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  • डॉल्फिन से समुद्री जंग? ईरान की ‘सीक्रेट अंडरवॉटर स्ट्रैटेजी’ के दावों से बढ़ी हलचल

    डॉल्फिन से समुद्री जंग? ईरान की ‘सीक्रेट अंडरवॉटर स्ट्रैटेजी’ के दावों से बढ़ी हलचल


    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक चौंकाने वाला दावा सामने आया है कि ईरान समुद्र के अंदर बारूदी सुरंगें बिछाने और दुश्मन जहाजों को निशाना बनाने के लिए प्रशिक्षित डॉल्फिन का इस्तेमाल कर सकता है। यह दावा ऐसे समय में किया गया है जब होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों में से एक बना हुआ है और यहां किसी भी सैन्य गतिविधि का वैश्विक असर पड़ सकता है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस कथित रणनीति में डॉल्फिन को विस्फोटकों या माइंस से लैस कर दुश्मन के जहाजों के पास भेजा जा सकता है। हालांकि, इस तरह के दावों की पुष्टि अब तक स्वतंत्र रूप से नहीं हुई है और कई विशेषज्ञ इसे सूचना युद्ध (Information Warfare) का हिस्सा भी मान रहे हैं। सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि वास्तविक युद्ध में इस तरह के प्रयोग बेहद जटिल और जोखिम भरे होते हैं।

    इतिहास बताता है कि समुद्री जीवों का सैन्य उपयोग पूरी तरह नया नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ जैसे देशों ने अतीत में डॉल्फिन और सी-लायन को माइन डिटेक्शन और अंडरवॉटर मिशन के लिए ट्रेन किया था। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने भी साल 2000 के आसपास ऐसे प्रशिक्षित समुद्री जीव हासिल किए थे, लेकिन वर्तमान में उनकी वास्तविक क्षमता और तैनाती को लेकर कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं है।

    दूसरी ओर, होर्मुज जलडमरूमध्य में खतरे का बड़ा कारण अभी भी पानी के ऊपर होने वाले हमले और जहाजों की सुरक्षा है, न कि समुद्र के नीचे बिछाई गई माइंस। अमेरिकी अधिकारियों के बयान भी इस मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं कुछ इसे बड़ा खतरा मानते हैं, तो कुछ इसे सीमित जोखिम बताते हैं। हालांकि डोनाल्ड ट्रंप पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगर ईरान किसी भी तरह की माइन बिछाने की कोशिश करता है, तो उसे तुरंत नष्ट कर दिया जाएगा।

    रणनीतिक रूप से देखा जाए तो होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल सप्लाई का अहम रास्ता है, और यहां किसी भी तरह का अवरोध या संघर्ष पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकता है। ऐसे में डॉल्फिन जैसे असामान्य हथियारों की चर्चा भले ही सुर्खियां बना रही हो, लेकिन असली चिंता अब भी पारंपरिक सैन्य टकराव और समुद्री सुरक्षा को लेकर ही है।

  • कच्चे तेल की तेजी से शेयर बाजार दबाव में, बैंकिंग शेयरों में भारी बिकवाली

    कच्चे तेल की तेजी से शेयर बाजार दबाव में, बैंकिंग शेयरों में भारी बिकवाली


    नई दिल्ली| कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमतों और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय शेयर बाजार मंगलवार को कमजोरी के साथ खुला। शुरुआती कारोबार में निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया, जिसका असर सीधे प्रमुख सूचकांकों पर दिखाई दिया।

    सुबह 9:17 बजे तक सेंसेक्स करीब 203 अंक गिरकर 77,099 के स्तर पर कारोबार कर रहा था, जबकि निफ्टी लगभग 50 अंक टूटकर 24,042 पर पहुंच गया। बाजार में शुरुआती गिरावट का मुख्य कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक तनाव को माना जा रहा है।

    सेक्टोरल फ्रंट पर बैंकिंग शेयरों में सबसे ज्यादा बिकवाली देखने को मिली। Nifty Bank Index में आधा प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा फाइनेंशियल सर्विसेज, फार्मा, हेल्थकेयर और सर्विस सेक्टर भी लाल निशान में रहे।

    हालांकि कुछ सेक्टरों में मजबूती भी देखी गई। एनर्जी, मेटल, इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑटो और डिफेंस सेक्टर में खरीदारी का रुझान बना रहा। मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए हरे निशान में कारोबार किया, जिससे व्यापक बाजार में कुछ संतुलन देखने को मिला।

    एशियाई बाजारों में भी मिला-जुला रुख रहा। टोक्यो, शंघाई और हांगकांग के बाजार कमजोर रहे, जबकि बैंकॉक और सोल में हल्की तेजी देखी गई। वहीं अमेरिकी बाजारों में सोमवार को डाओ जोन्स में गिरावट और नैस्डैक में हल्की तेजी दर्ज की गई।

    बाजार पर सबसे बड़ा दबाव कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल से आया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड करीब 109 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई क्रूड लगभग 97 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह तेजी मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव का परिणाम है, खासकर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती अनिश्चितता के कारण। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के शांति प्रस्ताव पर अमेरिका की असहमति ने भी बाजारों में अस्थिरता बढ़ाई है, जिससे ऊर्जा कीमतों में तेजी आई है।

    जब तक कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक तनाव में स्थिरता नहीं आती, तब तक शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बने रहने की संभावना जताई जा रही है।

  • सीजफायर की डेडलाइन नजदीक, अमेरिका-ईरान के बीच 24 घंटे में तय होगा जंग या बातचीत का रास्ता

    सीजफायर की डेडलाइन नजदीक, अमेरिका-ईरान के बीच 24 घंटे में तय होगा जंग या बातचीत का रास्ता

    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच लागू सीजफायर 22 अप्रैल को खत्म होने जा रहा है, और ऐसे में दोनों देशों के लिए आने वाले 24 घंटे बेहद अहम माने जा रहे हैं। इस दौरान यह साफ हो सकता है कि हालात युद्ध की ओर बढ़ेंगे या कूटनीतिक बातचीत से समाधान निकलेगा।

    अमेरिका की ओर से बातचीत के लिए डेलिगेशन के पाकिस्तान जाने को लेकर स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है। सोमवार को खबरें आई थीं कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल जल्द इस्लामाबाद पहुंच सकता है, लेकिन बाद में ये खबरें गलत साबित हुईं। सीजफायर की समयसीमा खत्म होने से पहले अगर दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बनती है, तो एक बार फिर संघर्ष शुरू होने की आशंका है। फिलहाल यह भी तय नहीं है कि इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच कोई बैठक होगी या नहीं।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, जेडी वेंस मंगलवार को पाकिस्तान के लिए रवाना हो सकते हैं। वहीं Bloomberg से बातचीत में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि सीजफायर अमेरिकी समयानुसार बुधवार रात 8 बजे तक लागू रहेगा। इस हिसाब से दोनों देशों के पास गुरुवार सुबह तक निर्णय लेने का समय होगा।

    दूसरी ओर, ईरान ने साफ किया है कि उसकी कोई भी आधिकारिक या अनौपचारिक टीम बातचीत के लिए पाकिस्तान नहीं गई है। सरकारी मीडिया के अनुसार, इस तरह की सभी खबरें गलत हैं। ईरान का कहना है कि वह धमकियों के माहौल में बातचीत नहीं करेगा और जब तक अमेरिका अपना रुख नहीं बदलता, तब तक वार्ता आगे नहीं बढ़ेगी।

    बातचीत में अड़चन क्यों?
    ईरान के बातचीत से पीछे हटने के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। The New York Times की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप की आक्रामक और दबाव वाली रणनीति ने हालात को जटिल बना दिया है। ट्रंप अक्सर सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर बड़े दावे करते हैं, जिनका ईरान खंडन कर देता है।
    ईरान के बातचीत से पीछे हटने के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। The New York Times की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप की आक्रामक और दबाव वाली रणनीति ने हालात को जटिल बना दिया है। ट्रंप अक्सर सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर बड़े दावे करते हैं, जिनका ईरान खंडन कर देता है।

    ट्रंप जहां तेजी से समझौता करना चाहते हैं, वहीं ईरान धैर्य के साथ लंबी रणनीति अपनाए हुए है। ट्रंप का दावा है कि वह ईरान के साथ बराक ओबामा से बेहतर परमाणु समझौता करेंगे, लेकिन ईरान का कहना है कि अमेरिका भरोसेमंद नहीं है, क्योंकि एक सरकार समझौता करती है और दूसरी उसे तोड़ देती है।

    ईरान की चेतावनी
    ईरान के संसद स्पीकर मोहम्मद बाघेर गलिबाफ ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि युद्ध फिर से शुरू होता है, तो ईरान नए तरीकों से जवाब देगा। उन्होंने संकेत दिया कि युद्धविराम के दौरान ईरान ने अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत किया है, जिसमें मिसाइल और ड्रोन क्षमता भी शामिल है। ईरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन किसी भी तरह के दबाव या थोपे गए शर्तों को स्वीकार नहीं करेगा। अब नजर इस बात पर है कि सीजफायर खत्म होने के बाद हालात टकराव की ओर बढ़ते हैं या कूटनीति से कोई रास्ता निकलता है।

  • होर्मुज पर ट्रंप का बड़ा बयान, बोले- अब टोल वसूलने का अधिकार हमारा, ईरान पर जीत का किया दावा

    होर्मुज पर ट्रंप का बड़ा बयान, बोले- अब टोल वसूलने का अधिकार हमारा, ईरान पर जीत का किया दावा

    नई दिल्ली। होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से तेल की आवाजाही को लेकर जारी तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर अमेरिका की जीत का दावा करते हुए कहा कि अब टोल वसूलने का अधिकार भी उनके पास है। उन्होंने वाइट हाउस में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि जब अमेरिका विजेता है, तो होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलने का अधिकार भी उनके पास है।

    ट्रंप ने कहा कि उन्हें ईरान से कई संदेश मिले हैं, जिनसे पता चला कि वहां की जनता अपनी सरकार के खिलाफ और अधिक हमलों की मांग कर रही है। जब उनसे पूछा गया कि इन हमलों का आम ईरानी नागरिकों पर क्या असर पड़ेगा, तो उन्होंने दावा किया कि ईरानी लोग अपनी आजादी पाने के लिए तकलीफ उठाने को तैयार हैं।

    ट्रंप की चेतावनी
    उन्होंने ईरान के बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की योजना का बचाव करते हुए कहा कि हर फैसला सोच-समझकर लिया गया है। ट्रंप ने साफ किया कि यदि समझौता नहीं हुआ, तो ईरान के कोई पुल या पावर प्लांट सुरक्षित नहीं रहेंगे और देश पूरी तरह तबाह हो जाएगा। उन्होंने अपने सख्त समय-सीमा की बात भी दोहराई, जिसमें कहा कि मंगलवार रात 8 बजे (भारतीय समयानुसार बुधवार सुबह 1 बजे) तक कोई रियायत नहीं दी जाएगी।

    ट्रंप ने रखी शर्त
    ट्रंप ने शर्त रखी कि वे केवल ऐसे समझौते को मंजूर करेंगे जिसमें तेल की बिना रोक-टोक आवाजाही सुनिश्चित हो। होर्मुज जलडमरूमध्य के विवाद पर उन्होंने नया बयान देते हुए कहा कि ईरान जहाजों से टोल नहीं वसूल सकता। ट्रंप ने स्पष्ट किया, “जीत हमारी है, वे सैन्य रूप से हार चुके हैं।” उन्होंने दोहराया कि अमेरिका ने इस संघर्ष को जीत लिया है और अब शर्तें उनके अनुसार तय होंगी।

    पूर्व ईरानी विदेश मंत्री की प्रतिक्रिया
    पूर्व ईरानी विदेश मंत्री ने इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्रंप को मूर्ख राष्ट्रपति बताया और चेताया कि अरब देशों के शासकों को अमेरिकी हस्तक्षेप से बचाव करना चाहिए, ताकि पूरे क्षेत्र को अंधेरे में डूबने से रोका जा सके।

    गौरतलब है कि होर्मुज का मार्ग दुनिया के 20 प्रतिशत कच्चे तेल के आयात-निर्यात के लिए महत्वपूर्ण है, और इस तनाव ने वैश्विक ऊर्जा संकट की संभावना बढ़ा दी है।

  • ट्रंप के अल्टीमेटम से बढ़ा तनाव: रूस ने दी सख्त चेतावनी, परमाणु ठिकानों पर हमले को बताया बेहद खतरनाक

    ट्रंप के अल्टीमेटम से बढ़ा तनाव: रूस ने दी सख्त चेतावनी, परमाणु ठिकानों पर हमले को बताया बेहद खतरनाक


    नई दिल्ली:मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को दिए गए 48 घंटे के अल्टीमेटम ने वैश्विक चिंता को और गहरा कर दिया है। इस अल्टीमेटम के बाद जहां ईरान ने भी कड़ी प्रतिक्रिया की चेतावनी दी, वहीं अब रूस ने इस पूरे घटनाक्रम पर अपना स्पष्ट रुख सामने रखा है। रूस का कहना है कि मौजूदा हालात को युद्ध के बजाय राजनीतिक और रणनीतिक तरीकों से सुलझाया जाना चाहिए।

    क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने साफ शब्दों में कहा कि क्षेत्र में बढ़ते तनाव को कम करने का एकमात्र प्रभावी तरीका संवाद और कूटनीति है। उनका मानना है कि सैन्य कार्रवाई से हालात और बिगड़ सकते हैं, जिसका असर केवल क्षेत्रीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुनिया को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

    रूस ने खास तौर पर ईरान के बुशहर परमाणु पावर प्लांट पर संभावित हमले की आशंका को बेहद गंभीर बताया है। पेसकोव ने चेतावनी दी कि किसी भी परमाणु सुविधा पर हमला न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगा बल्कि इससे मानवीय आपदा भी पैदा हो सकती है, जिसकी भरपाई संभव नहीं होगी। उन्होंने यह भी कहा कि रूस इस मुद्दे पर अमेरिका तक अपनी चिंताएं स्पष्ट रूप से पहुंचा चुका है।

    इसी बीच, ईरान के नतांज परमाणु परिसर पर हाल ही में हुए हमलों ने भी स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। यह परिसर ईरान के परमाणु कार्यक्रम का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहां यूरेनियम संवर्धन का कार्य होता है। इस पर हुए हमले को रूस ने अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ बताते हुए कड़ी निंदा की थी।

    इस मामले में इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी ने भी चिंता व्यक्त की है। हालांकि एजेंसी ने स्पष्ट किया कि किसी प्रकार का रेडियोएक्टिव रिसाव नहीं हुआ, लेकिन उसने एहतियात बरतने और स्थिति पर करीबी नजर रखने की जरूरत पर जोर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया तो इसके परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते हैं।

    मौजूदा हालात ऐसे समय में सामने आए हैं जब पहले से ही अमेरिका और ईरान के बीच संबंध बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं, और इजरायल भी इस समीकरण का अहम हिस्सा है। ऐसे में किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई पूरे क्षेत्र को बड़े संघर्ष की ओर धकेल सकती है।

    रूस का यह बयान वैश्विक स्तर पर शांति की अपील के रूप में देखा जा रहा है। यह साफ संकेत देता है कि बड़ी शक्तियां अब इस संकट को युद्ध के बजाय बातचीत के जरिए सुलझाने के पक्ष में हैं। हालांकि, आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या संबंधित देश इस सलाह को मानते हैं या फिर यह तनाव एक बड़े संघर्ष का रूप लेता है।

  • फिनलैंड के राष्ट्रपति की अपील पश्चिम एशिया में सीजफायर के लिए भारत निभाए अहम भूमिका

    फिनलैंड के राष्ट्रपति की अपील पश्चिम एशिया में सीजफायर के लिए भारत निभाए अहम भूमिका


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने भारत से अहम कूटनीतिक भूमिका निभाने की अपील की है। उन्होंने अमेरिका ईरान और इजरायल के बीच जारी तनाव के बीच तुरंत सीजफायर की जरूरत बताई है।

    ब्लूमबर्ग को दिए एक इंटरव्यू में स्टब ने कहा कि वैश्विक समुदाय को दुश्मनी रोकने और संवाद के रास्ते खोलने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि भारत अपनी संतुलित विदेश नीति के चलते इस संकट को कम करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

    स्टब ने कहा हमें तत्काल सीजफायर की जरूरत है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारत इसमें मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। उन्होंने एस. जयशंकर द्वारा पहले की गई शांति अपील का भी उल्लेख किया।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत क्षेत्र में बढ़ते संघर्ष के बीच सक्रिय कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। हाल ही में विदेश मंत्री जयशंकर ने अपने ईरानी समकक्ष अब्बास अराघची से बातचीत कर स्थिति पर चर्चा की। इस दौरान ईरान ने मौजूदा संघर्ष को अमेरिका और इजरायल के हमलों का परिणाम बताया और आत्मरक्षा के अपने अधिकार पर जोर दिया।

    भारत इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है। खासतौर पर क्षेत्रीय स्थिरता ऊर्जा आपूर्ति और वहां रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर सरकार सतर्क है। इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से भी बातचीत की।

    बातचीत के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने आम नागरिकों की बढ़ती मौतों पर चिंता जताते हुए शांति और स्थिरता बहाल करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस क्षेत्र में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता भारत की प्राथमिकता है।मौजूदा हालात को देखते हुए विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि भारत मध्यस्थता की भूमिका निभाता है तो यह क्षेत्र में शांति बहाल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

  • अमेरिका-ईरान में जुबानी जंग तेज, अराघची ने मार्को रुबियो पर साधा निशाना

    अमेरिका-ईरान में जुबानी जंग तेज, अराघची ने मार्को रुबियो पर साधा निशाना


    नई दिल्ली ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच मंगलवार को जुबानी जंग तेज हो गई। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी विदेश सचिव मार्को रुबियो के हालिया बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “ईरान से कभी कोई खतरा था ही नहीं” और अमेरिकी कार्रवाई महज एक बहाना थी। अराघची ने दोनों देशों के नागरिकों के खून-खराबे के लिए सीधे तौर पर इजरायल को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि अमेरिका ने इजरायल की ओर से अपनी मर्जी से युद्ध लड़ा है।

    क्या कहा था रुबियो ने?
    सोमवार को मीडिया से बातचीत में मार्को रुबियो ने कहा था कि अमेरिका ने ईरान पर हमला तब किया जब उसे जानकारी मिली कि उसका सहयोगी इजरायल सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहा है।

    रुबियो के मुताबिक, वॉशिंगटन को आशंका थी कि इजरायल की कार्रवाई के बाद तेहरान क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सेना के खिलाफ जवाबी हमला कर सकता है। उन्होंने कहा,
    “हमें पता था कि इजरायल कार्रवाई करने वाला है। यदि हम पहले कदम नहीं उठाते, तो हमें ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता था। रुबियो ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति Donald Trump के प्रशासन का मानना था कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई आवश्यक थी, भले ही इसका घोषित उद्देश्य ईरानी शासन का अंत नहीं था।

    अराघची का तीखा जवाब
    रुबियो के बयान के बाद अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा,
    “मिस्टर रुबियो ने वह माना जो हम सब जानते थे। अमेरिका ने इजरायल की तरफ से अपनी मर्जी से जंग लड़ी है। ईरान से कभी कोई खतरा था ही नहीं।”

    उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिकी और ईरानी दोनों नागरिकों का खून बहा है, जिसकी जिम्मेदारी इजरायल पर है। अराघची ने लिखा,
    “अमेरिकी लोग इससे बेहतर के हकदार हैं।”

    ईरान का यह बयान साफ संकेत देता है कि तेहरान अमेरिकी कार्रवाई को आत्मरक्षा नहीं, बल्कि पूर्व-नियोजित आक्रामक कदम मान रहा है।

    तेहरान हमले पर नया खुलासा
    इससे पहले अमेरिकी रक्षा सचिव Pete Hegseth ने कहा था कि शनिवार को तेहरान में हुआ हमला इजरायल द्वारा किया गया था। इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के मारे जाने की खबर सामने आई थी। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, खुफिया जानकारी से संकेत मिला था कि खामेनेई उस समय एक अहम बैठक में मौजूद थे। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अब तक नहीं हुई है।

    बढ़ता कूटनीतिक टकराव
    रुबियो ने यह भी कहा कि अमेरिका “खामेनेई प्रतिष्ठान के अंत” को देखना पसंद करेगा, लेकिन मौजूदा सैन्य अभियान का घोषित लक्ष्य शासन परिवर्तन नहीं है। दूसरी ओर, ईरान इस पूरी कार्रवाई को क्षेत्रीय अस्थिरता का कारण बता रहा है और अमेरिका-इजरायल पर संयुक्त साजिश का आरोप लगा रहा है।

    मानना है कि दोनों देशों के बीच बयानबाजी का यह दौर आगे और तीखा हो सकता है। पश्चिम एशिया पहले ही अस्थिर हालात से गुजर रहा है, ऐसे में कूटनीतिक संवाद के बजाय आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकती है।

  • मिडिल ईस्ट में बढ़ा तनाव, ट्रंप ने दिया बड़ा संकेत-ईरान में सैन्य विकल्प खुले

    मिडिल ईस्ट में बढ़ा तनाव, ट्रंप ने दिया बड़ा संकेत-ईरान में सैन्य विकल्प खुले


    नई दिल्ली। दुनिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर ऐसा संकेत दिया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। विदेशों में लंबे युद्धों से दूरी बनाने के अपने पुराने रुख से अलग जाते हुए ट्रंप ने कहा है कि “यदि आवश्यकता पड़ी” तो वह ईरान में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं करते।

    “मैं यह नहीं कहता कि जमीन पर सैनिक नहीं होंगे”
    अमेरिकी अखबार New York Post को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा, “जैसा कि हर राष्ट्रपति कहता है, ‘जमीन पर कोई सैनिक नहीं होगा।’ मैं ऐसा नहीं कहता। उन्होंने स्पष्ट किया कि जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सैनिकों को ग्राउंड पर भेजा जा सकता है, हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि फिलहाल इसकी आवश्यकता नहीं होगी। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है और क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं।

    ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ और हताहतों की खबर
    इससे पहले अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी दी कि सोमवार तक अमेरिकी सेना के चार सदस्य मारे गए हैं। शनिवार सुबह ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ की घोषणा करते हुए ट्रंप ने संभावित नुकसान का संकेत दिया था। वीडियो संदेश में उन्होंने कहा, “ईरानी शासन मारना चाहता है। साहसी अमेरिकी नायकों की जान जा सकती है, और हमारे सैनिक हताहत हो सकते हैं; युद्ध में अक्सर ऐसा होता है। ट्रंप ने दावा किया कि यह ऑपरेशन तय समय से आगे चल रहा है और “बहुत तेजी से खत्म होने वाला है।” उन्होंने यह भी कहा कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व को खत्म करने में चार सप्ताह लगने की उम्मीद थी, लेकिन 49 नेता “एक दिन में” मारे गए। उनके मुताबिक मारे गए लोगों में ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei भी शामिल थे। हालांकि, इस दावे पर स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।

    “जितना समय लगेगा, उतना चलेगा अभियान”

    सोमवार को ट्रंप ने संकेत दिया कि ऑपरेशन चार से पांच सप्ताह तक चल सकता है और यदि इससे अधिक समय भी लगे तो वह इसके लिए तैयार हैं। संयुक्त राष्ट्र में इजरायल के स्थायी प्रतिनिधि Danny Danon ने भी कहा कि अभियान में “जितना समय लगेगा, लगेगा। इस बयानबाजी ने संकेत दिया है कि अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान के खिलाफ लंबी रणनीति पर काम कर सकते हैं।

    अमेरिकी जनता बंटी हुई
    विदेशी युद्धों में अमेरिका की पिछली उलझनों-जैसे इराक और अफगानिस्तान को देखते हुए अमेरिकी जनता सतर्क नजर आ रही है। एक रॉयटर्स-इप्सोस पोल के अनुसार, केवल 27 प्रतिशत लोगों ने ईरान पर हमले का समर्थन किया, जबकि 43 प्रतिशत इससे असहमत थे और 13 प्रतिशत अनिश्चित रहे।

    हालांकि ट्रंप ने पोल के आंकड़ों को खारिज करते हुए कहा, “मुझे पोलिंग की परवाह नहीं है। मुझे सही काम करना है। उन्होंने यह भी कहा कि वह एक “साइलेंट मेजॉरिटी” पर भरोसा करते हैं, जो उनके अनुसार “असली पोल” में दिखाई देगी।

    वैश्विक असर की आशंका
    ट्रंप के इस बयान ने पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ने की आशंका पैदा कर दी है। यदि वास्तव में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती होती है, तो यह क्षेत्रीय संघर्ष को व्यापक युद्ध का रूप दे सकता है। फिलहाल दुनिया की निगाहें वॉशिंगटन और तेहरान पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में यह टकराव किस दिशा में जाता है।

  • ईरान पर बढ़ा अमेरिकी दबाव: व्हाइट हाउस ने अमेरिकियों पर हमलों की सूची जारी की

    ईरान पर बढ़ा अमेरिकी दबाव: व्हाइट हाउस ने अमेरिकियों पर हमलों की सूची जारी की


    नई दिल्ली विगत लगभग पांच दशकों से अमेरिका की अलग-अलग सरकारें ईरान पर यह आरोप लगाती रही हैं कि वह मध्य पूर्व और अन्य क्षेत्रों में अमेरिकी नागरिकों व सैन्यकर्मियों पर हुए हमलों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल रहा है। इसी क्रम में व्हाइट हाउस ने एक विस्तृत बयान जारी कर ऐसे हमलों की सूची साझा की है।

    बयान में ईरान को “दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला देश” बताते हुए कहा गया कि उसने “किसी भी अन्य आतंकवादी शासन से अधिक अमेरिकियों को मारा है।” साथ ही यह भी कहा गया कि राष्ट्रपति Donald Trump “वह कर रहे हैं जो पिछले पांच दशकों के राष्ट्रपतियों ने करने से परहेज किया-खतरे को हमेशा के लिए खत्म करना।”

    1979 से शुरू हुआ टकराव
    नवंबर 1979: तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर 66 अमेरिकियों को 444 दिनों तक बंधक बनाए रखा गया।

    अप्रैल 1983: लेबनान की राजधानी Beirut में अमेरिकी दूतावास पर आत्मघाती कार बम हमला, 17 अमेरिकी मारे गए।

    अक्टूबर 1983: बेरूत में मरीन कंपाउंड पर ट्रक बम धमाका, 241 अमेरिकी सैनिकों की मौत।

    1990 का दशक: बड़े आतंकी हमले
    1996: Saudi Arabia में अमेरिकी एयर फोर्स हाउसिंग कॉम्प्लेक्स पर ट्रक बम हमला, 19 एयरमैन की मौत, सैकड़ों घायल।

    1998: Kenya और Tanzania में अमेरिकी दूतावासों पर बम धमाके, 224 लोगों की मौत, जिनमें एक दर्जन अमेरिकी शामिल।

    इन हमलों के लिए अमेरिका ने ईरान समर्थित संगठनों-Hezbollah, Hamas और Islamic Jihad-को जिम्मेदार ठहराया।

    इराक युद्ध और उसके बाद
    2003–2011: इराक युद्ध के दौरान ईरान समर्थित मिलिशिया द्वारा कम से कम 603 अमेरिकी सैनिकों की हत्या का दावा।

    जनवरी 2007: कर्बला में अमेरिकी सैनिकों की हत्या, जिसमें ईरान की कुद्स फोर्स का नाम जोड़ा गया।

    पूर्व एफबीआई एजेंट Robert Levinson 2007 में ईरान में लापता हुए, जिनकी कथित रूप से हिरासत में मौत हो गई।

    हालिया घटनाएं
    जनवरी 2024: जॉर्डन में अमेरिकी बेस पर ड्रोन हमला, तीन अमेरिकी सैनिक मारे गए।

    अक्टूबर 2023: इजरायल पर हमले के दौरान 46 अमेरिकियों की मौत और 12 के अपहरण का आरोप ईरान समर्थित हमास पर लगाया गया।

    नवंबर 2024: एक ईरानी नागरिक और आईआरजीसी से जुड़े व्यक्ति पर डोनाल्ड ट्रंप की हत्या की साजिश का आरोप।

    व्हाइट हाउस ने कहा कि अक्टूबर 2003 से नवंबर 2024 के बीच ईरान और उसके प्रॉक्सी द्वारा मिडिल ईस्ट में अमेरिकी बलों पर 180 से अधिक हमले किए गए।

    गौरतलब है कि अमेरिका ने 1984 से ईरान को “आतंकवाद प्रायोजक देश” की सूची में शामिल कर रखा है। ईरान लगातार इन आरोपों से इनकार करता रहा है और अमेरिकी नीतियों को क्षेत्रीय अस्थिरता के लिए जिम्मेदार ठहराता है।