Tag: US diplomacy

  • ईरान तनाव के बीच अमेरिका की कूटनीति तेज भारत, कनाडा केन्या से अहम बातचीत

    ईरान तनाव के बीच अमेरिका की कूटनीति तेज भारत, कनाडा केन्या से अहम बातचीत


    नई दिल्ली:मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच मार्को रुबियो के नेतृत्व में अमेरिका ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता तेज कर दी है। इस क्रम में उन्होंने भारत कनाडा और केन्या के शीर्ष नेताओं से बातचीत कर ईरान और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर विचार साझा किए।

    भारत के साथ हुई बातचीत में एस जयशंकर के साथ मध्य पूर्व की मौजूदा स्थिति और बदलते हालात पर चर्चा की गई। दोनों देशों ने आपसी रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जताई। यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है और वैश्विक स्थिरता को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।

    कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद के साथ बातचीत में ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उस पर अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। अमेरिका ने इस दौरान वैश्विक सुरक्षा और परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने पर जोर दिया। साथ ही हैती में शांति बहाली के प्रयासों और वहां की स्थिति पर भी विचार साझा किए गए।

    केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो के साथ हुई बातचीत में अमेरिका ने ईरान के मुद्दे पर केन्या के रुख की सराहना की। दोनों नेताओं ने खाड़ी देशों के खिलाफ ईरान की गतिविधियों की निंदा पर चर्चा की और क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखने के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। इस दौरान अमेरिका ने हैती में शांति स्थापित करने के लिए केन्या के योगदान की भी सराहना की।

    अमेरिका की यह पहल इस बात का संकेत है कि वह अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का समाधान ढूंढने की दिशा में काम कर रहा है। एशिया अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका के प्रमुख साझेदार देशों के साथ संवाद बढ़ाकर अमेरिका अपनी कूटनीतिक पकड़ को और मजबूत करना चाहता है।

    यह कूटनीतिक सक्रियता दर्शाती है कि अमेरिका ईरान और मध्य पूर्व के मुद्दों को लेकर बेहद गंभीर है और वह अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर एक संयुक्त रणनीति के तहत आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है।

  • अमेरिकी दस्तावेजों से खुलासा: ऑपरेशन सिंदूर को रोकने के लिए पाकिस्तान ने अमेरिका में की 60 बार लॉबिंग

    अमेरिकी दस्तावेजों से खुलासा: ऑपरेशन सिंदूर को रोकने के लिए पाकिस्तान ने अमेरिका में की 60 बार लॉबिंग


    नई दिल्ली । पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की संभावित सैन्य कार्रवाई ऑपरेशन सिंदूर से पाकिस्तान की बेचैनी अमेरिकी दस्तावेजों में उजागर हुई है। FARA के तहत दाखिल रिकॉर्ड बताते हैं कि पाकिस्तान ने भारत के सैन्य अभियान को रोकने के लिए अमेरिका में बड़े स्तर पर कूटनीतिक और राजनीतिक लॉबिंग की। इस दौरान पाकिस्तानी राजनयिकों और लॉबिंग फर्मों ने अमेरिकी प्रशासन सांसदों पेंटागन और विदेश विभाग के अधिकारियों से करीब 60 बार संपर्क किया।दस्तावेजों के मुताबिक यह अभियान अप्रैल के अंतिम सप्ताह से शुरू होकर भारत के चार दिवसीय सैन्य अभियान के बाद तक जारी रहा। पाकिस्तान का उद्देश्य स्पष्ट था-वॉशिंगटन के जरिए भारत पर दबाव बनाना ताकि किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई को रोका जा सके। इसके लिए ईमेल फोन कॉल और आमने-सामने की बैठकों का सहारा लिया गया।

    लॉबिंग पर करोड़ों का खर्च

    FARA रिकॉर्ड के अनुसार पाकिस्तान ने अमेरिका में छह लॉबिंग फर्मों की सेवाएं लीं और इस पर करीब 45 करोड़ रुपये खर्च किए। रिपोर्ट में कहा गया है कि अप्रैल और मई के दौरान पाकिस्तान का लॉबिंग खर्च भारत की तुलना में कहीं अधिक रहा। पाकिस्तान ने अमेरिकी प्रशासन तक अपनी पहुंच बढ़ाने और व्यापार एवं कूटनीतिक फैसलों को प्रभावित करने की कोशिश की।सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान ने भारत की सैन्य तैयारी को क्षेत्रीय अस्थिरता के रूप में पेश किया और अमेरिका से हस्तक्षेप की मांग की। हालांकि इन लॉबिंग प्रयासों का भारत की रणनीति पर कोई असर नहीं पड़ा। भारत ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को प्राथमिकता देते हुए कदम उठाए।

    भारत का रुख स्पष्ट

    भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका में लॉबिंग एक कानूनी और स्थापित प्रक्रिया है। विदेशी सरकारें दूतावास निजी कंपनियां और व्यावसायिक संगठन लॉबिंग फर्मों के माध्यम से अपनी बात रखते हैं। भारत का दूतावास भी दशकों से जरूरत के अनुसार ऐसी सेवाओं का इस्तेमाल करता रहा है। मंत्रालय ने यह भी बताया कि FARA के तहत सभी लॉबिंग गतिविधियों का रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और इसे गुप्त या असामान्य गतिविधि नहीं माना जाना चाहिए।

    रणनीतिक संदेश और आगे की तस्वीर

    विशेषज्ञों के अनुसार पाकिस्तान की आक्रामक लॉबिंग यह दर्शाती है कि वह भारत की सैन्य क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति को लेकर गंभीर दबाव में था। इसके बावजूद भारत ने किसी भी दबाव में समझौता नहीं किया। अमेरिकी दस्तावेजों से यह भी स्पष्ट हुआ कि आतंकवाद और सुरक्षा मामलों में भारत का रुख अब पहले से अधिक सख्त और निर्णायक है।