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  • जब दंगल की शूटिंग में हो गई थी बड़ी गड़बड़, नितेश तिवारी ने VFX से ऐसा खेल रचा कि सब देखते रह गए

    जब दंगल की शूटिंग में हो गई थी बड़ी गड़बड़, नितेश तिवारी ने VFX से ऐसा खेल रचा कि सब देखते रह गए


    नई दिल्ली। रणबीर कपूर स्टारर रामायण का ट्रेलर रिलीज होने के बाद फिल्म के विजुअल्स और VFX को लेकर जबरदस्त चर्चा हो रही है। फिल्म के निर्देशक नितेश तिवारी को लेकर ट्रेलर रिलीज से पहले सोशल मीडिया पर कई तरह के सवाल भी उठाए गए थे। कुछ लोगों का मानना था कि दंगल और छिछोरे जैसी फिल्मों का निर्देशन कर चुके नितेश तिवारी इतने बड़े VFX प्रोजेक्ट के लिए सही चुनाव नहीं हैं। इसकी वजह यह बताई जा रही थी कि उनकी पिछली फिल्मों में बड़े स्तर पर VFX का इस्तेमाल देखने को नहीं मिला था। हालांकि दंगल से जुड़े उनके कुछ पुराने किस्से बताते हैं कि नितेश तिवारी शूटिंग और पोस्ट प्रोडक्शन के स्तर पर तकनीक का बेहद समझदारी से इस्तेमाल कर चुके हैं।

    नितेश तिवारी की फिल्म दंगल साल 2016 में रिलीज हुई थी और आमिर खान स्टारर इस फिल्म ने दर्शकों के साथ साथ बॉक्स ऑफिस पर भी शानदार सफलता हासिल की थी। फिल्म की कहानी और कलाकारों के अभिनय की जितनी चर्चा हुई उतनी ही दिलचस्प इसके निर्माण से जुड़ी कई बातें भी हैं। खास बात यह है कि फिल्म के कुछ ऐसे सीन भी थे जिनकी शूटिंग के दौरान खामियां सामने आने के बाद नितेश तिवारी ने VFX और क्रोमा तकनीक का सहारा लिया और दर्शकों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी।

    दंगल के क्लाइमैक्स से जुड़ा एक सीन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। फिल्म में महावीर सिंह फोगाट को एक कमरे में बंद कर दिया जाता है। इस पूरे सीक्वेंस की शूटिंग के दौरान टीम ने महसूस किया कि दरवाजा तोड़ने वाले हिस्से को जितना प्रभावी होना चाहिए था उतना शूट नहीं किया जा सका। एडिटिंग के दौरान जब नितेश तिवारी और उनकी टीम ने फुटेज देखा तो उन्हें महसूस हुआ कि सीन में जरूरी प्रभाव की कमी है। समस्या यह थी कि जिस कमरे में शूटिंग हुई थी वह लोकेशन अब दोबारा उपलब्ध नहीं थी।

    ऐसे में नितेश तिवारी ने दोबारा पूरी शूटिंग करने के बजाय तकनीक का सहारा लिया। उन्होंने एक अलग दरवाजा तैयार करवाया और आमिर खान को उसके सामने खड़ा करके पीछे क्रोमा लगाया। इसके बाद जरूरी शॉट्स शूट किए गए और पोस्ट प्रोडक्शन में उन्हें पहले से मौजूद फुटेज के साथ इस तरह जोड़ा गया कि पूरा सीन स्वाभाविक दिखाई देने लगा। दर्शकों को फिल्म देखते समय यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि सीन के एक हिस्से को बाद में VFX की मदद से तैयार किया गया है।

    दंगल में एक और सीन ऐसा था जहां कहानी के भीतर एक तरह का विरोधाभास दिखाई दे रहा था। यह वह हिस्सा था जब महावीर फोगाट अपनी बेटियों को लड़कों के दंगल में उतारने के लिए ले जाते हैं। वहां मौजूद एक व्यक्ति लड़कियों को लड़कों के साथ मुकाबला कराने का विरोध करता है लेकिन बाद में एक अन्य व्यक्ति यह बात कहता है कि अगर लड़कियां लड़कों के साथ दंगल करेंगी तो मुकाबला देखने के लिए भीड़ जुटेगी और दंगल हिट हो जाएगा।

    इस सीन को भी नितेश तिवारी ने साधारण तरीके से दोबारा शूट करने के बजाय VFX और क्रोमा की मदद से ठीक किया। दूसरे कलाकार की मदद से जरूरी हिस्सा शूट किया गया और फिर उसे मौजूदा सीन में इस तरह शामिल किया गया कि कहानी की निरंतरता बनी रहे। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि फिल्म देखने वाले ज्यादातर दर्शक इस बदलाव को पहचान भी नहीं पाए।

    यही वजह है कि रामायण के बड़े VFX प्रोजेक्ट को लेकर नितेश तिवारी की क्षमता पर सवाल उठाने से पहले उनके पुराने काम को देखना जरूरी है। दंगल में उन्होंने सीमित परिस्थितियों के बावजूद तकनीक और कहानी के बीच ऐसा संतुलन बनाया था कि VFX पर्दे पर अलग से नजर नहीं आया बल्कि कहानी का हिस्सा बन गया। अब रामायण में उन्हें इससे कहीं बड़े स्तर पर यही काम करना है। फिल्म के ट्रेलर ने जिस तरह के भव्य विजुअल्स दिखाए हैं उससे साफ है कि नितेश तिवारी के सामने इस बार चुनौती बड़ी है लेकिन दंगल का उनका अनुभव उनके लिए निश्चित तौर पर मजबूत आधार साबित हो सकता है।

  • चीख-पुकार और भारी मेकअप के दौर से निकलकर अब मनोवैज्ञानिक गहराई और देसी लोककथाओं तक पहुंचा डर

    चीख-पुकार और भारी मेकअप के दौर से निकलकर अब मनोवैज्ञानिक गहराई और देसी लोककथाओं तक पहुंचा डर

    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के इतिहास में हॉरर फिल्मों का सफर बेहद दिलचस्प रहा है। अस्सी और नब्बे के दशक में हॉरर का मतलब केवल पुरानी हवेलियां, अंधेरी रातें, चेहरे पर भारी मेकअप और डरावनी आवाजों तक सीमित था। उस दौर में कहानियों का ढांचा बहुत सरल हुआ करता था और दर्शकों का मुख्य उद्देश्य केवल डर का अनुभव करना था। हालांकि, समय के साथ दर्शकों की सोच और सिनेमाई तकनीक में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। अब हॉरर केवल डराने का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि इसे एक गंभीर सिनेमा की तरह देखा जाने लगा है, जहां कहानी के पीछे तर्क, भावनाएं और किरदारों की मनोवैज्ञानिक यात्रा भी महत्वपूर्ण हो गई है।

    आज के दौर में हॉरर फिल्मों में सिर्फ डरावने दृश्य दिखाना काफी नहीं रह गया है। आधुनिक निर्माता अब ऐसे कथानक तैयार कर रहे हैं जिनमें सस्पेंस, मिस्ट्री और इमोशन का सटीक संतुलन हो। दर्शक अब भूत-प्रेत से ज्यादा कहानी के मोड़ और किरदारों के मानसिक संघर्ष में दिलचस्पी लेते हैं। फिल्मों में अब मनोवैज्ञानिक कोण यानी साइकोलॉजिकल एंगल जोड़ा जा रहा है, जिससे डर और भी वास्तविक और गहरा लगने लगा है। यह बदलाव दर्शाता है कि दर्शक अब पहले से अधिक समझदार हो चुके हैं और वे केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक विचारोत्तेजक अनुभव की तलाश में रहते हैं। इस बदलाव ने हॉरर को ड्रामा और थ्रिलर के साथ मिश्रित कर एक नया आयाम दिया है।

    सिनेमा के इस विकास में उन्नत तकनीक और वीएफएक्स की भूमिका अतुलनीय रही है। पहले के समय में सीमित संसाधनों के कारण डरावने दृश्य उतने प्रभावशाली नहीं लगते थे, लेकिन आज अत्याधुनिक ग्राफिक्स और साउंड डिजाइन ने डर को एक नया एहसास दिया है। अब दर्शक स्क्रीन पर केवल डर देखते नहीं, बल्कि उसे महसूस करते हैं। अचानक छाई खामोशी और बेहतरीन विजुअल्स दर्शकों को कहानी के भीतर तक खींच ले जाते हैं। इसके साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने भी इस जॉनर को नई आजादी दी है। यहां निर्माताओं को बिना किसी दबाव के डार्क और गहरी कहानियों को विस्तार से दिखाने का मौका मिल रहा है, जिससे इस विषय की पहुंच व्यापक स्तर पर बढ़ी है।

    वर्तमान में भारतीय हॉरर सिनेमा में एक और बड़ा बदलाव देसी कहानियों और लोककथाओं के इस्तेमाल के रूप में देखा जा रहा है। अब निर्माता विदेशी कहानियों की नकल करने के बजाय अपने ही देश की मिट्टी से जुड़ी लोककथाओं, गांवों और परंपराओं को पर्दे पर उतार रहे हैं। ये कहानियां दर्शकों को अपने आसपास की याद दिलाती हैं, जिससे डर और भी सजीव हो उठता है। फिल्म निर्माताओं के लिए भी यह जॉनर एक सुरक्षित विकल्प साबित हो रहा है, क्योंकि एक मजबूत कहानी होने पर बिना किसी बड़े सुपरस्टार के भी फिल्म सफल हो सकती है। आज हॉरर सिनेमा निरंतर नए प्रयोगों के साथ विकसित हो रहा है और दर्शकों को एक अलग तरह का रोमांच प्रदान कर रहा है।