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  • अस्पताल की कथित गलती ने बदल दी दो परिवारों की किस्मत 38 साल बाद डीएनए टेस्ट से खुला जन्म का सबसे बड़ा राज

    अस्पताल की कथित गलती ने बदल दी दो परिवारों की किस्मत 38 साल बाद डीएनए टेस्ट से खुला जन्म का सबसे बड़ा राज


    नई दिल्ली। अमेरिका के नॉर्थ डकोटा राज्य से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने चिकित्सा व्यवस्था और अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि वर्ष 1988 में एक अस्पताल की कथित लापरवाही के कारण जन्म के तुरंत बाद दो नवजात बच्चों की अदला-बदली हो गई और दोनों अपने जैविक माता-पिता की बजाय दूसरे परिवारों के साथ बड़े हुए। करीब 38 वर्ष तक किसी को इस गलती का पता नहीं चला। आखिरकार एक सामान्य डीएनए टेस्ट ने ऐसा सच उजागर किया जिसने दो परिवारों की पूरी दुनिया बदल दी।

    रिपोर्ट के अनुसार यह मामला नॉर्थ डकोटा के ग्राफ्टन शहर स्थित यूनिटी मेडिकल सेंटर से जुड़ा है। परिवारों का कहना है कि 26 जनवरी 1988 को अस्पताल में केवल दो बच्चों का जन्म हुआ था। आरोप है कि अस्पताल से छुट्टी के समय दोनों नवजातों को गलत परिवारों के साथ भेज दिया गया। इसके बाद दोनों बच्चे अपने नए परिवारों में पले बढ़े और उन्हें कभी इस बात का अंदाजा नहीं हुआ कि उनके जैविक माता-पिता कोई और हैं।

    समय के साथ दोनों ने सामान्य जीवन जिया। पढ़ाई की नौकरी की परिवार बसाया और अपने रिश्तों को उसी रूप में स्वीकार किया जैसा उन्हें बचपन से बताया गया था। हालांकि उनमें से एक व्यक्ति को बचपन से ही यह महसूस होता था कि उसका चेहरा और शारीरिक बनावट परिवार के अन्य सदस्यों से काफी अलग है। उस समय इसे सामान्य संयोग मान लिया गया लेकिन वर्षों बाद यही संदेह एक बड़े खुलासे की वजह बना।

    करीब दो वर्ष पहले दूसरे व्यक्ति ने अपने पारिवारिक इतिहास के बारे में अधिक जानकारी हासिल करने के उद्देश्य से डीएनए टेस्ट कराया। जांच रिपोर्ट में सामने आए परिणाम पूरी तरह अप्रत्याशित थे। रिपोर्ट ने ऐसे जैविक रिश्तों की ओर संकेत किया जिनके बारे में उन्हें पहले कोई जानकारी नहीं थी। इसके बाद आगे की जांच और पारिवारिक रिकॉर्ड की पड़ताल में कथित अदला-बदली की पूरी कहानी सामने आने लगी। परिवारों का दावा है कि जन्म के समय अस्पताल की पहचान पट्टी में दर्ज विवरण भी उनकी आशंकाओं को मजबूत करता है।

    सच्चाई सामने आने के बाद दोनों परिवारों के लिए भावनात्मक स्थिति बेहद कठिन हो गई। जिन लोगों को वे जीवनभर अपना माता-पिता और भाई-बहन मानते रहे थे उनके साथ रिश्ते तो बने रहे लेकिन अचानक यह जानना कि जैविक परिवार कोई और है किसी बड़े मानसिक आघात से कम नहीं था। दोनों पक्षों ने अपने वास्तविक परिवारों से मुलाकात की लेकिन लगभग चार दशक बाद नए रिश्तों को स्वीकार करना आसान नहीं रहा।

    परिवारों का आरोप है कि उन्होंने पहले अस्पताल के साथ बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने की कोशिश की लेकिन सहमति नहीं बन सकी। इसके बाद अस्पताल के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर किया गया। उनका कहना है कि अस्पताल की कथित लापरवाही ने दो परिवारों का जीवन पूरी तरह बदल दिया और उन्हें दशकों तक अपने वास्तविक रिश्तों से दूर रखा।

    वहीं अस्पताल ने इस मामले में परिवारों की भावनात्मक पीड़ा पर संवेदना जताई है लेकिन अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से इनकार किया है। अस्पताल ने अदालत से मामला खारिज करने की मांग की है। अब अंतिम निर्णय न्यायालय में पेश किए जाने वाले सबूतों और सुनवाई के आधार पर होगा।

    यह मामला केवल एक संभावित प्रशासनिक गलती का नहीं बल्कि पहचान रिश्तों और परिवार जैसी गहरी मानवीय भावनाओं का भी है। यदि अदालत में आरोप साबित होते हैं तो यह मामला चिकित्सा इतिहास के सबसे गंभीर लापरवाही के मामलों में गिना जा सकता है और भविष्य में अस्पतालों की सुरक्षा प्रक्रियाओं को और सख्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण उदाहरण भी बन सकता है।

  • पंजाब से अमेरिका पहुंचे परिवार के बेटे ने रचा इतिहास, 176 छात्रों का पूरा एजुकेशन लोन चुकाकर बने मिसाल

    पंजाब से अमेरिका पहुंचे परिवार के बेटे ने रचा इतिहास, 176 छात्रों का पूरा एजुकेशन लोन चुकाकर बने मिसाल



    नई दिल्ली। अमेरिका में भारतीय मूल के समाजसेवी अनिल कोचर इन दिनों चर्चा में हैं। उन्होंने नॉर्थ कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी के विल्सन कॉलेज ऑफ टेक्सटाइल्स के 176 छात्रों का अंतिम वर्ष का पूरा एजुकेशन लोन चुकाने की घोषणा कर सबको चौंका दिया। यह ऐलान ग्रेजुएशन समारोह के दौरान किया गया, जहां छात्र अपने भविष्य को लेकर उत्साहित थे, लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा आर्थिक बोझ उसी मंच से खत्म होने वाला है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, यह घोषणा यूनिवर्सिटी के रेनॉल्ड्स कोलिजियम में आयोजित दीक्षांत समारोह के दौरान हुई। समारोह में मुख्य वक्ता के तौर पर पहुंचे अनिल कोचर ने कहा कि यह फैसला उनके दिवंगत पिता प्रकाश चंद कोचर को सम्मान देने के लिए लिया गया है। उनके पिता कई दशक पहले पंजाब से अमेरिका आए थे और कठिन संघर्ष के बाद परिवार को नई पहचान दिलाई थी।

    अनिल कोचर ने अपने संबोधन में कहा कि शिक्षा किसी भी युवा के भविष्य की सबसे बड़ी ताकत होती है, लेकिन बढ़ते एजुकेशन लोन कई छात्रों के सपनों पर भारी पड़ जाते हैं। उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि छात्र अपने करियर की शुरुआत कर्ज के दबाव से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और आजादी के साथ करें।

    समारोह में मौजूद छात्रों और उनके परिवारों के लिए यह पल बेहद भावुक बन गया। कई छात्र खुशी से रो पड़े, क्योंकि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उनकी पढ़ाई का बड़ा कर्ज अचानक खत्म हो जाएगा। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने भी इस पहल को ऐतिहासिक बताते हुए अनिल कोचर की जमकर सराहना की।

    बताया जा रहा है कि अनिल कोचर लंबे समय से शिक्षा और समाजसेवा से जुड़े कार्यों में सक्रिय हैं। वे मानते हैं कि समाज को वापस लौटाना हर सफल व्यक्ति की जिम्मेदारी है। उनकी यह पहल अब अमेरिका ही नहीं, बल्कि भारतीय समुदाय में भी प्रेरणा की मिसाल बन गई है।

  • चीन की टेंशन बढ़ाएगा अमेरिका का ‘लिथियम खजाना’, पहाड़ों के नीचे मिला इतना बड़ा भंडार कि 300 साल नहीं पड़ेगी आयात की जरूरत

    चीन की टेंशन बढ़ाएगा अमेरिका का ‘लिथियम खजाना’, पहाड़ों के नीचे मिला इतना बड़ा भंडार कि 300 साल नहीं पड़ेगी आयात की जरूरत



    नई दिल्ली। संयुक्त राज्य अमेरिका में वैज्ञानिकों ने लिथियम का एक विशाल भंडार खोजा है, जिसे ऊर्जा और टेक्नोलॉजी सेक्टर के लिए गेमचेंजर माना जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह भंडार इतना बड़ा है कि अमेरिका करीब 300 साल तक लिथियम आयात पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है। इस खोज को चीन के रेयर अर्थ और बैटरी मटेरियल बाजार में दबदबे के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

    अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार यह विशाल लिथियम भंडार अपलाचियन पर्वत के नीचे मौजूद है। यह मुख्य रूप से North Carolina, South Carolina, Maine और New Hampshire में फैला हुआ है। वैज्ञानिकों ने इलाके में लिथियम से समृद्ध 18 अलग-अलग क्षेत्रों की पहचान की है।

    65 अरब डॉलर का ‘सफेद सोना’
    रिपोर्ट के मुताबिक इस भंडार में करीब 2.5 करोड़ मीट्रिक टन लिथियम मौजूद हो सकता है। इसकी अनुमानित कीमत लगभग 65 अरब डॉलर आंकी गई है। माना जा रहा है कि यह खोज अमेरिका को बैटरी निर्माण और इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर में फिर से मजबूत बना सकती है।

    क्यों इतना अहम है लिथियम?
    लिथियम को आधुनिक दौर का “सफेद सोना” कहा जाता है। इसका इस्तेमाल:

    इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों में

    स्मार्टफोन और लैपटॉप में

    ऊर्जा भंडारण सिस्टम में

    एयरोस्पेस और डिफेंस उपकरणों में

    सबसे ज्यादा होता है। दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग तेजी से बढ़ने के साथ लिथियम की जरूरत भी लगातार बढ़ रही है।

    चीन का दबदबा पड़ सकता है कमजोर
    फिलहाल China रेयर अर्थ और लिथियम रिफाइनिंग सेक्टर में सबसे ताकतवर देश माना जाता है। वहीं Australia दुनिया में सबसे ज्यादा लिथियम सप्लाई करता है। ऐसे में अमेरिका की यह खोज वैश्विक सप्लाई चेन का समीकरण बदल सकती है।

    जापान ने भी खोजा समुद्र के नीचे खजाना
    इधर Japan ने भी समुद्र की गहराई में रेयर अर्थ एलिमेंट्स का विशाल भंडार खोजने का दावा किया है। बताया जा रहा है कि यह भंडार टोक्यो से करीब 2000 किलोमीटर दूर समुद्री इलाके में मौजूद है। अनुमान है कि वहां 160 लाख टन से ज्यादा रेयर अर्थ संसाधन हो सकते हैं, जो चीन पर निर्भरता कम करने में मदद करेंगे।

  • अमेरिकी नागरिकता का नया दावा! ट्रंप का ‘Gold Card’ प्रोग्राम चर्चा में-जानें फीस और पूरा प्रोसेस

    अमेरिकी नागरिकता का नया दावा! ट्रंप का ‘Gold Card’ प्रोग्राम चर्चा में-जानें फीस और पूरा प्रोसेस


    अमेरिका। में स्थायी रूप से बसने का सपना देखने वालों के लिए बड़ी चर्चा सामने आई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया इन्वेस्टर-आधारित इमिग्रेशन मॉडल “Trump Gold Card” लॉन्च किया है, जिसे अमेरिकी इमिग्रेशन सिस्टम का बड़ा बदलाव बताया जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि यह प्रोग्राम योग्य व्यक्तियों को भविष्य में अमेरिकी नागरिकता तक पहुँचने का अवसर प्रदान कर सकता है।

    माना जा रहा है कि Gold Card दो श्रेणियों में जारी किया जा रहा है-पहला Gold Card, जो व्यक्तिगत आवेदकों के लिए है, और दूसरा Corporate Gold Card, जो उन कर्मचारियों के लिए है जिन्हें उनकी कंपनी अमेरिका भेजना चाहती है। इसके अलावा एक Platinum Card शुरू करने की भी बात सामने आ रही है, जो लगभग 270 दिन तक अमेरिका में रहने की अनुमति दे सकता है।

    इस कार्ड की लागत को लेकर किए गए दावों के अनुसार, Gold Card के लिए $15,000 का नॉन-रिफंडेबल आवेदन शुल्क देना होगा, और मंजूरी मिलने पर $1 मिलियन की एकमुश्त रकम जमा करनी होगी। वहीं Corporate Gold Card के लिए कंपनियों से मंजूरी के बाद $2 मिलियन तक का भुगतान लेने की बात कही जा रही है। इसे निवेश और टैलेंट को अमेरिका की ओर आकर्षित करने का प्रयास बताया जा रहा है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक आवेदन प्रक्रिया सरल है-बता‍या गया है कि आवेदक को trumpcard.gov वेबसाइट पर जाकर फॉर्म भरना होता है और अंतरराष्ट्रीय अथवा अमेरिकी क्रेडिट कार्ड के जरिए भुगतान किया जा सकता है। हालांकि, इस प्रोग्राम की आधिकारिक पुष्टि अमेरिकी सरकारी वेबसाइटों पर उपलब्ध नहीं है।

    इसी वजह से विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि वीज़ा, इमिग्रेशन और नागरिकता से जुड़ी किसी भी जानकारी या आवेदन से पहले USCIS और U.S. State Department जैसे आधिकारिक स्रोतों को ही अंतिम आधार माना जाए, ताकि किसी भी तरह की भ्रमित जानकारी या गलत दावे से बचा जा सके।