Tag: Vande Mataram

  • बांसुरी स्वराज ने राहुल गांधी को वंदे मातरम गाने की दी चुनौती, ऋतिक रोशन की हैरानी भरी प्रतिक्रिया हुई वायरल

    बांसुरी स्वराज ने राहुल गांधी को वंदे मातरम गाने की दी चुनौती, ऋतिक रोशन की हैरानी भरी प्रतिक्रिया हुई वायरल

    नई दिल्ली। वंदे मातरम और पितृसत्ता को लेकर बीजेपी सांसद बांसुरी स्वराज की ओर से कांग्रेस नेता राहुल गांधी को दी गई चुनौती का मामला एक बार फिर चर्चा में है। करीब एक महीने पुराने इस बयान पर बॉलीवुड अभिनेता ऋतिक रोशन की प्रतिक्रिया सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

    बांसुरी स्वराज ने पुणे में आयोजित छात्रों की गूंज कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी के उस बयान पर प्रतिक्रिया दी थी, जिसमें उन्होंने महिलाओं से पितृसत्ता के खिलाफ आवाज उठाने और इसे खत्म करने की बात कही थी। राहुल गांधी ने अपने संबोधन में महिलाओं को बेटी, पत्नी या मां की भूमिका तक सीमित किए जाने की बात कही थी और ऐसी सोच के खिलाफ एकजुट होकर काम करने का आह्वान किया था।

    इसी संदर्भ में बांसुरी स्वराज ने राहुल गांधी को चुनौती देते हुए कहा था कि अगर वह वास्तव में पितृसत्ता को खत्म करना चाहते हैं तो उन्हें पूरा वंदे मातरम गाकर दिखाना चाहिए। उन्होंने कहा था कि उन्हें क्रिसमस कैरल गाने, पूरा वंदे मातरम गाने और शिव तांडव का पाठ करने में कोई परेशानी नहीं है। इसके बाद उन्होंने राहुल गांधी को पूरा वंदे मातरम गाने की चुनौती दी थी।

    बांसुरी स्वराज का यह बयान अगस्त में सामने आया था, लेकिन हाल ही में इसका वीडियो फिर सोशल मीडिया पर चर्चा में आया। वीडियो पर ऋतिक रोशन की प्रतिक्रिया ने इस मामले को और सुर्खियों में ला दिया। उन्होंने वीडियो पर कमेंट करते हुए लिखा, “Huh? Is this real. Wow.” ऋतिक की इस संक्षिप्त प्रतिक्रिया के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने भी इस मुद्दे पर अपनी-अपनी राय रखी।

    राहुल गांधी ने पुणे में महिलाओं को संबोधित करते हुए पितृसत्ता की आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि महिलाओं को अक्सर बेटी, पत्नी या मां जैसी भूमिकाओं तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि उनकी अपनी स्वतंत्र पहचान भी है। उन्होंने कहा था कि पितृसत्ता महिलाओं को दबाती, डराती और नियंत्रित करती है तथा इसे खत्म करने के लिए मिलकर काम करना जरूरी है।

    अपने संबोधन में राहुल गांधी ने मनुस्मृति का भी उल्लेख किया था और महिलाओं को सीमित भूमिकाओं में रखने वाली सोच की आलोचना की थी। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक स्तर पर प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। इसी क्रम में बांसुरी स्वराज ने वंदे मातरम के पूर्ण गायन को पितृसत्ता के खिलाफ उनके आह्वान से जोड़ते हुए चुनौती दी थी।

    ऋतिक रोशन की टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। एक यूजर ने उनकी फिल्म कृष का जिक्र करते हुए उनसे अपने अंदर के कृष को बाहर लाने की बात कही। एक अन्य यूजर ने इसी पार्टी की नेता कंगना रनौत का जिक्र करते हुए प्रतिक्रिया दी। कुछ लोगों ने ऋतिक के कमेंट की तारीफ भी की और इसे मजेदार बताया।

    इस पूरे घटनाक्रम में एक तरफ राहुल गांधी का महिलाओं और पितृसत्ता से जुड़ा बयान है, दूसरी तरफ बांसुरी स्वराज की ओर से वंदे मातरम को लेकर दी गई चुनौती और अब ऋतिक रोशन की प्रतिक्रिया है। पुराने वीडियो पर आई नई प्रतिक्रिया ने इस राजनीतिक बयान और उससे जुड़े सोशल मीडिया विमर्श को दोबारा सुर्खियों में ला दिया है।

  • अरुण जेटली स्टेडियम में ऐतिहासिक पल भारत अफगानिस्तान मुकाबले से पहले गूंजा वंदे मातरम

    अरुण जेटली स्टेडियम में ऐतिहासिक पल भारत अफगानिस्तान मुकाबले से पहले गूंजा वंदे मातरम


    नई दिल्ली। भारत और अफगानिस्तान के बीच नई दिल्ली के अरुण जेटली स्टेडियम में खेले जा रहे पहले टी20 अंतरराष्ट्रीय मुकाबले से पहले एक ऐतिहासिक पल देखने को मिला। क्रिकेट के मैदान पर पहली बार राष्ट्रीय गान जन गण मन से पहले राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम का वादन किया गया। इस दौरान स्टेडियम में मौजूद खिलाड़ियों के साथ दर्शकों ने भी सम्मान के साथ खड़े होकर राष्ट्रीय गीत को सुना। यह मौका भारतीय क्रिकेट और देश के खेल इतिहास में खास माना जा रहा है।

    मुकाबला शुरू होने से पहले आमतौर पर राष्ट्रीय गान बजाने की परंपरा रही है। हालांकि इस बार कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम से हुई और उसके बाद राष्ट्रीय गान जन गण मन बजाया गया। इस ऐतिहासिक आयोजन ने स्टेडियम के माहौल को देशभक्ति के रंग में रंग दिया। खिलाड़ियों और दर्शकों के बीच भी इस दौरान खास उत्साह नजर आया।

    बताया गया कि यह आयोजन राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ से जुड़े कार्यक्रमों का हिस्सा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से इससे संबंधित दिशा निर्देश जारी किए गए थे। इन्हीं दिशा निर्देशों के तहत अरुण जेटली स्टेडियम में वंदे मातरम के सभी छह छंद प्रस्तुत किए गए। राष्ट्रीय गीत के पूरे संस्करण को प्रस्तुत करने में करीब 3 मिनट 10 सेकेंड का समय निर्धारित किया गया था। इसके बाद राष्ट्रीय गान के लिए करीब 52 सेकेंड का समय रखा गया। इस तरह पूरे कार्यक्रम की अवधि लगभग 4 मिनट 2 सेकेंड रही।

    नए दिशा निर्देशों के अनुसार राष्ट्रीय गीत के वादन के दौरान वहां मौजूद लोगों को सावधान की मुद्रा में खड़े रहने के लिए कहा गया है। राष्ट्रीय गीत के संपूर्ण संस्करण के इस्तेमाल को कुछ औपचारिक सरकारी कार्यक्रमों और विशेष अवसरों के लिए मंजूरी दी गई है। इसी क्रम में भारत और अफगानिस्तान के बीच खेले गए इस अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मुकाबले से पहले भी इसका आयोजन किया गया।

    वंदे मातरम का भारतीय इतिहास में विशेष महत्व है। इसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने रचा था। वर्ष 1937 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसके शुरुआती दो छंदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया था। इसके बाद वर्ष 1950 में संविधान सभा ने वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता दी।

    क्रिकेट मुकाबले की बात करें तो भारतीय कप्तान श्रेयस अय्यर ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी करने का फैसला किया। भारतीय टीम में संजू सैमसन को विकेटकीपर की जिम्मेदारी दी गई जबकि अभिषेक शर्मा और ईशान किशन टीम का हिस्सा रहे। तिलक वर्मा नीतीश कुमार रेड्डी शिवम दुबे अक्षर पटेल अर्शदीप सिंह जसप्रीत बुमराह और वरुण चक्रवर्ती भी प्लेइंग इलेवन में शामिल रहे। हालांकि युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी को इस मुकाबले में खेलने का मौका नहीं मिला।

    इस ऐतिहासिक शुरुआत के बाद अब क्रिकेट प्रेमियों की नजर इस बात पर भी रहेगी कि आने वाले अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट आयोजनों में वंदे मातरम को लेकर क्या परंपरा आगे बढ़ती है। भारत अफगानिस्तान मुकाबले से पहले हुआ यह आयोजन निश्चित तौर पर क्रिकेट के मैदान पर यादगार पलों में शामिल हो गया है।

  • वंदे मातरम पर कांग्रेस-एनसी आमने-सामने, अब्दुल्ला परिवार के पूरे गीत के सम्मान में खड़े होने पर बढ़ा विवाद

    वंदे मातरम पर कांग्रेस-एनसी आमने-सामने, अब्दुल्ला परिवार के पूरे गीत के सम्मान में खड़े होने पर बढ़ा विवाद


    नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर में वंदे मातरम के पूरे संस्करण के गायन को लेकर कांग्रेस और उसकी गठबंधन सहयोगी नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। श्रीनगर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के दौरान वंदे मातरम का पूरा संस्करण बजाया गया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला सम्मान में खड़े रहे। इसके बाद कांग्रेस ने पूरे गीत के गायन पर आपत्ति जताते हुए एनसी से अपने रुख का समर्थन करने की अपील की। एनसी ने जवाब में कहा कि गठबंधन में होने का मतलब यह नहीं है कि कोई सहयोगी दल दूसरे पर अपनी शर्तें थोपे।

    कांग्रेस महासचिव एवं संगठन प्रभारी केसी वेणुगोपाल ने वंदे मातरम के पूरे संस्करण को लेकर पार्टी का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अपने कार्यक्रमों में 1937 में तय किए गए स्वरूप के अनुरूप गीत के शुरुआती दो अंतरे ही गाएगी। कांग्रेस का कहना है कि यह निर्णय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बनी व्यापक सहमति और देश की बहुलतावादी एवं समन्वयवादी भावना को ध्यान में रखकर लिया गया है।

    श्रीनगर के फिल्म महोत्सव से शुरू हुआ विवाद

    विवाद की शुरुआत श्रीनगर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के कार्यक्रम से हुई। कार्यक्रम में वंदे मातरम का पूरा संस्करण बजाया गया। मंच पर मौजूद उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला इस दौरान सम्मान में खड़े रहे। कार्यक्रम का वीडियो सामने आने के बाद कांग्रेस की ओर से इस पर प्रतिक्रिया दी गई।

    वेणुगोपाल ने कहा कि कांग्रेस ने अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो अंतरे गाने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि गठबंधन के सहयोगी दलों को भी कांग्रेस के इस फैसले का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद और सरोजिनी नायडू सहित स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं के विचारों का भी उल्लेख किया।

    एनसी ने कहा- सहयोगी अपनी शर्तें नहीं थोप सकता

    कांग्रेस की अपील पर नेशनल कॉन्फ्रेंस की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। पार्टी नेता बशीर अहमद ने कहा कि गठबंधन में शामिल होने का अर्थ यह नहीं है कि एक सहयोगी दल दूसरे दल को यह बताए कि कोई गीत कितने हिस्से में गाया जाए। उन्होंने कहा कि केसी वेणुगोपाल को सोशल मीडिया पर अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन वह अपनी राय किसी दूसरे दल पर थोप नहीं सकते।

    एनसी नेता ने कहा कि उनकी पार्टी भी लोगों पर किसी तरह की शर्त थोपने के खिलाफ है। इस बयान के बाद कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच मतभेद सार्वजनिक हो गए हैं।

    कांग्रेस ने आरएसएस पर भी साधा निशाना

    एनसी की प्रतिक्रिया के बाद कांग्रेस नेता कपिल सिंह ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं, इसलिए उन्हें कांग्रेस के फैसले का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें नागपुर यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के दबाव में नहीं आना चाहिए।

    भाजपा ने कांग्रेस को घेरा

    विवाद में भाजपा भी कूद पड़ी। भाजपा सांसद एवं प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि पूरे वंदे मातरम के गायन को लेकर उसकी आपत्ति से उसकी राजनीतिक सोच स्पष्ट होती है। उन्होंने कांग्रेस को 21वीं सदी की नई मुस्लिम लीग तक करार दिया और आरोप लगाया कि पार्टी अलगाववादी तथा कट्टरपंथी ताकतों के सामने झुक रही है।

    भाजपा नेता आरएस पठानिया ने भी कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि घाटी में अलगाववादी ताकतों ने भी राष्ट्रगीत को लेकर ऐसी आपत्ति नहीं जताई थी।

    1937 के फैसले का हवाला दे रही कांग्रेस

    कांग्रेस ने पिछले महीने अपनी कार्यसमिति की बैठक में 1937 के प्रस्ताव के अनुरूप पार्टी के सभी कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल दो अंतरे गाने का निर्णय लिया था। पार्टी का कहना है कि यह फैसला स्वतंत्रता आंदोलन के समय बनी व्यापक सहमति और देश की बहुलतावादी सोच को ध्यान में रखकर लिया गया है।

    वहीं भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर वंदे मातरम का पूरा सम्मान नहीं करने का आरोप लगाती रही है।

    गठबंधन की राजनीति पर भी पड़ सकता है असर

    वंदे मातरम को लेकर शुरू हुआ विवाद अब कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच वैचारिक मतभेद का मुद्दा बन गया है। दोनों दल इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन राष्ट्रगीत को लेकर उनके रुख में स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है। कांग्रेस अपने ऐतिहासिक और राजनीतिक निर्णय पर कायम है, जबकि एनसी का कहना है कि कोई भी सहयोगी दल दूसरे पर अपनी शर्तें नहीं थोप सकता।

    ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वंदे मातरम को लेकर शुरू हुआ यह विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या इसका असर कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच गठबंधन की राजनीति पर भी पड़ता है।

  • हर समारोह में वंदे मातरम् के सभी अंतरे बजाने को अनिवार्य करना तर्कसंगत नहीं : शशि थरूर

    हर समारोह में वंदे मातरम् के सभी अंतरे बजाने को अनिवार्य करना तर्कसंगत नहीं : शशि थरूर


    नई दिल्ली।
    कांग्रेस सांसद शशि थरूर (Congress MP Shashi Tharoor) ने वंदे मातरम् (VANDAM MATARAM) के गायन को लेकर चल रही बहस के बीच बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी आधिकारिक कार्यक्रम की शुरुआत और समापन पर राष्ट्रीय गीत के सभी पांच पदों का गायन करवाना उचित नहीं लगता। संवाददाताओं से बात करते हुए थरूर ने कहा कि वंदे मातरम का सभी सम्मान करते हैं, लेकिन हर समारोह में इसके सभी अंतरे बजाने को अनिवार्य करना तर्कसंगत नहीं है।

    कांग्रेस सांसद ने कहा, “वंदे मातरम राष्ट्रगीत है और जब इसे गाया जाता है तो हम सम्मानपूर्वक खड़े हो जाते हैं। इसका पहला अंतरा या शुरुआती दो अंतरे, ज्यादातर लोगों को मुंह जुबानी याद होते हैं।” थरूर ने बताया कि परंपरागत रूप से यह गीत किसी कार्यक्रम की शुरुआत में एक बार गाया जाता है, जबकि राष्ट्रगान अलग से, अक्सर अंत में बजाया जाता है।

    उन्होंने कहा, “अब वे चाहते हैं कि हर कार्यक्रम की शुरुआत में और अंत में पांचों अंतरे गाए जाएं। मुझे लगता है कि यह एक अनावश्यक थोपा हुआ नियम है।” थारूर ने इस बात पर जोर दिया कि उन्हें राष्ट्रगीत से कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा, “हम सभी वंदे मातरम का सम्मान करते हैं। मैं खुशी-खुशी इसे आपके लिए गा सकता हूं।”

    राज्य सरकार और राज्यपाल के रुख में अंतर का संकेत
    कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य थरूर ने कहा कि केरल सरकार का रुख यह रहा है कि वंदे मातरम् का पूरा संस्करण गाना वैकल्पिक है। वहीं, उन्होंने संकेत दिया कि राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर की राय इससे अलग दिखाई देती है। थरूर के मुताबिक, इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय की आवश्यकता पड़ सकती है क्योंकि संसद द्वारा ऐसा कोई कानून पारित नहीं किया गया है जो हर कार्यक्रम में पूरे गीत के गायन को अनिवार्य बनाता हो। उन्होंने इसे मुख्य रूप से परंपरा और प्रचलन से जुड़ा विषय बताया।

    ‘राष्ट्रीय गीत से कोई आपत्ति नहीं’
    थरूर ने स्पष्ट किया कि उन्हें वंदे मातरम् से कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि सभी भारतीय इस राष्ट्रीय गीत का सम्मान करते हैं और वह स्वयं भी इसे खुशी से गा सकते हैं। उन्होंने एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए बताया कि नई दिल्ली में आयोजित उस कार्यक्रम में, जिसमें उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन मौजूद थे, वंदे मातरम् का पूरा संस्करण कार्यक्रम की शुरुआत और अंत दोनों समय बजाया गया था।

    ‘दर्शकों के लिए यह व्यावहारिक चुनौती बन जाती है’
    थरूर का कहना था कि अपेक्षाकृत लंबा और कम परिचित गीत जब एक ही कार्यक्रम में दो बार सुनाया जाता है तो दर्शकों के लिए लंबे समय तक खड़े रहना एक मुद्दा बन सकता है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक आयोजनों में परंपरागत रूप से वंदे मातरम् का वही हिस्सा गाया जाता रहा है जिसकी अवधि लगभग राष्ट्रीय गान के बराबर होती है। यह स्वरूप लंबे समय से व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता रहा है और लोगों द्वारा सम्मानित भी है।

    विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान निकलने की उम्मीद
    इस पूरे विवाद को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए थरूर ने उम्मीद जताई कि इसका समाधान आपसी समझ और सौहार्द के साथ निकलेगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पदाधिकारियों की मौजूदगी वाले विशेष औपचारिक कार्यक्रमों में एक बार पूरा गीत गाए जाने को समझा जा सकता है। हालांकि, किसी छोटे कार्यक्रम में पूरे वंदे मातरम् का दो बार गायन करवाने के पीछे उन्हें कोई स्पष्ट तर्क नजर नहीं आता। उनके अनुसार यह व्यवस्था न तो विशेष रूप से व्यावहारिक है और न ही बहुत प्रभावी।

  • यूपी के मदरसों में ‘वंदे मातरम’ लागू करने की तैयारी, ओपी राजभर के बयान से सियासत गरमाई

    यूपी के मदरसों में ‘वंदे मातरम’ लागू करने की तैयारी, ओपी राजभर के बयान से सियासत गरमाई



    लखनऊ। उत्तर प्रदेश में मदरसा शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया है। राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने संकेत दिए हैं कि यूपी के मदरसों में भी ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य करने की दिशा में तैयारी की जा रही है। उनके इस बयान के बाद प्रदेश की सियासत में नई बहस शुरू हो गई है।

    राजभर ने एक मीडिया इंटरव्यू में कहा कि जिस तरह अन्य शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान कराया जाता है, उसी तरह मदरसों में भी ऐसी व्यवस्था लागू करने पर विचार किया जा रहा है। उन्होंने साफ कहा कि विभाग उनके पास है और इस तरह की व्यवस्था लागू करने में कोई बुराई नहीं है।

    शिक्षा और राष्ट्रभक्ति से जोड़ने की बात
    मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि सरकार का उद्देश्य मदरसा संस्थानों के छात्रों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर देना है। उन्होंने कहा कि बच्चों को अमन, चैन और भाईचारे के साथ आगे बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता है।उनके अनुसार, “राष्ट्रगीत का सम्मान किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह देश के प्रति सम्मान का प्रतीक है।”

    विपक्ष पर तीखा हमला
    ओपी राजभर ने अपने बयान में विपक्षी दलों पर भी निशाना साधा। उन्होंने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर आरोप लगाया कि वे केवल राजनीति के लिए समाज में नफरत फैलाने की बात करते हैं।

    उन्होंने कहा कि मुसलमानों को केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया गया है और उन्हें शिक्षा एवं विकास से दूर रखा गया है। राजभर ने दावा किया कि उनकी सरकार सभी वर्गों के विकास के लिए काम कर रही है।

    विवाद की पृष्ठभूमि
    यह मुद्दा ऐसे समय पर सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में भी कुछ मदरसों में ‘वंदे मातरम’ को लेकर बहस चल रही है। वहां कई मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध किया है, जबकि कुछ राजनीतिक दलों ने इसे समर्थन दिया है।अब उत्तर प्रदेश में भी इस तरह का प्रस्ताव सामने आने के बाद राजनीतिक तापमान बढ़ गया है। विपक्षी दलों के साथ-साथ धार्मिक संगठनों की प्रतिक्रिया आने की संभावना है।

    सियासी माहौल गर्म
    उत्तर प्रदेश में पहले से ही 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हैं। ऐसे में ओपी राजभर का यह बयान राजनीतिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है। इसे सरकार की शिक्षा नीति और सामाजिक संतुलन की दिशा में एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

    मदरसा शिक्षा प्रणाली में ‘वंदे मातरम’ लागू करने की चर्चा ने राज्य में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। जहां सरकार इसे राष्ट्रभक्ति और एकता से जोड़कर देख रही है, वहीं विरोधी इसे संवेदनशील मुद्दा मान रहे हैं। आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं और तेज होने की संभावना है।

  • स्कूलों के बाद अब मदरसों पर भी लागू हुआ राष्ट्रगीत नियम, बंगाल सरकार के फैसले से राजनीतिक हलचल

    स्कूलों के बाद अब मदरसों पर भी लागू हुआ राष्ट्रगीत नियम, बंगाल सरकार के फैसले से राजनीतिक हलचल


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा और संवेदनशील नीतिगत फैसला सामने आया है, जिसने राज्य के राजनीतिक और सामाजिक माहौल में नई बहस को जन्म दे दिया है। राज्य सरकार ने आदेश जारी करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि अब सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और मान्यता प्राप्त मदरसों में कक्षाएं शुरू होने से पहले प्रार्थना सभा के दौरान राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ का गायन अनिवार्य रूप से किया जाएगा। इस निर्णय को शिक्षा और राष्ट्रीय एकता से जुड़ा एक अहम कदम बताया जा रहा है, जबकि दूसरी ओर इसे लेकर अलग-अलग स्तर पर चर्चा और प्रतिक्रिया भी देखने को मिल रही है।

    सरकारी आदेश के अनुसार यह नियम केवल सामान्य सरकारी स्कूलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मदरसा शिक्षा व्यवस्था के सभी स्तरों पर लागू होगा। इसमें सरकारी मॉडल मदरसे, सहायता प्राप्त संस्थान, स्वीकृत मदरसा शिक्षा केंद्र, शिशु शिक्षा केंद्र और मान्यता प्राप्त गैर-सहायता प्राप्त मदरसे सभी शामिल किए गए हैं। इस आदेश के बाद पुराने सभी संबंधित नियम और पूर्व प्रथाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त मानी जाएंगी। प्रशासन का मानना है कि शिक्षा संस्थानों में एक समान सांस्कृतिक और राष्ट्रीय अभ्यास को लागू करने से एकरूपता और राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिलेगी।

    इस फैसले के पीछे सरकार की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि जब राज्य के अन्य सभी सरकारी स्कूलों और विशेष भाषा आधारित विद्यालयों में प्रार्थना सभा के दौरान ‘वंदे मातरम्’ का गायन पहले से ही लागू है, तो फिर मदरसों को इससे अलग रखना उचित नहीं है। सरकार के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल अकादमिक ज्ञान देना नहीं है, बल्कि छात्रों में राष्ट्र के प्रतीकों के प्रति सम्मान और एकता की भावना विकसित करना भी है। इसी सोच के तहत इस निर्णय को लागू किया गया है।

    शिक्षा विभाग की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि यह निर्णय किसी एक वर्ग या संस्था को लक्षित नहीं करता, बल्कि इसका उद्देश्य राज्य के सभी शैक्षणिक संस्थानों में समान नियम लागू करना है। प्रशासन का मानना है कि इससे छात्रों के बीच सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय भावना को और अधिक मजबूती मिलेगी। वहीं इस फैसले के बाद शिक्षा जगत में इस बात पर भी चर्चा शुरू हो गई है कि क्या इस तरह के निर्देश विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों की विविध परंपराओं और व्यवस्थाओं के साथ संतुलन बना पाएंगे या नहीं।

    इससे पहले राज्य सरकार ने कुछ दिन पूर्व ही सामान्य सरकारी स्कूलों में भी यही नियम लागू किया था, जिसके बाद अब इसे मदरसों तक विस्तारित कर दिया गया है। इस विस्तार को सरकार की एक व्यापक नीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य सभी शिक्षा संस्थानों में एक समान सांस्कृतिक अभ्यास सुनिश्चित करना बताया जा रहा है।

    राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर इस निर्णय को लेकर बहस तेज हो गई है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय एकता और शिक्षा में समानता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे शैक्षणिक स्वतंत्रता और परंपराओं से जुड़ा मुद्दा बता रहा है। हालांकि सरकार अपने रुख पर कायम है और इस नीति को राज्य के सभी संबंधित संस्थानों में लागू करने के लिए प्रतिबद्ध नजर आ रही है। कुल मिलाकर यह निर्णय पश्चिम बंगाल की शिक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जिसका प्रभाव आने वाले समय में राज्य के शैक्षणिक और सामाजिक ढांचे पर भी पड़ सकता है।

  • कांग्रेस में वंदे मातरम विवाद ने पकड़ा राजनीतिक तूफ़ान, केके मिश्रा ने दी खुली चेतावनी

    कांग्रेस में वंदे मातरम विवाद ने पकड़ा राजनीतिक तूफ़ान, केके मिश्रा ने दी खुली चेतावनी


    इंदौर । इंदौर में वंदे मातरम को लेकर शुरू हुआ विवाद अब कांग्रेस के अंदर ही बड़ा राजनीतिक तूफ़ान बन गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केके मिश्रा ने इस मामले पर अपनी पार्टी के भीतर खुले तौर पर विरोध दर्ज कराया है। उन्होंने अपने ट्वीट्स में न सिर्फ भाजपा पर हमला बोला बल्कि कांग्रेस की पार्षद रूबीना खान को भी आड़े हाथों लिया। मिश्रा ने बेहद सख्त शब्दों में कहा कि जो लोग राष्ट्रधर्म नहीं निभा सकते और वंदे मातरम नहीं बोल सकते वे भाड़ में जाएं और पाकिस्तान जाकर बसें। उनके इस बयान ने राजनीतिक माहौल को और गर्मा दिया है।

    रूबीना खान के बयान को मिश्रा ने राजनीतिक ब्लैकमेलिंग करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि पूरा मामला भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर खेला गया है। मिश्रा ने यह भी कहा कि रूबीना खान के बयान से उन मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों और सैनिकों का अपमान हुआ है जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देश के लिए दी। उनके अनुसार यह केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं बल्कि राष्ट्रभक्ति के मूल्यों को चुनौती देने वाला मामला है।

    केके मिश्रा ने भाजपा पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि भाजपा को इस मुद्दे पर राजनीति करने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि उसने अपने ही मंत्री विजय शाह के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। मिश्रा ने भाजपा पर राष्ट्रधर्म के मुद्दे पर दोहरा चरित्र अपनाने का आरोप लगाया। उनके अनुसार केवल राजनीतिक लाभ के लिए मुद्दों को उछालना और अपने ही लोगों की अनदेखी करना लोकतंत्र और राष्ट्रीय भावना के लिए खतरनाक है।

    मिश्रा ने कांग्रेस नेतृत्व को भी खुली चुनौती दी। इंदौर कांग्रेस अध्यक्ष चिंटू चौकसे को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सिर्फ नोटिस देने से काम नहीं चलेगा। उनके अनुसार रूबीना खान को पार्टी से बर्खास्त किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा जहां जाना चाहती हैं चली जाएं। मिश्रा ने पार्टी को चेतावनी दी कि ऐसे संदिग्ध निष्ठा वाले लोगों को शामिल करने से पहले गंभीरता से विचार करना चाहिए। उनके अनुसार यह केवल पार्टी का मामला नहीं बल्कि देश के प्रति प्रतिबद्धता का भी सवाल है।

    इस पूरे विवाद ने कांग्रेस के अंदरूनी मतभेद को खुलकर सामने ला दिया है। एक तरफ भाजपा इस मुद्दे को राजनीतिक लाभ उठाने के लिए भुनाने की कोशिश कर रही है तो वहीं कांग्रेस के भीतर नेताओं के बीच टकराव और तेज होता दिख रहा है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस मामले में कांग्रेस की छवि और संगठनात्मक क्षमता दोनों चुनौतीपूर्ण स्थिति में हैं।

    इंदौर के यह विवाद केवल स्थानीय स्तर पर सीमित नहीं है बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डाल सकता है। केके मिश्रा का यह कड़ा रुख और पार्टी नेतृत्व को खुली चुनौती देना इस बात का संकेत है कि कांग्रेस को अपने भीतर अनुशासन और संगठनात्मक मजबूती बनाए रखने की आवश्यकता है। इस विवाद का राजनीतिक भविष्य और असर आने वाले दिनों में साफ होगा लेकिन फिलहाल यह वंदे मातरम विवाद कांग्रेस के लिए सबसे बड़े अंदरूनी तूफानों में से एक बन चुका है।

  • मंत्रालय में गूंजा वंदे मातरम और जन गण मन सामूहिक गायन से देशभक्ति का माहौल

    मंत्रालय में गूंजा वंदे मातरम और जन गण मन सामूहिक गायन से देशभक्ति का माहौल


    भोपाल । भोपाल स्थित मंत्रालय में अप्रैल माह के प्रथम शासकीय कार्य दिवस की शुरुआत राष्ट्रभक्ति के भाव से ओतप्रोत वातावरण में हुई सरदार वल्लभभाई पटेल पार्क में आयोजित कार्यक्रम में अधिकारियों कर्मचारियों और पुलिस कर्मियों ने एक साथ राष्ट्रगीत वंदे मातरम और राष्ट्रगान जन गण मन का सामूहिक गायन किया इस दौरान पूरे परिसर में देशभक्ति का उल्लासपूर्ण माहौल दिखाई दिया

    कार्यक्रम में पुलिस बैंड द्वारा प्रस्तुत की गई मधुर धुनों ने वातावरण को और भी भावपूर्ण बना दिया बैंड की स्वर लहरियों के साथ जब उपस्थित सभी लोगों ने एक स्वर में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान गाया तो पूरा परिसर देशभक्ति की भावना से गूंज उठा

    इस अवसर पर मुख्य सचिव अनुराग जैन अपर मुख्य सचिव डॉ राजेश राजौरा श्री अशोक बर्णवाल और श्री संजय कुमार शुक्ला सहित मंत्रालय वल्लभ भवन सतपुड़ा और विंध्याचल भवन के अनेक अधिकारी कर्मचारी मौजूद रहे सभी ने पूरे उत्साह और गरिमा के साथ इस आयोजन में भाग लिया

    हर माह के पहले कार्य दिवस पर आयोजित होने वाला यह सामूहिक गायन कार्यक्रम न केवल देशभक्ति की भावना को सुदृढ़ करता है बल्कि शासकीय कार्यों के प्रति समर्पण और जिम्मेदारी का भी संदेश देता है इस तरह के आयोजन कर्मचारियों में एकता अनुशासन और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैंकार्यक्रम ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि राष्ट्र सर्वोपरि है और उसकी सेवा ही प्रत्येक नागरिक का सर्वोच्च कर्तव्य है

  • आकाशवाणी में बड़ा बदलाव अब बजेगा ‘वंदे मातरम’ का पूरा संस्करण All India Radio

    आकाशवाणी में बड़ा बदलाव अब बजेगा ‘वंदे मातरम’ का पूरा संस्करण All India Radio


    नई दिल्ली: भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत संचालित All India Radio यानी आकाशवाणी ने अपने सुबह के प्रसारण में एक महत्वपूर्ण बदलाव की घोषणा की है अब तक जहां सुबह की शुरुआत प्रतिष्ठित धुन और उसके बाद ‘वंदे मातरम’ के दो छंदों वाले संस्करण से होती थी वहीं अब इसकी जगह राष्ट्रीय गीत का पूरा संस्करण प्रसारित किया जाएगा यह बदलाव 26 मार्च 2026 से लागू हो रहा है

    आजादी के बाद से आकाशवाणी की यह परंपरा रही है कि वह अपने सुबह के कार्यक्रम की शुरुआत एक खास धुन से करता है और उसके बाद ‘वंदे मातरम’ का छोटा संस्करण बजाया जाता था जिसकी अवधि लगभग 65 सेकंड होती थी लेकिन गृह मंत्रालय द्वारा 28 जनवरी 2026 को जारी नए दिशानिर्देशों के बाद अब इस परंपरा में बदलाव किया गया है नए नियम के अनुसार अब राष्ट्रीय गीत के छह छंदों वाला पूर्ण संस्करण हर दिन प्रसारित किया जाएगा

    इस नए संस्करण की अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड है और इसकी प्रस्तुति प्रसिद्ध हिंदी शास्त्रीय गायक Pandit Chandrashekhar Vaze द्वारा राग देश में की गई है उनकी आवाज में गाया गया यह संस्करण देशभक्ति की भावना और संगीत की गहराई को और अधिक प्रभावी बनाता है अब श्रोता पूरे गीत के माध्यम से ‘वंदे मातरम’ की मूल भावना और उसकी भावनात्मक शक्ति को बेहतर तरीके से अनुभव कर सकेंगे

    इस पहल का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब देशभर के अलग अलग राज्यों के लिए ‘वंदे मातरम’ के क्षेत्रीय संस्करण भी तैयार किए जाएंगे इन संस्करणों में स्थानीय संगीत वाद्ययंत्रों और शास्त्रीय धुनों का उपयोग किया जाएगा जिससे हर क्षेत्र के लोग अपनी भाषा और संगीत के अंदाज में इस गीत को सुन और महसूस कर सकेंगे यह कदम भारत की सांस्कृतिक विविधता को सम्मान देने और उसे और अधिक समृद्ध बनाने की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है

    आकाशवाणी का यह नया कदम न केवल राष्ट्रीय गीत को एक नए स्वरूप में प्रस्तुत करेगा बल्कि नई पीढ़ी को भी इसकी पूरी गहराई से परिचित कराएगा इससे श्रोताओं को एक समग्र और समृद्ध देशभक्ति का अनुभव मिलेगा और सुबह की शुरुआत पहले से कहीं अधिक प्रेरणादायक और ऊर्जावान बन जाएगी

  • वंदे मातरम मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी कोई दंड नहीं केवल सलाह…

    वंदे मातरम मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी कोई दंड नहीं केवल सलाह…

    नई दिल्ली: देश के सर्वोच्च न्यायालय ने वंदे मातरम के गायन को अनिवार्य किए जाने से जुड़े एक सर्कुलर के खिलाफ दायर याचिका को खारिज करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने साफ किया कि इस मामले में अभी हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता क्योंकि याचिका समय से पहले यानी प्री मेच्योर है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार के सर्कुलर में वंदे मातरम के गायन को लेकर केवल एक सुझाव या एडवाइजरी दी गई है न कि कोई बाध्यकारी आदेश या दंड का प्रावधान।

    सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि क्या 28 जनवरी को जारी सरकारी अधिसूचना में कहीं यह उल्लेख है कि यदि कोई व्यक्ति वंदे मातरम नहीं गाता है तो उसे किसी तरह की सजा दी जाएगी या उसके खिलाफ कोई कार्रवाई होगी। इस पर अदालत ने यह समझने की कोशिश की कि याचिकाकर्ता की आशंका किस आधार पर है।

    याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने दलील दी कि भले ही सरकार ने सीधे तौर पर दंड का प्रावधान न किया हो, लेकिन इस तरह की एडवाइजरी के कारण सामाजिक दबाव उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को गाने या सम्मान करने के लिए मजबूर किया जाना उसके अधिकारों के खिलाफ हो सकता है और इस तरह की स्थिति में अप्रत्यक्ष रूप से दबाव बन सकता है।

    इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सवाल उठाते हुए कहा कि क्या राष्ट्रगीत के सम्मान के लिए किसी एडवाइजरी की आवश्यकता होती है। वहीं अदालत ने इस मामले में स्पष्ट किया कि सर्कुलर में “may” यानी “सकते हैं” जैसे शब्द का उपयोग किया गया है, जो किसी भी प्रकार के अनिवार्य आदेश या दंड को इंगित नहीं करता।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी में यह भी सामने आया कि इस सर्कुलर में न तो किसी प्रकार की सजा का प्रावधान है और न ही किसी व्यक्ति को इसे गाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। अदालत ने कहा कि अगर भविष्य में इस एडवाइजरी के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव किया जाता है या उसके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई होती है, तो उस स्थिति में वह व्यक्ति न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह भी सलाह दी कि अभी उनके द्वारा उठाई गई आशंकाएं अस्पष्ट हैं और किसी ठोस आधार पर नहीं हैं। अदालत ने कहा कि यदि वास्तव में किसी के साथ अन्याय या भेदभाव होता है तभी वह कोर्ट में आए। यह कोई धमकी नहीं बल्कि एक स्पष्ट सलाह है।

    इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फिलहाल हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि वंदे मातरम को लेकर जारी सर्कुलर में किसी प्रकार का दंडात्मक प्रावधान नहीं है और यह केवल एक सलाह के रूप में देखा जाना चाहिए।