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  • भोपाल पुलिस लाइन में मंत्री विश्वास सारंग ने किया शस्त्र पूजन, विजयादशमी पर दी शुभकामनाएं

    भोपाल पुलिस लाइन में मंत्री विश्वास सारंग ने किया शस्त्र पूजन, विजयादशमी पर दी शुभकामनाएं

    मध्य प्रदेश: की राजधानी भोपाल में विजयादशमी के अवसर पर शस्त्र पूजन का आयोजन किया गया। प्रदेश सरकार में मंत्री विश्वास सारंग ने नेहरू नगर स्थित पुलिस लाइन के मैदान में आयोजित कार्यक्रम में भाग लिया। इस दौरान उन्होंने विधि-विधान के साथ शस्त्रों का पूजन किया और प्रदेशवासियों को दशहरे की शुभकामनाएं दीं। कार्यक्रम में विजयादशमी की परंपरा और शस्त्र पूजन के महत्व को रेखांकित किया गया।

    मंत्री विश्वास सारंग ने कहा कि विजयादशमी का पर्व पूरी दुनिया में बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने इस अवसर पर सभी लोगों को दशहरे की बहुत-बहुत शुभकामनाएं दीं। उनके संदेश में पर्व की परंपरा, उसके सांस्कृतिक महत्व और शुभ अवसर पर लोगों को बधाई देने की भावना प्रमुख रही।

    विजयादशमी के अवसर पर मध्य प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में शस्त्र पूजन के आयोजन किए गए। इस परंपरा के तहत शस्त्रों की पूजा कर उनके महत्व को सम्मान दिया जाता है। भोपाल की पुलिस लाइन में आयोजित कार्यक्रम भी इसी परंपरा का हिस्सा रहा, जिसमें मंत्री सारंग ने स्वयं पूजन की विधि पूरी की।

    शस्त्र पूजन भारतीय परंपरा में शक्ति और सामर्थ्य के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। विजयादशमी के दिन इस अनुष्ठान के आयोजन का उद्देश्य परंपरागत मान्यताओं के प्रति सम्मान व्यक्त करना है। इस अवसर पर शस्त्रों की पूजा के माध्यम से शक्ति के महत्व को दर्शाया जाता है। मध्य प्रदेश में भी दशहरे के मौके पर इस परंपरा का पालन किया गया।

    मंत्री सारंग ने अपने संदेश में कहा कि शस्त्र शक्ति का प्रतीक हैं। उन्होंने देश और प्रदेश की प्रगति का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत आगे बढ़ रहा है और मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में मध्य प्रदेश भी विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने सनातन परंपराओं का पालन करते हुए आगे बढ़ने की बात कही।

    भोपाल के नेहरू नगर पुलिस लाइन स्थित मैदान में हुआ यह आयोजन विजयादशमी के अवसर पर आयोजित धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की कड़ी का हिस्सा रहा। शस्त्र पूजन के माध्यम से पर्व की परंपरा का निर्वहन किया गया। मंत्री सारंग ने पूजन के बाद अपने संदेश में विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए बुराई पर अच्छाई की जीत के महत्व को सामने रखा।

    विजयादशमी भारत में मनाए जाने वाले प्रमुख पर्वों में शामिल है। इस दिन विभिन्न स्थानों पर धार्मिक अनुष्ठान और परंपरागत कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। मध्य प्रदेश में भी पर्व के अवसर पर शस्त्र पूजन की परंपरा निभाई गई। भोपाल में आयोजित कार्यक्रम में मंत्री विश्वास सारंग की भागीदारी इसी आयोजन का प्रमुख हिस्सा रही।

  • दशहरा 2026 आज, विजयादशमी पर जानें पर्व का महत्व, शुभ मुहूर्त और अपनों को बधाई देने के खास संदेश

    दशहरा 2026 आज, विजयादशमी पर जानें पर्व का महत्व, शुभ मुहूर्त और अपनों को बधाई देने के खास संदेश

    नई दिल्ली । दशहरा और विजयादशमी का पर्व मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को मनाया जा रहा है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर देशभर में लोग भगवान श्रीराम की पूजा-अर्चना करते हैं और रावण दहन के माध्यम से बुराइयों के अंत का संदेश देते हैं। दशहरा केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा पर्व नहीं है, बल्कि यह सत्य, साहस, सदाचार और सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है।

    विजयादशमी के अवसर पर परिवार, दोस्तों और प्रियजनों को शुभकामनाएं देने की परंपरा भी खास महत्व रखती है। लोग इस दिन संदेशों, प्रेरणादायक विचारों और सामाजिक माध्यमों पर साझा किए जाने वाले स्टेटस के जरिए एक-दूसरे को पर्व की बधाई देते हैं। शुभकामना संदेशों में सुख, शांति, समृद्धि, सफलता और खुशहाली की कामना प्रमुख रूप से शामिल रहती है।

    दशहरा हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इसी दिन भगवान श्रीराम ने लंका के राजा रावण का वध किया था। इस घटना को अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में याद किया जाता है। वहीं, कुछ परंपराओं में विजयादशमी को देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय से भी जोड़कर देखा जाता है। इस तरह यह पर्व अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के माध्यम से शक्ति, धर्म और सत्य की स्थापना का संदेश देता है।

    दशहरे पर रावण दहन की परंपरा इस पर्व का प्रमुख आकर्षण है। रावण के दस सिरों को प्रतीकात्मक रूप से मनुष्य के भीतर मौजूद नकारात्मक प्रवृत्तियों से जोड़ा जाता है। इनमें अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, घृणा, भय और वासना जैसी बुराइयां शामिल हैं। रावण दहन के जरिए लोगों को यह संदेश दिया जाता है कि जीवन में केवल बाहरी बुराइयों का विरोध करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपनी गलत आदतों और नकारात्मक विचारों को दूर करने का प्रयास भी जरूरी है।

    20 अक्टूबर को दशहरा पूजा के लिए बताए गए प्रमुख शुभ समय में विजय मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 59 मिनट से 2 बजकर 45 मिनट तक निर्धारित बताया गया है। वहीं, प्रदोष काल शाम 5 बजकर 47 मिनट से शुरू होगा। इसी समय को ध्यान में रखते हुए रावण दहन शाम 5 बजकर 47 मिनट के बाद करने का उल्लेख है। हालांकि, पूजा और अन्य धार्मिक कार्यों के लिए स्थानीय पंचांग तथा क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार समय की पुष्टि करना उचित माना जाता है।

    दशहरे पर भेजे जाने वाले शुभकामना संदेशों में भगवान श्रीराम की कृपा, परिवार की खुशहाली और जीवन में सफलता की कामना की जाती है। लोग अपने प्रियजनों को संदेश भेजकर उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बने रहने की प्रार्थना करते हैं। कुछ संदेश जीवन की चुनौतियों का सामना करने, कठिन परिस्थितियों में साहस बनाए रखने और सत्य का साथ देने की प्रेरणा देते हैं।

    प्रेरणादायक विचारों में यह संदेश प्रमुख है कि बुराई चाहे कितनी भी प्रभावशाली क्यों न दिखाई दे, अंततः अच्छाई का महत्व बना रहता है। विजयादशमी लोगों को अपने व्यवहार में प्रेम, सद्भाव और सकारात्मकता अपनाने की सीख भी देती है। इस अवसर पर अहंकार और नफरत छोड़कर आपसी सम्मान तथा विश्वास को मजबूत करने का संकल्प लिया जा सकता है।

    WhatsApp स्टेटस के जरिए भी लोग दशहरा की शुभकामनाएं साझा करते हैं। जय श्रीराम, सत्य की जीत और असत्य के अंत जैसे संदेश इस अवसर पर विशेष रूप से प्रासंगिक रहते हैं। इन संदेशों का उद्देश्य पर्व की भावना को अपनों तक पहुंचाना और जीवन में अच्छे विचारों को अपनाने के लिए प्रेरित करना है।

    दशहरा 2026 का पर्व धार्मिक आस्था के साथ आत्ममंथन का अवसर भी प्रदान करता है। भगवान श्रीराम की विजय और रावण दहन की परंपरा लोगों को याद दिलाती है कि सत्य, संयम और सदाचार का रास्ता जीवन में महत्वपूर्ण है। विजयादशमी पर एक-दूसरे को शुभकामनाएं देने के साथ अपनी बुराइयों को दूर करने और सकारात्मक बदलाव की शुरुआत करने का संकल्प इस त्योहार के संदेश को सार्थक बना सकता है।

  • दशहरा 2026 कब मनाया जाएगा, 20 या 21 अक्टूबर? जानें विजयादशमी की सही तारीख, दिल्ली में पूजा का शुभ मुहूर्त और रावण दहन का समय

    दशहरा 2026 कब मनाया जाएगा, 20 या 21 अक्टूबर? जानें विजयादशमी की सही तारीख, दिल्ली में पूजा का शुभ मुहूर्त और रावण दहन का समय


    नई दिल्ली ।
    दशहरा यानी विजयादशमी हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक माना जाता है। साल 2026 में दशहरे की तारीख को लेकर लोगों के बीच असमंजस बना हुआ है। कुछ लोग 20 अक्टूबर को त्योहार मनाने की तैयारी कर रहे हैं, जबकि कुछ स्थानों पर 21 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। इसकी वजह आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि का दो दिनों तक रहना है। उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में दशहरा 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा, जबकि पश्चिम बंगाल में स्थानीय धार्मिक परंपराओं के अनुसार 21 अक्टूबर को विजयादशमी का उत्सव होगा।

    हिंदू पंचांग के अनुसार, नई दिल्ली में दशमी तिथि 20 अक्टूबर 2026 को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर शुरू होगी और 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट पर समाप्त होगी। इसी वजह से अलग-अलग क्षेत्रों में त्योहार मनाने की तारीख में अंतर देखने को मिल रहा है। दिल्ली और उत्तर भारत के कई हिस्सों में 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। वहीं, पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की परंपराओं के अनुसार 21 अक्टूबर को मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा। इस अवसर पर सिंदूर खेला जैसी पारंपरिक रस्में भी निभाई जाती हैं।

    विजयादशमी 2026 का शुभ मुहूर्त
    दशहरे के दिन विजय मुहूर्त में पूजा करना शुभ माना जाता है। इस दौरान लोग अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार भगवान श्रीराम, मां दुर्गा और शस्त्रों की पूजा करते हैं। नई दिल्ली में 20 अक्टूबर को विजय मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 59 मिनट से 2 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। इस अवधि में पूजा और अन्य शुभ कार्य किए जा सकते हैं।

    वहीं, अपराह्न पूजा का समय दोपहर 1 बजकर 19 मिनट से 3 बजकर 37 मिनट तक बताया गया है। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और स्थानीय पंचांग के आधार पर मुहूर्त में अंतर हो सकता है। इसलिए पूजा करने से पहले अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करना उचित रहेगा।

    दशहरे पर रावण दहन कब होगा?
    उत्तर भारत में दशहरे के अवसर पर 20 अक्टूबर की शाम को रामलीला के समापन के बाद रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाएगा। इस परंपरा को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। आमतौर पर रावण दहन सूर्यास्त के बाद किया जाता है, लेकिन इसके लिए पूरे देश में एक समान समय निर्धारित नहीं है।

    अलग-अलग शहरों में रामलीला समितियां और स्थानीय आयोजक अपने कार्यक्रम के अनुसार रावण दहन का समय तय करते हैं। ऐसे में आयोजन में शामिल होने वाले लोगों को अपने शहर की रामलीला या संबंधित समिति से समय की जानकारी लेनी चाहिए।

    क्यों मनाया जाता है दशहरा?

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विजयादशमी के दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था और माता सीता को उसकी कैद से मुक्त कराया था। इसी विजय की स्मृति में दशहरे पर रावण दहन की परंपरा निभाई जाती है। यह पर्व लोगों को सत्य, धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

    दशहरे का संबंध मां दुर्गा और महिषासुर के युद्ध से भी है। मान्यता है कि मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर उसके अत्याचारों से संसार को मुक्ति दिलाई थी। इसी कारण विजयादशमी को शक्ति, साहस और अन्याय पर विजय का प्रतीक भी माना जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इस पर्व को स्थानीय रीति-रिवाजों और धार्मिक परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है।

    शस्त्र पूजन और शमी पूजा का महत्व

    दशहरे पर शस्त्र पूजन और शमी वृक्ष की पूजा करने की परंपरा भी प्रचलित है। कई जगहों पर लोग अपने वाहनों, औजारों, मशीनों और कामकाज में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की पूजा करते हैं। व्यापारी वर्ग इस दिन बही-खातों और कारोबार से जुड़ी वस्तुओं का पूजन करता है।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, विजयादशमी पर शुभ कार्यों की शुरुआत करना सफलता और समृद्धि की कामना से जुड़ा है। हालांकि, पूजा की विधि, मुहूर्त और त्योहार मनाने के तरीके अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित परंपराओं के अनुसार बदल सकते हैं। इसलिए दशहरे की तैयारी करते समय स्थानीय पंचांग और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों का ध्यान रखना चाहिए।

  • विजयादशमी पर मध्यप्रदेश में होगा शस्त्र-पूजन, इंदौर में मुख्यमंत्री मोहन यादव करेंगे पूजा, 31 जिलों में मंत्री संभालेंगे जिम्मेदारी

    विजयादशमी पर मध्यप्रदेश में होगा शस्त्र-पूजन, इंदौर में मुख्यमंत्री मोहन यादव करेंगे पूजा, 31 जिलों में मंत्री संभालेंगे जिम्मेदारी

    मध्यप्रदेश: में विजयादशमी के अवसर पर 20 अक्टूबर 2026 को प्रदेशव्यापी शस्त्र-पूजन कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। राज्य सरकार ने इस आयोजन के लिए जिलों के अनुसार जिम्मेदारियां तय की हैं। मुख्यमंत्री मोहन यादव इंदौर में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होकर शस्त्र-पूजन करेंगे। वहीं, प्रदेश के 31 जिलों में मंत्री और अन्य प्रमुख जनप्रतिनिधि मौजूद रहेंगे। शेष 24 जिलों में कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक कार्यक्रम की जिम्मेदारी संभालेंगे।

    सरकार की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य विजयादशमी पर शस्त्र-पूजन की परंपरा को आगे बढ़ाना और सुरक्षा, साहस तथा राष्ट्र के प्रति सम्मान के भाव को रेखांकित करना है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस परंपरा को देश की सैन्य शक्ति, सुरक्षा और स्वतंत्रता के प्रति सम्मान का प्रतीक बताया है। उनका कहना है कि शस्त्र-पूजन को साहस, आत्मरक्षा और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की भावना से जोड़कर देखा जाना चाहिए।

    इन जिलों में प्रमुख नेता करेंगे शस्त्र-पूजन
    राज्य सरकार ने कई जिलों में मंत्रियों और प्रमुख जनप्रतिनिधियों को कार्यक्रम की जिम्मेदारी सौंपी है। इंदौर में मुख्यमंत्री मोहन यादव शस्त्र-पूजन करेंगे। ग्वालियर में विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर कार्यक्रम की अगुवाई करेंगे। मंदसौर में उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा और रीवा में उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल शस्त्र-पूजन में शामिल होंगे।

    राजधानी भोपाल में मंत्री विश्वास सारंग पूजा-अर्चना करेंगे। धार में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय कार्यक्रम में मौजूद रहेंगे। नरसिंहपुर में मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल और जबलपुर में मंत्री राकेश सिंह शस्त्र-पूजन करेंगे। सीहोर में मंत्री करण सिंह वर्मा तथा नर्मदापुरम में मंत्री उदय प्रताप सिंह कार्यक्रम की जिम्मेदारी संभालेंगे।इनके अलावा प्रदेश के अन्य जिलों में भी मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों को जिम्मेदारियां दी गई हैं। सरकार की योजना के अनुसार, कुल 31 जिलों में मंत्री स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

    24 जिलों में प्रशासन संभालेगा जिम्मेदारी
    प्रदेश के बाकी 24 जिलों में शस्त्र-पूजन कार्यक्रम के संचालन की जिम्मेदारी जिला प्रशासन को दी गई है। इन स्थानों पर कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक मिलकर आयोजन की व्यवस्था सुनिश्चित करेंगे। इस तरह सरकार ने प्रदेश के सभी जिलों में कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई है।प्रशासनिक अधिकारियों की भागीदारी के जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि निर्धारित कार्यक्रम संबंधित जिलों में आयोजित हो सके। शस्त्र-पूजन में सुरक्षा से जुड़े विभागों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी।

    विजयादशमी पर शस्त्र-पूजन का धार्मिक महत्व
    सनातन परंपरा में शस्त्रों को शक्ति, साहस और आत्मरक्षा का प्रतीक माना जाता है। विजयादशमी पर शस्त्र-पूजन की परंपरा का उद्देश्य शक्ति के सदुपयोग और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की भावना को मजबूत करना है। इस अवसर पर सैनिक और पुलिसकर्मी अपने हथियारों की पूजा करते हैं, जबकि कई अन्य क्षेत्रों में लोग अपने कामकाज से जुड़े औजारों का पूजन करते हैं।


    शस्त्र-पूजन की एक मान्यता महाभारत काल से जुड़ी है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान अपने हथियार शमी के पेड़ के नीचे छिपाए थे। अज्ञातवास पूरा होने के बाद अर्जुन ने शमी के पेड़ से अपने शस्त्र निकाले और राजा विराट के राज्य की रक्षा के लिए कौरवों की सेना का सामना किया। इसी मान्यता के कारण कई स्थानों पर विजयादशमी के दिन शमी के पेड़ और शस्त्रों की पूजा की जाती है।

    राम और दुर्गा की विजय से जुड़ा पर्व
    विजयादशमी को भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और मां दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध की मान्यताओं से भी जोड़ा जाता है। दोनों प्रसंग बुराई, अन्याय और अधर्म पर अच्छाई की जीत का संदेश देते हैं। इसी भावना के साथ शस्त्र-पूजन में शक्ति का इस्तेमाल सही उद्देश्यों, सुरक्षा और धर्म की रक्षा के लिए करने का संकल्प लिया जाता है।

    मध्यप्रदेश में होने वाला यह आयोजन धार्मिक परंपरा के साथ-साथ सुरक्षा और जिम्मेदारी के महत्व को भी सामने रखेगा। प्रदेश के सभी 55 जिलों में तय व्यवस्था के अनुसार कार्यक्रम संपन्न कराने की जिम्मेदारी मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपी गई है।

  • शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर से शुरू, जानें घटस्थापना का शुभ मुहूर्त और विजयादशमी की तारीख

    शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर से शुरू, जानें घटस्थापना का शुभ मुहूर्त और विजयादशमी की तारीख

    नई दिल्ली: मां दुर्गा की आराधना का प्रमुख पर्व शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर 2026 से शुरू होने जा रहा है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। नौ दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और सुख, शांति तथा समृद्धि की कामना करते हैं। नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना के साथ धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत होती है। इसके बाद नौ दिनों तक देवी के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना की जाती है। पर्व के अंतिम चरण में अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन की परंपरा निभाई जाती है। इसके अगले दिन विजयादशमी मनाई जाती है। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर से शुरू होकर 20 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ संपन्न होंगे।

    हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर 2026 को रात 9 बजकर 18 मिनट पर शुरू होगी। यह तिथि 11 अक्टूबर को रात 9 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर शारदीय नवरात्र का पहला दिन 11 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इसी दिन घरों और मंदिरों में कलश स्थापना की जाएगी और मां दुर्गा की पूजा शुरू होगी। नवरात्र के दौरान श्रद्धालु अपनी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार व्रत रखते हैं। कई भक्त पूरे नौ दिन उपवास करते हैं, जबकि कुछ लोग पहले और अंतिम दिन व्रत रखकर पूजा-अर्चना करते हैं। इन दिनों देवी के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

    शारदीय नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना के लिए सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। श्रद्धालु इन समयावधियों में अपनी परंपरा के अनुसार कलश स्थापना कर सकते हैं। घटस्थापना को नवरात्र पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, क्योंकि इसी के साथ देवी आराधना और नौ दिनों के धार्मिक अनुष्ठानों का आरंभ होता है। पूजा की तैयारी करते समय श्रद्धालु पूजा स्थल की सफाई करते हैं और आवश्यक सामग्री एकत्र करते हैं। मुहूर्त में कलश स्थापित करने के बाद मां दुर्गा का ध्यान करके परिवार के लिए सुख-शांति और मंगल की प्रार्थना की जाती है।

    नवरात्र के पहले दिन पूजा करने के लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद घर के पूजा स्थल की सफाई करके वहां चौकी स्थापित करें। चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर रखें। पूजा आरंभ करने से पहले भगवान गणेश का स्मरण करें और फिर विधि-विधान से घटस्थापना करें। कलश स्थापित करने के लिए उसमें साफ जल भरें। परंपरा के अनुसार, कलश में अक्षत, सुपारी और सिक्का भी रखा जा सकता है। इसके बाद कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते रखें और लाल कपड़े में लपेटा हुआ नारियल उसके ऊपर स्थापित करें। कलश स्थापना करते समय मां दुर्गा का ध्यान करें और घर-परिवार की सुख-शांति तथा मंगल की कामना करें।

    घटस्थापना के बाद मां दुर्गा को रोली, अक्षत, सिंदूर, फूल, माला, फल और मिठाई अर्पित करें। पूजा स्थल पर दीपक और धूप जलाएं। श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार दुर्गा सप्तशती, देवी मंत्र या दुर्गा चालीसा का पाठ कर सकते हैं। पूजा के अंत में मां दुर्गा की आरती करें और प्रसाद वितरित करें। इसके बाद नौ दिनों तक देवी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्र के अंतिम दिनों में अष्टमी या नवमी के अवसर पर कन्या पूजन करने की परंपरा भी प्रचलित है। इस दौरान कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है। नौ दिनों की आराधना के बाद 20 अक्टूबर को विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा, जिसके साथ शारदीय नवरात्र का समापन होगा।

  • शारदीय नवरात्रि 2026 की शुरुआत 11 अक्टूबर से, जानें घटस्थापना, अष्टमी-नवमी और दशहरा की पूरी तारीख

    शारदीय नवरात्रि 2026 की शुरुआत 11 अक्टूबर से, जानें घटस्थापना, अष्टमी-नवमी और दशहरा की पूरी तारीख

    नई दिल्ली: शारदीय नवरात्रि 2026 की शुरुआत 11 अक्टूबर, रविवार से होगी। इसी दिन घटस्थापना के साथ मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा का सिलसिला शुरू होगा। नवरात्रि का समापन 20 अक्टूबर को विजयादशमी यानी दशहरा के साथ होगा। इस बार अष्टमी और नवमी की तिथियों के संयोग के कारण दोनों से जुड़े पूजा-अनुष्ठान 19 अक्टूबर को किए जाएंगे। नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार उपवास भी रखते हैं।

    11 अक्टूबर को नवरात्रि के पहले दिन प्रतिपदा तिथि पर घटस्थापना और मां शैलपुत्री की पूजा होगी। घटस्थापना को कलश स्थापना भी कहा जाता है। इस दौरान कलश स्थापित करने के साथ जौ बोने की परंपरा भी है। दिए गए पंचांग के अनुसार, 11 अक्टूबर को घटस्थापना का शुभ समय सुबह 6:19 बजे से 10:12 बजे तक बताया गया है। अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक रहेगा। घटस्थापना का समय अलग-अलग शहरों में स्थानीय सूर्योदय और पंचांग की गणना के कारण कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त देखना उचित माना गया है।

    नवरात्रि की प्रमुख तिथियों के अनुसार 12 अक्टूबर को द्वितीया पर मां ब्रह्मचारिणी, 13 अक्टूबर को तृतीया पर मां चंद्रघंटा, 14 अक्टूबर को चतुर्थी पर मां कूष्मांडा और 15 अक्टूबर को पंचमी पर मां स्कंदमाता की पूजा होगी। 16 अक्टूबर को षष्ठी पर मां कात्यायनी और 17 अक्टूबर को सप्तमी पर मां कालरात्रि की आराधना की जाएगी। 19 अक्टूबर को दुर्गा अष्टमी और महानवमी से जुड़े अनुष्ठान होंगे, जबकि 20 अक्टूबर को विजयादशमी और दशहरा मनाया जाएगा। नवरात्रि में मां के नौ स्वरूपों में पहले दिन शैलपुत्री, दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन चंद्रघंटा, चौथे दिन कूष्मांडा, पांचवें दिन स्कंदमाता, छठे दिन कात्यायनी, सातवें दिन कालरात्रि, आठवें दिन महागौरी और नौवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार नवरात्रि के दौरान शक्ति की आराधना करने से साहस, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार उपवास रखते हैं और मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं। नवरात्रि के बाद दसवें दिन विजयादशमी मनाई जाती है, जिसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। रामायण की मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था। इसी वजह से देश के अलग-अलग हिस्सों में दशहरे के दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाने की परंपरा है।

    घटस्थापना को नवरात्रि का महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसे शुभ मुहूर्त में किया जाना चाहिए। कलश स्थापना के लिए साफ स्थान का चयन किया जाता है और पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ किया जाता है। इसके बाद कलश में जल भरकर उसके ऊपर आम या अशोक के पत्ते और नारियल रखने की परंपरा है। घटस्थापना के मुहूर्त पर स्थानीय सूर्योदय और पंचांग की गणना का प्रभाव पड़ता है, इसलिए अलग-अलग शहरों में समय में अंतर हो सकता है। उदाहरण के तौर पर मुंबई और दिल्ली के लिए बताए गए घटस्थापना मुहूर्त अलग हो सकते हैं।