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  • जब धरती ने दिखाई अपनी सबसे भयावह ताकत, दुनिया के महाविनाशकारी भूकंपों ने लाखों जिंदगियां निगलीं और बदल दिया इतिहास

    जब धरती ने दिखाई अपनी सबसे भयावह ताकत, दुनिया के महाविनाशकारी भूकंपों ने लाखों जिंदगियां निगलीं और बदल दिया इतिहास

    नई दिल्ली । वेनेजुएला में हाल ही में आए शक्तिशाली भूकंपों ने एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान प्राकृतिक आपदाओं की भयावहता की ओर आकर्षित किया है। 7.2 और 7.5 तीव्रता के झटकों ने यह याद दिलाया कि आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद प्रकृति की शक्ति के सामने मानव सभ्यता अब भी सीमित है। हालांकि वेनेजुएला में आए ये भूकंप गंभीर माने जा रहे हैं, लेकिन विश्व इतिहास में दर्ज सबसे शक्तिशाली भूकंपों की सूची इससे कहीं अधिक विनाशकारी घटनाओं से भरी हुई है।

    दुनिया के इतिहास में अब तक दर्ज सबसे शक्तिशाली भूकंप वर्ष 1960 में दक्षिण अमेरिकी देश चिली में आया था। बायोबियो क्षेत्र में दर्ज इस भूकंप की तीव्रता 9.5 मापी गई थी। इसे ग्रेट चिली अर्थक्वेक के नाम से जाना जाता है। इस आपदा ने हजारों इमारतों को क्षतिग्रस्त कर दिया और व्यापक तबाही मचाई। बड़ी संख्या में लोग बेघर हो गए तथा कई क्षेत्रों में सामान्य जीवन लंबे समय तक प्रभावित रहा।

    इसके बाद वर्ष 1964 में अमेरिका के अलास्का क्षेत्र में 9.2 तीव्रता का भूकंप आया। यह भूकंप कई मिनट तक महसूस किया गया और इसके प्रभाव ने विशाल भूभाग को प्रभावित किया। भूकंप के साथ भूस्खलन और समुद्री उथल-पुथल ने भी नुकसान को बढ़ा दिया। इसे उत्तरी अमेरिका के इतिहास की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में गिना जाता है।

    वर्ष 2004 में इंडोनेशिया के सुमात्रा तट के निकट समुद्र के भीतर आया 9.1 तीव्रता का भूकंप आधुनिक इतिहास की सबसे घातक प्राकृतिक त्रासदियों में शामिल है। इस भूकंप के बाद उत्पन्न सुनामी ने हिंद महासागर से जुड़े अनेक देशों को अपनी चपेट में ले लिया। भारत, श्रीलंका, थाईलैंड और इंडोनेशिया समेत कई देशों के तटीय क्षेत्रों में भारी तबाही हुई। लाखों लोग प्रभावित हुए और दो लाख से अधिक लोगों की जान चली गई। इस घटना ने वैश्विक स्तर पर सुनामी चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने की आवश्यकता को भी रेखांकित किया।

    वर्ष 2011 में जापान के तोहोकू क्षेत्र में आए 9.1 तीव्रता के भूकंप ने दुनिया को एक और बड़ा झटका दिया। अत्याधुनिक तकनीक और मजबूत आपदा प्रबंधन व्यवस्था होने के बावजूद जापान को भारी नुकसान झेलना पड़ा। भूकंप के बाद आई विशाल सुनामी ने कई शहरों को प्रभावित किया और हजारों लोगों की मौत हुई। इस आपदा का असर ऊर्जा और परमाणु सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों तक भी पहुंचा।

    रूस का कामचटका क्षेत्र भी दुनिया के सबसे शक्तिशाली भूकंपों का साक्षी रहा है। वर्ष 1952 में यहां 9.0 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसने व्यापक विनाश फैलाया। वहीं हाल के वर्षों में इसी क्षेत्र में एक और शक्तिशाली भूकंप दर्ज किया गया, जिसने वैज्ञानिकों का ध्यान पृथ्वी की सक्रिय विवर्तनिक गतिविधियों की ओर आकर्षित किया।

    भारत भी इस सूची से अछूता नहीं रहा है। वर्ष 1950 में पूर्वोत्तर क्षेत्र, विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश और आसपास के इलाकों में आए 8.6 तीव्रता के भूकंप ने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया था। यह स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में गिना जाता है। इसके अतिरिक्त इक्वाडोर, चिली और अलास्का जैसे क्षेत्रों में भी समय-समय पर आए शक्तिशाली भूकंपों ने हजारों लोगों की जान ली और भूगर्भीय इतिहास में अपनी अलग पहचान बनाई।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भूकंपों को रोका नहीं जा सकता, लेकिन वैज्ञानिक निगरानी, मजबूत निर्माण मानकों और प्रभावी आपदा प्रबंधन के माध्यम से इनके नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। वेनेजुएला की हालिया घटना एक बार फिर यही संदेश देती है कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति सतर्कता और तैयारी ही सबसे बड़ा बचाव है।

  • चीन की टेंशन बढ़ाएगा अमेरिका का ‘लिथियम खजाना’, पहाड़ों के नीचे मिला इतना बड़ा भंडार कि 300 साल नहीं पड़ेगी आयात की जरूरत

    चीन की टेंशन बढ़ाएगा अमेरिका का ‘लिथियम खजाना’, पहाड़ों के नीचे मिला इतना बड़ा भंडार कि 300 साल नहीं पड़ेगी आयात की जरूरत



    नई दिल्ली। संयुक्त राज्य अमेरिका में वैज्ञानिकों ने लिथियम का एक विशाल भंडार खोजा है, जिसे ऊर्जा और टेक्नोलॉजी सेक्टर के लिए गेमचेंजर माना जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह भंडार इतना बड़ा है कि अमेरिका करीब 300 साल तक लिथियम आयात पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है। इस खोज को चीन के रेयर अर्थ और बैटरी मटेरियल बाजार में दबदबे के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

    अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार यह विशाल लिथियम भंडार अपलाचियन पर्वत के नीचे मौजूद है। यह मुख्य रूप से North Carolina, South Carolina, Maine और New Hampshire में फैला हुआ है। वैज्ञानिकों ने इलाके में लिथियम से समृद्ध 18 अलग-अलग क्षेत्रों की पहचान की है।

    65 अरब डॉलर का ‘सफेद सोना’
    रिपोर्ट के मुताबिक इस भंडार में करीब 2.5 करोड़ मीट्रिक टन लिथियम मौजूद हो सकता है। इसकी अनुमानित कीमत लगभग 65 अरब डॉलर आंकी गई है। माना जा रहा है कि यह खोज अमेरिका को बैटरी निर्माण और इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर में फिर से मजबूत बना सकती है।

    क्यों इतना अहम है लिथियम?
    लिथियम को आधुनिक दौर का “सफेद सोना” कहा जाता है। इसका इस्तेमाल:

    इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों में

    स्मार्टफोन और लैपटॉप में

    ऊर्जा भंडारण सिस्टम में

    एयरोस्पेस और डिफेंस उपकरणों में

    सबसे ज्यादा होता है। दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग तेजी से बढ़ने के साथ लिथियम की जरूरत भी लगातार बढ़ रही है।

    चीन का दबदबा पड़ सकता है कमजोर
    फिलहाल China रेयर अर्थ और लिथियम रिफाइनिंग सेक्टर में सबसे ताकतवर देश माना जाता है। वहीं Australia दुनिया में सबसे ज्यादा लिथियम सप्लाई करता है। ऐसे में अमेरिका की यह खोज वैश्विक सप्लाई चेन का समीकरण बदल सकती है।

    जापान ने भी खोजा समुद्र के नीचे खजाना
    इधर Japan ने भी समुद्र की गहराई में रेयर अर्थ एलिमेंट्स का विशाल भंडार खोजने का दावा किया है। बताया जा रहा है कि यह भंडार टोक्यो से करीब 2000 किलोमीटर दूर समुद्री इलाके में मौजूद है। अनुमान है कि वहां 160 लाख टन से ज्यादा रेयर अर्थ संसाधन हो सकते हैं, जो चीन पर निर्भरता कम करने में मदद करेंगे।