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  • MP के बालाघाट में 100 गांवों के विकास का अभियान शुरू, सड़क, पानी, शिक्षा और रोजगार पर रहेगा खास जोर..

    MP के बालाघाट में 100 गांवों के विकास का अभियान शुरू, सड़क, पानी, शिक्षा और रोजगार पर रहेगा खास जोर..

    मध्य प्रदेश: के बालाघाट जिले में लंबे समय तक नक्सल गतिविधियों से प्रभावित रहे 100 गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए विशेष अभियान शुरू किया गया है। राज्य सरकार की इस पहल के तहत गांवों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति का आकलन किया जा रहा है। प्रशासन का उद्देश्य ग्रामीणों की जरूरतों को समझकर ऐसे विकास कार्यों की योजना बनाना है, जिनसे स्थानीय लोगों को बेहतर सुविधाएं और रोजगार के अवसर मिल सकें।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर शुरू किए गए इस अभियान में विभिन्न सरकारी विभागों के अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन अधिकारियों को अपने निर्धारित गांवों का दौरा कर ग्रामीणों से सीधे बातचीत करने, समस्याओं की जानकारी जुटाने और उपलब्ध सुविधाओं की समीक्षा करने के निर्देश दिए गए हैं। यह पूरी प्रक्रिया 14 दिनों के भीतर पूरी की जानी है। इसके बाद गांवों की जरूरतों के अनुसार विकास कार्यों के प्रस्ताव तैयार किए जाएंगे।

    अभियान के लिए बालाघाट जिले के 100 गांवों को चार क्लस्टर में विभाजित किया गया है। इनमें बैहर, बिरसा, लांजी और किरनापुर विकासखंड के गांव शामिल हैं। अलग-अलग विभागों की टीमें अपने निर्धारित क्षेत्रों में पहुंचकर स्थानीय परिस्थितियों और विकास की संभावनाओं का आकलन कर रही हैं। ग्रामीणों से मिली जानकारी के आधार पर यह तय करने की कोशिश की जा रही है कि किन सुविधाओं की सबसे अधिक जरूरत है और किन कार्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

    26 अक्टूबर को अधिकारियों की टीमों ने विभिन्न गांवों का दौरा कर लोगों से चर्चा की। लांजी क्षेत्र में कट्टीपार, सतोना, बरगुड़ और देवरबेली गांवों में ग्रामीणों की समस्याओं और आवश्यकताओं की जानकारी ली गई। बैहर क्षेत्र की टीम दड़ेकसा, बिलालकसा, सोनगुड्डा, लूद, हिर्री, भर्री, सोनपुरी और बिठरी सहित कई गांवों में पहुंची। वहीं, किरनापुर क्षेत्र के सीतापार और बोरवन गांवों में भी स्थानीय लोगों से बातचीत कर विकास की जरूरतों का पता लगाया गया।

    28 अक्टूबर को कलेक्टर आदित्य सिंह ने लांजी विकासखंड की देवरबेली ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले बरगुड़-सतोना, केराडीह, सायर और संदूका गांवों का भ्रमण किया। जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी और अन्य विभागों की टीमों ने भी अलग-अलग क्षेत्रों में पहुंचकर ग्रामीणों से संवाद किया। इसके अतिरिक्त जनजातीय कार्य, पशु चिकित्सा, मत्स्यपालन और शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने भी अपने क्षेत्रों में सुविधाओं की स्थिति की जानकारी जुटाई।

    अभियान में सड़क, पुल-पुलिया, पेयजल, सिंचाई और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसके साथ ही सरकारी स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों, छात्रावासों और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता का भी आकलन किया जा रहा है। जहां सुविधाओं की कमी सामने आएगी, वहां जरूरत के अनुसार विकास कार्यों के प्रस्ताव तैयार किए जाएंगे। पात्र ग्रामीणों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

    ग्रामीणों की आजीविका मजबूत करना भी इस पहल का अहम हिस्सा है। इसके लिए कृषि, उद्यानिकी, डेयरी, पशुपालन और मत्स्यपालन जैसी गतिविधियों में रोजगार और स्वरोजगार की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। प्रशासन स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ऐसे अवसरों की पहचान करना चाहता है, जिनसे ग्रामीण अपने क्षेत्र में ही आर्थिक गतिविधियों से जुड़ सकें।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इससे पहले बालाघाट जिले के 100 पिछड़े गांवों में विकास कार्यों के लिए लगभग 225 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की थी। अब जारी सर्वेक्षण और ग्रामीणों से प्राप्त सुझावों के आधार पर योजनाओं की प्राथमिकताएं तय की जाएंगी। अधिकारियों को 14 दिनों के भीतर भ्रमण और रिपोर्ट तैयार करने का काम पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। इस अभियान का लक्ष्य गांवों में जरूरी सुविधाओं का विस्तार करना और स्थानीय लोगों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य तथा आजीविका के बेहतर अवसर विकसित करना है।

  • Ethiopia: ओरोमिया में ईसाई चर्चों और आसपास के गांवों में खूनी हमला… 40 से ज्यादा लोगों की मौत

    Ethiopia: ओरोमिया में ईसाई चर्चों और आसपास के गांवों में खूनी हमला… 40 से ज्यादा लोगों की मौत


    अदीस अबाबा।
    इथियोपिया (Ethiopia) के ओरोमिया राज्य (Oromia State) में ऑर्थोडॉक्स ईसाई चर्चों (Orthodox Christian churches) और आसपास के गांवों पर हमले होने की खबर है। इन हमलों में 40 से ज्यादा लोगों की जान चली गई। दो स्थानीय निवासियों और एक पादरी के हवाले से एक न्यूज में यह जानकारी दी गई है। बता दें कि ओरोमिया इथियोपिया का सबसे बड़ा राज्य है। यहां लंबे समय से विद्रोह, सशस्त्र संघर्ष और जातीय तनाव की स्थिति बनी हुई है। हथियारबंद समूह अक्सर धर्म का इस्तेमाल कर समुदायों के बीच फूट डालने और लोगों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं।

    एक न्यूज में स्थानीय लोगों के हवाले से बताया गया कि इस घटना में कुल 44 लोगों की मौत हुई है। एक अन्य निवासी ने मरने वालों की संख्या 51 बताई। दोनों ने हमले की पुष्टि की, लेकिन आंकड़ों में थोड़ा अंतर रहा। मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों पर इथियोपिया में भारी पाबंदियां होने के कारण इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। सरकारी इथियोपिया ह्यूमन राइट्स कमीशन ने इस मामले पर ज्यादा कुछ नहीं कहा। उसने केवल इतना कहा कि वह हालात पर नजर रख रहा है।

    रिपोर्ट के अनुसार, इलाके में धार्मिक तनाव बहुत ज्यादा है। अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह बड़ा संकट बन सकता है। स्थानीय लोगों के अनुसार इलाके के दो चर्चों पर हमला हुआ। लोगों के कई घर भी तबाह कर दिए गए।

    बता दें कि इथियोपिया हॉर्न ऑफ अफ्रीका का देश है, जो कई आंतरिक संघर्षों से जूझ रहा है। पिछले महीने उत्तरी टिग्रे राज्य में भी भारी लड़ाई हुई थी। देश के बीचों-बीच स्थित ओरोमिया राज्य में करीब 4 करोड़ लोग रहते हैं। यहां मुस्लिम, प्रोटेस्टेंट और ऑर्थोडॉक्स समुदाय साथ रहते हैं। झगड़े की मुख्य वजह राजनीतिक और जातीय प्रतिनिधित्व की शिकायतें रही हैं, लेकिन लड़ाकों को इकट्ठा करने के लिए धर्म का भी इस्तेमाल किया जाता रहा है।

    हमला किए गए चर्चों में से एक के डीकन ने कहा कि वे इन दुखद हत्याओं से बहुत सदमे में हैं। उन्होंने सरकार से अपील की कि वह तुरंत दखल दे और इलाके में सुरक्षा बहाल करे। डीकन के अनुसार मरने वालों की संख्या 46 है।

    हालांकि अभी तक सरकार की तरफ से हमले की विस्तृत पुष्टि या कार्रवाई की कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। स्थानीय लोग सुरक्षा की मांग कर रहे हैं और चर्चों की सुरक्षा बढ़ाने की अपील कर रहे हैं।

  • क्या होते हैं ‘श्याओकांग’ गांव? LAC के पास चीन ने बसाए सैकड़ों गांव, भारत ने भी बढ़ाई सीमा पर तैयारी

    क्या होते हैं ‘श्याओकांग’ गांव? LAC के पास चीन ने बसाए सैकड़ों गांव, भारत ने भी बढ़ाई सीमा पर तैयारी

    बीजिंग। भारत-चीन सीमा पर बुनियादी ढांचे की होड़ तेज होती जा रही है। चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास सैकड़ों नए गांव बसाए हैं, जिनमें बड़ी संख्या Arunachal Pradesh की सीमा के सामने स्थित है। भारतीय सेना के उपप्रमुख (रणनीति) Rajiv Ghai ने जानकारी दी कि चीन ने LAC के आसपास 600 से अधिक गांव बसाए हैं, जिनमें से करीब 72% उत्तर-पूर्वी सीमा के पास हैं। इनमें लगभग 450 गांव सीधे अरुणाचल प्रदेश की सीमा के सामने बनाए गए हैं।

    क्या हैं ‘श्याओकांग’ गांव?

    चीन इन सीमावर्ती बस्तियों को ‘श्याओकांग’ गांव कहता है। चीनी भाषा में ‘श्याओकांग’ का अर्थ समृद्ध या खुशहाल गांव होता है। इन गांवों का निर्माण मुख्य रूप से Tibet Autonomous Region से लगने वाली भारतीय सीमा के पास पिछले करीब पांच वर्षों से किया जा रहा है।

    इन बस्तियों में आम तौर पर दो मंजिला आधुनिक मकान, चौड़ी सड़कें और अन्य बुनियादी सुविधाएं विकसित की गई हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इन गांवों का इस्तेमाल दोहरे उद्देश्य से किया जा सकता है—एक ओर नागरिक आबादी को बसाने के लिए और दूसरी ओर किसी सैन्य तनाव की स्थिति में सैनिकों की तैनाती, रसद और निगरानी के लिए। इसे चीन द्वारा विवादित क्षेत्रों पर अपना दावा मजबूत करने की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।

    पहले खाली रहे, अब बसने लगी आबादी

    चीन ने 2019 के बाद इन गांवों का निर्माण तेज कर दिया था, लेकिन शुरुआत में कई गांव खाली पड़े रहे। रिपोर्टों के मुताबिक 2023 से चीनी नागरिकों ने इन बस्तियों में बसना शुरू किया है।

    खास तौर पर अरुणाचल प्रदेश के लोहित घाटी और Tawang सेक्टर के सामने वाले इलाकों में आबादी बढ़ने लगी है।

    बताया जाता है कि चीन ने इसी तरह के कुछ गांव Bhutan के क्षेत्रों के पास भी बनाए हैं।

    सीमा कानून से बढ़ी रणनीति

    चीन ने 1 जनवरी 2022 से नया थल सीमा कानून लागू किया, जिसका उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देना बताया गया। इस कानून के तहत सरकार लोगों को सीमा क्षेत्रों में बसने और काम करने के लिए प्रोत्साहित करती है, जिससे वहां नागरिक मौजूदगी बढ़े और निगरानी तंत्र मजबूत हो सके।

    भारत भी दे रहा जवाब

    चीन की इस रणनीति के जवाब में भारत सरकार ने 2022 में ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ शुरू किया। इस योजना के तहत सीमा के पास स्थित 663 गांवों को बुनियादी सुविधाओं, सड़क, संचार और पर्यटन विकास से जोड़ा जा रहा है ताकि वहां से पलायन रोका जा सके।

    इस कार्यक्रम के लिए कई गांवों को प्राथमिकता दी गई है, जिनमें Kibithu, Tuting, Taksing, Chayang Tajo और Zemithang शामिल हैं।

    सीमा पर तेज हुआ इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण

    चीन तवांग और सियांग घाटी के आसपास नई सड़कें, पुल और हवाई पट्टियां भी विकसित कर रहा है। इसके जवाब में भारत ने भी LAC के पास फॉरवर्ड कनेक्टिविटी मजबूत की है। नए हेलीपैड, अंतर-घाटी सड़कें और वैकल्पिक मार्ग बनाए जा रहे हैं, जिससे भारतीय सेना की तैनाती और मूवमेंट पहले से कहीं अधिक तेज हो सके।

    लेफ्टिनेंट जनरल घई के अनुसार सीमावर्ती क्षेत्रों में तेजी से उभरती ये बस्तियां भारत के लिए रणनीतिक चुनौती जरूर हैं, लेकिन साथ ही सीमा पर मजबूत बुनियादी ढांचा और स्थानीय आबादी को वहां बनाए रखना अब भारत की सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है।

  • छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में आजादी के बाद 41 गांवों में पहली बार मनाया जा रहा गणतंत्र दिवस

    छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में आजादी के बाद 41 गांवों में पहली बार मनाया जा रहा गणतंत्र दिवस

    रायपुर। यह खबर वाकई चौंकाने वाली है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में माओवादी प्रभाव से मुक्त हुए 41 गांवों में गणतंत्र दिवस के अवसर पर पहली बार तिरंगा फहराया जाएगा। यह कदम ‘लाल आतंक’ के अंत की लड़ाई में मिली सफलता को साफ तौर पर दर्शाती है। साथ ही यह खबर शांति एवं विकास का संकेत भी देती है।
    पुलिस महानिरीक्षक (आईजी), बस्तर रेंज, सुंदरराज पी ने बताया कि इन 41 गांवों में से 13 गांव बीजापुर जिले में, 18 नारायणपुर में और 10 सुकमा में हैं।
    गणतंत्र दिवस पूरे जोश से मनाने की तैयारी

    उन्होंने कहा, ‘‘बस्तर मंडल के 41 गांवों में पहली बार 77वां गणतंत्र दिवस पूरे जोश और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। ये गांव दशकों से इस तरह के राष्ट्रीय समारोहों से दूर रहे थे, लेकिन अब देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक भावना में वे एक्टिव होकर भाग ले रहे हैं।’’ उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों में इन जगहों पर सुरक्षा शिविरों की स्थापना ने स्थानीय आबादी के बीच विश्वास, सुशासन और अपनेपन की भावना जगाने में अहम भूमिका निभाई है।

    धीरे-धीरे स्थापित हो रही है शांति

    आईडी सुंदरराज पी ने कहा, ‘‘सुरक्षा बलों के निरंतर प्रयासों और स्थानीय समुदायों के सहयोग से यह सकारात्मक परिवर्तन संभव हो पाया है। पिछले वर्ष 13 गांवों में 15 अगस्त को पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया था। अब, इन 13 गांवों सहित कुल 54 गांव पहली बार गणतंत्र दिवस मनाएंगे।” सुंदरराज ने कहा कि अबूझमाड़, राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र आदि में बसवराजु, के रामचंद्र रेड्डी, सुधाकर, कट्टा सत्यनारायण रेड्डी और अन्य माओवादी कैडर को निष्क्रिय करने से क्षेत्र में चरमपंथी प्रभाव काफी कमजोर हो गया है। नक्सलियों की ताकत और उनके प्रभाव कमजोर होने से भय और धमकी की जगह धीरे-धीरे शांति, विकास और प्रशासनिक संपर्क स्थापित हो रहे हैं।
    रायपुर में राज्यपाल फहराएंगे तिरंगा

    इस बीच, एक सरकारी अधिकारी ने बताया कि राज्य भर में गणतंत्र दिवस समारोह की सभी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। उन्होंने बताया कि राज्यपाल रमन डेका सोमवार सुबह रायपुर के पुलिस परेड ग्राउंड में राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगे और विभिन्न सुरक्षा इकाइयों से ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ (सलामी गारद) लेंगे, जबकि मुख्यमंत्री विष्णु देव साई बिलासपुर जिले में तिरंगा फहराएंगे।

  • बड़ा खुलासा… मप्र के गांवों में मिल रहा पानी लोगों के इस्तेमाल के लायक नहीं

    बड़ा खुलासा… मप्र के गांवों में मिल रहा पानी लोगों के इस्तेमाल के लायक नहीं


    भोपाल।
    इंदौर के भागीरथपुरा (Bhagirathpura, Indore) में काल बने पीने के पानी ने अब तक 20 लोगों की जिंदगियां लील ली हैं और जो इससे बच गए, उनका अस्पताल में इलाज जारी है। सरकार कटघरे में है तो विपक्ष भी इस मुद्दे पर हावी है। इस बीच मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के गांवों (Villages) में पीने के पानी (Drinking water) पर आई एक रिपोर्ट आपको भी हैरान कर देगी। केंद्र सरकार के ‘जल जीवन मिशन’ (‘Jal Jeevan Mission’) की एक नई रिपोर्ट से पता चला है कि राज्य के ग्रामीण इलाकों में एक-तिहाई से अधिक पीने का पानी इंसानों के इस्तेमाल के लायक नहीं है, जिससे लाखों लोग अनदेखे लेकिन जानलेवा खतरों की चपेट में हैं।


    रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े

    4 जनवरी 2026 को जारी ‘फंक्शनैलिटी असेसमेंट रिपोर्ट’ (कार्यक्षमता मूल्यांकन रिपोर्ट) के अनुसार मध्य प्रदेश में पानी के केवल 63.3% नमूने ही गुणवत्ता मानकों पर खरे उतरे, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 76% है। इसका मतलब है कि राज्य के ग्रामीण इलाकों में 36.7% पानी के नमूने असुरक्षित पाए गए हैं। इनमें हानिकारक बैक्टीरिया (कीटाणु) या रासायनिक मिलावट पाई गई है। ये नमूने सितंबर-अक्टूबर 2024 के दौरान मध्य प्रदेश के 15,000 से अधिक ग्रामीण घरों से इकट्ठा किए गए थे।

    यह स्थिति उन जगहों पर और भी अधिक चिंताजनक है जो सुरक्षा और इलाज के लिए बनी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी अस्पतालों में पानी के केवल 12% नमूने ही सूक्ष्मजीवविज्ञानी (microbiological) सुरक्षा जांच में पास हो पाए, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 83.1% है। इसका मतलब है कि मध्य प्रदेश के लगभग 88% अस्पतालों में मरीजों को असुरक्षित पानी दिया जा रहा है। स्कूलों में 26.7% नमूने माइक्रोबायोलॉजिकल टेस्ट में फेल हो गए, जिससे बच्चे हर दिन दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।


    इन जिलों की हालत सबसे खराब

    अनूपपुर और डिंडोरी जैसे आदिवासी बहुल जिलों में स्थिति सबसे खराब है, जहां एक भी पानी का नमूना सुरक्षित नहीं पाया गया। बालाघाट, बैतुल और छिंदवाड़ा में 50% से अधिक पानी के नमूने दूषित मिले हैं। मध्य प्रदेश में केवल 31.5% घरों में नल के कनेक्शन हैं, जो कि 70.9% के राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है। जहां पाइपलाइन बिछी भी है, वहां व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है; राज्य के 99.1% गांवों में पाइप से जलापूर्ति की व्यवस्था तो है, लेकिन केवल 76.6% घरों में ही चालू हालत में नल लगे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि हर चौथे घर में या तो नल खराब है या पानी ही नहीं आता।


    नल से पानी आने का मतलब सुरक्षित पानी होना नहीं….

    इससे भी बदतर बात यह है कि नल से पानी आने का मतलब सुरक्षित पानी होना नहीं है। इंदौर जिला, जिसे आधिकारिक तौर पर 100% नल कनेक्शन वाला घोषित किया गया है, वहां भी केवल 33% घरों को ही सुरक्षित पीने का पानी मिल रहा है। पूरे राज्य में 33% पानी के नमूने गुणवत्ता जांच में फेल हो गए, जो इस बात की पुष्टि करता है कि संकट केवल पानी की पहुंच का नहीं, बल्कि ‘जहरीली सप्लाई’ का है। केंद्र सरकार ने इस स्थिति को “सिस्टम की ओर से पैदा की गई आपदा” करार दिया है और चेतावनी दी है कि यदि पानी की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ, तो इस साल फंड (बजट) में कटौती की जा सकती है।

    यह चेतावनी एक बड़ी त्रासदी के बाद आई है। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 20 लोगों की मौत हो गई। 429 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जिनमें से 16 आईसीयू (ICU) में हैं और तीन वेंटिलेटर पर हैं। अब मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने औपचारिक रूप से इस संकट को ‘पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी’ (सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल) घोषित कर दिया है। अपने आदेश में अदालत ने कहा कि “अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में साफ पीने का पानी पाने का अधिकार भी शामिल है” और वर्तमान स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के दायरे में आती है।