Tag: verdict

  • मेरठ ब्लू ड्रम हत्याकांड में मुस्कान और साहिल को मौत की सजा, सौरभ राजपूत हत्याकांड की पूरी कहानी डॉक्यू-सीरीज में दिखाई गई

    मेरठ ब्लू ड्रम हत्याकांड में मुस्कान और साहिल को मौत की सजा, सौरभ राजपूत हत्याकांड की पूरी कहानी डॉक्यू-सीरीज में दिखाई गई

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के मेरठ में चर्चित ब्लू ड्रम हत्याकांड में जिला अदालत ने सौरभ राजपूत की हत्या के मामले में उनकी पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाई है। बुधवार को आए इस फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस हत्याकांड की घटनाओं, पुलिस जांच और आरोपियों से जुड़े घटनाक्रम को ‘हनीमून से हत्या’ नाम की डॉक्यू-सीरीज में भी प्रस्तुत किया गया है।

    यह डॉक्यू-सीरीज पांच गंभीर आपराधिक मामलों पर आधारित है। इसमें उन महिलाओं की घटनाओं को दिखाया गया है, जिन्होंने अपने पतियों की हत्या की। घटनाओं को समझाने के लिए पुलिस जांच, संबंधित लोगों के साक्षात्कार और घटनाओं के पुनर्निर्माण का सहारा लिया गया है। मेरठ का ब्लू ड्रम हत्याकांड भी इसमें शामिल है। इस मामले में हत्या के बाद शव को ठिकाने लगाने के लिए नीले ड्रम का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई थी।

    यह घटना 3 मार्च 2022 की बताई गई है। सौरभ राजपूत लंदन में रहते थे। आरोपों के मुताबिक, उनकी पत्नी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला ने मिलकर उनकी हत्या कर दी थी। बताया गया कि हत्या के बाद दोनों पूरी रात शव के साथ घर में रहे। अगले दिन उन्होंने चाकू, सीमेंट और एक बड़ा नीला ड्रम खरीदा। इसके बाद शव के चार टुकड़े किए गए और उन्हें तकिए के कवर में लपेटकर ड्रम में रखा गया। शव को छिपाने के लिए ड्रम में सीमेंट का घोल भी डाला गया।

    आरोपियों की योजना ड्रम को किसी दूसरी जगह ले जाकर ठिकाने लगाने की थी, लेकिन उसका वजन अधिक होने के कारण वे उसे घर से बाहर नहीं ले जा सके। परिणामस्वरूप ड्रम उसी मकान में छिपा रह गया। इस घटनाक्रम के बाद दोनों के हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड घूमने जाने की जानकारी भी सामने आई थी।

    बताया गया कि 4 मार्च को दोनों ने ड्राइवर अजब सिंह के साथ कैब बुक की और घूमने निकल गए। इस दौरान वे मनाली, शिमला और कसोल गए। ड्राइवर के अनुसार, दोनों ने यात्रा के दौरान शराब पी और छुट्टियां बिताईं। 17 मार्च को मेरठ लौटने के बाद मुस्कान ने अपनी मां कविता को फोन कर सौरभ की हत्या की जानकारी दी। उसने बताया कि शव किराए के मकान में पड़ा है।

    इसके बाद मुस्कान के पिता प्रमोद ने पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने मकान पर पहुंचकर तलाशी ली, जहां नीले ड्रम के अंदर सौरभ का शव बरामद हुआ। जांच के बाद मुस्कान और साहिल को गिरफ्तार किया गया। 19 मार्च को दोनों को अदालत में पेश किया गया, जिसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया।
    इस मामले में एक अन्य घटनाक्रम तब सामने आया, जब जेल में रहते हुए मुस्कान ने 24 नवंबर को एक बेटी को जन्म दिया। यह उसकी दूसरी बेटी बताई गई है। उसकी पहली बेटी पीहू अपने दादा-दादी के पास रह रही है। इस घटना ने मामले से जुड़े पारिवारिक पहलुओं को भी चर्चा में ला दिया था।

    अब जिला अदालत द्वारा मुस्कान और साहिल को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद यह हत्याकांड फिर सुर्खियों में है। इस मामले को विस्तार से समझने के इच्छुक दर्शक ‘हनीमून से हत्या’ डॉक्यू-सीरीज देख सकते हैं, जिसमें अपराध की घटनाओं, जांच और उनसे जुड़े सवालों को प्रस्तुत किया गया है।

  • राम जन्मभूमि फैसले पर स्वरा भास्कर का पुराना बयान फिर चर्चा में, कहा था- मुस्लिम दोस्तों से माफी मांगी थी

    राम जन्मभूमि फैसले पर स्वरा भास्कर का पुराना बयान फिर चर्चा में, कहा था- मुस्लिम दोस्तों से माफी मांगी थी

    नई दिल्ली ।स्वरा भास्कर का एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर दोबारा चर्चा में है। वीडियो में वह अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर नवंबर 2019 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर अपनी प्रतिक्रिया देती नजर आ रही हैं। अपने बयान में स्वरा ने कहा था कि वह फैसले से काफी दुखी और निराश हुई थीं। उन्होंने यह भी बताया था कि फैसले के बाद उन्होंने अपने परिचित मुस्लिम दोस्तों को संदेश भेजकर माफी मांगी थी।

    वीडियो में स्वरा भास्कर ने कहा था कि राम जन्मभूमि मामले में फैसला आने के बाद उन्हें लगा था कि यह फैसला उचित नहीं था। उन्होंने कहा था कि उस समय वह काफी नाराज थीं और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि देश में ऐसा फैसला कैसे आया। उन्होंने बताया था कि उनके फोन में मौजूद कई मुस्लिम परिचितों को उन्होंने संदेश भेजे थे।

    स्वरा के अनुसार, इन लोगों में शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान और फहाद अहमद समेत कई लोग शामिल थे। उन्होंने कहा था कि एक हिंदू होने के नाते वह अपने मुस्लिम परिचितों को यह बताना चाहती थीं कि फैसले को लेकर उन्हें खेद है और वह इससे सहमत नहीं हैं। उनके इस पुराने बयान का वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

    कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने स्वरा के बयान की आलोचना की और उनके पुराने रुख को लेकर सवाल उठाए। कई लोगों ने धार्मिक नारे और टिप्पणियां भी कीं। दूसरी ओर, कुछ समर्थकों ने उनके विचार व्यक्त करने के अधिकार का समर्थन किया। उनका तर्क रहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी नागरिक को न्यायिक फैसले पर अपनी व्यक्तिगत राय या असहमति व्यक्त करने का अधिकार है।

    राम जन्मभूमि विवाद पर स्वरा भास्कर पहले भी सार्वजनिक रूप से अपनी असहमति जता चुकी थीं। 2019 में फैसले के बाद उनके बयानों को लेकर विवाद हुआ था। एक वकील की ओर से उनके खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई की मांग किए जाने की बात भी सामने आई थी। हालांकि, उस समय अटॉर्नी जनरल ने इस कार्रवाई की मांग से असहमति जताई थी।

    सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2019 को अयोध्या भूमि विवाद पर सर्वसम्मति से फैसला सुनाया था। पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने विवादित 2.77 एकड़ भूमि पर मंदिर निर्माण के लिए अधिकार देने का फैसला किया था। साथ ही मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।

    फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 1949 में विवादित परिसर में मूर्तियां रखे जाने और 1992 में बाबरी मस्जिद के ढांचे को गिराए जाने को कानून का उल्लंघन बताया था। अदालत ने विवादित भूमि पर रामलला के अधिकार से संबंधित निष्कर्ष भी दर्ज किए थे। फैसले के बाद अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ।

    अब स्वरा भास्कर के पुराने बयान का वीडियो फिर सामने आने से उनके 2019 के रुख पर सोशल मीडिया में चर्चा हो रही है। बयान को लेकर आलोचना और समर्थन, दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

  • मध्य प्रदेश में OBC आरक्षण मामले की हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी, अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा, हजारों अभ्यर्थियों की नजर

    मध्य प्रदेश में OBC आरक्षण मामले की हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी, अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा, हजारों अभ्यर्थियों की नजर

    मध्य प्रदेश: में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC आरक्षण से जुड़े लंबे समय से लंबित मामले में हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई है। अदालत ने मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब इस प्रकरण में न्यायालय के अंतिम निर्णय का इंतजार किया जा रहा है। फैसले का असर OBC वर्ग के अभ्यर्थियों और आरक्षण से जुड़े विभिन्न मामलों पर पड़ने की संभावना है।

    यह मामला वर्ष 2019 से न्यायिक प्रक्रिया में लंबित बताया जा रहा है। करीब सात साल से चल रहे इस प्रकरण के कारण OBC वर्ग के अभ्यर्थियों के बीच लगातार असमंजस की स्थिति बनी हुई है। सुनवाई पूरी होने के बाद अब सभी पक्षों की निगाहें अदालत के निर्णय पर टिकी हैं।

    मामले की सुनवाई के दौरान OBC आरक्षण से संबंधित पक्षों ने अपनी दलीलें और तर्क न्यायालय के सामने रखे। OBC महासभा की ओर से भी इस प्रकरण को सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्ग के हितों से जुड़ा महत्वपूर्ण मामला बताया गया है। संगठन का कहना है कि लंबे समय से लंबित रहने के कारण बड़ी संख्या में अभ्यर्थी प्रभावित हो रहे हैं।

    OBC महासभा के संस्थापक अध्यक्ष विजय कुमार ने कहा कि जबलपुर हाई कोर्ट में लंबित प्रकरण पर सुनवाई पूरी हो चुकी है और न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा है। उनके अनुसार, OBC वर्ग से जुड़े पक्षकारों और अधिवक्ताओं ने मामले में अपनी बात रखी है। अब न्यायालय के निर्णय का इंतजार है।

    मामले से जुड़े पक्ष की ओर से दावा किया गया है कि लगभग 80 से 90 हजार OBC वर्ग के बच्चे और अभ्यर्थी इस प्रकरण से प्रभावित हैं। लंबे समय से आरक्षण व्यवस्था को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने के कारण उनकी शैक्षणिक और रोजगार संबंधी संभावनाओं पर भी अनिश्चितता बनी हुई है।

    आरक्षण का मुद्दा मध्य प्रदेश में लंबे समय से राजनीतिक, सामाजिक और न्यायिक चर्चा का विषय रहा है। OBC वर्ग के लिए आरक्षण से संबंधित विभिन्न नियुक्तियों और शैक्षणिक अवसरों में स्थिति स्पष्ट होने को लेकर अभ्यर्थियों की नजर न्यायालय के निर्णय पर रहती है। ऐसे में फैसला सुरक्षित होने के बाद उम्मीद की जा रही है कि आगे की स्थिति न्यायिक निर्णय से स्पष्ट होगी।

    OBC महासभा ने न्यायालय से जल्द फैसला सुनाए जाने की अपील की है। संगठन का कहना है कि मामले के लंबे समय से लंबित रहने के कारण अभ्यर्थियों को अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। फैसला आने के बाद आरक्षण से संबंधित कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर स्थिति साफ हो सकेगी।

    फिलहाल हाई कोर्ट ने सुनवाई पूरी करने के बाद निर्णय सुरक्षित रखा है। अदालत कब तक फैसला सुनाएगी, इसकी निश्चित तारीख की जानकारी सामने नहीं आई है। अंतिम निर्णय आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि OBC आरक्षण से जुड़े लंबित विवाद पर न्यायालय का रुख क्या रहता है और उसका अभ्यर्थियों पर किस प्रकार प्रभाव पड़ेगा।

    करीब सात वर्षों से चल रहे इस मामले में सुनवाई पूरी होना अपने आप में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। अब OBC वर्ग के अभ्यर्थियों, संगठनों और संबंधित पक्षों की निगाहें हाई कोर्ट के फैसले पर केंद्रित हैं। निर्णय आने के बाद ही आरक्षण व्यवस्था से जुड़े आगे के कदम और प्रभावित अभ्यर्थियों की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

  • सलमान रुश्दी पर हमले के मामले में बड़ा फैसला, हमलावर आतंकवाद से जुड़े आरोपों में भी दोषी करार

    सलमान रुश्दी पर हमले के मामले में बड़ा फैसला, हमलावर आतंकवाद से जुड़े आरोपों में भी दोषी करार

    नई दिल्ली । बुकर पुरस्कार विजेता लेखक सलमान रुश्दी पर वर्ष 2022 में हुए जानलेवा हमले के मामले में अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत की जूरी ने आरोपी हादी मतर को आतंकवाद से जुड़े आरोपों में दोषी ठहराया है। इससे पहले वह न्यूयॉर्क राज्य की अदालत में हत्या के प्रयास के मामले में भी दोषी करार दिया जा चुका है और वर्तमान में सजा काट रहा है। ताजा फैसले के बाद उस पर अतिरिक्त संघीय सजा का रास्ता भी खुल गया है।

    अभियोजन पक्ष ने अदालत में दलील दी कि हादी मतर ने सलमान रुश्दी पर हमला अकेले नहीं किया, बल्कि वह ईरान से जुड़े एक संगठन के समर्थन और विचारधारा से प्रभावित होकर काम कर रहा था। अभियोजकों ने अदालत के समक्ष ऐसे साक्ष्य प्रस्तुत किए, जिनमें आरोपी की तस्वीरें और वीडियो शामिल थे। इन साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने माना कि आरोपी पर लगाए गए आतंकवाद से संबंधित आरोप साबित होते हैं।

    मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने यह भी कहा कि हमला वर्ष 1989 में जारी उस विवादित फतवे की पृष्ठभूमि से जुड़ा था, जिसमें सलमान रुश्दी के खिलाफ कार्रवाई की अपील की गई थी। यह फतवा उनके उपन्यास ‘सैटेनिक वर्सेज’ को लेकर उत्पन्न विवाद के बाद जारी हुआ था। इसी संदर्भ को अभियोजन ने हमले के संभावित उद्देश्य के रूप में अदालत के सामने रखा।

    दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने यह स्वीकार किया कि हादी मतर ने लेखक पर हमला किया था, लेकिन उसने यह दलील दी कि आरोपी ने यह कृत्य किसी संगठन के निर्देश पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत रूप से किया। बचाव पक्ष का कहना था कि मतर अपनी धार्मिक भावनाओं के कारण आक्रोशित था और उसने किसी विदेशी सरकार या संगठन के साथ मिलकर साजिश नहीं रची।

    79 वर्षीय सलमान रुश्दी पर अगस्त 2022 में न्यूयॉर्क राज्य के चौटाक्वा इंस्टीट्यूशन में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान हमला हुआ था। विडंबना यह थी कि उस समय वह लेखकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा से जुड़े विषय पर बोलने वाले थे। कार्यक्रम शुरू होने से पहले मंच पर पहुंचे आरोपी ने उन पर कई बार चाकू से हमला किया, जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गए।

    हमले के कारण सलमान रुश्दी की एक आंख की रोशनी चली गई और उनके हाथ तथा शरीर के अन्य हिस्सों में भी गंभीर चोटें आईं। अदालत में गवाही के दौरान उन्होंने बताया कि हमले के कारण उन्हें स्थायी शारीरिक नुकसान हुआ है और अब वह पहले की तरह सामान्य जीवन नहीं जी सकते। उन्होंने अपने अनुभवों और हमले के बाद के संघर्ष को लेकर एक पुस्तक भी लिखी है, जिसमें उन्होंने पूरे घटनाक्रम का विस्तार से उल्लेख किया है।

    अमेरिकी न्याय व्यवस्था के तहत किसी एक घटना में राज्य और संघीय स्तर पर अलग-अलग कानूनों के आधार पर मुकदमा चलाया जा सकता है। इसी प्रक्रिया के तहत हादी मतर को पहले राज्य अदालत में हत्या के प्रयास के मामले में दोषी ठहराया गया था, जबकि अब संघीय अदालत ने उसे आतंकवाद से जुड़े आरोपों में भी दोषी माना है। इस मामले में नवंबर में सजा सुनाई जानी है और उसे बिना पैरोल के आजीवन कारावास तक की सजा मिल सकती है।

    यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लेखकों की सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मामलों में अमेरिकी न्याय प्रणाली की कार्रवाई के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मामले पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लंबे समय से नजर बनी हुई थी और अब संघीय अदालत के फैसले के बाद इसकी कानूनी प्रक्रिया एक नए चरण में पहुंच गई है।

  • दिल्ली दंगों के सबसे चर्चित मामलों में शामिल अंकित शर्मा हत्याकांड, अदालत ने फैसला 11 जून तक टाला

    दिल्ली दंगों के सबसे चर्चित मामलों में शामिल अंकित शर्मा हत्याकांड, अदालत ने फैसला 11 जून तक टाला

    नई दिल्ली । वर्ष 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या से जुड़े बहुचर्चित मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने अपना फैसला फिलहाल सुरक्षित रखते हुए सुनवाई की अगली तारीख 11 जून निर्धारित की है। अदालत को गुरुवार को इस मामले में निर्णय सुनाना था, लेकिन अब फैसला अगले सप्ताह सुनाया जाएगा। इस घटनाक्रम के बाद सभी पक्षों की निगाहें आगामी सुनवाई पर टिक गई हैं।

    अंकित शर्मा हत्याकांड दिल्ली दंगों से जुड़े सबसे चर्चित और संवेदनशील मामलों में शामिल रहा है। यह मामला न केवल अपनी गंभीरता बल्कि इससे जुड़े आरोपों और लंबे न्यायिक प्रक्रिया के कारण भी लगातार चर्चा में बना रहा। मामले में पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत कुल 11 आरोपी न्यायालय के समक्ष पेश हैं, जिन पर हत्या, दंगा, आपराधिक साजिश और अन्य गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

    घटना फरवरी 2020 की है, जब उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में हिंसा भड़क उठी थी। इसी दौरान 26 फरवरी को अंकित शर्मा का शव खजूरी खास क्षेत्र के एक नाले से बरामद किया गया था। उनकी मौत ने पूरे देश का ध्यान इस मामले की ओर खींचा था। इसके बाद पुलिस ने हत्या और दंगों से संबंधित विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी।

    अभियोजन पक्ष का दावा है कि आरोपी एक संगठित भीड़ और कथित साजिश का हिस्सा थे, जिसने दंगों के दौरान हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया। जांच एजेंसियों ने अदालत के समक्ष विभिन्न दस्तावेजी साक्ष्य, गवाहों के बयान और अन्य सामग्री प्रस्तुत की है। वहीं बचाव पक्ष ने आरोपों का विरोध करते हुए अपने तर्क अदालत के समक्ष रखे हैं।

    मार्च 2023 में अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान सभी आरोपियों के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत आरोप तय किए थे। इनमें हत्या, दंगा, घातक हथियारों के साथ दंगा करने, समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने और आपराधिक साजिश जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं। इसके बाद लंबे समय तक चली सुनवाई में दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क विस्तार से प्रस्तुत किए।

    मामले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान यह केस कई बार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना। अदालतों में हुई सुनवाई, जमानत याचिकाओं और कानूनी बहसों ने इसे लगातार सुर्खियों में बनाए रखा। इसी वजह से फैसले का इंतजार केवल संबंधित पक्षों को ही नहीं बल्कि कानूनी और राजनीतिक हलकों को भी है।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में आने वाला फैसला दिल्ली दंगों से जुड़े अन्य मामलों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जाएगा। अदालत का निर्णय उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहियों और कानूनी तथ्यों के आधार पर होगा, जिसका सभी पक्षों को इंतजार है।

    फिलहाल अदालत द्वारा फैसला टाले जाने के बाद एक सप्ताह और प्रतीक्षा बढ़ गई है। अब 11 जून को कड़कड़डूमा कोर्ट इस बहुचर्चित मामले में अपना अंतिम निर्णय सुनाएगी। ऐसे में आगामी तारीख को लेकर सुरक्षा एजेंसियों, कानूनी विशेषज्ञों और आम लोगों की नजरें अदालत की कार्यवाही पर बनी हुई हैं।

  • पाकिस्तान में न्यायपालिका पर सवाल: फर्जी डिग्री के आधार पर फैसले सुनाते रहे जज, पद से हटाए गए

    पाकिस्तान में न्यायपालिका पर सवाल: फर्जी डिग्री के आधार पर फैसले सुनाते रहे जज, पद से हटाए गए

    इस्लामाबाद। पाकिस्तान की न्यायिक व्यवस्था से जुड़ा एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने नियुक्तियों की पारदर्शिता और डिग्री सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। तारिक महमूद जहांगीरी नामक जज को कथित तौर पर फर्जी कानून की डिग्री के आधार पर वर्षों तक पद पर बने रहने के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया है।

    यह कार्रवाई इस्लामाबाद हाई कोर्ट के 116 पन्नों के विस्तृत फैसले के बाद की गई, जिसमें अदालत ने मामले को “गंभीर संस्थागत धोखाधड़ी” बताया।

    डिग्री शुरू से ही अवैध पाई गई

    अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा कि जहांगीरी की लॉ डिग्री वैध नहीं थी, इसलिए उनकी न्यायिक नियुक्ति भी कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं मानी जा सकती। कोर्ट के अनुसार, किसी भी न्यायिक पद के लिए शैक्षणिक योग्यता की प्रामाणिकता अनिवार्य है, और इस मामले में वही मूल आधार ही संदिग्ध पाया गया।

    विश्वविद्यालय रिकॉर्ड से हुआ खुलासा

    मीडिया रिपोर्ट, विशेषकर डॉन में प्रकाशित जानकारी के अनुसार, अदालत को कराची विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार से आधिकारिक रिकॉर्ड प्राप्त हुए। इन दस्तावेजों ने प्रस्तुत किए गए प्रमाणपत्रों को पूरी तरह फर्जी साबित कर दिया।

    जांच में यह भी सामने आया कि:

    • 1988 में जहांगीरी ने कथित तौर पर फर्जी नामांकन संख्या के साथ परीक्षा दी।

    • परीक्षा के दौरान नकल करते पकड़े गए और उन पर तीन वर्ष का प्रतिबंध लगाया गया।

    • बाद में उन्होंने दंड स्वीकार नहीं किया और किसी अन्य छात्र के एनरोलमेंट नंबर का इस्तेमाल कर दोबारा परीक्षा देने का प्रयास किया।

    कॉलेज में प्रवेश का कोई रिकॉर्ड नहीं

    सुनवाई के दौरान संबंधित लॉ कॉलेज प्रशासन ने अदालत को बताया कि जहांगीरी ने संस्थान में कभी औपचारिक प्रवेश ही नहीं लिया था। अदालत ने उन्हें मूल दस्तावेज पेश करने और अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर दिया, लेकिन वे ऐसा करने में असफल रहे।

    सुनवाई टालने की कोशिशें भी खारिज

    जहांगीरी ने फुल बेंच से सुनवाई की मांग, चीफ जस्टिस को मामले से अलग करने की अपील और कार्यवाही स्थगित कराने जैसे कई प्रयास किए। अदालत ने इन कदमों को “मामले को लंबा खींचने की रणनीति” बताते हुए खारिज कर दिया।

    अदालत की सख्त टिप्पणी

    कोर्ट ने कहा कि जब याचिकाकर्ता पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत कर चुका था, तब संबंधित जज की जिम्मेदारी थी कि वह अपनी डिग्री की वैधता सिद्ध करें। ऐसा न कर पाने पर उन्हें पद से हटाना आवश्यक हो गया।

    पाकिस्तान में छिड़ी नई बहस

    यह मामला अब पाकिस्तान में न्यायिक नियुक्तियों की पारदर्शिता, शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के सत्यापन और संस्थागत जवाबदेही को लेकर व्यापक बहस का कारण बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटना के बाद नियुक्ति प्रक्रिया की जांच और कड़े सत्यापन तंत्र की मांग तेज हो सकती है।