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  • UPI PIN डालते ही कैसे पहुंचते हैं दूसरे खाते में पैसे, जानें यूपीआई पेमेंट का पूरा तरीका..

    UPI PIN डालते ही कैसे पहुंचते हैं दूसरे खाते में पैसे, जानें यूपीआई पेमेंट का पूरा तरीका..

    नई दिल्ली । आज के डिजिटल दौर में पैसे भेजने और भुगतान करने के लिए यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। दुकानों पर खरीदारी करने, बिजली का बिल भरने, ऑनलाइन सामान खरीदने या किसी परिचित को रकम भेजने जैसे काम अब मोबाइल के जरिए कुछ ही सेकंड में पूरे हो जाते हैं। Google Pay, PhonePe, Paytm और BHIM जैसे ऐप के माध्यम से लोग सीधे अपने बैंक खाते से भुगतान कर सकते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यूपीआई पिन डालते ही एक खाते से पैसे कटकर दूसरे खाते में कैसे पहुंच जाते हैं? इसके पीछे बैंकिंग व्यवस्था और डिजिटल भुगतान नेटवर्क की एक निर्धारित प्रक्रिया काम करती है।

    यूपीआई एक डिजिटल भुगतान प्रणाली है, जिसे नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने विकसित किया है। इसकी मदद से दो बैंक खातों के बीच तुरंत धनराशि ट्रांसफर की जा सकती है। इस व्यवस्था में हर बार बैंक खाता संख्या या आईएफएससी कोड दर्ज करना जरूरी नहीं होता। उपयोगकर्ता यूपीआई आईडी, पंजीकृत मोबाइल नंबर या क्यूआर कोड के माध्यम से भी भुगतान कर सकते हैं। इससे लेनदेन की प्रक्रिया आसान और तेज हो जाती है।

    मान लीजिए कि आपको किसी दुकानदार को 500 रुपये देने हैं। इसके लिए आप अपने मोबाइल में यूपीआई ऐप खोलते हैं और दुकानदार का क्यूआर कोड स्कैन करते हैं। इसके बाद भुगतान की जाने वाली रकम दर्ज करके आगे बढ़ते हैं। लेनदेन को अधिकृत करने के लिए आपको अपना यूपीआई पिन डालना होता है। पिन दर्ज करने के बाद ऐप भुगतान का अनुरोध संबंधित बैंकिंग प्रणाली तक पहुंचाता है। इसके बाद यूपीआई नेटवर्क इस अनुरोध को लेनदेन में शामिल बैंकों के बीच आगे बढ़ाता है।

    सबसे पहले भुगतान करने वाले व्यक्ति का बैंक जरूरी जांच करता है। इसमें यूपीआई पिन का सत्यापन और खाते में उपलब्ध राशि की जांच शामिल होती है। यदि पिन सही है, खाते में पर्याप्त बैलेंस है और अन्य आवश्यक जांच पूरी हो जाती हैं, तो बैंक भुगतान को मंजूरी देकर खाते से 500 रुपये काट लेता है। यदि पिन गलत हो या खाते में पर्याप्त राशि उपलब्ध न हो, तो लेनदेन असफल हो सकता है।

    इसके बाद यूपीआई नेटवर्क प्राप्तकर्ता के बैंक तक भुगतान से जुड़ी जानकारी पहुंचाता है। प्राप्तकर्ता बैंक संबंधित खाते में निर्धारित रकम जमा कर देता है। इस तरह भुगतान करने वाले व्यक्ति के खाते से पैसे निकलकर दूसरे व्यक्ति के खाते में पहुंच जाते हैं। पूरी प्रक्रिया इलेक्ट्रॉनिक तरीके से होती है, इसलिए सामान्य परिस्थितियों में लेनदेन कुछ ही सेकंड में पूरा हो जाता है। हालांकि, ग्राहक के खाते में राशि दिखने और बैंकों के बीच लेनदेन का अंतिम निपटान होने की प्रक्रियाएं अलग-अलग हो सकती हैं।

    यूपीआई भुगतान में पिन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यह भुगतान करने वाले व्यक्ति की पहचान और लेनदेन को अधिकृत करने में मदद करता है। इसलिए अपना यूपीआई पिन किसी अन्य व्यक्ति के साथ साझा नहीं करना चाहिए। मोबाइल या यूपीआई ऐप तक किसी की पहुंच होने मात्र से वह सामान्य भुगतान पूरा नहीं कर सकता, लेकिन पिन साझा करने या धोखाधड़ी के कारण जोखिम बढ़ सकता है।

    सबसे जरूरी बात यह है कि यूपीआई पिन का इस्तेमाल पैसे भेजने या भुगतान करने के लिए किया जाता है, पैसे प्राप्त करने के लिए नहीं। यदि कोई व्यक्ति रकम भेजने के नाम पर आपसे पिन डालने को कहता है, तो सावधान रहें। अनजान भुगतान अनुरोधों को स्वीकार करने से पहले उनकी जांच करें और किसी भी स्थिति में अपना पिन या गोपनीय बैंकिंग जानकारी साझा न करें।

  • यूपीआई भुगतान पर एमडीआर शुल्क लगाने का फैसला दीपावली तक टला, दुकानदार फिर लगाएंगे क्यूआर कोड, ग्राहकों को मिलेगी राहत

    यूपीआई भुगतान पर एमडीआर शुल्क लगाने का फैसला दीपावली तक टला, दुकानदार फिर लगाएंगे क्यूआर कोड, ग्राहकों को मिलेगी राहत


    नई दिल्ली ।
    त्योहारी सीजन के बीच दुकानदारों को राहत मिली है। यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) शुल्क लागू करने का फैसला फिलहाल टाल दिया गया है। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाली थी, लेकिन अब इसे दीपावली के बाद तक स्थगित कर दिया गया है। नई तारीख को लेकर आगे निर्णय लिया जाएगा। इस फैसले से छोटे और बड़े कारोबारियों ने राहत की सांस ली है।
    यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगाए जाने की खबर सामने आने के बाद कई दुकानदारों की चिंता बढ़ गई थी। कारोबारियों को आशंका थी कि अतिरिक्त शुल्क लागू होने से उनके खर्च में बढ़ोतरी होगी और इसका असर कारोबार पर पड़ सकता है। इसी वजह से कुछ दुकानदार ग्राहकों से यूपीआई के जरिए भुगतान लेने से बचने लगे थे। कई दुकानों पर नकद भुगतान को प्राथमिकता दी जा रही थी, जबकि कुछ कारोबारियों ने अपनी दुकानों से यूपीआई क्यूआर कोड हटाने भी शुरू कर दिए थे।
    अब शुल्क लागू करने का फैसला स्थगित होने से दुकानदारों को राहत मिली है। कई कारोबारियों का कहना है कि वे दोबारा अपनी दुकानों पर क्यूआर कोड लगाएंगे, ताकि ग्राहक पहले की तरह डिजिटल माध्यम से भुगतान कर सकें। त्योहारी मौसम में खरीदारी बढ़ने के दौरान यूपीआई भुगतान की सुविधा कारोबारियों और ग्राहकों, दोनों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ऐसे में प्रस्तावित शुल्क पर रोक से दुकानदार फिलहाल अपने कारोबार पर ध्यान दे सकेंगे।
    प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क लगाए जाने की बात कही गई थी। हालांकि, अब इसकी समयसीमा आगे बढ़ा दी गई है। नई तारीख को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। कारोबारियों को आगे होने वाले फैसले का इंतजार है कि शुल्क व्यवस्था किस तारीख से लागू होगी या इस संबंध में क्या निर्णय लिया जाएगा।
    दिल्ली के लाजपत नगर में एक दुकानदार ने कहा कि यूपीआई लेनदेन को शुल्क-मुक्त रखने से कारोबारियों को काफी फायदा हुआ है। त्योहारों के दौरान ग्राहक बिना किसी झिझक के यूपीआई से भुगतान कर रहे हैं। इससे दुकानों पर ग्राहकों की आवाजाही बनी रहती है और कारोबार सामान्य रूप से चलता है। दुकानदार के मुताबिक, डिजिटल भुगतान की सुविधा ग्राहकों के लिए उपयोगी है और इससे खरीदारी के समय भुगतान करना आसान रहता है।
    दुकानदार ने इस फैसले को सकारात्मक बताया। हालांकि, उसने यह भी कहा कि आगे इस व्यवस्था को जारी रखने के संबंध में क्या निर्णय लिया जाता है, यह देखना होगा। शुल्क लगाने की नई तारीख तय होने के बाद ही स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
    कारोबारियों का कहना है कि यूपीआई देश में डिजिटल भुगतान का प्रमुख माध्यम बन चुका है। ऐसे में इस तरह के लेनदेन पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से छोटे दुकानदारों और ग्राहकों पर आर्थिक असर पड़ सकता है। फिलहाल फैसला टलने से दुकानदारों को राहत मिली है। अब वे त्योहारी सीजन में ग्राहकों को डिजिटल भुगतान की सुविधा देने और अपने कारोबार पर ध्यान केंद्रित करने की तैयारी कर रहे हैं।
  • UPI पेमेंट पर MDR चार्ज लगाने की समय सीमा बढ़ी, 1 जनवरी 2027 तक टली व्यवस्था से व्यापारियों को मिलेगी राहत

    UPI पेमेंट पर MDR चार्ज लगाने की समय सीमा बढ़ी, 1 जनवरी 2027 तक टली व्यवस्था से व्यापारियों को मिलेगी राहत

    नई दिल्ली । त्योहारी सीजन के दौरान डिजिटल भुगतान करने वाले व्यापारियों के लिए राहत की खबर है। यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) शुल्क लागू करने की समय सीमा आगे बढ़ा दी गई है। पहले इस व्यवस्था को 15 अक्टूबर से लागू किए जाने की बात सामने आई थी, लेकिन अब इसकी समय सीमा बढ़ाकर 1 जनवरी 2027 कर दी गई है। इस फैसले से देशभर के छोटे-बड़े दुकानदारों और कारोबारियों को अतिरिक्त समय मिल गया है। त्योहारी खरीदारी के बीच व्यापारियों की चिंताओं और नई व्यवस्था को लागू करने की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है।

    एमडीआर का पूरा नाम मर्चेंट डिस्काउंट रेट है। यह वह शुल्क होता है, जो किसी दुकानदार या कारोबारी से डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के बदले लिया जाता है। आमतौर पर यह रकम भुगतान सेवाएं उपलब्ध कराने वाले बैंकों, फिनटेक कंपनियों या भुगतान व्यवस्था से जुड़ी संस्थाओं को मिलती है। यूपीआई के जरिए भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारियों के लिए इस तरह के शुल्क की समय सीमा और दरें कारोबार की लागत को प्रभावित कर सकती हैं। इसी वजह से एमडीआर लागू करने की तारीख को लेकर व्यापारियों के बीच चिंता बनी हुई थी।

    हाल ही में 2,000 रुपये से अधिक के डिजिटल लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क तय किए जाने की बात सामने आई थी। इस व्यवस्था से भुगतान गेटवे और पेटीएम तथा मोबिक्विक जैसी कंपनियों को फायदा मिलने की उम्मीद जताई गई थी। शुल्क लागू होने की संभावित व्यवस्था को लेकर भुगतान सेवाओं से जुड़ी कंपनियों के राजस्व में बढ़ोतरी की संभावना भी चर्चा में रही। हालांकि, अब समय सीमा आगे बढ़ने के कारण व्यापारियों और संबंधित कंपनियों को नई व्यवस्था के लिए तैयारी करने का अधिक समय मिलेगा।

    समय सीमा बढ़ाने के पीछे व्यापारियों की ओर से उठाई गई चिंताओं को भी अहम माना गया है। कारोबारियों और मर्चेंट्स की मांग थी कि नई व्यवस्था को ठीक से समझने और लागू करने के लिए उन्हें कुछ और समय दिया जाए। त्योहारी सीजन को देखते हुए 15 अक्टूबर से इसे लागू करने के बजाय समय सीमा आगे बढ़ाने का फैसला लिया गया। इस दौरान दुकानदारों को अपने भुगतान से जुड़े कामकाज और व्यवस्था को समझने का अवसर मिलेगा। त्योहारी खरीदारी के समय डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल बढ़ने के बीच यह फैसला कारोबारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    समय सीमा बढ़ने से देशभर के लाखों छोटे-बड़े व्यापारियों को राहत मिलने की उम्मीद है। कई कारोबारी संभावित डिजिटल भुगतान शुल्क को लेकर चिंतित थे, क्योंकि इससे उनके कारोबार की लागत और मुनाफे पर असर पड़ सकता था। अब नई तारीख तक उन्हें इस व्यवस्था को समझने और उसके लिए तैयारी करने का अतिरिक्त समय मिलेगा। हालांकि, शुल्क लागू होने पर इसका वास्तविक असर कारोबार के आकार और भुगतान व्यवस्था के इस्तेमाल के तरीके पर निर्भर करेगा।

    इस फैसले का असर भुगतान सेवाएं देने वाली कंपनियों पर भी पड़ सकता है। जब पिछले महीने एमडीआर से जुड़ी व्यवस्था की घोषणा हुई थी, तब भुगतान गेटवे और फिनटेक कंपनियों के शेयरों में तेजी देखी गई थी। उस समय इन कंपनियों के राजस्व में बढ़ोतरी की उम्मीद जताई गई थी। अब शुल्क लागू करने की समय सीमा बढ़ने से इस व्यवस्था के प्रभाव को लेकर बाजार की उम्मीदों और व्यापारियों की तैयारियों के बीच अधिक समय मिल गया है। फिलहाल, एमडीआर से जुड़ी नई समय सीमा 1 जनवरी 2027 तय की गई है।

  • यूपीआई एमडीआर लागू करने की तारीख टली, दीपावली के तुरंत बाद चुनिंदा डिजिटल भुगतानों पर व्यापारियों से लिया जाएगा शुल्क

    यूपीआई एमडीआर लागू करने की तारीख टली, दीपावली के तुरंत बाद चुनिंदा डिजिटल भुगतानों पर व्यापारियों से लिया जाएगा शुल्क

    नई दिल्ली ।भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने प्रस्तावित यूपीआई मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) फ्रेमवर्क लागू करने का समय आगे बढ़ा दिया है। अब इसे दीपावली के तुरंत बाद लागू किया जाएगा। हालांकि, इसके लिए कोई निश्चित तारीख घोषित नहीं की गई है। एनपीसीआई ने मंगलवार, 13 अक्टूबर को जारी अधिसूचना में बताया कि यूपीआई और सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी ने त्योहारों के मौसम को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया है। लागू होने की तारीख की जानकारी अलग से दी जाएगी।

    यह निर्णय ऐसे समय में आया है, जब व्यापारी संगठनों, फिनटेक कंपनियों और भुगतान सेवाएं देने वाली कंपनियों ने फ्रेमवर्क लागू करने की तारीख आगे बढ़ाने की मांग की थी। इन संगठनों को आशंका थी कि त्योहारों के दौरान बिक्री अधिक रहने के बीच नए शुल्क की व्यवस्था लागू होने से कारोबार प्रभावित हो सकता है। इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए इसे दीपावली के बाद लागू करने का फैसला किया गया है।

    प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा पर्सन-टू-मर्चेंट (पी2एम) यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर की दर 0.4 प्रतिशत निर्धारित की गई है। यह दर पिछले महीने यूपीआई स्टीयरिंग कमेटी ने तय की थी। हालांकि, यह शुल्क सभी यूपीआई लेनदेन पर लागू नहीं होगा, बल्कि निर्धारित श्रेणी के व्यापारी भुगतानों तक सीमित रहेगा।

    एमडीआर वह शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान की प्रक्रिया पूरी करने के बदले व्यापारियों से लिया जाता है। निर्धारित दर के हिसाब से 2,000 रुपये के भुगतान पर 0.4 प्रतिशत की गणना करने पर 8 रुपये शुल्क बनता है। इसी तरह 10,000 रुपये के भुगतान पर यह राशि 40 रुपये होती है। यह गणना निर्धारित शुल्क दर के आधार पर है और वास्तविक लागू होने की शर्तें संबंधित व्यवस्था के अनुसार होंगी।

    सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि यूपीआई एमडीआर का भुगतान व्यापारियों को करना होगा। वे इस शुल्क को किसी भी तरीके से ग्राहकों पर नहीं डाल सकते। इसका अर्थ है कि निर्धारित व्यवस्था के तहत शुल्क की जिम्मेदारी व्यापारी की होगी और ग्राहकों से इसे अलग से वसूलने की अनुमति नहीं होगी।

    इस प्रस्ताव पर भुगतान क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच चर्चा भी हुई है। विश्व बैंक समूह के कार्यकारी निदेशक नीलकंठ मिश्रा ने इससे पहले कहा था कि यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर की अनुमति देना एक अधिकार प्रदान करने वाले नियम की तरह होगा। उनका मानना था कि भुगतान क्षेत्र में मौजूद प्रतिस्पर्धा के कारण शुल्क में बड़े स्तर पर बढ़ोतरी की आशंका कम है।

    मिश्रा ने कहा था कि बाजार में ऐसी कंपनियां भी रही हैं, जो एमडीआर शुल्क नहीं ले पाने के बावजूद अपना कारोबार जारी रखने और बाजार में बने रहने में सफल रहीं। उनके बयान का मुख्य आधार भुगतान क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा थी। फिलहाल एनपीसीआई ने फ्रेमवर्क लागू करने के लिए दीपावली के बाद का समय तय किया है, जबकि इसकी सटीक तारीख और लागू होने से जुड़ी विस्तृत जानकारी की घोषणा अभी बाकी है।

  • व्यापारी संगठनों ने नए UPI MDR फ्रेमवर्क को त्योहारी सीजन तक टालने की मांग की, बिक्री प्रभावित होने की जताई आशंका

    व्यापारी संगठनों ने नए UPI MDR फ्रेमवर्क को त्योहारी सीजन तक टालने की मांग की, बिक्री प्रभावित होने की जताई आशंका


    नई दिल्ली ।
    व्यापारी संगठनों ने 15 अक्टूबर से लागू होने वाले नए यूपीआई एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट फ्रेमवर्क को त्योहारी सीजन तक टालने की अपील की है। संगठनों ने भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) से इस प्रस्ताव को त्योहारी सीजन और अगले साल की शुरुआत तक लागू नहीं करने का अनुरोध किया है। व्यापारियों का कहना है कि यदि बदलाव तय समय पर लागू किया गया तो त्योहारी सीजन के दौरान उनकी बिक्री पर असर पड़ सकता है।

    नए एमडीआर फ्रेमवर्क के तहत 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर चुनिंदा व्यापारी श्रेणियों के लिए 5 रुपये का एक समान शुल्क लागू किया जाएगा। इसके अलावा 2,000 रुपये से अधिक के बड़े पर्सन-टू-मर्चेंट यानी पी2एम भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाया जाएगा। इस शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये निर्धारित की गई है।

    प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर व्यापारी संगठनों की मुख्य चिंता त्योहारी सीजन में लेनदेन और बिक्री पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर है। संगठनों ने इसी वजह से नए फ्रेमवर्क को कुछ समय के लिए टालने की अपील की है। उनका आग्रह है कि इसे त्योहारी खरीदारी की अवधि समाप्त होने और अगले साल की शुरुआत तक लागू न किया जाए।

    एनपीसीआई के अनुमान के अनुसार, प्रस्तावित बदलाव का असर मर्चेंट ट्रांजैक्शन के केवल 4 प्रतिशत हिस्से पर पड़ेगा। संस्था के मुताबिक 95 प्रतिशत से अधिक पर्सन-टू-मर्चेंट यूपीआई भुगतान इस एमडीआर फ्रेमवर्क के दायरे से बाहर रहेंगे। वहीं, पीयर-टू-पीयर यानी पी2पी मर्चेंट मॉडल का इस्तेमाल करने वाले छोटे व्यापारियों को जीरो एमडीआर की सुविधा पहले की तरह मिलती रहेगी।

    आम यूपीआई उपयोगकर्ताओं के लिए मुफ्त यूपीआई इस्तेमाल को लेकर किसी मासिक कोटे या सीमा का प्रावधान नहीं किया गया है। उपयोगकर्ता तय मुफ्त फ्रेमवर्क के तहत लेनदेन जारी रख सकेंगे और उन पर एमडीआर शुल्क नहीं लगाया जाएगा। इस तरह प्रस्तावित बदलाव का सीधा दायरा मुख्य रूप से कुछ विशेष व्यापारी श्रेणियों और निर्धारित भुगतान लेनदेन तक सीमित रहेगा।

    नए फ्रेमवर्क में छोटे व्यापारियों के बीच यूपीआई के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष फंड बनाने का भी प्रावधान है। इसके लिए कुल एमडीआर कलेक्शन का 5 प्रतिशत हिस्सा निर्धारित किया गया है। एमडीआर से मिलने वाली राशि को अलग-अलग कंपनियों के बीच वितरित किया जाएगा। इस राशि का इस्तेमाल यूपीआई के विस्तार, साइबर सुरक्षा और इनोवेशन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया जाएगा।

    इसके साथ ही एनपीसीआई ने बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि व्यापारी एमडीआर शुल्क का बोझ ग्राहकों पर न डालें। ऐसे में नए फ्रेमवर्क में शुल्क व्यवस्था के साथ व्यापारियों और ग्राहकों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर भी स्पष्ट प्रावधान रखे गए हैं। फिलहाल व्यापारी संगठन नए एमडीआर फ्रेमवर्क को लागू करने की तारीख आगे बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, ताकि त्योहारी अवधि के दौरान उनकी बिक्री पर संभावित असर से बचा जा सके।

  • बैंकों की 28 से 30 सितंबर तक तीन दिन की हड़ताल, ग्राहकों के लिए जारी हुई जरूरी बैंकिंग सलाह

    बैंकों की 28 से 30 सितंबर तक तीन दिन की हड़ताल, ग्राहकों के लिए जारी हुई जरूरी बैंकिंग सलाह

    नई दिल्ली ।देश में 28 से 30 सितंबर तक तीन दिन की प्रस्तावित बैंक हड़ताल के कारण बैंकिंग सेवाओं पर असर पड़ने की संभावना है। हड़ताल के मद्देनजर ग्राहकों को अपने जरूरी बैंकिंग काम पहले ही निपटाने की सलाह दी गई है। इस दौरान खास तौर पर बैंक शाखाओं में होने वाले काम प्रभावित हो सकते हैं।

    हड़ताल की तारीखों से पहले 26 सितंबर को सितंबर का चौथा शनिवार और 27 सितंबर को रविवार है। ऐसे में सामान्य बैंकिंग व्यवस्था के कारण शाखाओं से जुड़े काम पहले ही प्रभावित रहेंगे। इसके बाद 28 से 30 सितंबर तक प्रस्तावित हड़ताल होने से ग्राहकों को लगातार कई दिनों तक शाखा संबंधी काम के लिए इंतजार करना पड़ सकता है।

    इसी स्थिति को देखते हुए ग्राहकों को सलाह दी गई है कि वे हड़ताल शुरू होने से पहले अपने जरूरी लेनदेन और बैंक से जुड़े महत्वपूर्ण काम पूरे कर लें। इससे हड़ताल के दौरान शाखाओं में संभावित व्यवधान के कारण होने वाली परेशानी से बचा जा सकता है।

    ग्राहकों के लिए यह भी स्पष्ट किया गया है कि इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग और यूपीआई जैसी डिजिटल सेवाएं उपलब्ध रहेंगी। एटीएम और ग्राहक सेवा केंद्रों के जरिए मिलने वाली सुविधाओं का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा मोबाइल बैंकिंग एप्लीकेशन के माध्यम से उपलब्ध वित्तीय सेवाओं का उपयोग जारी रखा जा सकता है।

    इंटरनेट बैंकिंग के जरिए कई जरूरी वित्तीय काम घर बैठे किए जा सकते हैं। इसी तरह यूपीआई के माध्यम से भुगतान और धनराशि से जुड़े कई सामान्य लेनदेन किए जा सकते हैं। इसलिए हड़ताल की अवधि में ग्राहकों को जहां संभव हो, डिजिटल माध्यमों को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है।

    प्रस्तावित हड़ताल को लेकर बैंक कर्मचारियों की यूनियनों की ओर से कई मांगें रखी गई हैं। इनमें पांच दिन का कार्य सप्ताह लागू करना प्रमुख मांग है। फिलहाल बैंकों में रविवार के अलावा दूसरे और चौथे शनिवार को अवकाश रहता है। कर्मचारी सभी शनिवार को छुट्टी देने की व्यवस्था लागू करने की मांग कर रहे हैं।

    पांच दिन के कार्य सप्ताह को लेकर मार्च 2024 में हुए वेतन समझौते के दौरान सहमति बनी थी, लेकिन कर्मचारियों के अनुसार इसे अभी तक लागू नहीं किया गया है। इसके अलावा प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन यानी पीएलआई व्यवस्था को लेकर भी यूनियनों ने विरोध जताया है।

    कर्मचारी संगठनों का कहना है कि संशोधित पीएलआई व्यवस्था में बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों और निचले स्तर के कर्मचारियों के बीच प्रोत्साहन को लेकर अंतर है। कर्मचारियों के विरोध के बाद सितंबर 2026 में इस संशोधित व्यवस्था को फिलहाल रोक दिया गया है।

    ग्राहकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए 27 सितंबर, रविवार को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में सामान्य बैंकिंग कामकाज की अनुमति दी गई है। इस दौरान शाखाएं, कार्यालय, एटीएम से जुड़ी शाखाएं और करेंसी चेस्ट संचालित रहेंगे। इसका उद्देश्य लगातार कई दिनों तक बैंकिंग सेवाओं में संभावित व्यवधान को कम करना है।

    इससे पहले 11 सितंबर को बैंक यूनियनों की ओर से एक दिन की हड़ताल की गई थी। अब 28 से 30 सितंबर तक तीन दिन की देशव्यापी हड़ताल प्रस्तावित है। यूनियनों ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों का समाधान नहीं हुआ तो 26 अक्टूबर से देशव्यापी अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू की जा सकती है।

  • भारत के UPI ने रचा वैश्विक रिकॉर्ड, हर महीने 20 अरब से अधिक ट्रांजैक्शन प्रोसेस कर बना डिजिटल भुगतान का बेंचमार्क

    भारत के UPI ने रचा वैश्विक रिकॉर्ड, हर महीने 20 अरब से अधिक ट्रांजैक्शन प्रोसेस कर बना डिजिटल भुगतान का बेंचमार्क


    नई दिल्ली ।
    भारत का यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI रियल-टाइम डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में लगातार बड़े स्तर पर विस्तार कर रहा है। वर्तमान में यह डिजिटल पेमेंट नेटवर्क हर महीने 20 अरब से अधिक ट्रांजैक्शन प्रोसेस कर रहा है। इसके साथ ही भारत ने बड़े पैमाने पर डिजिटल भुगतान और वित्तीय समावेशन को एक साथ आगे बढ़ाने का उदाहरण पेश किया है।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का रियल-टाइम पेमेंट इकोसिस्टम डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की प्रमुख सफलताओं में शामिल है। UPI के विस्तार ने बड़ी संख्या में लोगों को डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जोड़ने में भूमिका निभाई है। इसके बावजूद डिजिटल लेनदेन की वृद्धि मजबूत बनी हुई है।

    रिपोर्ट में वैश्विक भुगतान उद्योग को लेकर भी अनुमान सामने रखा गया है। इसके अनुसार, वर्ष 2030 तक वैश्विक भुगतान उद्योग का राजस्व 2.6 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। हालांकि आने वाले वर्षों में इसकी वृद्धि दर पिछले पांच वर्षों की तुलना में कुछ धीमी रहने का अनुमान है। पिछले पांच वर्षों में यह वृद्धि करीब 7 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही, जबकि आगे लगभग 5 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि का अनुमान जताया गया है।

    भारत के डिजिटल भुगतान मॉडल को वित्तीय समावेशन और बड़े पैमाने पर उपयोग के बीच संतुलन बनाने वाले उदाहरण के तौर पर बताया गया है। UPI के जरिए करोड़ों लोगों को डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जोड़े जाने के साथ लेनदेन में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

    डिजिटल भुगतान के साथ क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। खास तौर पर ऑनलाइन भुगतान के क्षेत्र में क्रेडिट कार्ड उपयोग में तेजी देखी जा रही है। इससे बैंकों, फिनटेक कंपनियों और भुगतान सेवा प्रदाताओं के लिए नई मूल्यवर्धित सेवाएं विकसित करने के अवसर बन रहे हैं।

    डिजिटल भुगतान क्षेत्र का अगला चरण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एजेंटिक कॉमर्स से जुड़ा हुआ बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, भविष्य में एआई आधारित सिस्टम भुगतान प्रक्रिया को अधिक सहज, सुरक्षित और स्वचालित बनाने में मदद कर सकते हैं।

    एआई के बढ़ते इस्तेमाल का असर भुगतान और ट्रांजैक्शन बैंकिंग क्षेत्र पर भी पड़ रहा है। इससे कंपनियों को परिचालन लागत कम करने, उत्पादों में सुधार करने और पारंपरिक प्रक्रियाओं को स्वचालित करने में मदद मिल सकती है। ट्रेड फाइनेंस और भुगतान संचालन जैसी कागजी प्रक्रियाओं में भी तकनीक के इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ रही हैं।

    एजेंटिक कॉमर्स को लेकर बड़े व्यापारियों के रुख से भी इसकी बढ़ती अहमियत का संकेत मिलता है। सर्वेक्षण में शामिल 73 प्रतिशत बड़े व्यापारियों ने कहा कि बेहतर एजेंट-आधारित लेनदेन की सुविधा और समर्थन मिलने पर वे अपने भुगतान सेवा प्रदाता को बदलने पर विचार कर सकते हैं। इससे भुगतान कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा में एजेंटिक कॉमर्स की भूमिका बढ़ने के संकेत मिलते हैं।

    रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर भुगतान संप्रभुता के बढ़ते महत्व का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार, दुनिया के 137 देशों में फिलहाल चौबीसों घंटे इंस्टेंट पेमेंट सिस्टम उपलब्ध हैं। इससे वैश्विक भुगतान व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक विविध और व्यापक हो रही है।

    भारत का UPI इसी बदलते वैश्विक डिजिटल भुगतान परिदृश्य में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले रियल-टाइम भुगतान नेटवर्क के रूप में सामने आया है। हर महीने 20 अरब से अधिक ट्रांजैक्शन की प्रोसेसिंग इसके विस्तार और डिजिटल भुगतान के बढ़ते उपयोग को दर्शाती है।

  • यूपीआई पेमेंट पर एमडीआर को लेकर बड़ी सफाई, 96 प्रतिशत से ज्यादा ट्रांजैक्शन पर नहीं पड़ेगा शुल्क का असर

    यूपीआई पेमेंट पर एमडीआर को लेकर बड़ी सफाई, 96 प्रतिशत से ज्यादा ट्रांजैक्शन पर नहीं पड़ेगा शुल्क का असर

    नई दिल्ली ।यू पीआई भुगतान को लेकर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर और उस पर लगने वाले जीएसटी को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच स्थिति स्पष्ट की गई है। नई व्यवस्था के तहत छोटे व्यापारियों और कम राशि वाले अधिकांश यूपीआई भुगतान पर एमडीआर का बोझ नहीं पड़ेगा।

    जानकारी के अनुसार, 2,000 रुपये तक के सभी व्यक्ति-से-व्यापारी यानी पी2एम यूपीआई ट्रांजैक्शन पर पहले की तरह शून्य एमडीआर लागू रहेगा। ऐसे भुगतान पर एमडीआर नहीं होने के कारण उससे संबंधित जीएसटी का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2,000 रुपये तक के भुगतान यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शन वॉल्यूम का 96 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं। इसका मतलब है कि यूपीआई के माध्यम से होने वाले अधिकांश व्यापारी भुगतान एमडीआर और उससे जुड़े जीएसटी दायित्व से बाहर रहेंगे।

    छोटे व्यापारियों के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान भी रखा गया है। जिन व्यापारियों की मासिक यूपीआई प्राप्तियां एक लाख रुपये तक हैं, उन्हें एमडीआर का भुगतान नहीं करना होगा। इसलिए इस श्रेणी के व्यापारियों पर एमडीआर के संबंध में जीएसटी लगने का सवाल भी नहीं उठता।

    एमडीआर का उद्देश्य यूपीआई भुगतान व्यवस्था से जुड़े विभिन्न भागीदारों के बीच भुगतान प्रक्रिया की लागत को पूरा करना है। इसमें बैंक, भुगतान सेवा प्रदाता और यूपीआई एप प्रदाता जैसे भागीदार शामिल होते हैं। एमडीआर सरकार या यूपीआई व्यवस्था संचालित करने वाली संस्था द्वारा लगाया जाने वाला कोई कर नहीं है।

    नई व्यवस्था में 2,000 रुपये से अधिक के पी2एम यूपीआई ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू होगा। हालांकि, 75,000 रुपये या उससे अधिक के ट्रांजैक्शन के लिए एमडीआर की अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति ट्रांजैक्शन निर्धारित की गई है।

    कुछ आवश्यक और कम मार्जिन वाले क्षेत्रों के लिए अलग व्यवस्था रखी गई है। रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे क्षेत्रों में 2,000 रुपये से अधिक के ट्रांजैक्शन पर पांच रुपये प्रति ट्रांजैक्शन का फ्लैट एमडीआर लागू होगा। इसका उद्देश्य इन क्षेत्रों में भुगतान लागत को सीमित और पूर्वानुमेय रखना है।

    एमडीआर पर जीएसटी को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई है। यदि किसी व्यापारी को एमडीआर पर जीएसटी का भुगतान करना पड़ता है, तो वह अन्य इनपुट टैक्स की तरह इस राशि को अपनी जीएसटी देनदारी के विरुद्ध समायोजित कर सकता है। ऐसे में यह राशि सीधे तौर पर व्यापारी की अंतिम लागत नहीं बनती।

    दूसरी ओर, व्यक्ति-से-व्यक्ति यानी पी2पी यूपीआई भुगतान पहले की तरह पूरी तरह मुफ्त रहेंगे। इसमें भुगतान की राशि कितनी भी हो, पी2पी ट्रांजैक्शन पर एमडीआर लागू नहीं होगा।

    इस व्यवस्था का असर मुख्य रूप से 2,000 रुपये से अधिक के कुछ पी2एम भुगतान पर पड़ेगा। वहीं कम राशि वाले भुगतान और एक लाख रुपये तक की मासिक यूपीआई प्राप्ति वाले छोटे व्यापारी इससे बाहर रहेंगे।

    कुल मिलाकर, यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शन के बड़े हिस्से पर शून्य एमडीआर की व्यवस्था जारी रहेगी। 96 प्रतिशत से अधिक मर्चेंट ट्रांजैक्शन 2,000 रुपये तक के होने के कारण अधिकांश डिजिटल भुगतान इस शुल्क व्यवस्था के दायरे में नहीं आएंगे।

  • UPI के लिए टिकाऊ राजस्व मॉडल की सिफारिश वाली संसदीय रिपोर्ट पर कांग्रेस के पांच सांसदों की मौजूदगी फिर चर्चा में

    UPI के लिए टिकाऊ राजस्व मॉडल की सिफारिश वाली संसदीय रिपोर्ट पर कांग्रेस के पांच सांसदों की मौजूदगी फिर चर्चा में

    नई दिल्ली ।UPI यानी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस पर प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा UPI मर्चेंट भुगतान पर लागू होने वाले 0.4 प्रतिशत MDR को ‘मोदी टैक्स’ बताते हुए इसका विरोध किया है। इसी बीच संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की 12 अगस्त को पेश रिपोर्ट चर्चा में आ गई है। इस रिपोर्ट में UPI के लिए टिकाऊ और स्तर आधारित राजस्व व्यवस्था की जरूरत बताई गई थी।

    समिति में कांग्रेस के पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ शामिल थे। रिपोर्ट को भाजपा सांसद भर्तृहरि महताब की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनाया था। प्रकाशित कार्यवाही में रिपोर्ट को लेकर किसी तरह की असहमति दर्ज नहीं की गई थी। समिति ने UPI के लिए टियर आधारित MDR या राजस्व व्यवस्था को जल्द अधिसूचित कर लागू करने की जरूरत बताई थी।

    रिपोर्ट में UPI इकोसिस्टम की वित्तीय स्थिरता का मुद्दा उठाया गया था। समिति के अनुसार, डिजिटल भुगतान का विस्तार होने के साथ उसके बुनियादी ढांचे, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने और तकनीकी व्यवस्था पर खर्च भी बढ़ता है। ऐसे में केवल सरकारी प्रोत्साहन राशि के सहारे लंबे समय तक UPI व्यवस्था को संचालित करना वित्तीय रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसी वजह से एक व्यवहारिक और टिकाऊ राजस्व मॉडल की जरूरत बताई गई थी।

    समिति ने 2026-27 के बजट में UPI और RuPay पर जीरो-MDR नीति से जुड़ी लागत की भरपाई के लिए 2,000 करोड़ रुपये के प्रावधान का भी उल्लेख किया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि UPI पर लेनदेन की संख्या लगातार बढ़ रही है और बड़ी संख्या में नए उपयोगकर्ता डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जुड़ रहे हैं। इसके बावजूद मौजूदा सरकारी प्रोत्साहन राशि उद्योग की वास्तविक लागत का सीमित हिस्सा ही पूरा करती है।

    वर्तमान विवाद प्रस्तावित 0.4 प्रतिशत MDR को लेकर है। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा UPI मर्चेंट लेनदेन पर लागू होनी है। 2,000 रुपये तक के मर्चेंट भुगतान पर कोई MDR नहीं लगेगा। व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P UPI लेनदेन भी पहले की तरह मुफ्त रहेंगे। छोटे कारोबारियों के लिए जीरो-MDR व्यवस्था के तहत आने वाले लेनदेन पर भी शुल्क नहीं लगेगा।

    MDR को लेकर यह भी स्पष्ट किया गया है कि इसे सरकार की ओर से लगाया गया टैक्स नहीं माना गया है। यह भुगतान व्यवस्था से जुड़े पक्षों के बीच निर्धारित ढांचे के तहत लागू होने वाला शुल्क है। इससे प्राप्त राशि बैंकों और भुगतान सेवा से जुड़े अन्य हिस्सेदारों के बीच वितरित की जाएगी।

    राहुल गांधी ने नए MDR ढांचे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने इसे ‘मोदी टैक्स’ बताते हुए व्यवस्था वापस लेने की मांग की। उन्होंने सरकार पर बाहरी दबाव में निर्णय लेने का आरोप भी लगाया। दूसरी ओर, सरकार की ओर से कहा गया है कि MDR को टैक्स के रूप में देखना सही नहीं है और नई व्यवस्था UPI भुगतान इकोसिस्टम की वित्तीय जरूरतों से जुड़ी है।

    ऐसे में वर्तमान राजनीतिक बहस में एक तरफ प्रस्तावित MDR का विरोध है, जबकि दूसरी तरफ UPI के लिए टिकाऊ राजस्व व्यवस्था की जरूरत से जुड़ा तर्क है। वित्त संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट में इसी तरह के राजस्व मॉडल की आवश्यकता पर जोर दिया गया था। UPI शुल्क व्यवस्था में बदलाव के बाद डिजिटल भुगतान की लागत, कारोबारियों पर प्रभाव और भुगतान व्यवस्था की वित्तीय स्थिरता को लेकर चर्चा जारी है।

  • सीआईआई अध्यक्ष आर. मुकुंदन ने कहा, पीएम मोदी के नेतृत्व में औपचारिकीकरण, वित्तीय समावेशन और डिजिटलाइजेशन को बढ़ावा मिला

    सीआईआई अध्यक्ष आर. मुकुंदन ने कहा, पीएम मोदी के नेतृत्व में औपचारिकीकरण, वित्तीय समावेशन और डिजिटलाइजेशन को बढ़ावा मिला

    नई दिल्ली ।सीआईआई अध्यक्ष आर. मुकुंदन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके 76वें जन्मदिन पर बधाई देते हुए उनके नेतृत्व में भारतीय अर्थव्यवस्था में हुए बदलावों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में अर्थव्यवस्था के औपचारिकीकरण, वित्तीय समावेशन और डिजिटलाइजेशन को बढ़ावा मिला है। मुकुंदन ने प्रधानमंत्री के सार्वजनिक जीवन में 25 वर्ष पूरे होने पर भी उन्हें बधाई दी।

    मुकुंदन ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। उनके अनुसार, औपचारिकीकरण, समावेशन और डिजिटलाइजेशन प्रधानमंत्री के कार्यकाल की उपलब्धियों के तीन प्रमुख स्तंभ रहे हैं। उन्होंने इन तीनों क्षेत्रों में उठाए गए कदमों को अर्थव्यवस्था में बदलाव से जोड़ते हुए अपनी बात रखी।

    अर्थव्यवस्था के औपचारिकीकरण की चर्चा करते हुए मुकुंदन ने वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी के क्रियान्वयन को महत्वपूर्ण कदम बताया। उनके अनुसार, जीएसटी ने अर्थव्यवस्था के औपचारिकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने इसे आर्थिक व्यवस्था में बदलाव लाने वाले प्रमुख कदमों में शामिल किया।

    वित्तीय समावेशन के संदर्भ में उन्होंने जन धन-आधार-मोबाइल यानी जेएएम ढांचे का उल्लेख किया। मुकुंदन के मुताबिक, जेएएम ढांचा वित्तीय समावेशन का एक प्रमुख माध्यम रहा है। इसके जरिए वित्तीय व्यवस्था से जुड़ाव बढ़ाने की दिशा में काम हुआ है।

    डिजिटलाइजेशन के क्षेत्र में मुकुंदन ने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने यूपीआई को भारत के डिजिटलाइजेशन अभियान का एक अहम हिस्सा बताया और इसे डिजिटल आर्थिक गतिविधियों से जोड़कर देखा।

    मुकुंदन ने आगे कहा कि अब देश में ध्यान केवल कारोबार करने में आसानी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उनके अनुसार, फोकस आम नागरिक के लिए जीवन जीने में आसानी, जीवन-यापन की लागत और जीवन की गति को बेहतर बनाने पर होना चाहिए। उन्होंने इसे भविष्य के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के रूप में सामने रखा।

    उन्होंने कहा कि अब ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ से आगे बढ़कर ‘ईज ऑफ लिविंग’, ‘कॉस्ट ऑफ लिविंग’ और ‘स्पीड ऑफ लिविंग’ पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, आर्थिक विकास का असर आम नागरिक के जीवन में भी दिखाई देना चाहिए और नीतिगत प्राथमिकताओं में लोगों के दैनिक जीवन से जुड़े पहलुओं को महत्व मिलना चाहिए।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अपनी शुभकामनाएं व्यक्त करते हुए मुकुंदन ने कहा कि उन्हें देश और उसके लोगों के लिए ऊंची आकांक्षाएं तय करना जारी रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक नेता के रूप में प्रधानमंत्री को पूरे देश और समाज से ऊंची आकांक्षाएं रखने की जरूरत है।

    मुकुंदन के अनुसार, ऐसी आकांक्षाएं भारत को अपने लक्ष्यों को पूरा करने में मदद कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि देश में विकास के लिए सकारात्मक माहौल तैयार हो रहा है। ऐसे समय में ऊंचे लक्ष्य तय करना और उन्हें हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ना महत्वपूर्ण है।

    मुकुंदन ने प्रधानमंत्री के नेतृत्व और आर्थिक बदलावों का उल्लेख करते हुए औपचारिकीकरण, वित्तीय समावेशन और डिजिटलाइजेशन को भारतीय अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में रेखांकित किया। साथ ही उन्होंने भविष्य की प्राथमिकताओं में आम नागरिक के जीवन से जुड़े मुद्दों को केंद्र में रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।