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  • 'वक्फ बोर्ड की जांच हो तो सामने आएगा बड़ा घोटाला', मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी ने सीएम योगी को लिखा पत्र

    'वक्फ बोर्ड की जांच हो तो सामने आएगा बड़ा घोटाला', मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी ने सीएम योगी को लिखा पत्र


    बरेली। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी ने उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और शिया वक्फ बोर्ड में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि यदि वक्फ बोर्ड की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो अरबों-खरबों रुपये की कथित अनियमितताओं का खुलासा हो सकता है। इसके लिए उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर विस्तृत जांच की मांग की है।

    प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौलाना रिजवी ने कहा कि केवल बरेली जिले में ही वक्फ की जमीनों से जुड़े करोड़ों और अरबों रुपये के कथित घोटाले हुए हैं। उनका आरोप है कि वक्फ संपत्तियों का उपयोग जनकल्याण के बजाय निजी हितों के लिए किया गया और सरकार को पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए।

    गरीबों के लिए बनी थी वक्फ संपत्ति
    मौलाना ने कहा कि वक्फ की जमीनें गरीब मुसलमानों, महिलाओं, बच्चों, जरूरतमंदों और बेसहारा लोगों की मदद के उद्देश्य से दान की गई थीं। इन संपत्तियों से होने वाली आय का उपयोग इन्हीं वर्गों के कल्याण पर होना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। उनका दावा है कि आज भी बड़ी संख्या में गरीब मुसलमान आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं, जबकि वक्फ की जमीनों से कुछ लोग करोड़ों रुपये का कारोबार कर रहे हैं।

    समाजवादी पार्टी के कार्यकाल पर लगाए आरोप
    मौलाना रिजवी ने आरोप लगाया कि वक्फ की जमीनों की कथित खरीद-फरोख्त समाजवादी पार्टी की सरकारों के दौरान सबसे अधिक हुई। उनके अनुसार, जब-जब समाजवादी पार्टी की सरकार सत्ता में रही, तब सुन्नी और शिया वक्फ बोर्ड के जिम्मेदार लोगों ने सरकारी संरक्षण में वक्फ संपत्तियों के सौदे किए।

    उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव 1989-91, 1993-95 और 2003-07 तक मुख्यमंत्री रहे, जबकि अखिलेश यादव 2012 से 2017 तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। मौलाना का दावा है कि इन चारों कार्यकालों में अधिकांश समय आजम खान के पास अल्पसंख्यक, वक्फ और हज मंत्रालय की जिम्मेदारी रही।

    चेयरमैनों की नियुक्ति और कार्यशैली पर भी सवाल
    मौलाना ने आरोप लगाया कि आजम खान की पसंद के लोगों को वक्फ बोर्ड में चेयरमैन और सदस्य बनाया गया। उन्होंने बताया कि जुफर अहमद फारूकी वर्ष 2000-01 तक, अमीर आलम 2001-03 तक, हाफिज उस्मान 2004-09 तक और इसके बाद जुफर अहमद फारूकी 2010 से 2026 तक सुन्नी वक्फ बोर्ड के चेयरमैन रहे। उनके अनुसार, इन कार्यकालों में बोर्ड के भीतर मनमाने ढंग से काम हुआ और कई कथित अनियमितताएं हुईं।

    ‘वक्फ की जमीनों का हुआ बंटवारा’
    मौलाना ने दावा किया कि सुन्नी और शिया दोनों वक्फ बोर्डों के कई जिम्मेदार पदाधिकारियों ने वक्फ की जमीनों का दुरुपयोग किया। उनका आरोप है कि जो भी व्यक्ति बोर्ड में सदस्य या पदाधिकारी बना, उसने अपने क्षेत्र में वक्फ की जमीनों का बंटवारा कराया। उन्होंने कहा कि पूर्वजों ने वक्फ संपत्तियां इसलिए दान की थीं ताकि उनकी आय से गरीबों, यतीमों और जरूरतमंद लोगों की सहायता की जा सके, लेकिन इस उद्देश्य को पूरा नहीं किया गया।

    स्कूल, अस्पताल और मदरसे बनाने का उद्देश्य अधूरा
    मौलाना ने कहा कि वक्फ संपत्तियों पर स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और मदरसे विकसित किए जाने थे, लेकिन कथित वक्फ माफिया के कारण यह उद्देश्य पूरा नहीं हो सका। उनका आरोप है कि इन संपत्तियों का लाभ आम लोगों के बजाय सीमित लोगों तक ही पहुंचा।

    मुख्यमंत्री से की कार्रवाई की मांग
    मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मांग की है कि वक्फ बोर्ड द्वारा बेची गई सभी जमीनों की जांच कराई जाए और दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। उन्होंने दावा किया कि यदि निष्पक्ष जांच हुई तो राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मामले से भी बड़ा घोटाला सामने आ सकता है। उनका यह भी कहना है कि यदि वक्फ की आय का सही उपयोग गरीब मुसलमानों के कल्याण पर किया जाए तो उनकी आर्थिक स्थिति में बड़ा सुधार संभव है।

  • मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड पर घमासान तेज, गैर-मुस्लिम नियुक्तियों के खिलाफ शिया समुदाय की भी खुली नाराजगी

    मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड पर घमासान तेज, गैर-मुस्लिम नियुक्तियों के खिलाफ शिया समुदाय की भी खुली नाराजगी


    मध्य प्रदेश। मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ विवाद अब नया मोड़ ले चुका है। अब तक सुन्नी उलेमा और मुस्लिम संगठनों के विरोध के बाद पहली बार शिया समुदाय ने भी इस मुद्दे पर खुलकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। भोपाल के करोंद स्थित आल-ए-मोहम्मद शिया जामा मस्जिद के इमाम-ए-जुमा मौलाना सैयद अज़हर हुसैन रिजवी ने साफ कहा कि वक्फ की जमीनें और संपत्तियां मुस्लिम समाज की अमानत हैं, इसलिए इनके संचालन और प्रबंधन में गैर-मुस्लिमों को शामिल करना उचित नहीं माना जा सकता।

    मौलाना रिजवी का कहना है कि वक्फ की संपत्तियां वर्षों पहले नवाबों, राजाओं और समाज के संपन्न लोगों ने गरीब और जरूरतमंद मुसलमानों की शिक्षा, आवास तथा सामाजिक कल्याण के उद्देश्य से दान की थीं। ऐसे में इन संपत्तियों से जुड़े फैसले भी मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों के हाथों में ही होने चाहिए। उनके मुताबिक वक्फ केवल संपत्ति का मामला नहीं बल्कि धार्मिक और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा विषय है, इसलिए इसमें बाहरी दखल उचित नहीं है।

    उन्होंने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि नए वक्फ बोर्ड में शिया समुदाय के किसी भी प्रतिनिधि को स्थान नहीं दिया गया। उनका कहना है कि प्रदेश के मुस्लिम समाज में शिया समुदाय भी महत्वपूर्ण हिस्सा है और बोर्ड में कम से कम एक शिया आलिम या प्रतिनिधि को शामिल किया जाना चाहिए था। ऐसा नहीं होने से समाज के एक बड़े वर्ग में निराशा है।

    मौलाना रिजवी ने उन लोगों पर भी अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठाए जिन्होंने नए वक्फ बोर्ड अध्यक्ष के स्वागत का समर्थन किया। उनका कहना है कि यदि कोई धार्मिक पद पर बैठा व्यक्ति ऐसे फैसलों का समर्थन करता है तो यह मुस्लिम समाज की भावनाओं के अनुरूप नहीं माना जा सकता। उनका मानना है कि धार्मिक मामलों में समाज की भावनाओं और विश्वास का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए।

    दरअसल हाल ही में शहर काजी मुश्ताक अली नदवी और शहर मुफ्ती अब्दुल कलाम द्वारा वक्फ बोर्ड अध्यक्ष सनव्वर पटेल के स्वागत के बाद मुस्लिम समाज के एक वर्ग में नाराजगी देखने को मिली थी। इस मुद्दे पर पहले भी कई मुस्लिम संगठनों ने विरोध दर्ज कराया था। जुमे की नमाज के दौरान लोगों ने काली पट्टी बांधकर विरोध प्रदर्शन किया था, जबकि कुछ धार्मिक पदाधिकारियों ने भी इस फैसले पर असहमति जताई थी।

    मौलाना रिजवी ने मुस्लिम समाज से एकजुट रहने की अपील करते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियों की एक बड़ी वजह आपसी एकता की कमी भी है। यदि समाज संगठित रहता तो ऐसे विवादों की स्थिति नहीं बनती। उन्होंने सभी मतभेद भुलाकर समाजहित में एक साथ खड़े होने की आवश्यकता बताई।

    इधर यह मामला अब कानूनी दिशा भी पकड़ता नजर आ रहा है। कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद द्वारा सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा के बाद मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड ने जबलपुर हाईकोर्ट में केविएट दायर कर दी है। बोर्ड अध्यक्ष सनव्वर पटेल का कहना है कि यदि इस मामले में कोई याचिका दायर होती है तो अदालत किसी भी आदेश से पहले बोर्ड का पक्ष भी अवश्य सुने। ऐसे में वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सामाजिक और कानूनी दोनों स्तरों पर लगातार गहराता दिखाई दे रहा है।

    Tags (English):
    Waqf Board, Madhya Pradesh, Shia Community, Bhopal News, Waqf Controversy मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ विवाद अब नया मोड़ ले चुका है। अब तक सुन्नी उलेमा और मुस्लिम संगठनों के विरोध के बाद पहली बार शिया समुदाय ने भी इस मुद्दे पर खुलकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। भोपाल के करोंद स्थित आल-ए-मोहम्मद शिया जामा मस्जिद के इमाम-ए-जुमा मौलाना सैयद अज़हर हुसैन रिजवी ने साफ कहा कि वक्फ की जमीनें और संपत्तियां मुस्लिम समाज की अमानत हैं, इसलिए इनके संचालन और प्रबंधन में गैर-मुस्लिमों को शामिल करना उचित नहीं माना जा सकता।

    मौलाना रिजवी का कहना है कि वक्फ की संपत्तियां वर्षों पहले नवाबों, राजाओं और समाज के संपन्न लोगों ने गरीब और जरूरतमंद मुसलमानों की शिक्षा, आवास तथा सामाजिक कल्याण के उद्देश्य से दान की थीं। ऐसे में इन संपत्तियों से जुड़े फैसले भी मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों के हाथों में ही होने चाहिए। उनके मुताबिक वक्फ केवल संपत्ति का मामला नहीं बल्कि धार्मिक और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा विषय है, इसलिए इसमें बाहरी दखल उचित नहीं है।

    उन्होंने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि नए वक्फ बोर्ड में शिया समुदाय के किसी भी प्रतिनिधि को स्थान नहीं दिया गया। उनका कहना है कि प्रदेश के मुस्लिम समाज में शिया समुदाय भी महत्वपूर्ण हिस्सा है और बोर्ड में कम से कम एक शिया आलिम या प्रतिनिधि को शामिल किया जाना चाहिए था। ऐसा नहीं होने से समाज के एक बड़े वर्ग में निराशा है।

    मौलाना रिजवी ने उन लोगों पर भी अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठाए जिन्होंने नए वक्फ बोर्ड अध्यक्ष के स्वागत का समर्थन किया। उनका कहना है कि यदि कोई धार्मिक पद पर बैठा व्यक्ति ऐसे फैसलों का समर्थन करता है तो यह मुस्लिम समाज की भावनाओं के अनुरूप नहीं माना जा सकता। उनका मानना है कि धार्मिक मामलों में समाज की भावनाओं और विश्वास का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए।

    दरअसल हाल ही में शहर काजी मुश्ताक अली नदवी और शहर मुफ्ती अब्दुल कलाम द्वारा वक्फ बोर्ड अध्यक्ष सनव्वर पटेल के स्वागत के बाद मुस्लिम समाज के एक वर्ग में नाराजगी देखने को मिली थी। इस मुद्दे पर पहले भी कई मुस्लिम संगठनों ने विरोध दर्ज कराया था। जुमे की नमाज के दौरान लोगों ने काली पट्टी बांधकर विरोध प्रदर्शन किया था, जबकि कुछ धार्मिक पदाधिकारियों ने भी इस फैसले पर असहमति जताई थी।

    मौलाना रिजवी ने मुस्लिम समाज से एकजुट रहने की अपील करते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियों की एक बड़ी वजह आपसी एकता की कमी भी है। यदि समाज संगठित रहता तो ऐसे विवादों की स्थिति नहीं बनती। उन्होंने सभी मतभेद भुलाकर समाजहित में एक साथ खड़े होने की आवश्यकता बताई।

    इधर यह मामला अब कानूनी दिशा भी पकड़ता नजर आ रहा है। कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद द्वारा सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा के बाद मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड ने जबलपुर हाईकोर्ट में केविएट दायर कर दी है। बोर्ड अध्यक्ष सनव्वर पटेल का कहना है कि यदि इस मामले में कोई याचिका दायर होती है तो अदालत किसी भी आदेश से पहले बोर्ड का पक्ष भी अवश्य सुने। ऐसे में वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सामाजिक और कानूनी दोनों स्तरों पर लगातार गहराता दिखाई दे रहा है।

  • मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड को लेकर बढ़ा विवाद गैर मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति के विरोध में तेज हुआ आंदोलन

    मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड को लेकर बढ़ा विवाद गैर मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति के विरोध में तेज हुआ आंदोलन


    नई दिल्ली । मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड में दो गैर मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति को लेकर प्रदेश में विवाद लगातार गहराता जा रहा है। ऑल इंडिया मुस्लिम त्योहार कमेटी ने इस फैसले का विरोध करते हुए अब सीधे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन के मुख्य संरक्षक शमशुल हसन ने कहा कि वक्फ बोर्ड में दो गैर मुस्लिम सदस्यों को शामिल किए जाने से मुस्लिम समाज की भावनाएं आहत हुई हैं। इसी को लेकर दोनों संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं को पत्र भेजकर मौजूदा आदेश को वापस लेने और बोर्ड का नए सिरे से पुनर्गठन करने की मांग की गई है।

    शमशुल हसन ने कहा कि संगठन को वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष सनव्वर पटेल या अन्य मुस्लिम सदस्यों के कामकाज पर कोई आपत्ति नहीं है। उनका विरोध केवल उन दो गैर मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति को लेकर है जिन्हें बोर्ड में शामिल किया गया है। उनका कहना है कि वक्फ इस्लाम से जुड़ी धार्मिक और सामाजिक संस्था है इसलिए इसके संचालन और प्रबंधन में मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों की ही भागीदारी होनी चाहिए।

    उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र में यह भी आग्रह किया गया है कि वर्तमान वक्फ बोर्ड को भंग कर समाज की भावनाओं के अनुरूप नए बोर्ड का गठन किया जाए। उनका विश्वास है कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोग इस विषय की संवेदनशीलता को समझते हुए उचित निर्णय लेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि अतीत में भी जनभावनाओं को देखते हुए कई महत्वपूर्ण फैसलों पर पुनर्विचार किया गया है इसलिए इस मामले में भी सरकार सकारात्मक कदम उठा सकती है।

    इस मुद्दे पर शमशुल हसन ने उन उलेमाओं और मुस्लिम धर्मगुरुओं पर भी अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठाए जिन्होंने नए वक्फ बोर्ड और उसके अध्यक्ष का स्वागत किया है। उनका कहना है कि धार्मिक नेतृत्व को समाज की भावनाओं के साथ खड़ा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुरान और हदीस की शिक्षाओं से परिचित होने के बावजूद यदि कोई ऐसे फैसलों का समर्थन करता है तो इससे समाज में नाराजगी बढ़ती है। उन्होंने धार्मिक नेतृत्व से अपने रुख पर पुनर्विचार करने की अपील भी की।

    शमशुल हसन ने कहा कि इतिहास में मुस्लिम उलेमाओं ने समाज और धार्मिक संस्थाओं की रक्षा के लिए कई संघर्ष किए हैं। आज भी धार्मिक नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल बयान देने तक सीमित नहीं है बल्कि समुदाय के अधिकारों और धार्मिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने की भी है। उन्होंने कहा कि जो लोग इस मुद्दे पर चुप हैं या समर्थन कर रहे हैं उन्हें इतिहास से सीख लेते हुए समाज के हित में आवाज उठानी चाहिए।

    संगठन का दावा है कि केवल मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि देश के कई हिस्सों में मुस्लिम समाज इस फैसले से असंतुष्ट है। उनका कहना है कि यह विरोध किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं बल्कि एक ऐसे निर्णय के विरोध में है जिसे समुदाय अपनी धार्मिक व्यवस्था में हस्तक्षेप के रूप में देख रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि सरकार ने इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं किया तो संगठन लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों से अपना आंदोलन आगे भी जारी रखेगा।

    गौरतलब है कि मध्यप्रदेश सरकार ने हाल ही में वक्फ बोर्ड का पुनर्गठन करते हुए पहली बार दो गैर मुस्लिम सदस्यों को बोर्ड में शामिल किया है। इसी फैसले के बाद विभिन्न मुस्लिम संगठनों की ओर से विरोध प्रदर्शन और ज्ञापन देने का सिलसिला लगातार जारी है।

  • मध्य प्रदेश बना पहला राज्य जहां वक्फ बोर्ड में शामिल हुए 2 हिंदू सदस्य, जानिए किन्हें मिली जिम्मेदारी?

    मध्य प्रदेश बना पहला राज्य जहां वक्फ बोर्ड में शामिल हुए 2 हिंदू सदस्य, जानिए किन्हें मिली जिम्मेदारी?


    भोपाल। मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम-2025 के तहत राज्य वक्फ बोर्ड का पुनर्गठन करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। इस नए गठन में दो हिंदू सदस्यों को भी शामिल किया गया है। इसके साथ ही मध्य प्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जहां वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम यानी हिंदू प्रतिनिधियों को जगह दी गई है। इस संबंध में आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना भी जारी कर दी गई है।

    बोर्ड में दो हिंदू सदस्य शामिल
    अधिकारियों के अनुसार, राज्य सरकार ने रविवार को 10 सदस्यीय मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड का पुनर्गठन किया। इसमें मनोज मालपानी और अनिमेश भार्गव को हिंदू सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। बोर्ड का अध्यक्ष सनवर पटेल को नियुक्त किया गया है। नए प्रावधानों के तहत गठित यह वक्फ बोर्ड देश का पहला राज्य स्तरीय बोर्ड बन गया है जिसमें हिंदू सदस्यों को औपचारिक रूप से शामिल किया गया है।

    अधिनियम के तहत हुआ पुनर्गठन
    यह पुनर्गठन वक्फ अधिनियम-1995 (संशोधित 2025) की धारा 13(1) में दिए गए प्रावधानों के तहत किया गया है। सरकार ने धारा 14 के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए यह नई संरचना लागू की है।

    क्या होता है वक्फ बोर्ड?
    वक्फ बोर्ड एक वैधानिक संस्था है, जो राज्य में मौजूद वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और संरक्षण का कार्य करती है। इसका मुख्य उद्देश्य इन संपत्तियों का रिकॉर्ड तैयार करना, उनकी निगरानी करना और यह सुनिश्चित करना है कि उनका उपयोग धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक कल्याण के कार्यों में हो। साथ ही यह संस्था वक्फ संपत्तियों को अवैध कब्जों से बचाने का भी काम करती है।

    शिवपुरी में रक्षा क्षेत्र को बढ़ावा
    इसी बीच मुख्यमंत्री मोहन यादव ने शिवपुरी में एक रक्षा निर्माण इकाई का शिलान्यास भी किया। उन्होंने कहा कि अब मध्य प्रदेश में बनी मिसाइलें दुश्मनों को जवाब देने में सक्षम होंगी। यह परियोजना अडाणी समूह की सहायक कंपनी अडाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस द्वारा विकसित की जा रही है। करीब 2,500 करोड़ रुपये की लागत वाली इस यूनिट से लगभग 5,000 लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी उपस्थित रहे।

  • महाकाल मंदिर विस्तार के लिए भूमि अधिग्रहण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला तकिया मस्जिद की याचिका खारिज

    उज्जैन । सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उज्जैन के महाकाल मंदिर परिसर के विस्तार महाकाल लोक फेज-2के लिए तकिया मस्जिद की भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता मोहम्मद तैय्यब भूमि का मालिक नहीं है बल्कि केवल उपासक भक्तहै इसलिए उसे भूमि अधिग्रहण पर सवाल उठाने का कानूनी अधिकार नहीं है। यह फैसला न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सुनाया।

    याचिका में यह दावा किया गया था कि 1985 से यह भूमि मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड की संपत्ति है और अधिग्रहण के समय उचित मुआवजा पुनर्वास और सामाजिक प्रभाव आकलन की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। याचिकाकर्ता ने कहा कि महाकाल मंदिर के विस्तार के लिए भूमि का अधिग्रहण सार्वजनिक उद्देश्य के अंतर्गत नहीं आता और इससे संविधान के अनुच्छेद 14 25 26 और 300-A का उल्लंघन होता है।

    हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में पहले से वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध थे और याचिकाकर्ता केवल मुआवजे की आपत्ति ही उठा सकता था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह भूमि अधिग्रहण की वैधता पर विचार नहीं करेगा क्योंकि याचिकाकर्ता भूमि का मालिक नहीं है।

    इससे पहले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी महाकाल लोक फेज-2 परियोजना से जुड़ी मुआवजे को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दी थीं। हाई कोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता न तो भू-स्वामी हैं और न ही टाइटल होल्डर इसलिए वे केवल मुआवजे के संदर्भ में सवाल उठा सकते हैं। इस फैसले से महाकाल लोक फेज-2 परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण को कानूनी मंजूरी मिल गई है। यह परियोजना महाकाल मंदिर परिसर के विस्तार और सार्वजनिक स्थलों के पुनर्विकास का हिस्सा है जिसे बड़ी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्वता प्राप्त है।