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  • चुनाव आयोग के समर्थन में 27 देशों के 400 से अधिक भारतवंशी, विपक्षी प्रदर्शनों पर जताई चिंता

    चुनाव आयोग के समर्थन में 27 देशों के 400 से अधिक भारतवंशी, विपक्षी प्रदर्शनों पर जताई चिंता

    नई दिल्ली । चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्षी दलों की ओर से किए जा रहे प्रदर्शनों के बीच दुनिया के 27 देशों में रहने वाले 400 से अधिक भारतीय मूल के छात्रों, शोधकर्ताओं और पूर्व विद्यार्थियों ने आयोग के समर्थन में संयुक्त बयान जारी किया है। ‘भारत को अराजकता से बचाएं’ शीर्षक वाले इस बयान में प्रदर्शन के तरीकों पर चिंता जताते हुए कहा गया है कि ऐसे कदम संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर कर सकते हैं। बयान पर हस्ताक्षर करने वालों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा के लिए संवैधानिक प्रक्रियाओं और संस्थाओं का सम्मान करने की आवश्यकता बताई है।

    संयुक्त बयान में बाबासाहब आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि लोकतंत्र में मतभेदों का समाधान संवैधानिक तरीकों से किया जाना चाहिए। हस्ताक्षरकर्ताओं ने सड़कों पर होने वाले अराजकतापूर्ण प्रदर्शनों की आलोचना की और कहा कि लोकतंत्र को बचाने के नाम पर ऐसी गतिविधियां नहीं होनी चाहिए, जिनसे संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर पड़े। उनके मुताबिक, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संस्थाओं पर भरोसा बनाए रखना देश के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।

    बयान में आरोप लगाया गया है कि भारतीय लोकतंत्र को लेकर संदेह पैदा करने की अनुचित कोशिश की जा रही है। इसमें अदालतों में विचाराधीन मामलों को इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किए जाने और फिर प्रदर्शनों के माध्यम से इस मुद्दे को आगे बढ़ाने पर आपत्ति जताई गई है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा का दावा करने वालों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके तरीके संवैधानिक शासन को नुकसान न पहुंचाएं। हालांकि, ये बातें बयान जारी करने वाले समूह के आरोप और विचार हैं।

    यह बयान ऐसे समय आया है, जब विपक्षी दल चुनाव आयोग के कामकाज और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं। विपक्षी नेताओं ने चुनावों में गड़बड़ी के आरोप लगाते हुए आयोग के खिलाफ प्रदर्शन किए हैं। इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी ने भी आयोग के विरोध में कई प्रदर्शन किए हैं। इन आंदोलनों की अगुवाई अभिजीत दीपके कर रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस सिलसिले में उन्हें दो बार हिरासत में भी लिया गया है।

    संयुक्त बयान में हस्ताक्षरकर्ताओं ने मौजूदा राजनीतिक माहौल पर दुख और हैरानी जताई है। उनका कहना है कि कुछ हलकों में चुनाव परिणामों को स्वीकार नहीं करने, संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार सवाल उठाने और संसद के बजाय सड़कों पर आंदोलन को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। बयान में कहा गया कि दुनिया के अलग-अलग देशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों के रूप में वे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसके भविष्य को लेकर चिंतित हैं।

    हस्ताक्षर करने वाले लोग अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, जापान और सिंगापुर समेत 27 देशों के विश्वविद्यालयों से जुड़े हैं। इनमें मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी), हार्वर्ड विश्वविद्यालय, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसे संस्थानों से जुड़े छात्र, शोधकर्ता और पूर्व विद्यार्थी शामिल हैं।

    बयान में एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया गया है कि हस्ताक्षरकर्ताओं का इन विश्वविद्यालयों से जुड़ा होना संबंधित संस्थानों की आधिकारिक सहमति या समर्थन का प्रमाण नहीं है। यानी यह बयान इसमें हस्ताक्षर करने वाले व्यक्तियों का सामूहिक रुख है, न कि इन विश्वविद्यालयों की ओर से जारी आधिकारिक वक्तव्य। इस तरह चुनाव आयोग के समर्थन में सामने आए इस बयान ने चुनाव प्रक्रिया, संवैधानिक संस्थाओं और विरोध प्रदर्शनों के तरीकों को लेकर जारी बहस में एक नया पक्ष सामने रखा है।

  • उच्च शिक्षा संस्थानों में बड़ा बदलाव, डिग्री प्रमाणपत्रों पर ‘India’ की जगह ‘Bharat’ लिखने का फैसला लागू

    उच्च शिक्षा संस्थानों में बड़ा बदलाव, डिग्री प्रमाणपत्रों पर ‘India’ की जगह ‘Bharat’ लिखने का फैसला लागू

    नई दिल्ली । देश के कई प्रमुख विश्वविद्यालयों ने शैक्षणिक दस्तावेजों में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए डिग्री, मार्कशीट और अन्य प्रमाणपत्रों पर ‘India’ शब्द के स्थान पर ‘Bharat’ का उपयोग करने का निर्णय लिया है। इस फैसले के बाद उच्च शिक्षा जगत में नई बहस शुरू हो गई है और इसे राष्ट्रीय पहचान तथा सांस्कृतिक विरासत से जोड़कर देखा जा रहा है।

    इस बदलाव का प्रभाव सबसे पहले विभिन्न विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोहों में दिखाई देगा, जहां विद्यार्थियों को प्रदान की जाने वाली नई डिग्रियों और प्रमाणपत्रों पर ‘भारत’ शब्द अंकित होगा। संबंधित विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि यह निर्णय संस्थागत प्रस्तावों और कार्यकारिणी परिषदों की स्वीकृति के बाद लिया गया है। इसके तहत हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा में तैयार किए जाने वाले दस्तावेजों में भी आवश्यक संशोधन किए जा रहे हैं।

    विश्वविद्यालयों का तर्क है कि देश का आधिकारिक और ऐतिहासिक नाम ‘भारत’ है, इसलिए शैक्षणिक दस्तावेजों में उसी नाम का प्रयोग अधिक उपयुक्त माना गया है। कुछ शिक्षाविदों और प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि इससे भारतीय पहचान और सांस्कृतिक परंपरा को और अधिक स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त किया जा सकेगा। इसी सोच के आधार पर कई संस्थानों ने अपने दस्तावेजों के प्रारूप में बदलाव की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

    बताया जा रहा है कि यह पहल केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र के कई विश्वविद्यालय भी इस दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं। विभिन्न संस्थानों ने अपने-अपने स्तर पर प्रस्ताव पारित कर नए प्रारूप को लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। कुछ विश्वविद्यालयों ने दावा किया है कि उन्होंने इस परिवर्तन को सबसे पहले अपनाने की पहल की थी और अब अन्य संस्थान भी उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

    इस निर्णय के समर्थन में यह तर्क भी दिया जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हाल के वर्षों में ‘भारत’ शब्द के उपयोग को अधिक प्रमुखता मिली है। समर्थकों का मानना है कि जब आधिकारिक और राजनयिक अवसरों पर ‘भारत’ का प्रयोग किया जा सकता है, तो शैक्षणिक दस्तावेजों में भी उसी नाम का उपयोग किया जाना स्वाभाविक है। उनका कहना है कि इससे देश की ऐतिहासिक पहचान और संवैधानिक भावना को मजबूती मिलेगी।

    हालांकि इस विषय पर अलग-अलग मत भी सामने आ रहे हैं। कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि ‘India’ और ‘Bharat’ दोनों ही नाम संवैधानिक रूप से मान्य हैं और लंबे समय से समान रूप से उपयोग में रहे हैं। ऐसे में किसी एक नाम को प्राथमिकता देने का निर्णय प्रशासनिक और संस्थागत नीति का विषय हो सकता है। वहीं कुछ विशेषज्ञ इसे सांस्कृतिक और भाषाई पहचान से जुड़ा स्वाभाविक परिवर्तन मान रहे हैं।

    उच्च शिक्षा क्षेत्र में यह बदलाव केवल शब्द परिवर्तन तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पहचान, परंपरा और प्रशासनिक दृष्टिकोण के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। आने वाले समय में यदि अधिक विश्वविद्यालय इस पहल को अपनाते हैं, तो देशभर के लाखों विद्यार्थियों को जारी होने वाले शैक्षणिक दस्तावेजों का स्वरूप भी बदलता नजर आ सकता है।

    फिलहाल कई विश्वविद्यालयों में नई डिग्रियों और प्रमाणपत्रों के प्रारूप तैयार किए जा रहे हैं। इसके साथ ही दीक्षांत समारोहों और आगामी शैक्षणिक सत्रों में जारी होने वाले दस्तावेजों पर ‘भारत’ शब्द के उपयोग को लेकर प्रक्रिया तेज हो गई है। यह बदलाव उच्च शिक्षा संस्थानों में चर्चा का महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है और इसके दूरगामी प्रभावों पर भी नजर रखी जा रही है।

  • MP: CM मोहन यादव की बड़ी घोषणा… विश्वविद्यालयों में शुरू किया जाएगा मंदिर प्रवंधन का कोर्स

    MP: CM मोहन यादव की बड़ी घोषणा… विश्वविद्यालयों में शुरू किया जाएगा मंदिर प्रवंधन का कोर्स


    भोपाल।
    एमपी (MP) के सीएम मोहन यादव (CM Mohan Yadav) ने घोषणा की है कि अब राज्य के विश्वविद्यालयों (Universities) में मंदिर प्रबंधन (Temple Management) को एक सब्जेक्ट के रूप में पढ़ाया जाएगा। इसका मकसद धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देकर राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है। इन पाठ्यक्रमों में मंदिरों की सुरक्षा, वित्तीय और प्रशासनिक व्यवस्था का प्रशिक्षण दिया जाएगा। उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय (Vikram University) ने डिप्लोमा और पीजी कोर्स शुरू भी कर दिए हैं।


    अकादमिक पाठ्यक्रम शुरू करने का निर्णय

    मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने रविवार को घोषणा की कि धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देकर अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए राज्य के विश्वविद्यालयों में मंदिर प्रबंधन को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाएगा। इंदौर में संवाददाताओं से बात करते हुए सीएम मोहन यादव ने कहा कि उन्होंने मंदिर प्रबंधन को यूनिवर्सिटी की पढ़ाई से जोड़ने और इस विषय पर अकादमिक पाठ्यक्रम शुरू करने का निर्णय लिया है।


    मंदिरों की वित्तीय और प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा की पढ़ाई

    सीएम मोहन यादव ने बताया कि इन पाठ्यक्रमों में धार्मिक पर्यटन के साथ ही मंदिरों की वित्तीय और प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा की पढ़ाई कराई जाएगी। उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय ने इस दिशा में पहल करते हुए मंदिर प्रबंधन विषय पर डिप्लोमा और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम शुरू किए हैं। इनके जरिए विद्यार्थियों को विद्वानों द्वारा सैद्धांतिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा।


    13 तीर्थस्थलों पर बनाए जा रहे धार्मिक गलियारे

    मोहन यादव ने कहा कि मंदिर हमेशा से हमारी आस्था और विश्वास के केंद्र रहे हैं। हम मंदिरों के सही प्रबंधन से अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। उज्जैन के महाकाल महालोक की तरह राज्य के 13 तीर्थस्थलों पर धार्मिक गलियारे बनाए जा रहे हैं। राज्य सरकार ने महाकाल महालोक परिसर से फाइबर की मूर्तियां हटाकर वहां पत्थर और धातु की प्रतिमाएं लगाने का फैसला किया है।


    उज्जैन में बनाई जा रही प्रतिमाएं

    मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बताया कि देश की प्राचीन स्थापत्य कला पर आधारित ये प्रतिमाएं उज्जैन में ही गढ़ी जा रही हैं। इससे स्थानीय लोगों को भी रोजगार मिल रहा है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने रविवार को एक अन्य कार्यक्रम में कहा कि मध्य प्रदेश दिव्यांग खेलों का प्रमुख केंद्र बन रहा है और यहां के खिलाड़ी दुनिया भर में नाम रोशन कर रहे हैं। सीएम भोपाल में राष्ट्रीय दिव्यांगजन क्रिकेट खेल महोत्सव के उद्घाटन समारोह में बोल रहे थे।