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  • यूएन मानवाधिकार प्रमुख के पुनर्नियुक्ति विवाद पर अमेरिका का कड़ा विरोध, फ्रांस के भाषण के दौरान छोड़ी बैठक

    यूएन मानवाधिकार प्रमुख के पुनर्नियुक्ति विवाद पर अमेरिका का कड़ा विरोध, फ्रांस के भाषण के दौरान छोड़ी बैठक

    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क के दूसरे कार्यकाल को लेकर अमेरिका और फ्रांस के बीच गंभीर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। यह विवाद उस समय और गहरा गया जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक बैठक के दौरान फ्रांस के प्रतिनिधि के संबोधन की शुरुआत होते ही अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल विरोध दर्ज कराते हुए बैठक से बाहर निकल गया। कूटनीतिक हलकों में इस घटनाक्रम को दोनों पारंपरिक सहयोगी देशों के रिश्तों में बढ़ते तनाव का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

    यह पूरा विवाद संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुए उस मतदान के बाद शुरू हुआ, जिसमें वोल्कर टर्क को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में दूसरा कार्यकाल दिया गया। मतदान में उन्हें 144 देशों का समर्थन मिला, जबकि 10 देशों ने विरोध किया और 13 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। अमेरिका और रूस ने उनके पुनर्नियुक्ति का विरोध किया, लेकिन पर्याप्त समर्थन मिलने के कारण उनका दूसरा कार्यकाल सुनिश्चित हो गया। भारत ने भी उनके पक्ष में मतदान किया, जबकि मतदान प्रक्रिया से जुड़े कुछ अन्य प्रस्तावों पर उसने हिस्सा नहीं लिया।

    मानवाधिकार प्रमुख के चयन को लेकर पैदा हुए मतभेद सुरक्षा परिषद की बैठक तक पहुंच गए। यूक्रेन से जुड़े मुद्दे पर आयोजित बैठक में जैसे ही फ्रांस के स्थायी प्रतिनिधि ने अपना वक्तव्य शुरू किया, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल बैठक छोड़कर बाहर चला गया। अमेरिकी अधिकारियों ने इस कदम को फ्रांस की राजनीतिक टिप्पणी और उसके रवैये के विरोध के रूप में प्रस्तुत किया।

    अमेरिकी पक्ष का कहना है कि फ्रांस लगातार मानवाधिकार के मुद्दों पर नैतिक श्रेष्ठता दिखाने की कोशिश करता है और अन्य देशों को उपदेश देने की नीति अपनाता है। अमेरिका ने यह भी आरोप लगाया कि संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने लोकतांत्रिक देशों की अपेक्षा अधिक आलोचना की है, जबकि कई दमनकारी शासन के मामलों में अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया गया। इसी कारण वोल्कर टर्क के दूसरे कार्यकाल का अमेरिका ने खुलकर विरोध किया।

    विवाद उस समय और बढ़ गया जब फ्रांस के संयुक्त राष्ट्र मिशन की ओर से सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी साझा की गई, जिसमें अमेरिका के मतदान रुख पर सवाल उठाए गए। इसके बाद अमेरिकी अधिकारियों ने भी सार्वजनिक रूप से फ्रांस की आलोचना की और कहा कि वह अपने मतदान को सही ठहराने के लिए राजनीतिक बयानबाजी कर रहा है। अमेरिका ने फ्रांस पर सुरक्षा परिषद की गरिमा के अनुरूप व्यवहार नहीं करने का भी आरोप लगाया।

    दूसरी ओर, वोल्कर टर्क के समर्थकों का तर्क है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में विभिन्न देशों के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर समान रूप से टिप्पणी की है। हालांकि अमेरिका और रूस दोनों का आरोप है कि उनके कार्यालय ने कई मामलों में राजनीतिक पक्षपात दिखाया है। रूस ने भी उनके पुनर्नियुक्ति का विरोध करते हुए कहा कि मानवाधिकार के नाम पर भू-राजनीतिक हितों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

    महासभा की प्रक्रिया के दौरान अमेरिका ने मतदान टालने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन उसे पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। इसके बाद रूस ने सुझाव दिया कि नए महासचिव के कार्यभार संभालने के बाद मानवाधिकार प्रमुख का चुनाव कराया जाए, लेकिन यह प्रस्ताव भी बहुमत हासिल नहीं कर सका। दोनों प्रस्ताव असफल रहने के बाद वोल्कर टर्क का दूसरा कार्यकाल तय हो गया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल एक नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली, मानवाधिकार एजेंडे और प्रमुख वैश्विक शक्तियों के बीच बढ़ते वैचारिक मतभेदों को भी उजागर करता है। सुरक्षा परिषद में अमेरिका का वॉकआउट इसी व्यापक कूटनीतिक तनाव का प्रतीक माना जा रहा है, जिसका प्रभाव भविष्य में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सहयोग और संवाद की दिशा पर भी पड़ सकता है।

  • संसद सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक में बागी सांसदों की मौजूदगी पर बढ़ा विवाद, विपक्ष ने जताया विरोध, सहमति की कोशिशों के बीच फिर लौटी बैठक

    संसद सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक में बागी सांसदों की मौजूदगी पर बढ़ा विवाद, विपक्ष ने जताया विरोध, सहमति की कोशिशों के बीच फिर लौटी बैठक

    नई दिल्ली । संसद के मानसून सत्र की शुरुआत से पहले आयोजित सर्वदलीय बैठक में रविवार को उस समय राजनीतिक हलचल तेज हो गई, जब विपक्षी दलों ने तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों को बैठक में आमंत्रित किए जाने का विरोध करते हुए सांकेतिक वॉकआउट कर दिया। हालांकि यह विरोध अधिक देर तक नहीं चला और बातचीत के बाद विपक्षी नेता दोबारा बैठक में लौट आए। इस घटनाक्रम ने मानसून सत्र शुरू होने से पहले ही सदन के भीतर संभावित राजनीतिक टकराव के संकेत दे दिए हैं।

    संसद भवन परिसर में आयोजित इस बैठक की अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की। बैठक में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, आम आदमी पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, वाम दलों सहित कई विपक्षी दलों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। बैठक का उद्देश्य आगामी मानसून सत्र के दौरान संसद के सुचारु संचालन के लिए सभी दलों के बीच संवाद स्थापित करना और विधायी कार्यों को लेकर सहमति बनाना था। लेकिन बैठक शुरू होने के कुछ ही समय बाद विपक्ष ने बागी सांसदों की मौजूदगी को लेकर आपत्ति दर्ज कराई और विरोध स्वरूप बाहर निकल गया।

    विपक्ष का कहना था कि जिन सांसदों ने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर अलग राजनीतिक समूह का दावा किया है, उन्हें अभी तक लोकसभा अध्यक्ष की ओर से औपचारिक मान्यता नहीं मिली है। साथ ही उनके खिलाफ दायर अयोग्यता संबंधी याचिकाएं भी लंबित हैं। ऐसे में उन्हें सर्वदलीय बैठक में अलग इकाई के रूप में आमंत्रित करना संसदीय परंपराओं और स्थापित प्रक्रियाओं के अनुरूप नहीं माना जा सकता। विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से जुड़ा विषय बताते हुए सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा।

    विरोध दर्ज कराने के बाद विपक्षी दलों ने कुछ समय के लिए बैठक का बहिष्कार किया, लेकिन बाद में संवाद की आवश्यकता को देखते हुए सभी दल फिर से बैठक में शामिल हो गए। बैठक के दौरान सरकार ने सभी राजनीतिक दलों से संसद के सुचारु संचालन में सहयोग की अपील की। साथ ही आगामी सत्र के दौरान प्रस्तावित विधेयकों, विधायी कार्यक्रम और विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के लिए सभी पक्षों से सकारात्मक भूमिका निभाने का आग्रह किया गया।

    इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि हाल में हुए राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़ी हुई है। तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए 20 सांसदों को लोकसभा में अलग बैठने की अनुमति मिलने के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई थी। विपक्ष का तर्क है कि अलग बैठने की अनुमति और किसी नए समूह को औपचारिक मान्यता दिए जाने की प्रक्रिया अलग-अलग विषय हैं। इसी कारण सर्वदलीय बैठक में उनकी भागीदारी को लेकर सवाल उठाए गए। इसी तरह अन्य दलों से जुड़े कुछ बागी सांसदों की संसदीय स्थिति भी चर्चा का विषय बनी हुई है।

    संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलेगा, जिसमें कुल 19 बैठकें प्रस्तावित हैं। इस दौरान सरकार कई महत्वपूर्ण विधेयक और नीतिगत प्रस्ताव सदन के समक्ष रख सकती है, जबकि विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और अन्य राजनीतिक मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है। ऐसे में सत्र शुरू होने से पहले सर्वदलीय बैठक में सामने आया यह विवाद संकेत देता है कि आने वाले दिनों में संसद के भीतर तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिल सकती है। इसके बावजूद बैठक में सभी दलों की वापसी इस बात का संकेत भी मानी जा रही है कि संवाद की प्रक्रिया को जारी रखने और संसदीय कार्यवाही को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक दलों ने बातचीत का रास्ता खुला रखा है।