रहा। उस समय कई भारतीय जहाज जैसे एलपीजी टैंकर ‘ग्रीन आशा’ और अन्य वेसल्स सुरक्षित रूप से भारत पहुंचे थे।

    वैश्विक ऊर्जा व्यापार पर नजर
    होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के तेल और गैस व्यापार के लिए बेहद अहम माना जाता है। ऐसे में किसी भी तरह का नया शुल्क या नियंत्रण वैश्विक ऊर्जा कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला पर बड़ा असर डाल सकता है।

  • अमेरिका के लिए स्पेन ने सैन्य विमानों के लिए बंद किया एयरस्पेस

    अमेरिका के लिए स्पेन ने सैन्य विमानों के लिए बंद किया एयरस्पेस

    वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच स्पेन ने बड़ा फैसला लेते हुए अमेरिकी सैन्य विमानों के लिए अपना एयरस्पेस बंद कर दिया है। इस कदम के बाद अमेरिका अब अपने सैन्य अभियानों के लिए स्पेन के आसमान या वहां के सैन्य ठिकानों का उपयोग नहीं कर पाएगा। इसे ईरान से जुड़े हालात के बीच अमेरिका के लिए रणनीतिक झटका माना जा रहा है।
    स्पेन की रक्षा मंत्री ने स्पष्ट कहा कि उनका देश ईरान (Iran) के खिलाफ किसी भी सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं बनेगा। उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिकी विमानों को न तो एयरस्पेस मिलेगा और न ही सैन्य अड्डों के इस्तेमाल की अनुमति दी जाएगी। इस बयान से संकेत मिला है कि स्पेन इस पूरे संघर्ष से दूरी बनाए रखना चाहता है।

    इस फैसले का सीधा असर अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अब अमेरिकी विमानों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने होंगे, जिससे उड़ान का समय बढ़ेगा और संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। हालांकि स्पेन ने मानवीय और आपातकालीन उड़ानों को छूट दी है, लेकिन सैन्य मिशनों पर यह प्रतिबंध अहम माना जा रहा है।

    स्पेन सरकार का कहना है कि वह ऐसे किसी भी युद्ध का समर्थन नहीं करती जो अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ हो। इसी आधार पर उसने यह निर्णय लिया है। स्पेन के नेताओं का मानना है कि इस तरह के संघर्ष से वैश्विक तनाव बढ़ता है और शांति प्रयास प्रभावित होते हैं।
    विश्लेषकों का कहना है कि इस कदम से अमेरिका और स्पेन के संबंधों में तनाव बढ़ सकता है। दोनों देशों के बीच पहले भी इस मुद्दे पर मतभेद रहे हैं, और अब एयरस्पेस बंद करने के फैसले से यह दूरी और बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
  • मिडिल ईस्ट जंग और भड़केगी? ट्रंप के बड़े सैन्य कदम के संकेत

    मिडिल ईस्ट जंग और भड़केगी? ट्रंप के बड़े सैन्य कदम के संकेत



    वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच हालात और गंभीर होते नजर आ रहे हैं। Iran, United States और Israel के बीच बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच अब संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका बड़ा कदम उठा सकता है, जिससे जंग और फैलने की आशंका बढ़ गई है।

    19 दिन से जारी भीषण टकराव
    पिछले करीब तीन हफ्तों से जारी संघर्ष में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर तीखे हमले किए हैं। अमेरिका और इजरायल ने ईरान के शीर्ष ठिकानों और नेतृत्व को निशाना बनाया, वहीं ईरान ने जवाब में इजरायल और खाड़ी देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमले तेज कर दिए हैं।

    हाल ही में ईरान ने Saudi Arabia, Qatar और United Arab Emirates के तेल-गैस ठिकानों को भी निशाना बनाया, जिससे युद्ध का दायरा और बढ़ गया है।

    हजारों अमेरिकी सैनिक भेजने की तैयारी
    रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने पर विचार कर रहा है। सूत्रों का कहना है कि हजारों अमेरिकी सैनिकों की तैनाती का प्लान तैयार किया जा रहा है, ताकि ईरान के खिलाफ ऑपरेशन को और मजबूत किया जा सके।

    क्या है अमेरिका की रणनीति?
    सूत्रों के अनुसार, सैनिकों की तैनाती से अमेरिका को कई सैन्य विकल्प मिल सकते हैं। इनमें सबसे अहम है Strait of Hormuz में तेल टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना।

    यह मिशन मुख्य रूप से एयरफोर्स और नेवी के जरिए चलाया जा सकता है। हालांकि कुछ विकल्प ऐसे भी हैं, जिनमें ईरान के तटीय इलाकों के पास सैनिकों की तैनाती की बात सामने आई है।

    खतरनाक योजना: खर्ग द्वीप पर नजर
    अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से यह भी जानकारी सामने आई है कि Kharg Island पर जमीनी सेना भेजने के विकल्प पर चर्चा हुई है।

    यह द्वीप ईरान के लगभग 90% तेल निर्यात का केंद्र है, इसलिए यहां कोई भी सैन्य कार्रवाई बेहद संवेदनशील और जोखिम भरी मानी जा रही है। ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता इसे और खतरनाक बना देती है।

    राजनीतिक जोखिम भी कम नहीं
    विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी सैनिकों की सीधी तैनाती Donald Trump के लिए राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकती है।

    अमेरिकी जनता में इस युद्ध को लेकर समर्थन सीमित है

    ट्रंप पहले ही मिडिल ईस्ट में नए युद्ध से दूर रहने का वादा कर चुके हैं

    हाल में एक अमेरिकी अधिकारी ने नाराजगी जताते हुए इस्तीफा भी दिया है

    इसके अलावा, इस संघर्ष में अब तक 13 अमेरिकी सैनिकों की मौत और करीब 200 के घायल होने की खबर है।

    मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका के संभावित सैन्य कदम हालात को और विस्फोटक बना सकते हैं। यदि सैनिकों की तैनाती होती है, तो यह संघर्ष एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।

  • ईरान में मोजतबा खामेनेई बने सुप्रीम लीडर, एक्सपर्ट बोले- अमेरिका से और बढ़ सकता है टकराव

    ईरान में मोजतबा खामेनेई बने सुप्रीम लीडर, एक्सपर्ट बोले- अमेरिका से और बढ़ सकता है टकराव


    नई दिल्ली। ईरान के मौजूदा नेतृत्व ने देश के नए सुप्रीम लीडर के रूप में मोजतबा खामेनेई को नियुक्त कर दिया है। उन्हें अयातुल्ला अली खामेनेई का उत्तराधिकारी बनाया गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला ईरान के अमेरिका के साथ समझौते की बजाय टकराव की नीति को मजबूत करने का संकेत देता है।

    ईरान में सुप्रीम लीडर देश का सबसे शक्तिशाली पद होता है। विदेश नीति, रक्षा और परमाणु कार्यक्रम जैसे अहम फैसलों पर अंतिम अधिकार उसी के पास होता है। साथ ही वह राष्ट्रपति और संसद के कामकाज को भी दिशा देता है। यानी कई मामलों में सुप्रीम लीडर की ताकत राष्ट्रपति से भी अधिक मानी जाती है।

    ट्रंप के लिए झटका माना जा रहा फैसला

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए भी झटका माना जा सकता है। ट्रंप ने पहले मोजतबा को कमजोर नेता बताते हुए उनकी संभावित नियुक्ति को खारिज किया था और यह भी संकेत दिए थे कि नए सुप्रीम लीडर के चयन में उनकी राय अहम होनी चाहिए।

    गौरतलब है कि युद्ध के शुरुआती दौर में अमेरिका और इजरायल के हमलों के दौरान अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई थी। इसके बाद मोजतबा को उनका उत्तराधिकारी बनाया गया है। इस कदम को तेहरान में कट्टरपंथी ताकतों के प्रभाव को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।

    अमेरिका के लिए ‘बेइज्जती’ जैसा कदम

    मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो एलेक्स वटांका के मुताबिक इतने बड़े सैन्य अभियान के बाद भी अगर 86 वर्षीय नेता की जगह उसके और ज्यादा कट्टरपंथी बेटे को सत्ता मिल जाए तो यह अमेरिका के लिए बड़ी असहज स्थिति है।

    विश्लेषकों का कहना है कि मोजतबा का चयन एक स्पष्ट संदेश देता है कि ईरान फिलहाल समझौते की राह नहीं, बल्कि सख्त रुख और जवाबी कार्रवाई की नीति अपनाने की तैयारी में है।

    रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो पॉल सलेम ने कहा कि मोजतबा के नेतृत्व में ईरान के लिए आने वाले दिन कठिन हो सकते हैं। उनका मानना है कि मोजतबा ऐसे नेता नहीं हैं जो अमेरिका के साथ समझौता करने या अपनी रणनीति बदलने के लिए तैयार हों।

    पिता से भी ज्यादा कट्टर बताए जाते हैं मोजतबा

    पूर्व अमेरिकी राजनयिक और ईरान विशेषज्ञ एलन आयर के मुताबिक मोजतबा खामेनेई को उनके पिता से भी ज्यादा सख्त और कट्टर माना जाता है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) भी उन्हें पसंदीदा उम्मीदवार मानती रही है।

    56 वर्षीय मोजतबा खामेनेई ने शिया इस्लाम की शिक्षा ईरान के कोम स्थित धार्मिक मदरसों में प्राप्त की है। उन्हें ‘हुज्जतुल इस्लाम’ की उपाधि मिली हुई है, जो शिया धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक दर्जा माना जाता है।

    अमेरिका ने 2019 में मोजतबा खामेनेई पर प्रतिबंध भी लगाया था। अमेरिकी वित्त मंत्रालय का आरोप था कि किसी आधिकारिक सरकारी पद पर न होने के बावजूद वे अपने पिता के प्रतिनिधि की तरह काम करते हुए सत्ता के फैसलों पर प्रभाव डालते रहे हैं।

    आर्थिक संकट और सख्त नीतियों की चुनौती

    ईरान पहले से ही कमजोर अर्थव्यवस्था, बढ़ती महंगाई, गिरती मुद्रा और बढ़ती गरीबी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। इसके साथ ही सरकार की कड़ी नीतियों के कारण जनता में असंतोष और विरोध प्रदर्शन भी बढ़े हैं।ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि मोजतबा के सामने देश की आंतरिक चुनौतियों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय दबाव से निपटना भी बड़ी चुनौती होगी। कई विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा हालात में उनके पास सख्त रुख अपनाने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं हैं, चाहे युद्ध समाप्त ही क्यों न हो जाए।