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  • ट्रेड डील से पहले निर्यातकों का फीडबैक लेगा भारत, अमेरिका में शुल्क और रूस से तेल खरीद के असर पर बनेगी रणनीति

    ट्रेड डील से पहले निर्यातकों का फीडबैक लेगा भारत, अमेरिका में शुल्क और रूस से तेल खरीद के असर पर बनेगी रणनीति


    नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर बातचीत लगातार आगे बढ़ रही है। इसी बीच भारत सरकार ने उद्योग जगत की चिंताओं और सुझावों को समझने के लिए अहम कदम उठाया है। वाणिज्य मंत्रालय मंगलवार को प्रमुख उद्योग संगठनों और निर्यात संवर्धन परिषदों के साथ बैठक करेगा। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य भारत अमेरिका व्यापार संबंधों की मौजूदा स्थिति की समीक्षा करना और अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यातकों के सामने आ रही चुनौतियों को समझना होगा। बैठक की अध्यक्षता वाणिज्य मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव दर्पण जैन करेंगे जो भारत अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए भारत के मुख्य वार्ताकार भी हैं। बैठक में अलग अलग क्षेत्रों के निर्यात प्रदर्शन और हाल के व्यापारिक रुझानों पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है।

    इस महत्वपूर्ण बैठक में फार्मास्युटिकल्स इंजीनियरिंग वस्त्र कृषि रसायन समुद्री उत्पाद चमड़ा ऑटोमोबाइल ऑटो कंपोनेंट्स हस्तशिल्प और प्लास्टिक जैसे प्रमुख क्षेत्रों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की उम्मीद है। इसके अलावा सीआईआई फिक्की एसोचैम और फियो जैसे प्रमुख उद्योग संगठनों के प्रतिनिधि भी अपने सुझाव रख सकते हैं। सरकार यह समझना चाहती है कि मौजूदा शुल्क व्यवस्था और अमेरिकी बाजार से जुड़ी व्यापारिक बाधाओं का भारतीय कारोबार और निर्यात पर कितना असर पड़ रहा है। उद्योग जगत से मिलने वाला फीडबैक आगे की बातचीत में भारत की रणनीति को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

    यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल सितंबर के अंत में अमेरिका की यात्रा पर जाने वाले हैं। वह 30 सितंबर से मिल्वौकी में होने वाली जी20 व्यापार मंत्रिस्तरीय बैठक में हिस्सा लेंगे। इस दौरान अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर के साथ द्विपक्षीय बातचीत भी प्रस्तावित है। ऐसे में उससे पहले भारतीय उद्योगों की स्थिति और उनकी प्राथमिकताओं को समझना सरकार के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    पीयूष गोयल पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत अमेरिका व्यापार समझौते का पहला चरण तभी लागू होगा जब भारतीय निर्यातकों को प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बेहतर या कम से कम तुलनात्मक लाभ हासिल हो। यही वजह है कि सरकार अलग अलग सेक्टर से सीधे जानकारी जुटा रही है। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल भी कह चुके हैं कि दोनों देश फरवरी में तय किए गए ढांचे के आधार पर समझौते को अंतिम रूप देने के लिए प्रतिबद्ध हैं और बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है।

    हालांकि व्यापार समझौते के रास्ते में कुछ चुनौतियां भी मौजूद हैं। भारतीय निर्यात फिलहाल अमेरिका में सेक्शन 301 जांच के तहत लगाए गए अतिरिक्त 10 प्रतिशत शुल्क से प्रभावित हो रहा है। इसके अलावा रूस से भारत की कच्चे तेल की खरीद भी अमेरिका के साथ व्यापारिक बातचीत में एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है। अमेरिकी सीनेट से जुड़े हालिया घटनाक्रम में रूस से तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों के निर्यात पर भारी शुल्क लगाने की संभावना ने अनिश्चितता बढ़ाई है। भारत बड़ी मात्रा में रूसी कच्चा तेल खरीदता है और जुलाई में देश के कुल कच्चे तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक रही थी।

    इन परिस्थितियों के बीच भारत सरकार फिलहाल बातचीत को रचनात्मक बनाए रखने पर जोर दे रही है। उद्योग जगत के साथ होने वाली बैठक से सरकार को यह समझने में मदद मिलेगी कि अमेरिकी बाजार में किन क्षेत्रों को सबसे ज्यादा राहत की जरूरत है और प्रस्तावित व्यापार समझौते में किन मुद्दों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। माना जा रहा है कि आने वाले समय में भारत अमेरिका ट्रेड डील को लेकर होने वाली बातचीत में इन सुझावों का असर साफ दिखाई दे सकता है।

  • भारतीय निर्यातकों के लिए राहत भरी खबर अमेरिका ने सेक्शन 301 के तहत भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा

    भारतीय निर्यातकों के लिए राहत भरी खबर अमेरिका ने सेक्शन 301 के तहत भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा


    नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों के लिए एक सकारात्मक खबर सामने आई है। केंद्र सरकार ने जानकारी दी है कि अमेरिका द्वारा सेक्शन 301 के तहत लागू किए गए अंतिम टैरिफ उपायों में भारत को अपेक्षाकृत कम शुल्क श्रेणी में रखा गया है। सरकार का कहना है कि जांच प्रक्रिया के दौरान अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय के साथ लगातार संवाद और सक्रिय भागीदारी का ही परिणाम है कि भारत को प्रस्तावित शुल्क की तुलना में राहत मिली है। इससे भारतीय निर्यातकों को कई प्रमुख क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलने की उम्मीद है।

    अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने 23 जुलाई को अमेरिकी व्यापार अधिनियम 1974 के सेक्शन 301 के तहत अंतिम उपायों की घोषणा की थी। यह कार्रवाई उन देशों और अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों की समीक्षा के बाद की गई जिनकी जांच कथित फोर्स्ड लेबर से जुड़े आयात नियमों के संदर्भ में की गई थी। इस प्रक्रिया में भारत सहित 60 अर्थव्यवस्थाएं शामिल थीं।

    सरकार के अनुसार शुरुआती प्रस्ताव में भारत से आयातित उत्पादों पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने की बात कही गई थी लेकिन अंतिम निर्णय में इसे घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया। सरकार का मानना है कि यह कमी भारत की सक्रिय कूटनीतिक और व्यापारिक पहल का परिणाम है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने बताया कि भारत ने लिखित प्रस्तुतियों व्यक्तिगत स्तर पर विचार विमर्श और सार्वजनिक सुनवाई के माध्यम से लगातार अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखा।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका को होने वाले भारत के कुल निर्यात का बड़ा हिस्सा इस अतिरिक्त शुल्क के दायरे से बाहर रहेगा। जेनेरिक दवाएं स्मार्टफोन और कुछ अन्य निर्दिष्ट उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लागू नहीं होगा। इसके अलावा स्टील एल्युमीनियम और ऑटो पार्ट्स जैसे वे उत्पाद जो पहले से सेक्शन 232 के तहत अलग व्यवस्था में आते हैं उन पर भी यह अतिरिक्त 10 प्रतिशत शुल्क लागू नहीं किया जाएगा।

    इन छूटों के कारण अमेरिका को भारत के कुल निर्यात का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा अतिरिक्त सेक्शन 301 शुल्क से मुक्त रहेगा। शेष लगभग 55 प्रतिशत निर्यात पर अतिरिक्त शुल्क लागू होगा लेकिन सरकार का कहना है कि अन्य कई देशों की तुलना में भारत पर कुल टैरिफ का प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहेगा। इससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत बनी रहने की संभावना है।

    सरकार ने यह भी दोहराया कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को जल्द अंतिम रूप देने के लिए बातचीत लगातार जारी है। विशेष रूप से टेक्सटाइल क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर दोनों देशों के बीच संवाद चल रहा है। सरकार का मानना है कि भविष्य में यह समझौता दोनों देशों के व्यापार और निवेश संबंधों को नई ऊंचाई देगा तथा भारतीय उद्योगों को वैश्विक बाजार में और बेहतर अवसर उपलब्ध कराएगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की ओर से कम टैरिफ श्रेणी में रखा जाना भारतीय निर्यात के लिए सकारात्मक संकेत है। इससे कई क्षेत्रों में लागत का दबाव कम रहेगा और भारतीय कंपनियां अमेरिकी बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धा बनाए रखने में सक्षम होंगी। साथ ही यह निर्णय दोनों देशों के बीच बढ़ते आर्थिक सहयोग और व्यापारिक विश्वास का भी संकेत माना जा रहा है।

  • रूस से तेल खरीदने पर 100% अमेरिकी टैरिफ का प्रस्ताव, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर क्या पड़ेगा असर?

    रूस से तेल खरीदने पर 100% अमेरिकी टैरिफ का प्रस्ताव, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर क्या पड़ेगा असर?

    नई दिल्ली। रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने के अमेरिकी प्रस्ताव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी सीनेटरों के एक समूह ने संशोधित विधेयक पेश किया है, जिसमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों पर रूसी तेल का आयात जारी रखने की स्थिति में भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रस्ताव के कानून बनने की संभावना फिलहाल सीमित है।

    संशोधित विधेयक में क्या है?

    प्रस्तावित बिल में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रीय हित के आधार पर प्रतिबंधों में छूट देने का अधिकार भी दिया गया है। वहीं, 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित कार्रवाई से बाहर रखा गया है, क्योंकि वे सीमित मात्रा में रूसी गैस आयात करते हैं और रूस पर अपनी निर्भरता लगातार कम कर रहे हैं।

    डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि यह केवल टैरिफ लगाने का प्रस्ताव नहीं, बल्कि रूस की ऊर्जा, वित्तीय और रक्षा अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है। यदि यह कानून बनता है तो पहली बार अमेरिकी कांग्रेस किसी तीसरे देश के साथ व्यापार करने वाले देशों पर टैरिफ को दंडात्मक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति देगी।

    वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है असर

    ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रूसी तेल की खरीद पर इस प्रकार के सेकेंडरी टैरिफ लागू होते हैं तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    केप्लर के मॉडलिंग एवं रिफाइनिंग विशेषज्ञ सुमित रिटोलिया के अनुसार, वैश्विक बाजार में रूसी कच्चे तेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यदि इसकी आपूर्ति में बड़ी कमी आती है तो उसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा। सीमित अतिरिक्त उत्पादन क्षमता, होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिम और वैकल्पिक आपूर्ति की कमी के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।

    भारत के लिए क्यों अहम है रूसी तेल?

    पिछले कुछ वर्षों में रूस भारत के सबसे बड़े कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया है। रियायती दरों पर उपलब्ध रूसी तेल ने भारतीय रिफाइनरियों को लागत कम रखने, ईंधन आपूर्ति बनाए रखने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में मदद की है।

    उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, जून में भारत ने प्रतिदिन लगभग 26 लाख बैरल (2.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन) रूसी कच्चे तेल का आयात किया, जो देश के कुल क्रूड आयात का 50 प्रतिशत से अधिक था। जुलाई में भी आयात का स्तर मजबूत बना हुआ है।

    क्या भारत को चिंतित होना चाहिए?

    ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का मानना है कि भारत को फिलहाल इस प्रस्ताव को लेकर अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। उनके अनुसार, ऐसा ही एक विधेयक लंबे समय से अमेरिकी सीनेट में लंबित है, जिससे स्पष्ट होता है कि ऐसे कठोर प्रावधानों को पर्याप्त राजनीतिक समर्थन नहीं मिल पाया है।

    उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी न्यायिक फैसलों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े कानूनी पहलुओं को देखते हुए इस प्रस्ताव के लागू होने की राह आसान नहीं है। साथ ही यूरोपीय देशों को दी गई छूट यह भी दर्शाती है कि प्रस्ताव सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा रहा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तय करनी चाहिए। यदि भविष्य में इस प्रस्ताव पर आगे बढ़त होती है, तब भी भारत के सामने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और आयात रणनीति का संतुलित मूल्यांकन करना महत्वपूर्ण होगा।

  • अमेरिकी टैरिफ से सोलर शेयरों में बड़ी गिरावट, वारी और प्रीमियर एनर्जीज टॉप लूजर..

    अमेरिकी टैरिफ से सोलर शेयरों में बड़ी गिरावट, वारी और प्रीमियर एनर्जीज टॉप लूजर..

    नई दिल्ली ।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से बुधवार को भारतीय सोलर आयात पर 126 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के बाद भारतीय सोलर शेयर बाजार में तेज गिरावट देखने को मिली। यह टैरिफ उन देशों पर लगाया गया है जो अनुचित रूप से सब्सिडी देते हैं और अमेरिका के घरेलू सोलर उद्योग को नुकसान पहुंचाते हैं।

    इस फैसले के बाद वारी एनर्जीज के शेयर में कारोबार के दौरान 15 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। खबर लिखे जाने तक हल्की रिकवरी के बाद यह 10.83 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 2,697 रुपए पर कारोबार कर रहा था।

    प्रीमियर एनर्जीज का शेयर भी दबाव में रहा और फिलहाल यह 6.19 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 728.95 रुपए पर था। कारोबार के दौरान इस शेयर में करीब 14 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई। इसके अलावा विक्रम सोलर का शेयर 5.67 प्रतिशत कमजोर होकर 174 रुपए पर था, जबकि कारोबार के दौरान 7.76 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई।

    ट्रंप प्रशासन ने भारत के अलावा इंडोनेशिया और लाओस के सोलर उत्पादों पर भी क्रमश: 143 प्रतिशत और 81 प्रतिशत टैरिफ लगाया है। 2025 की पहली छमाही में अमेरिका के सोलर मॉड्यूल आयात में इन तीन देशों की हिस्सेदारी कुल 57 प्रतिशत रही है। 2024 में अमेरिका को भारतीय सोलर निर्यात की वैल्यू 792.6 मिलियन डॉलर थी, जो 2022 की तुलना में नौ गुना अधिक है।

    अमेरिकी प्रशासन ने यह कार्रवाई यूएस सोलर ग्रुप की याचिका के आधार पर की है। इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि कुछ देशों की सब्सिडी अमेरिकी सोलर उद्योग को नुकसान पहुंचा रही है।

    निवेशकों के लिए यह टैरिफ भारतीय सोलर कंपनियों के लिए चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि आगामी कारोबारी सत्र में बिकवाली और दबाव जारी रहने की संभावना जताई जा रही है।