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  • युद्ध और आतंक का खतरनाक हथियार बना CRSV, संयुक्त राष्ट्र में भारत ने संघर्ष-संबंधी यौन हिंसा पर उठाई कड़ी आपत्ति

    युद्ध और आतंक का खतरनाक हथियार बना CRSV, संयुक्त राष्ट्र में भारत ने संघर्ष-संबंधी यौन हिंसा पर उठाई कड़ी आपत्ति

    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र में भारत ने संघर्ष-संबंधी यौन हिंसा (Conflict-Related Sexual Violence-CRSV) को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए इसकी स्पष्ट शब्दों में निंदा की है। भारत ने कहा कि युद्ध, आतंकवाद, सशस्त्र संघर्ष और राजनीतिक दमन के दौरान इस प्रकार की हिंसा का इस्तेमाल एक सुनियोजित हथियार के रूप में किया जाता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ऐसे अपराधों के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करने और पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाने का आह्वान किया है।

    संघर्ष-संबंधी यौन हिंसा ऐसे अपराधों को कहा जाता है जो किसी युद्ध, गृहयुद्ध, आतंकवादी गतिविधि, सशस्त्र संघर्ष या राजनीतिक अस्थिरता के दौरान किए जाते हैं। इन अपराधों में बलात्कार, यौन दासता, जबरन वेश्यावृत्ति, जबरन गर्भधारण, जबरन नसबंदी और अन्य प्रकार के यौन उत्पीड़न शामिल होते हैं। इनका उद्देश्य केवल शारीरिक नुकसान पहुंचाना नहीं होता, बल्कि पीड़ितों और पूरे समुदाय के मनोबल को तोड़ना भी होता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रकार की हिंसा का सबसे अधिक शिकार महिलाएं और लड़कियां बनती हैं। हालांकि कई संघर्ष क्षेत्रों में पुरुषों और बच्चों के भी ऐसे अपराधों का शिकार बनने के मामले सामने आए हैं। युद्ध और हिंसक संघर्ष के दौरान कमजोर और असुरक्षित आबादी को निशाना बनाकर विरोधी पक्ष में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा करने की कोशिश की जाती है। यही कारण है कि इसे केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं बल्कि व्यापक मानवाधिकार उल्लंघन माना जाता है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष-संबंधी यौन हिंसा को युद्ध अपराध, मानवता के विरुद्ध अपराध और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन की श्रेणी में देखा जाता है। ऐसे मामलों का असर केवल पीड़ित व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है। कई बार भय के कारण बड़ी संख्या में लोगों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर पलायन करना पड़ता है, जिससे मानवीय संकट और गहरा हो जाता है।

    संयुक्त राष्ट्र ने इस समस्या से निपटने के लिए कई वर्षों से विशेष प्रयास किए हैं। संगठन ने सदस्य देशों के सहयोग से ऐसे अपराधों को रोकने, पीड़ितों को न्याय दिलाने और दोषियों को जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से विभिन्न अंतरराष्ट्रीय ढांचे और तंत्र विकसित किए हैं। साथ ही संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में शांति स्थापना, मानवाधिकार संरक्षण और पुनर्वास की दिशा में भी लगातार काम किया जा रहा है।

    भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अपने वक्तव्य के दौरान इस बात पर जोर दिया कि संघर्ष-संबंधी यौन हिंसा को किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। भारत का मानना है कि ऐसे अपराधों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग, प्रभावी कानूनी कार्रवाई और पीड़ितों को न्याय उपलब्ध कराना वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए आवश्यक है। साथ ही संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में महिलाओं, बच्चों और अन्य कमजोर वर्गों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दिए जाने की जरूरत है।

    भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रकार की हिंसा केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि मानव गरिमा, अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और वैश्विक शांति से जुड़ा गंभीर विषय है। ऐसे अपराधों पर प्रभावी रोक लगाने, दोषियों को सजा दिलाने और पीड़ितों के पुनर्वास के लिए सभी देशों को मिलकर समन्वित प्रयास करने होंगे, तभी संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी शांति और न्याय सुनिश्चित किया जा सकेगा।

  • जिनेवा में एआई गवर्नेंस पर वैश्विक मंथन, संयुक्त राष्ट्र के पहले ग्लोबल डायलॉग में भारत का नेतृत्व करेंगे केंद्रीय मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह

    जिनेवा में एआई गवर्नेंस पर वैश्विक मंथन, संयुक्त राष्ट्र के पहले ग्लोबल डायलॉग में भारत का नेतृत्व करेंगे केंद्रीय मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह

    नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के वैश्विक नियमन और जिम्मेदार उपयोग को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण पहल शुरू होने जा रही है। इसी क्रम में स्विट्जरलैंड के जिनेवा में 6 और 7 जुलाई को आयोजित होने वाले संयुक्त राष्ट्र के पहले एआई गवर्नेंस ग्लोबल डायलॉग में भारत सक्रिय भागीदारी करेगा। इस महत्वपूर्ण मंच पर केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री कीर्तिवर्धन सिंह भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे।

    यह वैश्विक संवाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सहयोग, नीति निर्माण और साझा मानकों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य ऐसा वैश्विक ढांचा तैयार करना है, जो विभिन्न देशों, क्षेत्रीय संगठनों, निजी क्षेत्र, शिक्षाविदों और अन्य हितधारकों के प्रयासों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर सके। तेजी से विकसित हो रही एआई तकनीकों को सुरक्षित, पारदर्शी और मानव-केंद्रित बनाने पर भी विशेष जोर दिया जाएगा।

    सम्मेलन में एआई के सामाजिक और आर्थिक प्रभाव, विकसित और विकासशील देशों के बीच तकनीकी अंतर को कम करने, सुरक्षित एवं भरोसेमंद एआई प्रणालियों के विकास तथा मानवाधिकारों के संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इन मुद्दों पर वैश्विक सहमति भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था और तकनीकी सहयोग के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

    बैठक के दौरान एआई पर स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पैनल की पहली वार्षिक रिपोर्ट भी प्रस्तुत की जाएगी। इस रिपोर्ट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वर्तमान क्षमताओं, भविष्य की संभावनाओं और उससे जुड़े संभावित जोखिमों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया गया है। रिपोर्ट का उद्देश्य नीति निर्माताओं को विश्वसनीय और तथ्य आधारित जानकारी उपलब्ध कराना है, ताकि भविष्य की नीतियां संतुलित और प्रभावी बनाई जा सकें।

    भारत लगातार जिम्मेदार और समावेशी एआई विकास की वकालत करता रहा है। डिजिटल नवाचार, तकनीकी सहयोग और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में भारत की पहल को वैश्विक स्तर पर सकारात्मक दृष्टि से देखा जा रहा है। इसी क्रम में भारतीय प्रतिनिधिमंडल सम्मेलन के दौरान विकासशील देशों की आवश्यकताओं, तकनीकी समानता और डिजिटल समावेशन से जुड़े मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाएगा।

    वैश्विक स्तर पर एआई तकनीक के तेजी से विस्तार ने नियामकीय ढांचे की आवश्यकता को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते साझा नियम और पारदर्शी व्यवस्था विकसित नहीं की गई, तो भविष्य में सुरक्षा, गोपनीयता और नैतिकता से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। ऐसे में यह संवाद वैश्विक सहयोग को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण मंच माना जा रहा है।

    जिनेवा में होने वाले इस पहले सत्र के बाद अगले चरण का आयोजन वर्ष 2027 में न्यूयॉर्क में किया जाएगा। उम्मीद की जा रही है कि इन बैठकों के माध्यम से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सुरक्षित, जिम्मेदार और टिकाऊ उपयोग को लेकर अंतरराष्ट्रीय सहमति मजबूत होगी तथा वैश्विक डिजिटल शासन व्यवस्था को नई दिशा मिलेगी।

  • 117 हस्तियों ने भारत-पाक वार्ता की उठाई मांग, संयुक्त राष्ट्र में भारत ने आतंकवाद पर पाकिस्तान को घेरा, वैश्विक कार्रवाई पर दिया जोर

    117 हस्तियों ने भारत-पाक वार्ता की उठाई मांग, संयुक्त राष्ट्र में भारत ने आतंकवाद पर पाकिस्तान को घेरा, वैश्विक कार्रवाई पर दिया जोर

    नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के संबंधों में संवाद बहाल करने की मांग को लेकर दोनों देशों की 117 प्रमुख हस्तियों द्वारा खुला पत्र जारी किए जाने के बीच संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर अपना स्पष्ट और सख्त रुख दोहराया है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कहा कि आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी लड़ाई तभी संभव है, जब सभी देश बिना किसी भेदभाव और दोहरे मानदंड के आतंकवाद तथा उसके समर्थकों के विरुद्ध समान रूप से कार्रवाई करें।

    संयुक्त राष्ट्र में भारत ने कहा कि आतंकवाद को किसी भी आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटने की सोच वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है। भारत ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद का कोई धर्म, सीमा या वैचारिक औचित्य नहीं होता और इससे निपटने के लिए एक समान वैश्विक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। केवल निंदा या औपचारिक बयान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि आतंकवादी गतिविधियों की योजना बनाने वालों, आर्थिक सहायता देने वालों और उन्हें संरक्षण प्रदान करने वालों तक कानून की पहुंच सुनिश्चित करनी होगी।

    भारत का यह रुख ऐसे समय सामने आया है, जब दुनिया के कई हिस्सों में सीमा पार आतंकवादी नेटवर्क और नई तकनीकों के दुरुपयोग को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। भारत ने कहा कि आधुनिक तकनीक ने आतंकवादी संगठनों की कार्यप्रणाली को पहले की तुलना में अधिक जटिल और संगठित बना दिया है। इसलिए वैश्विक सुरक्षा तंत्र को भी बदलती चुनौतियों के अनुरूप मजबूत और तकनीकी रूप से सक्षम बनाना समय की आवश्यकता है।

    भारत ने विशेष रूप से ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डीपफेक तकनीक, एन्क्रिप्टेड संचार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, मैपिंग एप्लिकेशन और डार्क वेब के बढ़ते दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की। भारत का कहना है कि इन तकनीकों का इस्तेमाल कट्टरपंथ फैलाने, भर्ती अभियान चलाने, वित्तीय लेन-देन छिपाने और आतंकी गतिविधियों के समन्वय के लिए किया जा रहा है। ऐसे में सुरक्षित और विश्वसनीय डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना सभी देशों की साझा जिम्मेदारी है।

    भारत ने यह भी दोहराया कि आतंकवाद के वित्तपोषण पर प्रभावी रोक लगाए बिना इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसके लिए देशों के बीच खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, वित्तीय निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पूरी तरह पालन करने की आवश्यकता बताई गई। भारत ने कहा कि किसी भी देश की भूमि का उपयोग आतंकवादी गतिविधियों के लिए सुरक्षित ठिकाने के रूप में नहीं होने दिया जाना चाहिए।

    इसी दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में सुधार तथा संवाद बहाल करने की मांग को लेकर दोनों देशों की 117 हस्तियों द्वारा जारी खुले पत्र ने भी राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में चर्चा को गति दी है। हालांकि भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन के माध्यम से यह स्पष्ट संकेत दिया कि आतंकवाद के मुद्दे पर उसकी नीति में कोई बदलाव नहीं है और सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस तथा निष्पक्ष वैश्विक कार्रवाई उसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल रहेगी। भारत का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग, तकनीकी सतर्कता और आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति ही वैश्विक शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने का सबसे प्रभावी मार्ग है।