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  • एआई कंपनियों के वैल्यूएशन में गिरावट से भारत में बढ़ सकता है पूंजी प्रवाह, आरबीआई गवर्नर ने वैश्विक जोखिमों पर जताई चिंता

    एआई कंपनियों के वैल्यूएशन में गिरावट से भारत में बढ़ सकता है पूंजी प्रवाह, आरबीआई गवर्नर ने वैश्विक जोखिमों पर जताई चिंता

    नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी कंपनियों के वैल्यूएशन में कमी आने से वैश्विक निवेश चक्र में धीमापन होने के बावजूद भारत में पूंजी प्रवाह बढ़ सकता है। उन्होंने शनिवार को राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव 2026 में यह बात कही। उनके अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में एआई निवेश में तेजी वैश्विक वित्तीय बाजार के लिए प्रमुख प्रेरक कारकों में रही है। हालांकि, एआई से जुड़े निवेश या कमाई में कमी आने पर इस क्षेत्र से जुड़ी वित्तीय परिसंपत्तियों की कीमतों में बड़ा बदलाव हो सकता है।

    मल्होत्रा ने कहा कि एआई क्षेत्र में ऐसी गिरावट वैश्विक बाजारों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है, लेकिन इसका भारत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है। उन्होंने कहा कि अगर विकसित देशों में एआई से जुड़े वैल्यूएशन में सुधार होता है, तो इससे भारत की ओर पूंजी प्रवाह पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। उनके मुताबिक, हाल के महीनों में भारतीय इक्विटी बाजार में भी ऊंचे वैल्यूएशन से सुधार हुआ है और इसे बाजार की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए।

    आरबीआई गवर्नर ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली के सामने मौजूद कई अन्य जोखिमों का भी उल्लेख किया। इनमें वैश्विक स्तर पर बढ़ा हुआ कर्ज, नॉन-बैंक फाइनेंशियल सेक्टर में लीवरेज, प्राइवेट क्रेडिट एक्सपोजर में वृद्धि और साइबर सुरक्षा से जुड़े खतरे शामिल हैं। उन्होंने हालांकि स्पष्ट किया कि इन कमजोरियों का होना तत्काल किसी वित्तीय संकट की शुरुआत का संकेत नहीं है। उनके अनुसार, इन जोखिमों को लेकर सतर्क रहना जरूरी है, भले ही फिलहाल संकट के तत्काल संकेत दिखाई नहीं दे रहे हों।

    मल्होत्रा ने कहा कि भारत मजबूत व्यापक आर्थिक आधार और बैंकों तथा नॉन-बैंक फाइनेंशियल संस्थानों की मजबूत बैलेंस शीट के सहारे चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल का सामना कर रहा है। उन्होंने यह भी माना कि कमोडिटी की कीमतों, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों और पूंजी प्रवाह में बदलाव के कारण भारत बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है। इसके बावजूद उन्होंने घरेलू वित्तीय प्रणाली की मजबूती को रेखांकित किया और कहा कि वित्तीय क्षेत्र में मजबूती बनी हुई है।

    आरबीआई गवर्नर के बयान में एआई निवेश से जुड़े वैश्विक घटनाक्रम और भारत में संभावित पूंजी प्रवाह के बीच संबंध पर जोर दिया गया। उनके मुताबिक, विकसित अर्थव्यवस्थाओं में एआई से जुड़े वैल्यूएशन में सुधार भारत के लिए पूंजी आकर्षित करने का अवसर बन सकता है। दूसरी ओर, वैश्विक कर्ज, वित्तीय संस्थानों में बढ़ता लीवरेज, निजी ऋण का बढ़ता एक्सपोजर और साइबर सुरक्षा जैसे जोखिमों पर नजर रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत की घरेलू वित्तीय प्रणाली मजबूत बनी हुई है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव के कारण सतर्कता आवश्यक है।

  • सितंबर में एफपीआई ने भारतीय शेयर बाजार से निकाले 45,536 करोड़ रुपये, लार्ज-कैप शेयरों के वैल्यूएशन अब आकर्षक

    सितंबर में एफपीआई ने भारतीय शेयर बाजार से निकाले 45,536 करोड़ रुपये, लार्ज-कैप शेयरों के वैल्यूएशन अब आकर्षक


    नई दिल्ली ।
    सितंबर 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी एफपीआई ने भारतीय शेयर बाजार में बड़ी बिकवाली की। महीने के दौरान उन्होंने कुल 45,536 करोड़ रुपये के इक्विटी शेयर बेचे। हालांकि, प्राथमिक बाजार में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी बनी रही और उन्होंने सितंबर में 9,676 करोड़ रुपये का निवेश किया। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, विदेशी निवेशकों की बढ़ती बिकवाली के पीछे अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड का 5.2 प्रतिशत से ऊपर पहुंचना और कच्चे तेल की कीमतों के लंबे समय तक ऊंचे बने रहने की आशंका प्रमुख कारण रही।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, लगातार विदेशी बिकवाली ने भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बढ़ाया है। इसी दबाव के बीच बाजार लगातार आठ सप्ताह गिरावट के साथ बंद हुआ। इस दौरान 13 प्रतिशत कम बारिश वाले कमजोर मानसून ने भी निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया। हालांकि, बाजार में हालिया करेक्शन के बाद बड़ी कंपनियों यानी लार्ज-कैप शेयरों के वैल्यूएशन पहले की तुलना में अधिक आकर्षक दिखाई देने लगे हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि गुणवत्ता वाली बड़ी कंपनियों के शेयरों में लंबी अवधि के निवेशकों के लिए अवसर बन सकते हैं।

    विदेशी निवेशकों की बिकवाली में ठहराव या उनके दोबारा खरीदारी की ओर लौटने के लिए कुछ सकारात्मक संकेतों की जरूरत होगी। इनमें कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में नरमी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जुलाई और अगस्त में कच्चे तेल की कीमतों में संभावित गिरावट की उम्मीद के कारण एफपीआई का रुख कुछ सकारात्मक हुआ था, लेकिन यह बदलाव ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सका। 28 सितंबर से 1 अक्टूबर के बीच केवल चार कारोबारी सत्रों में विदेशी निवेशकों ने करीब 34,965 करोड़ रुपये की अस्थायी इक्विटी बिकवाली की, जबकि इसी अवधि के लिए निर्धारित इक्विटी बिकवाली 27,962 करोड़ रुपये रही। इससे महीने के अंत और अक्टूबर की शुरुआत में विदेशी निकासी तेज होने का संकेत मिला।

    बाजार रणनीतिकारों के अनुसार, द्वितीयक बाजार में बिकवाली और प्राथमिक बाजार में निवेश का अंतर यह दर्शाता है कि विदेशी निवेशक भारत से पूरी तरह बाहर नहीं जा रहे हैं। वे निवेश के अवसरों का चयन पहले की तुलना में अधिक सावधानी से कर रहे हैं। यह रुझान अक्टूबर में भी जारी रहने की संभावना जताई गई है। दूसरी ओर, घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी डीआईआई ने बाजार को मजबूत सहारा दिया। सितंबर 2026 में डीआईआई ने नकद इक्विटी बाजार में 76,030 करोड़ रुपये की खरीदारी की। घरेलू संस्थागत और खुदरा निवेशकों की लगातार खरीदारी ने विदेशी बिकवाली के दबाव को काफी हद तक संतुलित किया।

    आगे बाजार की दिशा वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के कॉरपोरेट नतीजों से भी प्रभावित होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, जिन कंपनियों के परिणाम उम्मीद से बेहतर रहेंगे और जिनका प्रबंधन भविष्य को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण पेश करेगा, उनके शेयरों में निवेशकों की खरीदारी बढ़ सकती है। ऐसे में विदेशी निवेशकों की गतिविधि, घरेलू संस्थागत निवेश, कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और कंपनियों के दूसरी तिमाही के प्रदर्शन पर बाजार की नजर बनी रहेगी।

  • सोना महंगा तो चांदी सस्ती क्यों दिख रही, गोल्ड-सिल्वर रेशियो और फेयर वैल्यू से समझिए दोनों धातुओं की कीमत का अंतर

    सोना महंगा तो चांदी सस्ती क्यों दिख रही, गोल्ड-सिल्वर रेशियो और फेयर वैल्यू से समझिए दोनों धातुओं की कीमत का अंतर

    नई दिल्ली ।मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी MCX पर मंगलवार, 8 सितंबर को सोने और चांदी के वायदा भाव में मिला-जुला कारोबार देखने को मिला। कमजोर अमेरिकी डॉलर और अमेरिका की मौद्रिक नीति को लेकर बनी उम्मीदों से कीमती धातुओं को समर्थन मिला। अक्टूबर गोल्ड फ्यूचर्स 1.53 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम पर रहा और इसमें 0.14 प्रतिशत की तेजी दर्ज हुई। दूसरी ओर दिसंबर सिल्वर फ्यूचर्स 2.38 लाख रुपये प्रति किलो पर रहा, जिसमें 0.08 प्रतिशत की गिरावट आई।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना करीब 4,434 डॉलर प्रति औंस और चांदी लगभग 66.95 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रही थी। दोनों धातुओं पर मौजूदा आर्थिक संकेतों का प्रभाव पड़ रहा है, लेकिन उनकी कीमत और वैल्यूएशन की स्थिति एक जैसी नहीं है।

    सोने की मॉडल्ड फेयर वैल्यू 3,248 से 4,595 डॉलर प्रति औंस के बीच बताई गई है। इसका मिडपॉइंट 3,922 डॉलर प्रति औंस है। अगस्त की शुरुआत में सोना करीब 4,242 डॉलर प्रति औंस पर था, जो अनुमानित मिडपॉइंट से करीब 8 प्रतिशत अधिक था। जनवरी में सोना 5,589 डॉलर प्रति औंस के स्तर तक पहुंचा था, जो मॉडल्ड रेंज से काफी ऊपर था।

    इसके बाद जून में सोने की कीमत लगभग 3,985 डॉलर प्रति औंस तक आई, जो अनुमानित फेयर वैल्यू के करीब थी। बाद में सोने में फिर तेजी देखने को मिली। इसका मतलब यह है कि पहले की तेज सट्टेबाजी कुछ कम हुई है, लेकिन सोना अभी भी मॉडल्ड मिडपॉइंट से ऊपर कारोबार कर रहा है।

    चांदी के मामले में तस्वीर कुछ अलग है। इसकी वैल्यूएशन को गोल्ड-सिल्वर रेशियो के आधार पर देखा जा रहा है। 60:1 के सामान्य रेशियो के अनुसार चांदी की अनुमानित कीमत 54 से 77 डॉलर प्रति औंस के बीच बनती है, जिसका मिडपॉइंट 65 डॉलर है। विश्लेषण के अनुसार चांदी करीब 61.7 डॉलर प्रति औंस पर थी, यानी मिडपॉइंट से लगभग 6 प्रतिशत नीचे।

    गोल्ड-सिल्वर रेशियो भी चांदी की तुलनात्मक स्थिति को समझने में मदद करता है। जनवरी में यह अनुपात करीब 46 तक पहुंच गया था, जिसका मतलब था कि सोने की तुलना में चांदी महंगी हो गई थी। अब यह लगभग 69 पर पहुंच चुका है, जो 21वीं सदी के करीब 69:1 के औसत के आसपास है।

    चांदी को केवल निवेश मांग से ही समर्थन नहीं मिलता। इसका इस्तेमाल औद्योगिक कार्यों में भी होता है। इसलिए इसकी कीमत पर निवेश मांग के साथ औद्योगिक मांग का भी प्रभाव पड़ता है। रुपये की कमजोरी भी घरेलू MCX सिल्वर के लिए समर्थन देने वाला कारक मानी जा रही है।

    MCX सिल्वर के लिए 2.36 लाख रुपये प्रति किलो का स्तर सपोर्ट और 2.42 लाख रुपये प्रति किलो का स्तर रेजिस्टेंस बताया गया है। यदि चांदी रेजिस्टेंस के ऊपर टिकती है तो खरीदारी बढ़ने की संभावना बताई गई है।

    अब बाजार की नजर अमेरिका के आने वाले महंगाई आंकड़ों पर है। PPI और CPI जैसे आंकड़े फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर बाजार की उम्मीदों को प्रभावित कर सकते हैं। सोने के लिए 4,300 से 4,500 डॉलर प्रति औंस और चांदी के लिए 65 से 67 डॉलर प्रति औंस के स्तर महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

    भारतीय निवेशकों के लिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों के साथ रुपये की चाल भी अहम है। अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने के साथ रुपया कमजोर होने पर घरेलू सोने-चांदी की कीमतों में तेजी अधिक दिख सकती है। वहीं अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट की स्थिति में कमजोर रुपया घरेलू कीमतों में गिरावट को कुछ हद तक सीमित कर सकता है।

  • शेयर बाजार की शीर्ष कंपनियों में बड़ा बदलाव, एसबीआई की वैल्यूएशन में सबसे ज्यादा बढ़त

    शेयर बाजार की शीर्ष कंपनियों में बड़ा बदलाव, एसबीआई की वैल्यूएशन में सबसे ज्यादा बढ़त

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार की शीर्ष 10 सबसे अधिक मूल्यवान कंपनियों में बीते सप्ताह बाजार पूंजीकरण के स्तर पर मिला-जुला रुझान देखने को मिला। शीर्ष दस में शामिल चार कंपनियों की कुल मार्केट वैल्यूएशन में 1.43 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बढ़ोतरी हुई, जबकि छह कंपनियों का संयुक्त बाजार पूंजीकरण करीब 1.23 लाख करोड़ रुपये घट गया। इस दौरान भारतीय स्टेट बैंक यानी एसबीआई सबसे अधिक लाभ पाने वाली कंपनी रही।

    एसबीआई के बाजार पूंजीकरण में सप्ताह के दौरान 63,922.03 करोड़ रुपये की उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसके साथ ही बैंक की कुल बाजार वैल्यूएशन बढ़कर 10,11,721.84 करोड़ रुपये हो गई। बैंक के वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के बेहतर वित्तीय प्रदर्शन को इस बढ़त की प्रमुख वजहों में माना गया।

    मार्केटकैप में बढ़ोतरी के लिहाज से रिलायंस इंडस्ट्रीज दूसरे प्रमुख लाभार्थियों में रही। कंपनी की बाजार वैल्यूएशन 32,816.4 करोड़ रुपये बढ़कर 18,01,925.19 करोड़ रुपये पहुंच गई। इससे कंपनी शीर्ष मूल्यवान कंपनियों की सूची में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखने में सफल रही।

    सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी टीसीएस के बाजार पूंजीकरण में भी अच्छी बढ़त दर्ज हुई। कंपनी की वैल्यूएशन 31,875.35 करोड़ रुपये बढ़कर 8,87,770.13 करोड़ रुपये हो गई। इंजीनियरिंग और निर्माण क्षेत्र की प्रमुख कंपनी लार्सन एंड टुब्रो का मार्केटकैप भी 14,637.76 करोड़ रुपये बढ़ा और 5,56,482.45 करोड़ रुपये पर पहुंच गया।

    दूसरी ओर, शीर्ष 10 कंपनियों में छह कंपनियों को बाजार पूंजीकरण के स्तर पर नुकसान उठाना पड़ा। इनमें सबसे बड़ी गिरावट भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी में रही। कंपनी की बाजार वैल्यूएशन 40,543.23 करोड़ रुपये कम होकर 4,96,891.82 करोड़ रुपये रह गई।

    बजाज फाइनेंस के बाजार पूंजीकरण में 37,168.96 करोड़ रुपये की कमी दर्ज की गई। इसके बाद कंपनी की कुल वैल्यूएशन 6,73,648.55 करोड़ रुपये रह गई। एचडीएफसी बैंक का मार्केटकैप भी 24,183.16 करोड़ रुपये घटकर 11,27,967.47 करोड़ रुपये पर आ गया।

    आईसीआईसीआई बैंक की बाजार वैल्यूएशन में 9,507.67 करोड़ रुपये की गिरावट आई और यह 10,20,370.63 करोड़ रुपये रह गई। भारती एयरटेल का बाजार पूंजीकरण 7,581.65 करोड़ रुपये घटकर 12,22,423.98 करोड़ रुपये पर पहुंच गया।

    हिंदुस्तान यूनिलीवर भी उन कंपनियों में शामिल रही जिनके मार्केटकैप में गिरावट दर्ज की गई। कंपनी की बाजार वैल्यूएशन 4,793.16 करोड़ रुपये घटकर 4,88,808.97 करोड़ रुपये रह गई। इस तरह शीर्ष 10 कंपनियों के बीच सप्ताह के दौरान बाजार मूल्यांकन में स्पष्ट रूप से अलग-अलग दिशा देखने को मिली।

    इसी अवधि में भारतीय शेयर बाजार कुल मिलाकर बढ़त के साथ बंद हुआ। सेंसेक्स 404.53 अंक यानी 0.51 प्रतिशत की तेजी के साथ बंद हुआ। वहीं, निफ्टी में 187.05 अंक यानी 0.76 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। बाजार की इस तेजी के बीच कुछ बड़ी कंपनियों के शेयरों में खरीदारी बढ़ी, जबकि कई प्रमुख कंपनियों के मूल्यांकन में गिरावट रही।

    बाजार पूंजीकरण में हुए इस बदलाव से शीर्ष कंपनियों के बीच निवेशकों के रुझान में अंतर भी सामने आया। खास तौर पर एसबीआई की मजबूत बढ़त ने सप्ताह के दौरान उसके कुल बाजार मूल्यांकन को 10 लाख करोड़ रुपये के स्तर से ऊपर पहुंचा दिया। वहीं, कुछ अन्य बड़ी कंपनियों में गिरावट के कारण उनके बाजार पूंजीकरण में कमी दर्ज हुई।

  • भारतीय शेयर बाजार में बड़ी कंपनियों की दमदार वापसी, शीर्ष 10 में शामिल पांच दिग्गजों का मार्केटकैप 1.54 लाख करोड़ रुपये बढ़ा

    भारतीय शेयर बाजार में बड़ी कंपनियों की दमदार वापसी, शीर्ष 10 में शामिल पांच दिग्गजों का मार्केटकैप 1.54 लाख करोड़ रुपये बढ़ा


    नई दिल्ली ।
    भारतीय शेयर बाजार के लिए बीता सप्ताह सकारात्मक संकेतों के साथ समाप्त हुआ। मजबूत निवेशक धारणा, चुनिंदा क्षेत्रों में खरीदारी और बेहतर कॉरपोरेट प्रदर्शन के कारण देश की शीर्ष 10 सूचीबद्ध कंपनियों में से पांच के बाजार पूंजीकरण में संयुक्त रूप से 1.54 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस दौरान सूचना प्रौद्योगिकी और बैंकिंग क्षेत्र की प्रमुख कंपनियां निवेशकों के आकर्षण का केंद्र रहीं, जबकि कुछ बड़ी कंपनियों के बाजार मूल्यांकन में गिरावट भी देखने को मिली।

    सप्ताह के दौरान सबसे अधिक लाभ टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज को मिला। कंपनी के बाजार पूंजीकरण में 72 हजार करोड़ रुपये से अधिक का इजाफा हुआ, जिससे उसका कुल बाजार मूल्य 8.20 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया। कंपनी के बेहतर तिमाही नतीजों और आने वाली तिमाहियों में कारोबार की संभावनाओं को लेकर प्रबंधन के सकारात्मक संकेतों ने निवेशकों का भरोसा मजबूत किया। इसके परिणामस्वरूप आईटी क्षेत्र में खरीदारी तेज हुई और कंपनी के शेयरों में मजबूती देखने को मिली।

    निजी क्षेत्र के आईसीआईसीआई बैंक ने भी उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। सप्ताहभर में बैंक के बाजार पूंजीकरण में 29 हजार करोड़ रुपये से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। इसके अलावा रिलायंस इंडस्ट्रीज के बाजार मूल्य में भी लगभग 24 हजार करोड़ रुपये का इजाफा हुआ। वित्तीय क्षेत्र की प्रमुख कंपनी बजाज फाइनेंस और सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने भी बाजार पूंजीकरण में उल्लेखनीय बढ़त दर्ज कर निवेशकों को सकारात्मक रिटर्न दिया।

    हालांकि सभी बड़ी कंपनियों का प्रदर्शन एक जैसा नहीं रहा। इंजीनियरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की प्रमुख कंपनी लार्सन एंड टुब्रो के बाजार मूल्यांकन में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा भारतीय जीवन बीमा निगम, भारती एयरटेल, एचडीएफसी बैंक और हिंदुस्तान यूनिलीवर के बाजार पूंजीकरण में भी कमी देखने को मिली। इसके बावजूद इन कंपनियों की बाजार स्थिति मजबूत बनी रही और वे देश की सबसे मूल्यवान सूचीबद्ध कंपनियों में शामिल रहीं।

    सप्ताह के अंत तक रिलायंस इंडस्ट्रीज देश की सबसे अधिक बाजार मूल्य वाली सूचीबद्ध कंपनी बनी रही। इसके बाद एचडीएफसी बैंक, भारती एयरटेल, आईसीआईसीआई बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, बजाज फाइनेंस, भारतीय जीवन बीमा निगम, लार्सन एंड टुब्रो और हिंदुस्तान यूनिलीवर का स्थान रहा। यह क्रम भारतीय कॉरपोरेट जगत में इन कंपनियों की मजबूत उपस्थिति और निवेशकों के विश्वास को दर्शाता है।

    समूचे शेयर बाजार का प्रदर्शन भी उत्साहजनक रहा। सप्ताह के दौरान सेंसेक्स में 582 अंकों से अधिक की बढ़त दर्ज हुई, जबकि निफ्टी भी 127 अंकों से अधिक मजबूत होकर बंद हुआ। विभिन्न सेक्टरों में सूचना प्रौद्योगिकी सबसे अधिक लाभ देने वाला सूचकांक रहा। इसके अलावा कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, मीडिया, प्राइवेट बैंक, ऑयल एंड गैस, ऑटो, सर्विसेज, सार्वजनिक उपक्रम और ऊर्जा क्षेत्रों में भी सकारात्मक बढ़त देखने को मिली।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत कॉरपोरेट नतीजों, बेहतर आर्थिक संकेतकों और निवेशकों के बढ़ते विश्वास के कारण भारतीय शेयर बाजार में सकारात्मक माहौल बना हुआ है। यदि आने वाले समय में कंपनियों के तिमाही परिणाम अपेक्षाओं के अनुरूप रहते हैं और वैश्विक परिस्थितियां स्थिर बनी रहती हैं, तो बाजार में यह सकारात्मक रुझान आगे भी जारी रह सकता है। फिलहाल शीर्ष कंपनियों के बाजार पूंजीकरण में आई यह बढ़ोतरी भारतीय इक्विटी बाजार की मजबूती और निवेशकों के भरोसे का महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है।

  • आईपीओ से पहले एनएसई पर उठे वैल्यूएशन के सवाल, ब्रोकरेज ने दी बिकवाली की सलाह; घटते ट्रेडिंग वॉल्यूम और मार्केट शेयर को बताया सबसे बड़ी चिंता

    आईपीओ से पहले एनएसई पर उठे वैल्यूएशन के सवाल, ब्रोकरेज ने दी बिकवाली की सलाह; घटते ट्रेडिंग वॉल्यूम और मार्केट शेयर को बताया सबसे बड़ी चिंता

    नई दिल्ली । देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के प्रस्तावित आईपीओ से पहले बाजार में इसकी वैल्यूएशन को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। एक प्रमुख ब्रोकरेज फर्म ने एनएसई की कवरेज शुरू करते हुए निवेशकों को बिकवाली की सलाह दी है। आमतौर पर किसी कंपनी के आईपीओ से पहले इस तरह की राय कम ही देखने को मिलती है, इसलिए यह रिपोर्ट निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों के बीच विशेष चर्चा का विषय बन गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि एक्सचेंज के ट्रेडिंग वॉल्यूम में लगातार आ रही गिरावट और बाजार हिस्सेदारी में कमी भविष्य की ग्रोथ पर दबाव डाल सकती है।

    ब्रोकरेज फर्म का मानना है कि एनएसई की मौजूदा अनलिस्टेड मार्केट वैल्यू उसके वित्तीय प्रदर्शन की तुलना में अधिक दिखाई देती है। इसी आधार पर कंपनी के लिए 1,550 रुपये का लक्ष्य मूल्य निर्धारित किया गया है, जो अनलिस्टेड बाजार में प्रचलित करीब 2,085 रुपये के मूल्य से लगभग 26 प्रतिशत कम है। फर्म का कहना है कि मौजूदा स्तर पर निवेशकों को भविष्य में अपेक्षित रिटर्न सीमित मिल सकता है।

    रिपोर्ट के अनुसार, हाल के वर्षों में एनएसई के परिचालन प्रदर्शन में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले हैं। कंपनी की कुल परिचालन आय में वर्ष-दर-वर्ष गिरावट दर्ज की गई है। यह संकेत देता है कि कारोबार की रफ्तार पहले की तुलना में कुछ धीमी हुई है। विशेष रूप से इक्विटी डेरिवेटिव्स से जुड़े कारोबार में ट्रेडिंग वॉल्यूम कम होने का असर कंपनी की कमाई पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। इससे एक्सचेंज के बाजार हिस्से पर भी दबाव बढ़ा है।

    एनएसई की आय का सबसे बड़ा स्रोत ट्रांजैक्शन चार्जेज माना जाता है। उपलब्ध वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, इस मद से प्राप्त होने वाली आय में भी पिछले वित्त वर्ष की तुलना में कमी दर्ज की गई है। इसके अलावा क्लियरिंग और सेटलमेंट सेवाओं से होने वाली कमाई में भी गिरावट देखने को मिली है। इन दोनों प्रमुख आय स्रोतों में कमी आने से कंपनी के कुल राजस्व पर प्रभाव पड़ा है, जिसे बाजार विशेषज्ञ भविष्य की चुनौती के रूप में देख रहे हैं।

    वित्तीय वर्ष 2026 के दौरान कंपनी की कुल परिचालन आय पिछले वित्त वर्ष की तुलना में तीन प्रतिशत से अधिक कम रही। वहीं ट्रांजैक्शन चार्जेज से प्राप्त आय में लगभग चार प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। विश्लेषकों का मानना है कि यदि ट्रेडिंग गतिविधियों में तेजी नहीं आती और बाजार हिस्सेदारी में सुधार नहीं होता, तो भविष्य में कंपनी के लिए उच्च वैल्यूएशन को बनाए रखना आसान नहीं होगा।

    हालांकि एनएसई भारतीय पूंजी बाजार का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण एक्सचेंज बना हुआ है तथा निवेशकों के बीच उसकी मजबूत पहचान है, लेकिन किसी भी कंपनी की दीर्घकालिक वैल्यू उसके वित्तीय प्रदर्शन और कारोबार की वृद्धि पर निर्भर करती है। इसी कारण विशेषज्ञ निवेशकों को आईपीओ से पहले कंपनी के वित्तीय आंकड़ों, आय के स्रोतों, भविष्य की विकास संभावनाओं और वैल्यूएशन का संतुलित आकलन करने की सलाह दे रहे हैं।

    आने वाले समय में एनएसई का आईपीओ भारतीय पूंजी बाजार की सबसे चर्चित सार्वजनिक पेशकशों में शामिल हो सकता है। ऐसे में निवेशकों की नजर कंपनी के आगामी वित्तीय प्रदर्शन, नियामकीय प्रक्रियाओं और बाजार की प्रतिक्रिया पर बनी रहेगी। यदि कंपनी अपने कारोबार की गति बढ़ाने और आय के प्रमुख स्रोतों को मजबूत करने में सफल रहती है, तो भविष्य में निवेशकों का भरोसा और अधिक मजबूत हो सकता है। फिलहाल ब्रोकरेज की इस रिपोर्ट ने एनएसई के आईपीओ से पहले वैल्यूएशन और ग्रोथ को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है।

  • वैश्विक अस्थिरता और सप्लाई चेन संकट का असर, भारत में प्रीमियम हाउसिंग की कीमतों में 28% तक उछाल; महानगरों में मजबूत बनी मांग

    वैश्विक अस्थिरता और सप्लाई चेन संकट का असर, भारत में प्रीमियम हाउसिंग की कीमतों में 28% तक उछाल; महानगरों में मजबूत बनी मांग


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक स्तर पर बढ़ती आर्थिक अनिश्चितताओं, आपूर्ति श्रृंखलाओं में रुकावट और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत का प्रीमियम आवास बाजार मजबूती के साथ आगे बढ़ रहा है। वर्ष 2026 की पहली छमाही में देश के प्रमुख शहरों में प्रीमियम आवासों की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। ताजा बाजार विश्लेषण के अनुसार कई प्रमुख शहरों में प्रीमियम संपत्तियों के मूल्य में सालाना आधार पर 28 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च आय वर्ग के खरीदार अब बेहतर गुणवत्ता, विश्वसनीय डेवलपर और रणनीतिक लोकेशन वाली परियोजनाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार मुंबई, नोएडा, गुरुग्राम, बेंगलुरु और दिल्ली जैसे प्रमुख रियल एस्टेट बाजारों में प्रीमियम आवासों की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है। निर्माणाधीन प्रीमियम परियोजनाओं की कीमतों में मुंबई में लगभग 10 से 15 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई, जबकि नोएडा में यह बढ़ोतरी 4 से 28 प्रतिशत के बीच रही। गुरुग्राम में करीब 2 प्रतिशत और बेंगलुरु में 3 से 11 प्रतिशत तक की वार्षिक वृद्धि देखी गई। यह संकेत देता है कि विकसित हो रहे शहरी क्षेत्रों और बेहतर कनेक्टिविटी वाले कॉरिडोर में निवेशकों तथा खरीदारों का भरोसा कायम है।

    तैयार प्रीमियम आवासों के बाजार में भी तेजी बनी हुई है। दिल्ली में लग्जरी फ्लोर और तैयार प्रीमियम घरों की औसत कीमतों में 10 से 25 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। बेंगलुरु में यह वृद्धि 8 से 10 प्रतिशत और मुंबई में 2 से 7 प्रतिशत के बीच रही। विशेषज्ञों का मानना है कि तैयार संपत्तियों की बढ़ती मांग उन खरीदारों से आ रही है जो तुरंत रहने योग्य, आधुनिक सुविधाओं से युक्त और उच्च गुणवत्ता वाले घरों की तलाश में हैं।

    रियल एस्टेट क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि बाजार अब केवल तेज कीमत वृद्धि पर आधारित नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक मूल्य सृजन की दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्रीमियम परियोजनाओं में बेहतर निर्माण गुणवत्ता, आधुनिक डिजाइन, ऊर्जा दक्षता, हरित सुविधाएं और वेलनेस आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे पहलुओं को अधिक महत्व दिया जा रहा है। यही कारण है कि उच्च आय वर्ग के खरीदार अब केवल संपत्ति खरीदने के बजाय दीर्घकालिक निवेश और बेहतर जीवनशैली को ध्यान में रखकर निर्णय ले रहे हैं।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान का असर निर्माण सामग्री की लागत पर भी पड़ा है। कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि और लॉजिस्टिक लागत बढ़ने से परियोजनाओं की कुल लागत प्रभावित हुई है, जिसका असर प्रीमियम आवासों की कीमतों में भी दिखाई दिया। इसके बावजूद मांग में कमी नहीं आई है, क्योंकि बेहतर आय, मजबूत निवेश क्षमता और गुणवत्तापूर्ण आवासों की बढ़ती आवश्यकता इस वर्ग के बाजार को समर्थन दे रही है।

    विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि खरीदार अब पहले की तुलना में अधिक जागरूक हो चुके हैं। वे परियोजना की लोकेशन, डेवलपर की विश्वसनीयता, निर्माण गुणवत्ता, भविष्य की संभावनाओं और उपलब्ध सुविधाओं का गहन मूल्यांकन करने के बाद ही निवेश का निर्णय ले रहे हैं। इस बदलते रुझान ने डेवलपर्स को भी गुणवत्ता और पारदर्शिता पर अधिक ध्यान देने के लिए प्रेरित किया है।

    रियल एस्टेट बाजार के मौजूदा संकेत बताते हैं कि भारत के प्रीमियम आवास क्षेत्र में आने वाले समय में भी स्थिर मांग बनी रह सकती है। बेहतर शहरी बुनियादी ढांचे, नई कनेक्टिविटी परियोजनाओं, बढ़ती आय और गुणवत्तापूर्ण आवासों की प्राथमिकता के कारण यह वर्ग निवेशकों और खरीदारों दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आर्थिक परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो प्रीमियम हाउसिंग बाजार आने वाले वर्षों में भी संतुलित और मजबूत वृद्धि दर्ज कर सकता है।

  • एक्सेंचर के कमजोर आउटलुक से आईटी सेक्टर में मची भारी बिकवाली, निफ्टी आईटी 6 प्रतिशत से अधिक टूटा, इंफोसिस-टीसीएस समेत दिग्गज शेयरों में बड़ी गिरा

    एक्सेंचर के कमजोर आउटलुक से आईटी सेक्टर में मची भारी बिकवाली, निफ्टी आईटी 6 प्रतिशत से अधिक टूटा, इंफोसिस-टीसीएस समेत दिग्गज शेयरों में बड़ी गिरा


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक प्रौद्योगिकी सेवा क्षेत्र से आई कमजोर संकेतों ने भारतीय शेयर बाजार के आईटी सेक्टर को बड़ा झटका दिया है। दुनिया की प्रमुख टेक्नोलॉजी और कंसल्टिंग कंपनियों में शामिल एक्सेंचर द्वारा अपने वित्त वर्ष 2026 के राजस्व वृद्धि अनुमान में कटौती किए जाने के बाद भारतीय आईटी शेयरों में व्यापक बिकवाली देखने को मिली। इसके परिणामस्वरूप निफ्टी आईटी इंडेक्स शुरुआती कारोबार में 6 प्रतिशत से अधिक टूट गया और पूरे बाजार में नकारात्मक माहौल बन गया।

    शुक्रवार के कारोबार में आईटी सेक्टर सबसे अधिक दबाव में रहा। निवेशकों ने वैश्विक तकनीकी खर्च में संभावित सुस्ती और कॉरपोरेट ग्राहकों द्वारा खर्च कम किए जाने की आशंकाओं के चलते आईटी शेयरों से दूरी बनानी शुरू कर दी। इसका सीधा असर भारतीय टेक कंपनियों के शेयरों पर दिखाई दिया, जिनमें दिनभर भारी उतार-चढ़ाव और गिरावट दर्ज की गई।

    बाजार खुलने के कुछ ही समय बाद निफ्टी आईटी इंडेक्स 1,800 अंकों से अधिक फिसलकर अपने दिन के निचले स्तर तक पहुंच गया। हालांकि बाद में इसमें कुछ सुधार देखने को मिला, लेकिन इंडेक्स फिर भी भारी नुकसान के साथ कारोबार करता रहा। यह गिरावट इस बात का संकेत मानी जा रही है कि वैश्विक मांग को लेकर निवेशकों की चिंता अभी समाप्त नहीं हुई है।

    आईटी कंपनियों में सबसे अधिक दबाव इंफोसिस के शेयरों पर दिखाई दिया, जिनमें तेज गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, टेक महिंद्रा और एचसीएल टेक जैसे बड़े नाम भी बिकवाली की चपेट में रहे। मिडकैप आईटी कंपनियां भी इस दबाव से अछूती नहीं रहीं। पर्सिस्टेंट सिस्टम्स, एलटीआईमाइंडट्री, कोफोर्ज, केपीआईटी टेक्नोलॉजीज, टाटा एल्क्सी और एलएंडटी टेक्नोलॉजी सर्विसेज जैसे शेयरों में भी उल्लेखनीय कमजोरी देखने को मिली।

    विश्लेषकों का मानना है कि इस गिरावट की प्रमुख वजह एक्सेंचर का संशोधित आउटलुक है। कंपनी ने तीसरी तिमाही में मजबूत राजस्व दर्ज किया, लेकिन ग्राहकों के खर्च को लेकर बनी अनिश्चितता और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों के प्रभाव को देखते हुए पूरे वर्ष के लिए विकास अनुमान कम कर दिया। इसके अलावा कंपनी की नई बुकिंग्स में भी पिछले वर्ष की तुलना में कमी दर्ज की गई, जिसने निवेशकों की चिंता को और बढ़ा दिया।

    भारतीय आईटी कंपनियों की अमेरिकी डिपॉजिटरी रसीदों में भी कमजोरी देखने को मिली, जिससे घरेलू बाजार में नकारात्मक धारणा और मजबूत हुई। विदेशी बाजारों में आई इस गिरावट का असर भारतीय निवेशकों की रणनीति पर भी पड़ा और उन्होंने आईटी शेयरों में मुनाफावसूली तथा बिकवाली को प्राथमिकता दी।

    बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में आईटी क्षेत्र को लेकर सतर्क दृष्टिकोण बनाए रखना आवश्यक है। हालांकि हालिया गिरावट के बाद कई कंपनियों के मूल्यांकन आकर्षक स्तरों पर पहुंचने लगे हैं, लेकिन यदि आने वाली तिमाहियों में आय वृद्धि के अनुमान और कमजोर होते हैं तो इस सेक्टर पर दबाव लंबे समय तक बना रह सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय आईटी कंपनियों का मूल्यांकन अभी भी कई वैश्विक प्रतिस्पर्धियों की तुलना में ऊंचा माना जाता है। ऐसे में निवेशक भविष्य की आय, ऑर्डर बुक और वैश्विक मांग के संकेतों पर विशेष नजर बनाए हुए हैं। आगामी तिमाहियों के कारोबारी प्रदर्शन और प्रबंधन की टिप्पणियां इस क्षेत्र की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

    आईटी सेक्टर में आई इस बड़ी गिरावट का असर व्यापक बाजार पर भी दिखाई दिया। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों दबाव में रहे तथा निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता कमजोर होती नजर आई। ऐसे माहौल में बाजार की निगाहें अब वैश्विक आर्थिक संकेतकों, ब्याज दरों की दिशा और तकनीकी सेवाओं की मांग में संभावित सुधार पर टिकी हुई हैं।

  • एनएसई का 30,000 करोड़ रुपये का मेगा आईपीओ तैयार, भारतीय पूंजी बाजार के इतिहास में बन सकता है सबसे बड़ा पब्लिक ऑफर

    एनएसई का 30,000 करोड़ रुपये का मेगा आईपीओ तैयार, भारतीय पूंजी बाजार के इतिहास में बन सकता है सबसे बड़ा पब्लिक ऑफर

    नई दिल्ली । भारतीय पूंजी बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने अपने बहुप्रतीक्षित प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम यानी आईपीओ की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए नियामकीय प्रक्रिया को आगे बढ़ा दिया है। लंबे समय से बाजार की नजर जिस प्रस्ताव पर टिकी हुई थी, वह अब औपचारिक रूप से आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। अनुमान है कि यह सार्वजनिक निर्गम करीब 30,000 करोड़ रुपये का हो सकता है, जो भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ बनने की क्षमता रखता है।

    इस प्रस्तावित आईपीओ की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि यह पूरी तरह ऑफर फॉर सेल आधारित होगा। इसका अर्थ है कि कंपनी नए शेयर जारी कर पूंजी नहीं जुटाएगी, बल्कि मौजूदा निवेशक अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा बेचेंगे। इस मॉडल के तहत कंपनी की बैलेंस शीट पर कोई नई पूंजी नहीं आएगी, जबकि निवेशकों को अपनी हिस्सेदारी के आंशिक विनिवेश का अवसर मिलेगा।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार अनलिस्टेड मार्केट में एनएसई का मूल्यांकन लगभग पांच लाख करोड़ रुपये के आसपास आंका जा रहा है। इसी आधार पर यदि कुल हिस्सेदारी का सीमित प्रतिशत भी सार्वजनिक निर्गम के तहत पेश किया जाता है, तो इसका आकार 30,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। यह आंकड़ा भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास के कई बड़े आईपीओ को पीछे छोड़ सकता है और पूंजी बाजार में नया रिकॉर्ड स्थापित कर सकता है।

    इस इश्यू में कई प्रमुख संस्थागत निवेशक अपनी हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में हैं। लंबे समय से एनएसई में निवेश बनाए रखने वाले बड़े वित्तीय संस्थान और विदेशी निवेशक इस सार्वजनिक निर्गम के माध्यम से आंशिक निकास प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि देश की सबसे बड़ी बीमा संस्था एलआईसी इस आईपीओ में अपनी हिस्सेदारी बेचने की योजना में शामिल नहीं है। बाजार विश्लेषक इसे एनएसई में दीर्घकालिक विश्वास और रणनीतिक निवेश दृष्टिकोण के रूप में देख रहे हैं।

    एनएसई की लिस्टिंग का महत्व केवल इश्यू के आकार तक सीमित नहीं है। यह कदम भारतीय वित्तीय बाजारों में पारदर्शिता, कॉरपोरेट गवर्नेंस और निवेशकों की भागीदारी को नई दिशा दे सकता है। देश के अधिकांश इक्विटी और डेरिवेटिव कारोबार का संचालन इसी एक्सचेंज के माध्यम से होता है। ऐसे में इसका सार्वजनिक कंपनी के रूप में सामने आना बाजार संरचना के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।

    आईपीओ प्रक्रिया तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं रहा। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न नियामकीय और प्रक्रियात्मक चुनौतियों के कारण यह योजना कई बार चर्चा में रही। अब आवश्यक मंजूरियां और प्रक्रियाएं आगे बढ़ने के बाद बाजार को इस ऐतिहासिक निर्गम का इंतजार है। निवेशकों और वित्तीय संस्थानों की नजर आगामी चरणों पर बनी हुई है, जहां मूल्य निर्धारण, हिस्सेदारी के आकार और निवेशकों की प्रतिक्रिया जैसे पहलू महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह आईपीओ अनुमानित आकार में सफलतापूर्वक पूरा होता है तो यह केवल एक कॉर्पोरेट इवेंट नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय पूंजी बाजार की परिपक्वता और वैश्विक निवेश आकर्षण का प्रतीक भी बनेगा। इससे घरेलू और विदेशी निवेशकों का भरोसा और मजबूत हो सकता है तथा बाजार को नई गति मिल सकती है।

    भारतीय शेयर बाजार के विकास की यात्रा में यह कदम एक ऐतिहासिक अध्याय जोड़ सकता है। आने वाले महीनों में इस आईपीओ से जुड़ी गतिविधियां निवेश जगत के केंद्र में रहने की संभावना है और पूरा वित्तीय क्षेत्र इसके अगले चरणों पर बारीकी से नजर रखेगा।

  • शेयर बाजार की तेजी से निवेशकों की बल्ले-बल्ले, टॉप-10 कंपनियों की वैल्यू ₹1.90 लाख करोड़ बढ़ी, ICICI बैंक बना सबसे बड़ा लाभार्थी

    शेयर बाजार की तेजी से निवेशकों की बल्ले-बल्ले, टॉप-10 कंपनियों की वैल्यू ₹1.90 लाख करोड़ बढ़ी, ICICI बैंक बना सबसे बड़ा लाभार्थी

    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार में पिछले सप्ताह दर्ज की गई मजबूत तेजी का सीधा फायदा देश की प्रमुख सूचीबद्ध कंपनियों को मिला। बाजार में निवेशकों की बढ़ती भागीदारी, वैश्विक माहौल में सुधार और वित्तीय क्षेत्र में मजबूत खरीदारी के चलते देश की शीर्ष 10 कंपनियों में से 8 के संयुक्त बाजार पूंजीकरण में लगभग 1.90 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस दौरान निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकिंग शेयरों ने बाजार की तेजी का नेतृत्व किया, जबकि कुछ चुनिंदा कंपनियों के मूल्यांकन में गिरावट भी देखने को मिली।

    सप्ताह के दौरान बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 1,284.61 अंकों की बढ़त के साथ बंद हुआ। वहीं नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी भी मजबूती दिखाते हुए 256.2 अंक ऊपर चढ़ा। बाजार में आई इस तेजी ने निवेशकों की संपत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि की और बड़ी कंपनियों के मूल्यांकन को नई ऊंचाई तक पहुंचाने में मदद की।

    सबसे अधिक लाभ ICICI बैंक को हुआ, जिसका बाजार पूंजीकरण 56,223 करोड़ रुपये बढ़कर 9.61 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया। बैंकिंग क्षेत्र में मजबूत निवेश और वित्तीय शेयरों में बढ़ती मांग के कारण कंपनी का मूल्यांकन तेजी से बढ़ा। इसके अलावा HDFC बैंक ने भी उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुए अपने मार्केट कैप में 38,571 करोड़ रुपये से अधिक की वृद्धि दर्ज की। बैंक का कुल मूल्यांकन बढ़कर लगभग 11.89 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया।

    सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक SBI ने भी शानदार प्रदर्शन किया। कंपनी के बाजार पूंजीकरण में 36,137 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई और इसका कुल मूल्यांकन 9.38 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया। वित्तीय क्षेत्र में निवेशकों के बढ़ते विश्वास का लाभ इन प्रमुख बैंकिंग संस्थानों को सबसे अधिक मिला।

    वित्तीय सेवाओं की प्रमुख कंपनी बजाज फाइनेंस के बाजार पूंजीकरण में भी 18,366 करोड़ रुपये से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। दूरसंचार क्षेत्र की दिग्गज कंपनी भारती एयरटेल ने भी मजबूत प्रदर्शन करते हुए अपने मूल्यांकन में 14,380 करोड़ रुपये का इजाफा किया। वहीं इंजीनियरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की प्रमुख कंपनी लार्सन एंड टुब्रो तथा उपभोक्ता उत्पाद क्षेत्र की अग्रणी कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर के मार्केट कैप में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई।

    देश की सबसे मूल्यवान कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज के बाजार पूंजीकरण में भी वृद्धि हुई। हालांकि अन्य कंपनियों की तुलना में यह बढ़त सीमित रही, फिर भी कंपनी 17.49 लाख करोड़ रुपये से अधिक के मूल्यांकन के साथ देश की सबसे मूल्यवान सूचीबद्ध कंपनी बनी रही।

    दूसरी ओर, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज को इस सप्ताह नुकसान का सामना करना पड़ा। कंपनी का बाजार पूंजीकरण 13,296 करोड़ रुपये से अधिक घट गया। इसी तरह भारतीय जीवन बीमा निगम के मूल्यांकन में भी मामूली गिरावट दर्ज की गई। इन दोनों कंपनियों को छोड़कर बाकी सभी शीर्ष कंपनियों ने सकारात्मक प्रदर्शन किया।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक माहौल में सुधार, विदेशी निवेशकों की बढ़ती रुचि और वित्तीय स्थिरता से जुड़े कदमों ने भारतीय बाजारों को मजबूती प्रदान की है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव कम होने की उम्मीदों ने भी निवेशकों के विश्वास को मजबूत किया है। यदि यह सकारात्मक माहौल आगे भी बना रहता है तो आने वाले सप्ताहों में भारतीय शेयर बाजार और प्रमुख कंपनियों के मूल्यांकन में नई बढ़त देखने को मिल सकती है।