Tag: Voting

  • RS चुनावः झारखंड से 2 सीट और 3 उम्मीदवार… आज मतदान के बाद शाम तक साफ हो जाएगी तस्वीर

    RS चुनावः झारखंड से 2 सीट और 3 उम्मीदवार… आज मतदान के बाद शाम तक साफ हो जाएगी तस्वीर


    रांची।
    झारखंड में राज्यसभा की 2 सीटों के लिए आज वोटिंग होनी है. मतदान सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक विधानसभा परिसर में बने मतदान केंद्र पर होगा. शाम तक रिजल्ट भी आ जाएगा. झारखंड की दो सीटों पर तीन उम्मीदवार होने की वजह से चुनाव दिलचस्प हो गया है।

    तीसरे निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में परिमल नाथवानी है, जिनका समर्थन एनडीए कर रहा है. एनडीए के पास 24 विधायक हैं. इनमें बीजेपी के 21, AJSU, जेडीयू और LJP(R) का 1-1 विधायक है. वहीं, झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के पास 34 विधायक हैं।

    राज्यसभा की सीट जीतने के लिए 28 विधायकों का समर्थन चाहिए. पहली सीट पर JMM उम्मीदवार बैद्यनाथ राम की जीत तय है. लेकिन असली लड़ाई दूसरी सीट के लिए है. दूसरी सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा और एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी हैं. एनडीए को जीत के लिए सिर्फ 4 वोट और चाहिए, जबकि कांग्रेस के पास 14 वोट कम पड़ रहे हैं।

    राज्यसभा चुनाव के लिए इंडिया और एनडीए के बीच अपना कुनबा बचाना सबसे बड़ी चुनौती है. सोमवार को सीएम आवास पर कांग्रेस प्रभारी के राजू ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात के बाद साफ कर दिया था कि गठबंधन की सरकार को समर्थन दे रहे सभी 56 विधायकों को 16 और 17 जून को सीएम हाउस में हाजिरी लगानी होगी. के राजू ने बताया था कि वहां डिनर के दौरान मॉक पोल भी होगा. विधायकों को भी शहर में ही रहने का निर्देश दिया गया है.

    इधर NDA ने भी अपने विधायकों को एकजुट रखने के लिए सभी 24 विधायकों को एक साथ रांची के रेडिसन ब्लू में रहने के निर्देश दिए है. दो दिन से विधायक यहीं हैं और यहीं से वोटिंग के लिए जाएंगे. यानी पॉलिटिक्स होटल में शिफ्ट हो गई है.

    जाहिर है ऐसा इसलिए किया गया है कि पोचिंग की संभावना न हो. एनडीए के नेता भी बीजेपी प्रदेश कार्यालय में सोमवार को आयोजित गठबंधन के बैठक के बाद चौंकन्ना हो गए हैं. बैठक से 7विधायक नदारद थे. चंपई सोरेन समेत सरयू राय सरीखे नेता बैठक में नहीं थे।

    कांग्रेस के नेता भी आग में घी का काम ये कहकर डालते रहे कि NDA के तीन विधायक संपर्क में है. हालांकि बाद में चंपई सोरेन के साथ नाथवानी की तस्वीर सामने सोशल मीडिया पर आई और सरयू राय की भी तस्वीर देखने को मिली।


    इंडिया ब्लॉक के 56 विधायक, फिर क्यों चिंता?

    वहीं, कांग्रेस और JMM के दावे हैं कि जब हेमंत सरकार को 56 विधायकों का समर्थन है तो कहां चिंता का विषय है? 2सीट के लिए जीत के लिए 56 विधायकों की ही जरूरत है. लिहाजा दोनों सीट पर उनके ही उम्मीदवार जीतेंगे।

    दोनों गठबंधन ने बैठके की है. दोनों ने मॉक पोल भी किया है. संसदीय कार्य मंत्री राधा कृष्णा किशोर ने मंगलवार रात सीएम हाउस में बैठक के बाद बताया था कि दोनों सीट पर उनकी जीत होगी. मॉक पोल में कांग्रेस को 27 और JMM को 27 मत मिले थे.


    एनडीए को क्रॉस वोटिंग से उम्मीद

    इस बीच NDA की उम्मीदें कोर्स वोटिंग पर टिकी है और इंडिया ब्लॉक क्रॉस वोटिंग रोकने के लिए हर कोशिश कर रहा है. इसी कोशिश पर उसकी जीत का दारोमदार है. एनडीए समर्थित परिमल नाथवानी का कहना है कि भले ही 4 वोट कम है लेकिन झारखंड से वो 2008 और 2014 में भी राज्यसभा जा चुके हैं और सभी ने उनका काम देखा है. उनका कहना है कि अंतरात्मा की आवाज पर उन्हें जीत के लिए 28 वोट मिल जाएंगे।


    दो सीटों पर क्यों हो रहे हैं चुनाव?

    बीजेपी के सांसद दीपक प्रकाश का कार्यकाल खत्म हो रहा. दूसरी सीट शिबू सोरेन की थी, जिनका निधन हो चुका है. हालांकि, शिबू सोरेन अगर होते तो उनका कार्यकाल भी खत्म हो जाता।

  • 10 राज्यों की 24 राज्यसभा सीटों के लिए 18 जून को मतदान…

    10 राज्यों की 24 राज्यसभा सीटों के लिए 18 जून को मतदान…


    नई दिल्ली।
    भारत (India) के 10 राज्यों की 24 सीटों पर राज्यसभा चुनाव (Rajya Sabha elections) होने जा रहे हैं। 18 जून को मतदान (Voting June 18) होगा और संभावनाएं हैं कि एक ही दिन में नतीजे भी घोषित कर दिए जाएं। खास बात है कि यह चुनाव केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन NDA के लिए बेहद अहम होने जा रहा है। आंकड़े बता रहे हैं कि उच्च सदन में एनडीए दो तिहाई के आंकड़े से महज 15 सांसद दूर है। अब सवाल है कि गठबंधन का सबसा बड़ा सदस्य भारतीय जनता पार्टी कितनी सीटें जीत सकती है।


    समझें राज्यसभा का गणित

    245 सदस्यों वाले राज्यसभा में एनडीए के पास कुल 148 सांसद हैं। इनमें से सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के पास 113 सांसद हैं। अब इस गठबंधन को दो तिहाई का जादुई आंकड़ा छूने के लिए 15 और सांसदों की जरूरत है। खास बात है कि कोई भी संविधान संशोधन बिल पार कराने के लिए सरकार को दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। हालांकि, कहा जा रहा है कि इस चुनाव में एनडीए का इस आंकड़े तक पहुंचना तय नहीं है, लेकिन भाजपा कई राज्यों में बढ़त बना सकती है।


    कहां कितनी सीटें हो रही हैं खाली

    आंध्र प्रदेश और गुजरात में 4-4 सीटों पर चुनाव होने हैं। जबकि, मध्य प्रदेश और राजस्थान में प्रत्येक में 3 सीटों पर चुनाव हैं। इसके अलावा मणिपुर, मेघालाय में 1-1, झारखंड में 2, अरुणाचल प्रदेश में 1, कर्नाटक में 4 और मिजोरम की 1 सीट पर चुनाव होगा। साथ ही 2 राज्यसभा सीट पर उपचुनाव के लिए भी वोट डाले जाएंगे।


    कर्नाटक

    कर्नाटक में एनडीए के खाते में 1 सीट आना तय है। जबकि, कांग्रेस 2 सीटें अपने नाम कर सकती है। कहा जा रहा है कि चौथी सीट इस बात पर निर्भर करेगा कि विधायक किस ओर अपना वोट डाल रहे हैं।


    आंध्र प्रदेश

    175 विधायकों वाले आंध्र प्रदेश में टीडीपी के पास 135 और जन सेना पार्टी के पास 21 विधायक हैं। जबकि, भाजपा के पास 8 और YSRCP के 11 विधायक हैं। इस लिहाज से 164 सीटों वाली एनडीए यहां चारों राज्यसभा सीट जीत सकती है।


    गुजरात

    गुजरात की 182 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा के पास 161 विधायकों का भारी बहुमत है। इस मजबूत आंकड़े के दम पर पार्टी को 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव में सभी चारों सीटों पर अपनी आसान और पक्की जीत का पूरा भरोसा है।


    राजस्थान

    राजस्थान विधानसभा में सदस्यों की संख्या 200 है। यहां भाजपा के पास 115 और कांग्रेस के 69 विधायक हैं। इस लिहाज से माना जा रहा है कि भाजपा 2 और कांग्रेस 1 सीट जीत सकती है।


    मध्य प्रदेश

    मध्य प्रदेश के नतीजे चौंकाने वाले साबित हो सकते हैं। 163 विधायकों वाली भाजपा यहां 2 सीटें अपने नाम कर सकती है। वहीं, एक सीट कांग्रेस के खाते में जा सकती है।


    झारखंड

    INDIA गठबंधन के शासन वाले राज्य में दोनों ही सीटें सत्तारूढ़ गठबंधन को मिल सकती हैं। हालांकि, कहा जा रहा है कि रणनीति के तहत एनडीए एक सीट हासिल कर सकता है। यहां कुल 81 विधायक हैं, जिनमें 56 INDIA गठबंधन और 24 एनडीए के हैं।

  • राज्यसभा चुनाव कार्यक्रम घोषित, बीरेन सिंह, रवनीत बिट्टू और नरोत्तम मिश्रा समेत कई नेताओं पर सबकी नजर

    राज्यसभा चुनाव कार्यक्रम घोषित, बीरेन सिंह, रवनीत बिट्टू और नरोत्तम मिश्रा समेत कई नेताओं पर सबकी नजर

    नई दिल्ली । देश में राज्यसभा की 24 रिक्त सीटों पर चुनाव की घोषणा के बाद राजनीतिक माहौल तेजी से गर्म हो गया है। चुनाव आयोग की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार यह मतदान 10 राज्यों में कराया जाएगा, जिससे संसद के उच्च सदन में प्रतिनिधित्व और शक्ति संतुलन पर महत्वपूर्ण असर पड़ने की संभावना है। विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने-अपने स्तर पर रणनीति बनानी शुरू कर दी है और संभावित उम्मीदवारों के नामों पर मंथन तेज हो गया है। इस चुनाव को आगामी संसदीय समीकरणों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे राज्यसभा में दलों की स्थिति में बदलाव संभव है।

    सूत्रों और राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार कई राज्यों में वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं के नाम संभावित उम्मीदवारों की सूची में शामिल किए जा रहे हैं। इनमें पूर्वोत्तर के प्रमुख नेता बीरेन सिंह, पंजाब के नेता रवनीत बिट्टू और मध्य प्रदेश के वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा जैसे नाम प्रमुखता से चर्चा में हैं। हालांकि अंतिम निर्णय संबंधित दलों के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा राज्यवार राजनीतिक परिस्थितियों और विधायकों की संख्या के आधार पर लिया जाएगा। उम्मीदवार चयन में क्षेत्रीय संतुलन, जातीय समीकरण और संगठनात्मक अनुभव जैसे कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

    चुनाव कार्यक्रम के अनुसार नामांकन प्रक्रिया से लेकर मतदान और मतगणना तक की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी। कुछ राज्यों में जहां एक दल का स्पष्ट बहुमत है, वहां निर्विरोध निर्वाचन की संभावना जताई जा रही है, जबकि कुछ अन्य राज्यों में कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है। विशेष रूप से उन राज्यों में जहां विधानसभा में बहुदलीय संतुलन है, वहां क्रॉस वोटिंग और रणनीतिक मतदान के कारण परिणाम अनिश्चित रह सकते हैं।

    राजनीतिक दलों ने इस चुनाव को गंभीरता से लेते हुए अपने विधायकों के साथ लगातार बैठकें शुरू कर दी हैं। विधायकों की संख्या और वोटिंग गणित को ध्यान में रखते हुए हर पार्टी अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी है। इस प्रक्रिया में पार्टी अनुशासन और व्हिप जारी करने जैसे कदम भी अहम साबित हो सकते हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल रिक्त सीटों को भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे राज्यसभा में सत्ता संतुलन पर भी असर पड़ेगा। आने वाले समय में विधेयकों की मंजूरी और संसदीय बहसों में दलों की भूमिका इसी परिणाम से प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि सभी प्रमुख दल इस चुनाव को लेकर बेहद सतर्क और सक्रिय नजर आ रहे हैं।

    इसके अलावा कई राज्यों में स्थानीय राजनीतिक समीकरण भी इस चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। क्षेत्रीय दलों की भूमिका उन राज्यों में खास तौर पर महत्वपूर्ण होगी जहां किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं है। ऐसे में छोटे दल और निर्दलीय विधायक भी चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

    कुल मिलाकर राज्यसभा की 24 सीटों के लिए घोषित यह चुनाव देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। उम्मीदवारों की अंतिम सूची सामने आने के बाद राजनीतिक हलचल और भी तेज होने की संभावना है और सभी की नजर अब मतदान प्रक्रिया और उसके परिणामों पर टिकी हुई है।

  • UN में ब्रिटेन के खिलाफ किस प्रस्ताव पर भारत ने किया वोट? लंदन की बढ़ी टेंशन

    UN में ब्रिटेन के खिलाफ किस प्रस्ताव पर भारत ने किया वोट? लंदन की बढ़ी टेंशन


    संयुक्त राष्ट्र : संयुक्त राष्ट्र में ब्रिटेन को एक बड़ा झटका लगा है. अफ्रीकी देशों की मांग पर UN जनरल असेंबली में एक प्रस्ताव पास किया गया है, जिसमें ब्रिटेन और अन्य पूर्व उपनिवेशवादी देशों से ट्रांसअटलांटिक गुलाम व्यापार के लिए मुआवजा देने की मांग की गई है. इस प्रस्ताव में गुलाम व्यापार को मानवता के खिलाफ सबसे गंभीर अपराध बताया गया है.

    यह प्रस्ताव अफ्रीकी देश घाना की ओर से अफ्रीकी संघ के तत्वावधान में पेश किया गया था. इस पर हुए वोटिंग में 124 देशों ने समर्थन किया, जिसमें भारत भी शामिल है. इस प्रस्ताव का तीन देशों ने विरोध किया और 52 देशों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया.

    इस बिल का विरोध करने वाले देशों में अमेरिका, इजराइल और अर्जेंटीना शामिल हैं. वहीं ब्रिटेन के साथ फ्रांस और यूरोपीय संघ (European Union) के कई देशों ने वोटिंग से परहेज किया है. ब्रिटेन ने साफ कर दिया कि वह इस प्रस्ताव से सहमत नहीं है. ब्रिटेन के प्रतिनिधि ने कहा कि उन्हें प्रस्ताव में इस्तेमाल की गई कानूनी भाषा पर आपत्ति है. ब्रिटेन के विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ने साफ शब्दों में कहा, “ब्रिटेन का रुख साफ है, हम मुआवजा नहीं देंगे.”

    यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन यह अफ्रीकी देशों के लिए एक बड़ी राजनयिक जीत है. अब अफ्रीकी देश इस मामले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं. उनका तर्क है कि गुलाम व्यापार की वजह से अफ्रीका का विकास रुका और आज भी इसकी वजह से नस्लभेद की समस्या बनी हुई है.

    अमेरिका ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि वह मानवता के खिलाफ अपराधों की रैंकिंग बनाने का विरोध करता है. अमेरिका ने उन मुस्लिम देशों के गुलाम व्यापार का भी मुद्दा उठाया जो 20वीं सदी तक जारी रहा. UN में ब्रिटेन के खिलाफ पारित इस प्रस्ताव में मुआवजे की मांग की गई है. भारत ने इसके समर्थन में वोट किया, जिससे ब्रिटेन की मुश्किलें बढ़ गई हैं. अब अगला दौर अंतरराष्ट्रीय अदालत में लड़ा जा सकता है.

  • नेपाल में बड़ा बदलाव…. आज हो रहा मतदान, ओली के गढ़ में चुनौती बने Gen Z नेता बालेन

    नेपाल में बड़ा बदलाव…. आज हो रहा मतदान, ओली के गढ़ में चुनौती बने Gen Z नेता बालेन


    काठमांडु।
    नेपाल (Nepal) में आज (गुरुवार) मतदान (Voting) हो रहा है और इस बार हिमालयी देश के राजनीतिक माहौल में एक बड़ा पीढ़ीगत बदलाव (Big Generational Change) देखने को मिल रहा है। यह चुनाव मुख्य रूप से नेपाल के पारंपरिक नेतृत्व और बदलाव की मांग कर रहे युवा मतदाताओं (Young Voters) के बीच का संघर्ष बन गया है।


    युवा आक्रोश और झापा-5 का महामुकाबला

    काठमांडू और नेपाल के अन्य शहरों में, ‘जेन जी’ यानी युवा मतदाताओं का वर्ग नेपाल के पुराने और पारंपरिक नेतृत्व से निराश व बेचैन हो चुका है। यह वही युवा वर्ग है जिसने केपी शर्मा ओली की सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था और 35 वर्षीय बालेन शाह जैसे युवा नेताओं को राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया था।

    तमाम उथल-पुथल के बावजूद, केपी शर्मा ओली नेपाल की राजनीति के सबसे कद्दावर और स्थायी चेहरों में से एक बने हुए हैं। पूर्वी नेपाल में भारत की सीमा से लगा उनका चुनाव क्षेत्र ‘झापा-5’ दशकों से उनके राजनीतिक करियर का मजबूत गढ़ रहा है। इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प है क्योंकि युवा नेता बालेन ने सीधे तौर पर झापा-5 से ओली को चुनौती देने का फैसला किया है, मानो वे कोई बड़ा संदेश देना चाहते हों।


    विद्रोही से सत्ता के शिखर तक का सफर

    1952 में जन्मे ओली का राजनीतिक सफर नेपाल के ‘पंचायत युग’ के दौरान शुरू हुआ, जब देश में राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध था। 1970 में एक किशोर कम्युनिस्ट कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने राजशाही की दल-विहीन व्यवस्था का कड़ा विरोध किया। अक्टूबर 1973 में ‘झापा विद्रोह’ और राजशाही विरोधी गतिविधियों के लिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्होंने अपनी जिंदगी के 14 साल जेल में बिताए, जिनमें से चार साल उन्हें कालकोठरी में रखा गया था। 2018 में एक विश्लेषक ने बताया था कि पंचायत युग की जेलों से निकले नेताओं का मानना था कि सत्ता का प्रयोग निर्णायक रूप से होना चाहिए, क्योंकि उन्होंने देखा था कि इसे कितनी आसानी से कुचला जा सकता है।


    लोकतंत्र की बहाली और ओली का उदय

    1990 के जन आंदोलन के बाद जब नेपाल में बहुदलीय लोकतंत्र बहाल हुआ, तो ओली ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी UML के जरिए खुली राजनीति में प्रवेश किया। संसद में उन्होंने जल्द ही अपनी स्पष्ट बयानबाजी और तीखे व्यंग्य के लिए पहचान बना ली। वे राजनीतिक बहसों को शांतिपूर्ण समझौते के बजाय “सहनशक्ति और हाजिरजवाबी की प्रतियोगिता” के रूप में देखते थे।


    2015 का संकट और ‘राष्ट्रवादी’ छवि

    राष्ट्रीय स्तर पर उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक छलांग 2015 में आई। जब नेपाल ने अपना नया संविधान अपनाया, तो भारत के साथ उसके रिश्ते काफी खराब हो गए। दक्षिणी सीमा पर हुए विरोध प्रदर्शनों के कारण नेपाल में ईंधन, दवाओं और जरूरी चीजों की भारी कमी हो गई, जिसे नेपाल में भारत की ‘अघोषित नाकेबंदी’ के रूप में देखा गया। ओली ने इस संकट को नेपाल की संप्रभुता और राष्ट्रीय गौरव का मुद्दा बना दिया। इसी राष्ट्रवादी लहर के दम पर वामपंथी गठबंधन ने 2017 के चुनावों में भारी जीत हासिल की और ओली एक दुर्लभ संसदीय बहुमत के साथ सत्ता में लौटे।


    संवैधानिक संकट और सत्ता से बाहर

    उनके द्वारा किया गया राजनीतिक स्थिरता का वादा ज्यादा दिन नहीं टिक सका। अपनी ही पार्टी में विरोध का सामना करते हुए, ओली ने दिसंबर 2020 में संसद भंग कर दी (जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बाद में बहाल किया)। मई 2021 में उन्होंने फिर से संसद भंग कर दी, जिससे एक नया संवैधानिक संकट पैदा हुआ और आखिरकार उन्हें सत्ता से बाहर होना पड़ा। आलोचकों का कहना था कि जिस नेता ने राज्य की सत्ता का विरोध करते हुए वर्षों जेल में बिताए, वही अब सत्ता में बने रहने के लिए संवैधानिक सीमाओं को लांघ रहा था।


    बालेन का राजनीतिक सफर

    बालेन्द्र शाह (जिन्हें नेपाल में लोकप्रिय रूप से ‘बालेन’ कहा जाता है) का राजनीतिक सफर नेपाल के आधुनिक इतिहास की सबसे दिलचस्प कहानियों में से एक है। एक अंडरग्राउंड रैपर और स्ट्रक्चरल इंजीनियर से लेकर नेपाल के प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदार बनने तक का उनका सफर, पारंपरिक राजनीति को सीधी चुनौती देने वाला रहा है। बालेन का जन्म 27 अप्रैल 1990 को काठमांडू में हुआ था। राजनीति में आने से पहले वे एक पेशेवर इंजीनियर रहे हैं। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया और फिर भारत (कर्नाटक) से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री (MTech) हासिल की। वर्तमान में वे काठमांडू विश्वविद्यालय से अपनी पीएचडी (PhD) भी कर रहे हैं।


    रैपर के रूप में लोकप्रियता और सामाजिक चेतना

    म्यूजिक और ‘रैप बैटल’: 2013 के आसपास नेपाल के अंडरग्राउंड हिप-हॉप और ‘रैप बैटल’ (जैसे ‘Raw Barz’) के जरिए बालेन को खासी पहचान मिली। उनके गानों के बोल कोई सामान्य गीत नहीं थे; वे अक्सर भ्रष्टाचार, असमानता और राजनीतिक कुव्यवस्था पर तीखा प्रहार करते थे। इसी संगीत ने उन्हें पहली बार युवाओं के बीच एक विद्रोही आइकन के रूप में स्थापित किया। राजनीति में उनका असली उदय 2022 के स्थानीय चुनावों में हुआ, जब उन्होंने एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में काठमांडू के मेयर पद का चुनाव लड़ा।

    बिना किसी राजनीतिक पार्टी के समर्थन के, उन्होंने नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल (CPN-UML) जैसी मजबूत पार्टियों के दिग्गज उम्मीदवारों को भारी अंतर से हराकर पूरे देश की राजनीति में भूचाल ला दिया। मेयर के रूप में बालेन ने कई कड़े और मुखर फैसले लिए। उन्होंने अवैध कब्जों को हटाने के लिए अभियान चलाया, दशकों पुरानी कचरा प्रबंधन की समस्या को सुलझाने की कोशिश की और नेपाल में पहली बार नगर निगम की बैठकों का सीधा प्रसारण शुरू किया। हालांकि, उनके कुछ आक्रामक फैसलों की आलोचना भी हुई, लेकिन युवाओं में उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई।

    ‘Gen Z’ विरोध प्रदर्शन और राष्ट्रीय राजनीति की ओर कदम
    जब नेपाल में भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ युवाओं (Gen Z) का भारी विरोध प्रदर्शन हुआ- जिसके कारण अंततः केपी शर्मा ओली की सरकार को सत्ता से बाहर होना पड़ा- तो बालेन ने मुखर होकर इस युवा क्रांति का समर्थन किया। प्रदर्शनों के दौरान वे एक अघोषित नेता के रूप में उभरे। हालांकि कई युवाओं ने उन्हें अंतरिम नेतृत्व संभालने को कहा, लेकिन बालेन ने स्पष्ट किया कि वे सत्ता हथियाने के बजाय लोकतांत्रिक तरीके (बैलेट बॉक्स) से व्यवस्था में बदलाव लाना चाहते हैं।

    2026 का राष्ट्रीय चुनाव: पुराने दिग्गजों को सीधी चुनौती
    राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति करने के इरादे से, बालेन ने जनवरी 2026 में काठमांडू के मेयर पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने पूर्व टीवी होस्ट रबि लामिछाने के नेतृत्व वाली युवाओं की लोकप्रिय ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी’ (RSP) के साथ गठबंधन किया और इस चुनाव में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन गए। किसी आसान या सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के बजाय, बालेन ने नेपाल के कद्दावर नेता और चार बार के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को उनके ही गढ़ ‘झापा-5’ में चुनौती देने का साहसिक फैसला किया।

    क्या विद्रोही का भविष्य अब भी बाकी है?
    ओली 2024 में गठबंधन सरकार के हिस्से के रूप में एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर लौटे। लेकिन पिछले साल सितंबर में हुए हिंसक ‘जेन जी’ विरोध प्रदर्शनों के दौरान उन्हें भारी जनआक्रोश का सामना करना पड़ा और अंततः उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। कई लोगों का मानना था कि उनका राजनीतिक करियर अब खत्म हो गया है। इसके बावजूद, ओली झापा-5 से एक बार फिर चुनावी मैदान में डटे हैं। जेल, राजनीतिक उथल-पुथल और सत्ता विरोधी लहरों को मात देने वाले इस नेता का सामना अब उन युवा मतदाताओं से है, जो यह तय करेंगे कि नेपाल की राजनीति में इस कद्दावर नेता का अब कोई भविष्य बचा है या नहीं।

  • महाराष्ट्र, बंगाल, बिहार और हरियाणा समेत 10 राज्यों के लिए राज्यसभा चुनाव की घोषणा, 16 मार्च को होगा मतदान

    महाराष्ट्र, बंगाल, बिहार और हरियाणा समेत 10 राज्यों के लिए राज्यसभा चुनाव की घोषणा, 16 मार्च को होगा मतदान


    नई दिल्ली । चुनाव आयोग ने राज्यसभा चुनाव का कार्यक्रम घोषित कर दिया है। यह चुनाव उन सदस्यों की जगह भरे जाने के लिए कराया जा रहा है, जिनका कार्यकाल अप्रैल 2026 में समाप्त हो रहा है। कुल 10 राज्यों की 37 सीटों पर चुनाव होंगे। आयोग के अनुसार 26 फरवरी 2026 को अधिसूचना जारी होगी। नामांकन दाखिल करने, जांच और नाम वापस लेने की प्रक्रिया तय समय सीमा के अनुसार पूरी की जाएगी। सभी सीटों के लिए मतदान और मतगणना 16 मार्च 2026 को ही होंगे।

    मतदान और मतगणना का कार्यक्रम

    26 फरवरी 2026 को नोटिफिकेशन जारी किया जाएगा। नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 5 मार्च 2026 है, जबकि 6 मार्च को नामांकन पत्रों की जांच होगी। नाम वापस लेने की अंतिम तारीख 9 मार्च 2026 तय की गई है। मतदान 16 मार्च को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक होगा और मतगणना उसी दिन शाम 5 बजे से शुरू होगी। चुनाव प्रक्रिया 20 मार्च तक पूरी कर ली जाएगी।

    कौन से राज्यों की सीटों पर चुनाव
    इस चुनाव में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, असम, छत्तीसगढ़, हरियाणा, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश की सीटों के लिए चुनाव होगा। राजनीतिक दलों ने अपने उम्मीदवार तय करने की प्रक्रिया तेज कर दी है और राज्यों में चुनावी हलचल बढ़ गई है।

    रिटायर हो रहे सदस्य

    महाराष्ट्र: डॉ. भगवत किशनराव कराड, डॉ. फौजिया तहसीन अहमद खान, प्रियंका विक्रम चतुर्वेदी, शरदचंद्र गोविंदराव पवार, धैर्यशील मोहन पाटिल, रजनी अशोकराव पाटिल, रामदास बंदू अठावले।

    ओडिशा: ममता मोहंता, मुजीबुल्ला खान, सुजीत कुमार, निरंजन बिशी।

    तमिलनाडु: एन आर एलंगो, पी सेल्वारासु, एम थम्बिदुरई, तिरुची सिवा, डॉ. कनिमोझी एन वी एन सोमू, जी के वासन।

    पश्चिम बंगाल: साकेत गोखले, ऋतब्रत बनर्जी, बिकाश रंजन भट्टाचार्य, मौसम नूर, सुब्रत बक्शी।

    असम: रामेश्वर तेली, भुवनेश्वर कलिता, अजीत कुमार भुइयां।

    बिहार: अमरेंद्र धारी सिंह, प्रेम चंद गुप्ता, रामनाथ ठाकुर, उपेन्द्र कुशवाहा, हरिवंश नारायण सिंह।

    छत्तीसगढ़: कवि तेजपाल सिंह तुलसी, फूलो देवी नेताम।

    हरियाणा: किरण चौधरी, राम चंदर जांगड़ा।

    हिमाचल प्रदेश: इंदु बाला गोस्वामी।

    तेलंगाना: डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी, के आर सुरेश रेड्डी।

    राजनीतिक दल अब अपने उम्मीदवार तय कर रहे हैं और 16 मार्च 2026 को इन सभी सीटों के लिए मतदान होगा।

  • इंदौर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन चुनाव: अध्यक्ष के लिए रोमांचक मुकाबला, उपाध्यक्ष और सह सचिव पद पर बड़ी जीत

    इंदौर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन चुनाव: अध्यक्ष के लिए रोमांचक मुकाबला, उपाध्यक्ष और सह सचिव पद पर बड़ी जीत


    इंदौर । इंदौर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के चुनाव परिणाम बुधवार देर रात घोषित किए गए। लंबे और रोमांचक मुकाबले के बाद अध्यक्ष पद पर मनीष यादव विजयी हुए। उपाध्यक्ष, सचिव और सह सचिव पदों पर भी नवनिर्वाचितों ने अपने मजबूत प्रदर्शन से जीत दर्ज की। चुनाव में कुल 1914 मतदाता शामिल हुए।

    अध्यक्ष पद का मुकाबला बेहद कड़ा और रोमांचक रहा। शुरुआत में गौरव श्रीवास्तव आगे चल रहे थे, लेकिन जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ी, मनीष यादव ने 17वें राउंड में बढ़त बना ली और 20वें राउंड तक उसे बनाए रखा। अंततः मनीष यादव 512 वोटों के साथ 20 वोटों के अंतर से जीत गए। गौरव श्रीवास्तव को 492 वोट मिले। अन्य प्रत्याशियों में जीपी सिंह को 406, मनीष जैन को 282 और पवन जोशी को 95 मत मिले।

    उपाध्यक्ष पद पर अभिषेक तुगनावत ने शुरुआत से ही स्पष्ट बढ़त बनाए रखी और एकतरफा जीत दर्ज की। उन्हें 858 मत प्राप्त हुए, जबकि उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी अपूर्वा शुक्ला को 311, धर्मेंद्र साहू को 232, मधुसूदन यादव को 216 और भावना साहू को 162 वोट ही मिले।

    सचिव पद के चुनाव में तीन प्रमुख प्रत्याशियों के बीच कांटे की टक्कर रही। मतों की बार-बार अदला-बदली के बीच मनीष गडकर 652 वोट लेकर विजयी हुए। उनके प्रतिद्वंद्वी गोविंद राय को 582 और निलेश मनोरे को 533 मत प्राप्त हुए। सह सचिव पद पर अमित राज ने सबसे बड़ी जीत दर्ज की। उन्हें 1027 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी ज्ञानेंद्र शर्मा को 739 वोट ही मिल सके। एग्जीक्यूटिव मेंबर के रूप में राहुल पांचाल, तेजस जैन, अमन मालवीय, रश्मेंद्र सूर्यवंशी और अर्निक जैन चुने गए।

    परिणाम घोषित होते ही बार परिसर में समर्थकों ने जीत का जश्न मनाया। नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने कहा कि वे अधिवक्ताओं की समस्याओं, सुविधाओं और हाईकोर्ट परिसर से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता से उठाएंगे। मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज द्विवेदी और मीडिया प्रभारी अजय मिश्रा के अनुसार, मतदान सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक हुआ। इसके बाद शाम 7 बजे से मतगणना शुरू हुई, जो देर रात करीब 1 बजे तक चली। इस चुनाव ने बार एसोसिएशन में नई ऊर्जा और उत्साह पैदा कर दिया है।

  • युगांडा में राष्ट्रपति चुनाव के लिए आज मतदान… दो दिन पहले से इंटरनेट पूरी तरह बंद

    युगांडा में राष्ट्रपति चुनाव के लिए आज मतदान… दो दिन पहले से इंटरनेट पूरी तरह बंद


    कंपाला।
    अफ्रीकी देश युगांडा (African country Uganda) में 15 जनवरी 2026 को राष्ट्रपति चुनाव (Presidential Election.) होने जा रहे हैं, लेकिन निष्पक्ष और स्वतंत्र मतदान की उम्मीदें गंभीर चुनौती का सामना कर रही हैं। मतदान से महज दो दिन पहले (13 जनवरी को शाम 6 बजे से) पूरे देश में सार्वजनिक इंटरनेट सेवा पूरी तरह बंद कर दी गई है। साथ ही सड़कों पर सैनिकों और सुरक्षा बलों की भारी मौजूदगी है, जिससे आम नागरिकों में डर और असुरक्षा का माहौल है। विपक्षी नेता बॉबी वाइन (रॉबर्ट क्यागुलानी) ने इसे चुनावी धांधली और दमन की साजिश बताया है।

    दरअसल, यह चुनाव 81 वर्षीय राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी के लिए सातवां कार्यकाल हासिल करने का मौका है, जो 1986 से लगातार सत्ता में हैं। उनका मुख्य मुकाबला 43 वर्षीय बॉबी वाइन से है, जो पूर्व पॉप स्टार से राजनेता बने हैं और युवा वर्ग में बदलाव की लहर पैदा कर रहे हैं। एक्सपर्ट का कहना है कि मुसेवेनी की सत्ता में वापसी लगभग तय है, लेकिन वे अब सुरक्षा बलों और अपने बेटे जनरल मुहूज़ी कैनेरुगाबा (सेना के शीर्ष कमांडर) पर अधिक निर्भर हैं।

    गौरतलब है कि मुसेवेनी ने संविधान में दो बार बदलाव कर आयु और कार्यकाल की सीमा हटा दी है। विरोधियों को जेल, गायब किया जाना या दबाया जाना आम हो गया है। सत्तारूढ़ नेशनल रेजिस्टेंस मूवमेंट (एनआरएम) में कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नहीं दिखता, जिससे वंशानुगत शासन की आशंका बढ़ गई है।


    इंटरनेट बंदी… लोकतंत्र पर बड़ा हमला

    युगांडा कम्युनिकेशंस कमीशन (यूसीसी) ने इंटरनेट बंद करने का फैसला ‘ऑनलाइन गलत सूचना, भ्रामक जानकारी, चुनावी धोखाधड़ी और हिंसा भड़काने के जोखिम’ रोकने के नाम पर लिया है। यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की सिफारिश पर हुआ। लेकिन आलोचक इसे विरोध प्रदर्शनों को रोकने और चुनावी अनियमितताओं (जैसे मतपत्र भरना, वोटों में हेराफेरी) की जानकारी साझा करने से रोकने का हथकंडा बताते हैं। 2021 के चुनाव में भी ऐसा ही ब्लैकआउट हुआ था, जो कई दिनों तक चला।


    विपक्ष की रणनीति: वोट की रक्षा

    बॉबी वाइन की नेशनल यूनिटी प्लेटफॉर्म (NUP) ने समर्थकों से मतदान केंद्रों के पास कानूनी 20 मीटर की दूरी पर रहने, सतर्क रहने और धांधली रोकने का आह्वान किया है। चुनाव आयोग ने लोगों से वोट डालकर घर लौटने और जरूरत पर मतगणना देखने की अपील की है। वाइन ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा कि पहला कदम यह है कि हम सभी मतदान केंद्रों पर (20 मीटर की दूरी का पालन करते हुए) रहें और सुनिश्चित करें कि कोई आपराधिक घटना न हो। हम सभी से आग्रह करते हैं कि वे अपने कैमरों का उपयोग करें और किसी भी अनियमितता को रिकॉर्ड करें।