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  • अमेरिका ने भारत से आयात पर 10% नया टैरिफ लागू किया, फोर्स्ड लेबर नियमों के बीच कई निर्यात क्षेत्रों पर बढ़ेगा दबाव

    अमेरिका ने भारत से आयात पर 10% नया टैरिफ लागू किया, फोर्स्ड लेबर नियमों के बीच कई निर्यात क्षेत्रों पर बढ़ेगा दबाव

    नई दिल्ली । अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले उत्पादों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लागू कर दिया है। यह निर्णय अमेरिकी ट्रेड एक्ट-1974 की धारा 301 के तहत लिया गया है, जिसके माध्यम से उन देशों के खिलाफ व्यापारिक कार्रवाई की जाती है जिनकी सप्लाई चेन में जबरन मजदूरी या श्रम मानकों से जुड़े गंभीर सवाल उठते हैं। यह नया टैरिफ ऐसे समय लागू हुआ है जब पहले से लागू 15 प्रतिशत अस्थायी वैश्विक टैरिफ की अवधि समाप्त हो गई। इसके साथ ही भारत के लिए नई शुल्क व्यवस्था प्रभावी हो गई है, जिससे कई निर्यात क्षेत्रों पर सीधा असर पड़ने की संभावना है।

    अमेरिका ने इस नई व्यवस्था के तहत कुल 60 देशों पर 10 से 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाया है। इनमें भारत सहित कुछ देशों को 10 प्रतिशत वाले समूह में रखा गया है, जबकि अन्य देशों पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लागू किया गया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि जिन देशों ने फोर्स्ड लेबर से जुड़े उत्पादों पर रोक लगाने या श्रम मानकों में सुधार के लिए कदम उठाए हैं, उन्हें अपेक्षाकृत कम टैरिफ श्रेणी में रखा गया है।

    भारत के लिए राहत की बात यह रही कि प्रारंभिक प्रस्ताव में 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ की बात कही गई थी, लेकिन बाद में इसे घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया। अमेरिकी पक्ष का मानना है कि भारत ने श्रम मानकों, सप्लाई चेन की निगरानी और विदेशी व्यापार नीति में कुछ महत्वपूर्ण सुधार किए हैं। इन कदमों के आधार पर प्रस्तावित अतिरिक्त शुल्क में 2.5 प्रतिशत की कमी की गई। हालांकि यह स्पष्ट किया गया है कि अमेरिका भविष्य में भी इन सुधारों की निगरानी जारी रखेगा।

    अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार माना जाता है। ऐसे में नया टैरिफ उन उद्योगों के लिए चुनौती बन सकता है जिनकी अमेरिकी बाजार पर निर्भरता अधिक है। टेक्सटाइल और गारमेंट्स, रत्न एवं आभूषण, चमड़ा उद्योग, कृषि एवं खाद्य उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान, रसायन और विभिन्न विनिर्माण उत्पादों पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है। अतिरिक्त शुल्क लागू होने से भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में महंगे हो सकते हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा बढ़ने और निर्यातकों पर कीमत कम करने का दबाव बनने की संभावना है।

    फोर्स्ड लेबर का अर्थ ऐसी मजदूरी से है जिसमें किसी व्यक्ति से उसकी इच्छा के विरुद्ध काम कराया जाता है। इसमें धमकी देना, वेतन रोकना, कर्ज के बदले काम कराने की मजबूरी, पहचान संबंधी दस्तावेज जब्त करना या नौकरी छोड़ने की स्वतंत्रता न देना जैसी स्थितियां शामिल होती हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना जाता है और कई देश इस प्रकार के उत्पादों के आयात पर कड़ी निगरानी रखते हैं।

    अमेरिकी कानून के सेक्शन 301 के तहत सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि यदि किसी देश की व्यापारिक नीतियां या उत्पादन प्रणाली अमेरिकी उद्योगों के लिए अनुचित या नुकसानदायक मानी जाती हैं, तो उसके खिलाफ अतिरिक्त टैरिफ, आयात प्रतिबंध या अन्य व्यापारिक कदम उठाए जा सकते हैं। इस प्रक्रिया में जांच के बाद संबंधित देश से बातचीत भी की जाती है और उसके बाद अंतिम निर्णय लागू होता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए यह स्थिति चुनौती और अवसर दोनों लेकर आई है। यदि भारतीय उद्योग अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों, पारदर्शी सप्लाई चेन और गुणवत्ता मानकों को और मजबूत करते हैं, तो भविष्य में शुल्क संबंधी दबाव कम करने के साथ वैश्विक बाजारों में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति भी बेहतर बना सकते हैं।

  • फोर्स लेबर आयात प्रतिबंध का मिला फायदा, अमेरिका ने भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा, कई देशों पर अधिक शुल्क

    फोर्स लेबर आयात प्रतिबंध का मिला फायदा, अमेरिका ने भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा, कई देशों पर अधिक शुल्क

    नई दिल्ली । अमेरिका ने फोर्स लेबर से बने उत्पादों के आयात को लेकर अपनी नई व्यापारिक कार्रवाई के तहत भारत पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने का निर्णय लिया है। हालांकि यह दर उन कई देशों की तुलना में कम है, जिन पर 12.5 प्रतिशत तक का शुल्क लगाया गया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि भारत ने जांच प्रक्रिया के दौरान फोर्स लेबर से निर्मित उत्पादों के आयात पर रोक लगाने की दिशा में कदम उठाए, जिसके कारण उसे अपेक्षाकृत कम टैरिफ वाली श्रेणी में रखा गया।

    यह निर्णय अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (यूएसटीआर) द्वारा सेक्शन 301 के तहत की गई व्यापक जांच के बाद लिया गया है। जांच में 60 प्रमुख व्यापारिक अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों और व्यवस्थाओं की समीक्षा की गई। अमेरिकी प्रशासन का आरोप था कि इन देशों ने जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर प्रभावी प्रतिबंध लगाने या उसके पालन को सुनिश्चित करने में पर्याप्त कदम नहीं उठाए। इसी आधार पर विभिन्न देशों के लिए अलग-अलग टैरिफ दरें तय की गई हैं।

    यूएसटीआर के अनुसार, भारत उन 17 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है जिन्हें 10 प्रतिशत टैरिफ की श्रेणी में रखा गया है। इस समूह में बांग्लादेश, कनाडा, इंडोनेशिया, मलेशिया, मेक्सिको, पाकिस्तान, श्रीलंका और यूनाइटेड किंगडम जैसे देश भी शामिल हैं। वहीं चीन, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, वियतनाम और दक्षिण अफ्रीका सहित कई अन्य देशों पर 12.5 प्रतिशत तक का टैरिफ लागू किया जाएगा। यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड और ताइवान के लिए अलग व्यवस्था अपनाई गई है।

    अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि जून में प्रस्तावित कार्रवाई सार्वजनिक किए जाने के बाद भारत ने फोर्स लेबर से बने उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लागू करने की दिशा में कदम उठाए। इसी पहल को ध्यान में रखते हुए भारत को अधिक अनुकूल श्रेणी में रखा गया। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने कहा कि यह कदम वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जबरन श्रम को समाप्त करने और व्यापारिक व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है।

    इस जांच प्रक्रिया के दौरान दो चरणों में सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की गई, 45 से अधिक सरकारों से परामर्श किया गया और दो हजार से अधिक सार्वजनिक टिप्पणियां प्राप्त हुईं। इसके आधार पर यूएसटीआर ने निष्कर्ष निकाला कि समीक्षा के दायरे में शामिल सभी अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों में सुधार की आवश्यकता है। इसी कारण 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत कार्रवाई का निर्णय लिया गया।

    हालांकि अमेरिका ने कुछ आवश्यक उत्पादों को इस कार्रवाई से बाहर भी रखा है। इनमें दवाएं, सेमीकंडक्टर निर्माण उपकरण, चुनिंदा कच्चा माल और घरेलू आपूर्ति श्रृंखला के लिए महत्वपूर्ण वस्तुएं शामिल हैं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इन वस्तुओं पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा जाना द्विपक्षीय व्यापार संबंधों के लिए सकारात्मक संकेत माना जा सकता है, हालांकि आगे इसका प्रभाव दोनों देशों के व्यापार और निर्यात पर नजर रखने के बाद ही स्पष्ट होगा।

  • भारत सहित 54 देशों पर नया टैरिफ लगाने की तैयारी में अमेरिका…. USTR ने रखा प्रस्ताव

    भारत सहित 54 देशों पर नया टैरिफ लगाने की तैयारी में अमेरिका…. USTR ने रखा प्रस्ताव


    नई दिल्ली।
    भारत और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल (India and US Delegation) द्विपक्षीय व्यापार वार्ता (Bilateral Trade talks) को अंतिम रूप देने की कोशिशों में जुटा है। इसी बीच अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (US Trade Representative- USTR) ने बंधुआ मजदूरी से निर्मित वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लागू न करने के आरोप में भारत सहित 54 देशों पर 12.5% अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्ताव उन जांच के बाद सामने आया है, जो अमेरिका ने 60 देशों के खिलाफ इस आधार पर शुरू की थीं कि वे बंधुआ मजदूरी से बनी वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाने और उसे प्रभावी ढंग से लागू करने में असफल रहे हैं। इस प्रस्ताव की टाइमिंग काफी अहम है क्योंकि इस वक्त नई दिल्ली में दोनों देशों के बीच व्यापार सौदे को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस लिहाज से इसे एक झटका माना जा रहा है।

    अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTS) जैमीसन ग्रीर ने एक बयान में कहा, ”हमारे सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों द्वारा बंधुआ मजदूरी से निर्मित वस्तुओं के आयात पर रोक लगाने में विफल रहना अस्वीकार्य है। इससे ऐसी स्थिति पैदा होती है, जिसमें अमेरिकी श्रमिकों को वैश्विक स्तर पर असमान प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।” उन्होंने कहा, ”हम अब इस असमानता को बर्दाश्त नहीं करेंगे और इसका उल्लंघन करने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाएंगे” यह प्रस्ताव 1974 के अमेरिकी व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत की गई 60 जांचों में से एक के बाद आया है।


    क्या है USTR की धारा 301?

    USTR (यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव) की धारा 301 अमेरिकी व्यापार अधिनियम 1974 का एक प्रमुख प्रावधान है। यह अमेरिका को व्यापारिक साझेदार देशों की अनुचित व्यापार नीतियों या वबां प्रचलित परंपराओं की जांच करने और अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए आयात शुल्क या व्यापार प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या वे उपाय अनुचित या भेदभावपूर्ण हैं, या क्या वे US के व्यापार और वाणिज्यिक हितों पर कोई बेवजह बोझ तो नहीं डालते हैं।


    सुधारात्मक कार्रवाई करने की अनुमति

    अगर जाँच में यह पाया जाता है कि किसी देश ने द्विपक्षीय व्यापार के लिए ऐसे तौर-तरीके अपनाए हैं, जिन्हें अमेरिकी व्यापार के लिए हानिकारक मानता है, तो धारा-301 के प्रावधान US प्रशासन को उस मामले में सुधारात्मक कार्रवाई करने की अनुमति देता है। इन उपायों में ऊँचे टैरिफ लगाना, व्यापार पर प्रतिबंध लगाना या अन्य ऐसे उपाय शामिल हो सकते हैं जिनका उद्देश्य जाँच के दौरान सामने आई चिंताओं को दूर करना होता है।

    बंधुआ मजदूरी वाले आरोप पर भारत का क्या जवाब?
    भारत ने बंधुआ मजदूरी संबंधी आरोपों को खारिज करते हुए अमेरिका से इन जांचों को समाप्त करने की मांग की है। भारत का कहना है कि ऐसे मुद्दों का समाधान दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं के ढांचे के भीतर किया जाना चाहिए। वाणिज्य मंत्रालय ने कहा, ”भारत धारा-301 कार्यवाही के मामले में अमेरिका के साथ संपर्क में है। साथ ही भारत दो फरवरी 2026 को घोषित समझौते के ढांचे और सात फरवरी 2026 को जारी संयुक्त बयान के अनुरूप अमेरिका के साथ समझौते को अंतिम रूप देने के लिए भी बातचीत कर रहा है।”


    सार्वजनिक सुनवाई सात जुलाई 2026 को

    इसमें कहा गया कि धारा-232 (क्षेत्रीय) शुल्क के तहत आने वाले उत्पादों और कुछ अन्य वस्तुओं को इन प्रस्तावित शुल्कों से बाहर रखा गया है। कपड़ा एवं परिधान उत्पादों के लिए एक विशेष प्रणाली प्रस्तावित की गई है, जिसके तहत चयनित देशों से एक निश्चित मात्रा में आयात को अमेरिका में कम शुल्क दरों पर प्रवेश की अनुमति मिल सकती है। वाणिज्य मंत्रालय ने कहा, ”रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित शुल्क अभी अंतिम नहीं हैं और हितधारक 22 जून 2026 तक सार्वजनिक सुनवाई में भाग लेने के लिए आवेदन कर सकते हैं। लिखित टिप्पणियां छह जुलाई 2026 तक प्रस्तुत की जा सकती हैं।” सार्वजनिक सुनवाई सात जुलाई 2026 को होगी।

    उधऱ, ग्रीर ने कहा कि कुछ व्यापारिक साझेदारों ने बंधुआ मजदूरी से बनी वस्तुओं के आयात को रोकने के लिए शुरुआती कदम उठाए हैं। इनमें अमेरिका, मेक्सिको-कनाडा के बीच समझौते (यूएसएमसीए) और पारस्परिक व्यापार समझौतों के तहत जतायी गयी प्रतिबद्धताएं शामिल हैं।हालांकि, उन्होंने कहा कि ”प्रत्येक व्यापारिक साझेदार को यह सुनिश्चित करने के लिए और अधिक प्रयास करने होंगे कि वैश्विक व्यापार बंधुआ मजदूरी को बढ़ावा न दे और उसे स्थायी न बनाए।” अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने एक बयान में कहा कि भारत, चीन, जापान, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और सऊदी अरब सहित 54 देशों ने बंधुआ मजदूरी से बनी वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाने और उसे प्रभावी ढंग से लागू करने में विफलता दिखाई है।