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  • अमेरिका में स्वास्थ्य बीमा नियमों पर सियासी संग्राम ट्रंप प्रशासन के खिलाफ 25 राज्यों का मुकदमा

    अमेरिका में स्वास्थ्य बीमा नियमों पर सियासी संग्राम ट्रंप प्रशासन के खिलाफ 25 राज्यों का मुकदमा


    नई दिल्ली। अमेरिका में सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना मेडिकेड के नए नियमों को लेकर कानूनी और राजनीतिक विवाद गहरा गया है। 25 राज्यों और वॉशिंगटन डीसी ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर किया है। इन राज्यों का आरोप है कि नए कार्य संबंधी नियम जरूरतमंद लोगों के लिए स्वास्थ्य बीमा हासिल करना कठिन बना देंगे और कई पात्र नागरिक भी योजना के लाभ से वंचित हो सकते हैं।

    विवाद की शुरुआत अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत काम करने वाली सेंटर्स फॉर मेडिकेयर एंड मेडिकेड सर्विसेज की ओर से जारी अंतरिम नियमों के बाद हुई। राज्यों का कहना है कि प्रशासन ने पिछले वर्ष बने कानून की सीमा से आगे बढ़कर नए प्रावधान लागू किए हैं और कानून की ऐसी व्याख्या की है जिससे लाभार्थियों पर अतिरिक्त शर्तें लागू हो रही हैं।

    नए नियमों के अनुसार एक जनवरी से 19 से 64 वर्ष की आयु के वे लोग जो मेडिकेड विस्तार योजना के तहत आते हैं उन्हें हर महीने कम से कम 80 घंटे काम करना होगा या सामुदायिक सेवा करनी होगी अथवा आधे समय तक पढ़ाई करना अनिवार्य होगा। हालांकि गंभीर रूप से बीमार लोगों नशा मुक्ति कार्यक्रम में शामिल व्यक्तियों और कुछ अन्य श्रेणियों को छूट देने का प्रावधान रखा गया है।

    सबसे बड़ा विवाद गंभीर स्वास्थ्य स्थिति की नई परिभाषा को लेकर है। पहले कानून में विकलांगता गंभीर बीमारी या नशे की लत से जूझ रहे लोगों को छूट देने की व्यवस्था थी लेकिन नए नियमों में कहा गया है कि बीमारी इतनी गंभीर होनी चाहिए जिससे व्यक्ति की काम करने पढ़ाई करने या सामुदायिक सेवा करने की क्षमता काफी हद तक प्रभावित हो। तभी उसे छूट मिल सकेगी।

    मुकदमा दायर करने वाले राज्यों का कहना है कि इस नई शर्त के कारण कैंसर मरीज दिव्यांग मानसिक रोगी और अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों को अपनी पात्रता साबित करने के लिए अतिरिक्त दस्तावेज और लंबी कागजी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। इससे कई ऐसे लोग भी स्वास्थ्य बीमा से वंचित हो सकते हैं जो वास्तव में इसके हकदार हैं।

    राज्यों ने यह भी आरोप लगाया है कि लंबे समय तक चर्चा के बाद अचानक नियम बदल दिए गए जिससे प्रशासनिक स्तर पर नई व्यवस्था लागू करना मुश्किल हो गया है। साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि गंभीर बीमारी का प्रमाण किस प्रक्रिया के तहत स्वीकार किया जाएगा।

    दूसरी ओर ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इन नियमों का उद्देश्य सरकारी योजनाओं के दुरुपयोग को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि लाभ वास्तव में पात्र और जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे। हालांकि मुकदमा दायर होने के बाद स्वास्थ्य विभाग और सेंटर्स फॉर मेडिकेयर एंड मेडिकेड सर्विसेज की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

    न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स ने नए नियमों पर चिंता जताते हुए कहा कि कैंसर दिव्यांगता मानसिक बीमारी या नशे की लत से उबर रहे लोगों को इलाज पाने के लिए अनावश्यक कागजी कार्रवाई में नहीं उलझाया जाना चाहिए। उनके अनुसार इन बदलावों से हजारों जरूरतमंद लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच प्रभावित हो सकती है।

  • ईरान समझौते की कमान जेडी वेंस के हाथ: अमेरिकी राजनीति में बढ़ा कद, जोखिम भी उतना ही बड़ा

    ईरान समझौते की कमान जेडी वेंस के हाथ: अमेरिकी राजनीति में बढ़ा कद, जोखिम भी उतना ही बड़ा

    वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच जारी कूटनीतिक वार्ता ने वैश्विक राजनीति का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में अब अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस दिखाई दे रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की ओर से ईरान के साथ संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश में वेंस न केवल प्रमुख वार्ताकार बनकर उभरे हैं बल्कि इस पहल की सफलता और असफलता दोनों का राजनीतिक भार भी उनके कंधों पर आ गया है।

    स्विट्जरलैंड में ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चल रही बातचीत को ट्रंप प्रशासन एक ऐतिहासिक अवसर के रूप में देख रहा है। अमेरिकी नेतृत्व का मानना है कि यदि यह पहल सफल होती है तो मध्य पूर्व की राजनीति में एक बड़ा बदलाव संभव हो सकता है। इसी कारण जेडी वेंस को इस पूरी प्रक्रिया का प्रमुख चेहरा बनाया गया है।

    वेंस ने हाल ही में कहा था कि राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों का एक नया अध्याय शुरू हो। उनका कहना था कि यदि ईरान क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा करने वाली गतिविधियों और परमाणु हथियारों की महत्वाकांक्षा से पीछे हटता है तो अमेरिका भी संबंधों को पूरी तरह बदलने के लिए तैयार है। इस बयान ने साफ संकेत दिया कि ट्रंप प्रशासन टकराव के बजाय संवाद के रास्ते को प्राथमिकता देना चाहता है।

    पिछले कुछ सप्ताहों में जेडी वेंस की भूमिका और प्रभाव दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। विदेश मंत्री समेत कई वरिष्ठ अधिकारी जहां अपेक्षाकृत कम सक्रिय दिखाई दिए वहीं वेंस लगातार सरकार का पक्ष रखते हुए वार्ता को आगे बढ़ाने में जुटे रहे। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी सार्वजनिक रूप से उनकी भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि यदि बातचीत सफल रही तो उसका श्रेय वह स्वयं लेंगे और यदि विफल रही तो दोष वेंस को देंगे। हालांकि यह टिप्पणी हल्के अंदाज में की गई थी लेकिन इससे इस वार्ता में वेंस की केंद्रीय भूमिका स्पष्ट हो जाती है।

    दूसरी ओर इस समझौते को लेकर अमेरिकी राजनीति में तीखी बहस भी छिड़ गई है। डेमोक्रेटिक नेताओं ने इसे ईरान के प्रति अत्यधिक नरम रुख बताते हुए आलोचना की है। उनका मानना है कि इससे ईरान को आर्थिक और रणनीतिक लाभ मिल सकते हैं। वहीं रिपब्लिकन पार्टी के कुछ प्रभावशाली नेताओं ने भी चिंता जताई है कि अतिरिक्त संसाधनों का उपयोग ईरान अपनी सैन्य क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने में कर सकता है।

    आलोचनाओं के बावजूद ट्रंप प्रशासन इस पहल को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि मान रहा है। प्रशासन का तर्क है कि वर्षों से जमे गतिरोध को तोड़ते हुए पहली बार उच्च स्तर पर प्रत्यक्ष संवाद स्थापित हुआ है। अधिकारियों का मानना है कि बातचीत के जरिए स्थायी समाधान तलाशने का प्रयास किया जाना चाहिए।

    राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले 60 दिन जेडी वेंस के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं। यदि वार्ता सकारात्मक परिणाम देती है तो उनकी छवि एक प्रभावशाली कूटनीतिक नेता और राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के जानकार राजनेता के रूप में मजबूत होगी। वहीं यदि बातचीत विफल होती है तो उन्हें विपक्ष ही नहीं बल्कि अपनी पार्टी के भीतर भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ सकता है।

    यही कारण है कि ईरान के साथ चल रही यह वार्ता केवल दो देशों के संबंधों तक सीमित नहीं रह गई है। इसके परिणाम अमेरिकी राजनीति और जेडी वेंस के भविष्य दोनों पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि यह पहल ऐतिहासिक सफलता साबित होगी या फिर अमेरिकी कूटनीति के लिए एक नई चुनौती बनकर सामने आएगी।

  • विदेशी प्रभाव बढ़ाने की कोशिश? पाकिस्तान के खर्च को लेकर नई बहस

    विदेशी प्रभाव बढ़ाने की कोशिश? पाकिस्तान के खर्च को लेकर नई बहस


    नई दिल्ली। अमेरिका की सत्ता और नीति निर्धारण के केंद्र वाशिंगटन में पाकिस्तान की सक्रिय लॉबिंग को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। विदेशी मामलों के विशेषज्ञ रोबिंदर सचदेव ने अमेरिकी विदेशी एजेंट पंजीकरण अधिनियम यानी एफएआरए के सार्वजनिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए दावा किया है कि पाकिस्तान अमेरिका में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए हर महीने औसतन नौ लाख डॉलर यानी लगभग साढ़े आठ करोड़ रुपये खर्च कर रहा है। यह खुलासा ऐसे समय में सामने आया है जब पाकिस्तान कई कूटनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

    एफएआरए के दस्तावेजों के अनुसार पाकिस्तान का वार्षिक लॉबिंग खर्च लगभग एक से 1.2 करोड़ डॉलर के बीच पहुंच चुका है। यह राशि अमेरिकी राजनीतिक गलियारों, सरकारी एजेंसियों और प्रभावशाली नीति निर्माताओं तक पहुंच बनाने के लिए खर्च की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी देश द्वारा लॉबिंग फर्मों की सेवाएं लेना असामान्य नहीं है, लेकिन पाकिस्तान द्वारा किया जा रहा खर्च उसकी मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए काफी बड़ा माना जा रहा है।

    रोबिंदर सचदेव के अनुसार पाकिस्तान ने अमेरिकी अधिकारियों तक सीधी पहुंच बनाने के लिए कई पेशेवर लॉबिंग फर्मों को अनुबंध पर रखा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी गृह विभाग से जुड़े स्तर पर संपर्क स्थापित करने के लिए एक फर्म को हर महीने 50 हजार डॉलर दिए जा रहे हैं। वहीं व्यापार और आर्थिक मामलों से संबंधित मुद्दों को संभालने वाली एक अन्य कंपनी को लगभग ढाई लाख डॉलर प्रति माह का भुगतान किया जा रहा है।

    सबसे ज्यादा चर्चा उस अनुबंध को लेकर है जिसे हाल ही में बढ़ाया गया है। बताया गया है कि एक लॉबिंग फर्म को पहले 25 हजार डॉलर मासिक भुगतान किया जाता था, लेकिन अब उसके साथ लगभग 12 लाख डॉलर का बड़ा समझौता किया गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पाकिस्तान की बढ़ती कूटनीतिक बेचैनी और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिशों को दर्शाता है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान की ओर से चलाया जा रहा यह अभियान उन दावों से अलग तस्वीर पेश करता है जो हाल के महीनों में पाकिस्तानी नेतृत्व की ओर से किए गए थे। विशेष रूप से सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के उन बयानों का उल्लेख किया जा रहा है जिनमें उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान अमेरिकी मध्यस्थता से जुड़े दावे किए थे।

    एफएआरए दस्तावेजों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर यह भी दावा किया गया है कि मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने वाशिंगटन में अपने संपर्क अभियान को तेज कर दिया था। रिपोर्ट के मुताबिक 6 से 9 मई के बीच पाकिस्तानी प्रतिनिधियों और एजेंटों ने अमेरिकी संसद, पेंटागन और ट्रेजरी विभाग से जुड़े अधिकारियों के साथ दर्जनों आपातकालीन बैठकें की थीं। इन बैठकों का उद्देश्य पाकिस्तान के पक्ष को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना और अमेरिकी नीति निर्माताओं तक अपनी बात पहुंचाना बताया गया।

    अंतरराष्ट्रीय राजनीति में लॉबिंग एक सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है, लेकिन पाकिस्तान के कथित खर्च और गतिविधियों को लेकर सामने आई जानकारी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि वैश्विक मंचों पर प्रभाव कायम रखने के लिए देश किस हद तक संसाधन झोंक रहे हैं। आने वाले समय में इन खुलासों पर पाकिस्तान की आधिकारिक प्रतिक्रिया और अंतरराष्ट्रीय हलकों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण रहेगी।
  • शी जिनपिंग के ‘पतनशील अमेरिका’ वाले बयान पर ट्रंप की मुहर, बोले- बाइडेन ने देश को कमजोर कर दिया

    शी जिनपिंग के ‘पतनशील अमेरिका’ वाले बयान पर ट्रंप की मुहर, बोले- बाइडेन ने देश को कमजोर कर दिया



    नई दिल्ली। डोनाल्ड ट्रम्प  ने चीन दौरे के दौरान बड़ा बयान देते हुए कहा कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग
    द्वारा अमेरिका को “पतनशील राष्ट्र” कहे जाने पर वह कुछ हद तक सहमत हैं। हालांकि ट्रंप ने साफ किया कि यह टिप्पणी मौजूदा अमेरिकी स्थिति पर नहीं, बल्कि पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल की नीतियों पर लागू होती है।

    नई दिल्ली में मीडिया से बातचीत के दौरान ट्रंप ने दावा किया कि उनकी बीजिंग यात्रा बेहद सफल रही और शी जिनपिंग ने कई मुद्दों पर उनकी सराहना भी की। ट्रंप के मुताबिक, चीन के राष्ट्रपति ने अमेरिका की स्थिति को लेकर जो टिप्पणी की, उसका इशारा बाइडेन प्रशासन की आर्थिक और विदेश नीति की ओर था।

    ट्रंप ने कहा कि बाइडेन सरकार के दौरान अमेरिका को आर्थिक कमजोरी, वैश्विक दबाव और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेतृत्व संकट का सामना करना पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि गलत नीतियों की वजह से अमेरिका की वैश्विक छवि कमजोर हुई और चीन जैसे देशों को बढ़त मिली। ट्रंप ने दावा किया कि उनकी वापसी के बाद अमेरिका फिर से मजबूत स्थिति में आ रहा है।

    हालांकि यह साफ नहीं हो पाया कि ट्रंप ने शी जिनपिंग के किस बयान का जिक्र किया। माना जा रहा है कि वह चीन-अमेरिका संबंधों पर हुई बंद कमरे की बातचीत या “थ्यूसीडाइड्स ट्रैप” से जुड़े बयान की ओर इशारा कर रहे थे। अपनी मुलाकात के दौरान शी जिनपिंग ने कहा था कि दुनिया की स्थिरता और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अमेरिका और चीन के रिश्तों का संतुलित रहना बेहद जरूरी है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान अमेरिकी राजनीति में नया विवाद खड़ा कर सकता है, क्योंकि उन्होंने पहली बार सार्वजनिक रूप से चीन की आलोचनात्मक टिप्पणी को सही ठहराने जैसा संकेत दिया है। वहीं रिपब्लिकन खेमे में इसे बाइडेन प्रशासन पर सीधा हमला माना जा रहा है।

  • भारतीयों और चिल्कूर बालाजी मंदिर पर अमेरिकी सीनेटर का विवादित बयान, H-1B वीजा को बताया ‘कार्टेल’

    भारतीयों और चिल्कूर बालाजी मंदिर पर अमेरिकी सीनेटर का विवादित बयान, H-1B वीजा को बताया ‘कार्टेल’

    नई दिल्ली। अमेरिकी सीनेटर एरिक श्मिट ने H-1B वीजा नीति और भारतीयों को लेकर दिए गए बयान से बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया पर की गई उनकी टिप्पणी में उन्होंने भारतीय आईटी पेशेवरों, अमेरिकी कंपनियों और वीजा सिस्टम को जोड़ते हुए इसे “वीजा कार्टेल” तक कह दिया। इस टिप्पणी के बाद अमेरिका और भारत दोनों जगह तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

    सबसे ज्यादा विवाद उनके उस बयान पर है जिसमें उन्होंने हैदराबाद के प्रसिद्ध चिल्कूर बालाजी मंदिर का जिक्र करते हुए इसे “वीजा मंदिर” और कथित “वीजा कार्टेल” से जोड़ दिया। श्मिट के अनुसार, यह सिस्टम अमेरिकी नौकरियों और वेतन पर असर डाल रहा है, हालांकि उनके इन दावों को लेकर कई विशेषज्ञ और यूजर्स ने सवाल उठाए हैं और इसे भ्रामक बताया है।

    दरअसल, चिल्कूर बालाजी मंदिर लंबे समय से उन लोगों के बीच लोकप्रिय है जो विदेश जाने की इच्छा रखते हैं। मान्यता है कि यहां दर्शन और परिक्रमा करने से मनोकामना पूरी होती है, इसी कारण इसे “वीजा टेंपल” भी कहा जाता है। भक्त यहां वीजा आवेदन से पहले 11 परिक्रमा और सफलता मिलने पर 108 परिक्रमा करते हैं।

    श्मिट ने अपने बयान में H-1B, L-1 और F-1 वीजा सिस्टम पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि इससे अमेरिकी नागरिकों की नौकरियों और वेतन पर असर पड़ रहा है। साथ ही उन्होंने अमेरिकी टेक कंपनियों पर “मेरिट के बजाय पक्षपात” को बढ़ावा देने का आरोप भी लगाया।

    हालांकि, इस पूरे मामले पर सोशल मीडिया पर भारी आलोचना हो रही है और लोग इसे बिना तथ्यों के दिया गया भड़काऊ बयान बता रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर बयान देने से पहले तथ्यों की जांच बेहद जरूरी है।

    कुल मिलाकर, यह विवाद अब सिर्फ वीजा नीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत-अमेरिका संबंधों और सांस्कृतिक संवेदनशीलता तक पहुंच गया है।

  • चीन दौरे से पहले ट्रंप का बड़ा बयान, कहा- ईरान संकट सुलझाने में शी जिनपिंग की जरूरत नहीं

    चीन दौरे से पहले ट्रंप का बड़ा बयान, कहा- ईरान संकट सुलझाने में शी जिनपिंग की जरूरत नहीं

    नई दिल्ली । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आज तीन दिवसीय चीन दौरे पर रवाना हो रहे हैं। इस यात्रा के दौरान उनकी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ कई अहम वैश्विक मुद्दों पर द्विपक्षीय बातचीत होगी। हालांकि बीजिंग रवाना होने से पहले ट्रंप ने ईरान को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि ईरान संकट को हल करने के लिए उन्हें शी जिनपिंग की किसी मदद की जरूरत नहीं है। ट्रंप ने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि ईरान को अब सही रास्ता चुनना होगा, नहीं तो गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

    चीन दौरे पर हाई-प्रोफाइल डेलिगेशन
    13 से 15 मई तक चलने वाले इस दौरे में ट्रंप के साथ अमेरिका का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल भी चीन जा रहा है। इसमें उनके परिवार के सदस्य एरिक ट्रंप और लारा ट्रंप के अलावा कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। डेलिगेशन में विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी पीट हेगसेथ, और अन्य कूटनीतिक व सुरक्षा सलाहकार जैसे जेमीसन ग्रीर, स्टीफन मिलर, स्टीवन चेउंग, जेम्स ब्लेयर और अन्य प्रमुख नाम शामिल हैं।

    ईरान मुद्दा प्राथमिकता में नहीं
    रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि चीन में शी जिनपिंग के साथ उनकी बातचीत का मुख्य फोकस ईरान मुद्दा नहीं होगा, हालांकि इस पर चर्चा जरूर होगी। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की सैन्य क्षमता कमजोर हो चुकी है और किसी भी समझौते का उद्देश्य अमेरिका और ईरान दोनों देशों के हित में होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि “हम सिर्फ अच्छी डील करेंगे।”

    रूस-यूक्रेन युद्ध पर दावा
    ट्रंप ने यह भी दावा किया कि रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध जल्द ही समाप्त होने की दिशा में है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में वैश्विक हालात में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि चीन दौरे के दौरान ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात से वैश्विक राजनीति और खासकर ईरान संकट पर क्या नई दिशा निकलती है।

  • ट्रंप का बड़ा यू-टर्न! जिस अधिकारी को हटाया था, उसी को फिर सौंपी अमेरिका की आपदा सुरक्षा की कमान

    ट्रंप का बड़ा यू-टर्न! जिस अधिकारी को हटाया था, उसी को फिर सौंपी अमेरिका की आपदा सुरक्षा की कमान



    नई दिल्ली। डोनाल्ड ट्रम्प  ने एक बार फिर बड़ा राजनीतिक दांव चलते हुए पूर्व नेवी सील अधिकारी कैमरन हैमिल्टन को संघीय आपातकालीन प्रबंधन एजेंसी यानी फ़ेमा की जिम्मेदारी सौंपने का फैसला किया है। खास बात यह है कि यही कैमरन हैमिल्टन एक साल पहले एजेंसी के अस्थायी प्रमुख पद से हटा दिए गए थे। अब उनकी वापसी ने अमेरिकी राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है।

    व्हाइट हाउस की ओर से सोमवार को हैमिल्टन के नामांकन की घोषणा की गई। अगर अमेरिकी सीनेट उनकी नियुक्ति को मंजूरी देती है, तो वे आपातकालीन प्रबंधन और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया मामलों में ट्रंप प्रशासन के सबसे अहम सलाहकारों में शामिल होंगे। उन्हें होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के साथ मिलकर अमेरिका की आपदा प्रबंधन रणनीति को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दी जाएगी।

    कैमरन हैमिल्टन पूर्व नेवी सील अधिकारी रह चुके हैं और सुरक्षा मामलों में उनका लंबा अनुभव माना जाता है। हालांकि पिछले साल उन्हें फ़ेमा के कार्यवाहक प्रमुख पद से हटा दिया गया था। उस समय उन्होंने एजेंसी के अस्तित्व और उसकी जरूरत का खुलकर समर्थन किया था, जबकि ट्रंप प्रशासन लगातार फ़ेमा को कमजोर करने या खत्म करने जैसे संकेत दे रहा था। यही वजह थी कि उनके हटाए जाने को लेकर उस समय काफी विवाद भी हुआ था।

    अब उनकी वापसी ऐसे वक्त में हो रही है जब अमेरिका में प्राकृतिक आपदाओं, तूफानों और आपात स्थितियों से निपटने को लेकर संघीय एजेंसियों की भूमिका पर बहस तेज है। ट्रंप पहले भी फ़ेमा की कार्यप्रणाली की आलोचना कर चुके हैं और कई मौकों पर यह संकेत दे चुके हैं कि राज्यों को आपदा प्रबंधन में ज्यादा जिम्मेदारी उठानी चाहिए।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हैमिल्टन की दोबारा नियुक्ति ट्रंप प्रशासन की नई रणनीति का हिस्सा हो सकती है। एक तरफ ट्रंप फ़ेमा में बड़े बदलाव की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने ऐसे व्यक्ति को चुना है जो एजेंसी की कार्यप्रणाली को अंदर से समझता है और राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में मजबूत अनुभव रखता है।

    अमेरिका में अब सबकी नजर सीनेट की मंजूरी पर टिकी है। अगर नामांकन को हरी झंडी मिलती है तो कैमरन हैमिल्टन की वापसी अमेरिकी आपदा प्रबंधन व्यवस्था में बड़े बदलावों का संकेत मानी जा सकती है।

  • ईरान पर हमले के विरोध में सीनेट में हंगामा, पूर्व मरीन का टूटा हाथ; सांसद की भूमिका पर विवाद, VIDEO वायरल

    ईरान पर हमले के विरोध में सीनेट में हंगामा, पूर्व मरीन का टूटा हाथ; सांसद की भूमिका पर विवाद, VIDEO वायरल


    नई दिल्ली । अमेरिका में ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच विरोध के स्वर भी तेज होते जा रहे हैं। इसी कड़ी में यूनाइटेड स्टेट्स सीनेट की सशस्त्र सेवा समिति की सुनवाई के दौरान उस समय अफरा-तफरी मच गई जब एक पूर्व अमेरिकी मरीन ने ईरान पर हमले के विरोध में जोरदार प्रदर्शन शुरू कर दिया। प्रदर्शन के दौरान हुई झड़प में पूर्व सैनिक का हाथ टूट गया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और अमेरिकी राजनीति में नई बहस को जन्म दे रहा है।

    घायल प्रदर्शनकारी की पहचान ब्रायन मैकगिनेस के रूप में हुई है जो वर्ष 2000 से 2004 तक यूनाइटेड स्टेट्स मरीन कॉर्प्स में सार्जेंट के पद पर तैनात रह चुके हैं। जानकारी के मुताबिक मैकगिनेस सीनेट की सुनवाई के दौरान अचानक खड़े हो गए और ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का विरोध करने लगे। उन्होंने पश्चिम एशिया में अमेरिका की सैन्य भूमिका और इजरायल के समर्थन पर भी सवाल उठाए।

    स्थिति बिगड़ती देख यूएस कैपिटल पुलिस ने उन्हें हॉल से बाहर निकालने की कोशिश की। इसी दौरान मैकगिनेस ने दरवाजे के फ्रेम को पकड़ लिया और बाहर जाने से इनकार कर दिया। वीडियो में देखा जा सकता है कि पुलिसकर्मी उन्हें हटाने की कोशिश कर रहे हैं और खींचतान के दौरान उनका हाथ दरवाजे में फंस जाता है। इसी अफरा-तफरी में उनका हाथ टूट जाता है। कमरे में मौजूद लोगों की आवाजें भी वीडियो में सुनाई देती हैं जहां कुछ लोग चिल्लाते हुए कहते हैं उसका हाथ… उसका हाथ… ओह माय गॉड! वहीं पुलिस अधिकारी लगातार उन्हें दरवाजा छोड़ने के लिए कहते हुए सुनाई देते हैं।

    इस घटना में एक अमेरिकी सांसद की भूमिका भी सामने आई है। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि पुलिस अधिकारियों के साथ अमेरिकी सीनेटर टिम शीही भी प्रदर्शनकारी को बाहर निकालने में मदद करते नजर आ रहे हैं। हालांकि झड़प के दौरान उनका हाथ किस तरह टूटा इसे लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं।

    हॉल से बाहर ले जाए जाने के दौरान मैकगिनेस जोर-जोर से चिल्लाते हुए कहते सुने गए कोई भी सैनिक इजरायल के लिए लड़ना नहीं चाहता। उनका यह बयान पश्चिम एशिया में अमेरिका की सैन्य नीतियों के विरोध को दर्शाता है और इसी वजह से यह मामला और ज्यादा चर्चा में आ गया है।

    घटना के बाद सीनेटर टिम शीही ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी कार्रवाई का बचाव किया। उन्होंने कहा कि कैपिटल पुलिस एक असंतुलित प्रदर्शनकारी को हटाने की कोशिश कर रही थी और वह केवल स्थिति को शांत करने में मदद कर रहे थे। उन्होंने लिखा कि यह व्यक्ति टकराव के इरादे से कैपिटल आया था और पुलिस अपनी ड्यूटी निभा रही थी। शीही ने उम्मीद जताई कि घायल व्यक्ति को उचित मदद मिलेगी और भविष्य में ऐसी घटनाएं नहीं होंगी।

    वीडियो सामने आने के बाद अमेरिका में ईरान नीति इजरायल के समर्थन और पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप को लेकर नई बहस छिड़ गई है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना अमेरिकी राजनीति में बढ़ते ध्रुवीकरण और विदेश नीति को लेकर गहरी असहमति को भी उजागर करती है।

  • ट्रंप ने यूक्रेन और ईरान वार्ता की कमान अपने दामाद और दोस्त के हाथों में सौंपी

    ट्रंप ने यूक्रेन और ईरान वार्ता की कमान अपने दामाद और दोस्त के हाथों में सौंपी


    वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दामाद जेरेड कुश्नर और पुराने मित्र स्टीव विटकॉफ को दुनिया के दो सबसे बड़े संकटों यूक्रेन युद्ध और ईरान के तनाव को संभालने की जिम्मेदारी दी है। गुरुवार को दोनों ने स्विट्जरलैंड के जिनेवा में अलग-अलग बैठकों में इन मुद्दों पर चर्चा की।

    जिनेवा में व्यस्त कूटनीतिक दौरा
    कुश्नर और विटकॉफ ने अपने जिनेवा दौरे की शुरुआत ओमान के राजदूत के आवास से की जहां उन्होंने ईरानी अधिकारियों से मुलाकात की। इसका उद्देश्य तेहरान के परमाणु कार्यक्रम पर एक समझौते पर मुहर लगाना और अमेरिका तथा इजरायल द्वारा संभावित हमलों को रोकना था। इसके कुछ ही घंटों बाद दोनों ने इंटरकॉन्टिनेंटल होटल में यूक्रेनी अधिकारियों से बैठक की। रूसी आक्रमण अब अपने पांचवें वर्ष में है इसलिए यह वार्ता बेहद अहम मानी जा रही थी। इसके बाद फोर सीजन्स होटल में रूस और यूक्रेन के प्रतिनिधियों से अलग-अलग मंजिलों पर मुलाकात की गई। शाम तक दोनों फिर से ओमान के राजदूत के आवास लौटे और गुरुवार देर रात अमेरिका के लिए रवाना हुए।

    गाजा शांति समझौते में भूमिका

    कुश्नर और विटकॉफ की जिम्मेदारी केवल यूरोप या ईरान तक सीमित नहीं है। एक सप्ताह से भी कम समय पहले उन्होंने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की उद्घाटन बैठक में हिस्सा लिया था। यह संस्था गाजा पट्टी में हमास और इजरायल के बीच युद्धविराम सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है।

    ट्रंप की कूटनीतिक रणनीति
    ट्रंप की यह कवायद उनकी कूटनीतिक रणनीति को साफ दर्शाती है। वे अमेरिकी सरकार के पारंपरिक तंत्र पर भरोसा करने की बजाय अपनी सबसे अहम प्राथमिकताओं के लिए भरोसेमंद सहयोगियों दामाद और मित्र पर निर्भर हैं।

    विशेषज्ञों की चिंता और वाइट हाउस का बचाव

    कई विशेषज्ञों ने कहा है कि तीन बड़े और जटिल मुद्दों को केवल दो लोग संभालना चुनौतीपूर्ण है। ‘कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस’ के वरिष्ठ फेलो आरोन डेविड मिलर ने कहा कि हर वार्ता स्वयं में कई जटिल विवरणों का महासागर है। वहीं वाइट हाउस के एक अधिकारी ने इनका बचाव करते हुए कहा कि कुश्नर और विटकॉफ का सफलता का ट्रैक रिकॉर्ड और समय प्रबंधन उन्हें इन जिम्मेदारियों के लिए सक्षम बनाता है। दोनों को नियमित रूप से खुफिया ब्रीफिंग भी दी जाती है।

    व्यावसायिक हितों पर उठ रहे सवाल

    दोनों के बड़े व्यावसायिक हितों के कारण उनकी भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। जेरेड कुश्नर की निवेश फर्म ‘एफिनिटी पार्टनर्स’ अरबों डॉलर का प्रबंधन करती है जिसमें कतर के सॉवरेन वेल्थ फंड का पैसा शामिल है। स्टीव विटकॉफ की क्रिप्टो फर्म ‘वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल’ में हिस्सेदारी है जो अबू धाबी सरकार से जुड़े फंड्स के साथ मध्य पूर्व में सौदे कर रही है। इसके अलावा विटकॉफ और रूस के वार्ताकार किरिल दिमित्रीव ने युद्ध के बाद आर्थिक समझौतों पर चर्चा की। रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस ने कहा कि ये अच्छे व्यापारी हो सकते हैं लेकिन सीनेट की मंजूरी या सरकारी निगरानी के अधीन नहीं हैं।

    यूक्रेन का नजरिया

    यूक्रेन ने कुश्नर और विटकॉफ की भागीदारी का स्वागत किया है। मार्च की शुरुआत में रूसी अधिकारियों के साथ अगली त्रिपक्षीय चर्चा की उम्मीद है जिससे राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की और व्लादिमीर पुतिन की बैठक का रास्ता साफ हो सके। अमेरिका में यूक्रेन की राजदूत ओल्गा स्टेफनिशिना ने कहा कि सीधे राष्ट्रपति ट्रंप से संपर्क होने की वजह से वे दोनों उनके लिए उपयोगी हैं। हालांकि ट्रंप के पहले कार्यकाल में यूक्रेन वार्ता के विशेष दूत रहे कर्ट वोल्कर ने माना कि सीधा संपर्क सकारात्मक है लेकिन कुश्नर और विटकॉफ को इन मुद्दों की पूरी गहन समझ नहीं है।