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  • पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ तीनों आरोप साबित, जांच समिति ने लोकसभा में अंतिम रिपोर्ट पेश की

    पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ तीनों आरोप साबित, जांच समिति ने लोकसभा में अंतिम रिपोर्ट पेश की

    नई दिल्ली ।हाई कोर्ट के पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ गठित जांच समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट बुधवार को लोकसभा में पेश कर दी। समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को सिद्ध पाया है। रिपोर्ट में अघोषित नकदी, साक्ष्यों के संरक्षण में लापरवाही तथा जांच के दौरान दिए गए टालमटोल वाले और असंतोषजनक जवाब से जुड़े आरोप शामिल हैं।

    जांच समिति ने मामले से संबंधित कार्यवाही का रिकॉर्ड, जरूरी दस्तावेज और उपलब्ध साक्ष्य सक्षम प्राधिकारी को भी सौंप दिए हैं। अब समिति की रिपोर्ट और उसके निष्कर्षों के आधार पर कानून के अनुसार आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी। इस घटनाक्रम के बाद पूर्व जज के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच का औपचारिक चरण पूरा हो गया है।

    पहले आरोप के तहत नई दिल्ली स्थित 30, तुगलक क्रेसेंट के आधिकारिक आवासीय परिसर के स्टोररूम से बड़ी मात्रा में नकदी बरामद होने के मामले की जांच की गई। समिति के अनुसार, वहां 500 रुपये के नोटों के रूप में रखी गई नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत और स्वामित्व को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सका।

    समिति ने उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर अघोषित नकदी से संबंधित आरोप को सिद्ध माना। जांच में नकदी के संबंध में स्पष्ट और संतोषजनक जवाब का अभाव महत्वपूर्ण आधारों में शामिल रहा। इस निष्कर्ष के साथ समिति ने पहले आरोप को अपनी अंतिम रिपोर्ट में प्रमाणित माना है।

    दूसरा आरोप मामले से जुड़े भौतिक साक्ष्यों के संरक्षण में कथित लापरवाही से संबंधित था। समिति ने पाया कि संबंधित स्टोररूम की स्थिति को कानूनी सीलिंग और निरीक्षण से पहले बदले जाने की बात सामने आई। इसके अलावा बाद में कुछ करेंसी नोटों के गायब या अनुपलब्ध होने को लेकर भी स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं मिल सका।

    समिति ने इस स्थिति को साक्ष्यों के संरक्षण में गंभीर लापरवाही और विफलता के रूप में देखा। हालांकि, रिपोर्ट के निष्कर्ष के अनुसार साक्ष्यों के संरक्षण में लापरवाही का यह मतलब नहीं है कि जज ने स्वयं किसी नोट को हटाया था। आरोप का आधार साक्ष्यों को उचित तरीके से सुरक्षित रखने में हुई विफलता से जुड़ा रहा।

    तीसरा आरोप जस्टिस वर्मा की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण और जांच के दौरान उनके रुख से संबंधित था। समिति ने विशेष रूप से 22 मार्च 2025 को दिए गए उनके जवाब को संतोषजनक नहीं माना। रिपोर्ट के अनुसार, उनके जवाब में अपेक्षित स्पष्टता का अभाव था और उनका रुख टालमटोल वाला पाया गया।

    समिति ने स्वतंत्र आधिकारिक गवाहों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इस आरोप को भी सिद्ध माना। उसके अनुसार, मामले में जज से संस्थागत जिम्मेदारी के अनुरूप स्पष्ट और संतोषजनक जवाब की अपेक्षा थी, लेकिन प्रस्तुत स्पष्टीकरण उस कसौटी पर खरा नहीं उतरा।

    तीनों आरोपों के सिद्ध पाए जाने के बाद समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट संबंधित प्रक्रिया के लिए सक्षम प्राधिकारी को सौंप दी है। अब रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्षों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर आगे की कानूनी तथा संस्थागत कार्रवाई की जाएगी। इस मामले में अंतिम कदम संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत तय होंगे।

  • पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR मांग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और सस्ती लोकप्रियता

    पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR मांग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और सस्ती लोकप्रियता


    नई दिल्ली ।
    पूर्व हाई कोर्ट जज यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई से इनकार करते हुए उसे खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने याचिका को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया और कहा कि इस तरह की याचिकाएं सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के उद्देश्य से दाखिल की जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता को कड़ी टिप्पणी करते हुए मामले को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया।

    जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई की। याचिका में मांग की गई थी कि पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए। याचिकाकर्ता का कहना था कि दिल्ली हाई कोर्ट में न्यायाधीश रहते हुए उनके आवास से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद हुई थी और इस मामले में पुलिस कार्रवाई होनी चाहिए।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उन्होंने पुलिस को शिकायत दी थी, लेकिन इसके बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की गई। उन्होंने कहा कि पूर्व न्यायाधीश अब पद पर नहीं हैं और उन्हें किसी तरह की कानूनी छूट प्राप्त नहीं है। याचिकाकर्ता का कहना था कि मामले की जांच जरूरी है और कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि इससे पहले भी इसी तरह की एक याचिका अदालत द्वारा खारिज की जा चुकी है। जब वकील ने कहा कि पिछली याचिका तकनीकी आधार पर खारिज हुई थी क्योंकि उस समय शिकायत दर्ज नहीं की गई थी, तो अदालत ने कहा कि इस तरह की प्रक्रिया को बार-बार दोहराना उचित नहीं है।

    जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता एक अधिवक्ता हैं और उन्हें न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता को समझना चाहिए। अदालत ने कहा कि इस तरह की याचिकाएं न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हैं और केवल प्रचार हासिल करने के उद्देश्य से दाखिल की जा रही हैं। इसके बाद पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया।

    यशवंत वर्मा इससे पहले भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर चर्चा में आए थे। उनके खिलाफ पद से हटाने की प्रक्रिया के तहत महाभियोग की कार्रवाई शुरू की गई थी। हालांकि, उन्होंने बाद में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद महाभियोग की प्रक्रिया प्रभावी नहीं रही। नियमों के अनुसार, संसद द्वारा हटाए जाने की प्रक्रिया से बचने के लिए संबंधित न्यायाधीश के पास इस्तीफा देने का विकल्प उपलब्ध होता है।

    मामला उस घटना से जुड़ा है, जब दिल्ली स्थित यशवंत वर्मा के आवास पर आग लगने के बाद कथित रूप से जली हुई नकदी मिलने की बात सामने आई थी। घटना के बाद इस मामले ने काफी चर्चा बटोरी थी और जांच की मांग उठी थी। हालांकि, एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है।

    सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद स्पष्ट हो गया है कि अदालत किसी भी मामले में केवल आरोपों के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया के इस्तेमाल को मंजूरी नहीं देगी। शीर्ष अदालत ने अपने रुख से यह संदेश दिया है कि न्यायिक व्यवस्था में दाखिल होने वाली याचिकाएं ठोस आधार और वास्तविक कानूनी जरूरतों पर आधारित होनी चाहिए।