Tag: Water Dispute

  • देवास में शिप्रा बैराज पानी विवाद गरमाया: कांग्रेस ने उठाया मुद्दा, सांसद-विधायक ने दिया आश्वासन

    देवास में शिप्रा बैराज पानी विवाद गरमाया: कांग्रेस ने उठाया मुद्दा, सांसद-विधायक ने दिया आश्वासन


    मध्‍य प्रदेश । देवास में शिप्रा बैराज से नर्मदा जल आपूर्ति और उससे जुड़े वितरण को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि देवास के हिस्से का पानी मांगलिया क्षेत्र को दिया जा रहा है, जबकि भाजपा पक्ष इन आरोपों को सिरे से खारिज कर रहा है। इस मुद्दे ने अब शहर की सियासत को पूरी तरह गर्मा दिया है।

    गुरुवार को कांग्रेस नेता प्रदीप चौधरी ने इस मामले को लेकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की, जिसमें उन्होंने सरकार और स्थानीय प्रशासन पर गंभीर सवाल उठाए। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने सीधे फोन पर सांसद महेंद्र सिंह सोलंकी और विधायक गायत्री राजे पवार से बात की और देवास के जल अधिकारों की सुरक्षा की मांग रखी।

    फोन पर हुई बातचीत के दौरान कांग्रेस नेता ने सांसद से कहा कि देवास के नागरिकों के हितों की रक्षा की जाए और उनके हिस्से का पानी किसी अन्य क्षेत्र को न दिया जाए। इस पर सांसद महेंद्र सिंह सोलंकी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह भी इस मुद्दे पर संवेदनशील हैं और देवास की जनता के साथ खड़े हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि संबंधित अधिकारियों से बातचीत कर उचित समाधान सुनिश्चित किया जाएगा। सांसद ने यह भी कहा कि वे 24 घंटे जनता की सेवा के लिए उपलब्ध हैं।

    इसके बाद कांग्रेस नेता ने विधायक गायत्री राजे पवार से भी फोन पर संपर्क किया। विधायक ने स्पष्ट रूप से कहा कि देवास के हिस्से के पानी में किसी प्रकार की कटौती या अन्य क्षेत्र को स्थानांतरण नहीं किया जाएगा। उन्होंने आश्वासन दिया कि जनता के हितों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।

    कांग्रेस की ओर से लगातार इस मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। बीते कुछ दिनों में ज्ञापन, धरना और जनप्रतिनिधियों से मुलाकात के माध्यम से पार्टी ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। अब यह मामला सीधे जनप्रतिनिधियों तक पहुंचने के बाद और अधिक राजनीतिक महत्व प्राप्त कर चुका है।

    शिप्रा बैराज से नर्मदा जल की आपूर्ति देवास शहर के लिए की जाती है, लेकिन कांग्रेस का दावा है कि मांगलिया क्षेत्र को भी इसी स्रोत से पानी दिया जा रहा है। वहीं भाजपा और स्थानीय प्रतिनिधियों का कहना है कि मांगलिया को पानी एनवीडीए के माध्यम से अलग व्यवस्था के तहत उपलब्ध कराया जा रहा है और देवास के हिस्से में कोई कटौती नहीं की गई है।

    इस पूरे विवाद के बीच अब देखना होगा कि प्रशासनिक स्तर पर क्या स्पष्ट निर्णय सामने आता है और दोनों पक्षों के बीच चल रहा यह राजनीतिक तनाव किस दिशा में आगे बढ़ता है।

  • गंगा जल संधि पर तनाव बढ़ा, बांग्लादेश ने भारत से नए समझौते की मांग की 30 साल पुराना फॉर्मूला बताया नाकाफी

    गंगा जल संधि पर तनाव बढ़ा, बांग्लादेश ने भारत से नए समझौते की मांग की 30 साल पुराना फॉर्मूला बताया नाकाफी



    नई दिल्ली। भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे को लेकर एक बार फिर तनाव के संकेत दिखने लगे हैं। बांग्लादेश की BNP सरकार से जुड़े वरिष्ठ नेताओं ने कहा है कि आने वाले समय में दोनों देशों के संबंध गंगा जल संधि के नवीनीकरण और उसकी शर्तों पर काफी हद तक निर्भर करेंगे।

    बांग्लादेशी नेताओं ने आरोप लगाया है कि पिछले तीन दशकों में जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण गंगा नदी के प्रवाह में बड़ा बदलाव आया है, जिससे 1996 का पुराना जल बंटवारा फॉर्मूला अब दोनों देशों की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहा है।

    मिर्ज़ा फखरुल इस्लाम आलमगीर सहित कई नेताओं ने कहा कि गंगा जल संधि को और अधिक गारंटीड और लंबे समय के लिए लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत द्वारा साझा नदियों पर बनाए गए ढांचों से बांग्लादेश के जल प्रवाह पर असर पड़ा है, जिससे कृषि और पर्यावरण प्रभावित हो रहा है।

    1996 में हुआ था ऐतिहासिक समझौता
    गौरतलब है कि भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल संधि 12 दिसंबर 1996 को 30 वर्षों के लिए लागू की गई थी, जो 2026 में समाप्त होने वाली है। इस संधि के तहत फरक्का बैराज पर उपलब्ध जल को 10-10 दिनों के चक्र में दोनों देशों के बीच बांटा जाता है।

    समझौते के अनुसार पानी की उपलब्धता के आधार पर अलग-अलग फॉर्मूला लागू होता है—

    70,000 क्यूसेक से कम पानी पर बराबर बंटवारा

    70,000–75,000 क्यूसेक पर तय अनुपात

    75,000 क्यूसेक से अधिक पर अलग वितरण व्यवस्था

    दोनों देशों के बीच पानी के प्रवाह की निगरानी के लिए संयुक्त नदी आयोग (Joint Rivers Commission) भी काम करता है।

    भारत पर भी बढ़ी घरेलू मांग की चुनौती
    वहीं भारत की ओर से भी यह स्पष्ट किया जाता रहा है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए पानी की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में किसी भी नए समझौते को संतुलित और सभी पक्षों के हितों को ध्यान में रखकर ही तय किया जा सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण नदी प्रवाह में बदलाव ने इस समझौते को और जटिल बना दिया है। यही वजह है कि 2026 में संधि खत्म होने से पहले दोनों देशों के बीच नई बातचीत बेहद अहम मानी जा रही है।

    फिलहाल स्थिति यह है कि बांग्लादेश अधिक जल गारंटी की मांग कर रहा है, जबकि भारत संतुलित और व्यावहारिक समाधान पर जोर दे रहा है। आने वाले महीनों में यह मुद्दा दोनों देशों के रिश्तों में बड़ा कूटनीतिक विषय बन सकता है।

  • तीस्ता जल विवाद में बड़ा भू-राजनीतिक ट्विस्ट: चीन की एंट्री से बदला पूरा समीकरण, भारत की टेंशन बढ़ी

    तीस्ता जल विवाद में बड़ा भू-राजनीतिक ट्विस्ट: चीन की एंट्री से बदला पूरा समीकरण, भारत की टेंशन बढ़ी


    नई दिल्ली। बांग्लादेश में तीस्ता नदी परियोजना को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। ढाका में विदेश मंत्रालय के एक बयान के बाद यह चर्चा और बढ़ गई है कि भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से अटका तीस्ता जल-बंटवारा विवाद अब नए राजनीतिक हालात में आगे बढ़ सकता है।

    बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने उम्मीद जताई है कि भारत के साथ तीस्ता समझौते पर जल्द प्रगति हो सकती है। उन्होंने कहा कि पहले यह मुद्दा भारत के अंदर राज्यों की राजनीतिक स्थिति के कारण अटका हुआ था, लेकिन अब हालात बदलने से बातचीत आगे बढ़ने की संभावना है। उनके बयान के बाद इस मुद्दे ने एक बार फिर सुर्खियां पकड़ ली हैं।

    तीस्ता नदी, जो सिक्किम से निकलकर पश्चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है, दोनों देशों के लिए कृषि और सिंचाई का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। वर्षों से इसके पानी के बंटवारे को लेकर भारत और बांग्लादेश के बीच कोई स्थायी समझौता नहीं हो पाया है, जिससे यह मुद्दा संवेदनशील बना हुआ है।

    इसी बीच चीन की भूमिका भी लगातार चर्चा में है। बांग्लादेश ने तीस्ता नदी पर एक बड़े जलाशय और बांध परियोजना की योजना बनाई है, जिसके लिए चीन ने वित्तीय और तकनीकी सहायता देने की पेशकश की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन की एक्सिम बैंक इस परियोजना को फंड कर सकती है। इससे इस परियोजना का भू-राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है।

    भारत के लिए यह मामला सिर्फ जल प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि सुरक्षा के नजरिए से भी अहम है। जिस क्षेत्र में यह परियोजना प्रस्तावित है, वह भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बेहद करीब है, जिसे “चिकन नेक” कहा जाता है। यह संकरा गलियारा भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस क्षेत्र में किसी बाहरी शक्ति, खासकर चीन की भागीदारी बढ़ती है, तो यह भारत की सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा सकता है। इसी वजह से भारत इस पूरे घटनाक्रम पर बारीकी से नजर बनाए हुए है।

    फिलहाल स्थिति यह है कि तीस्ता विवाद पर भारत और बांग्लादेश के बीच बातचीत की संभावना बनी हुई है, लेकिन चीन की बढ़ती रुचि ने इस मुद्दे को केवल जल बंटवारे से आगे बढ़ाकर एक बड़े भू-राजनीतिक सवाल में बदल दिया है।

  • भारत-पाक सिंधु जल विवाद फिर गरमाया: जरदारी की धमकी, भारत के रुख से बढ़ा तनाव

    भारत-पाक सिंधु जल विवाद फिर गरमाया: जरदारी की धमकी, भारत के रुख से बढ़ा तनाव



    नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे सिंधु जल संधि (IWT) विवाद ने एक बार फिर राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने भारत को सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि उनका देश अपने जल अधिकारों की “हर कीमत पर रक्षा करेगा।” भारत द्वारा संधि को निलंबित करने के बाद यह बयानबाजी और तेज हो गई है।

    जरदारी का बयान: “पानी पर सौदेबाजी नहीं होगी”
    इस्लामाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान जरदारी ने भारत पर संधि का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि पानी किसी भी देश के लिए “सौदेबाजी का हथियार नहीं” हो सकता।

    जरदारी ने दावा किया, भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित कर गैरकानूनी कदम उठाया है। पाकिस्तान अपने जल अधिकारों की रक्षा पूरी मजबूती से करेगा।उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला पाकिस्तान की लाखों आबादी के जीवन से जुड़ा है, इसलिए किसी भी स्थिति में समझौता नहीं किया जाएगा।

    भारत का रुख: पहलगाम हमले के बाद कड़ा कदम
    भारत ने अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ कई सख्त कदम उठाए थे, जिनमें सिंधु जल संधि को आंशिक रूप से निलंबित करना भी शामिल था।

    इसके बाद भारत ने सीमापार आतंकी ढांचों पर कार्रवाई करते हुए “ऑपरेशन सिंदूर” के तहत कई ठिकानों को निशाना बनाया। तभी से दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बना हुआ है।

    सिंधु जल संधि क्या है?
    यह समझौता 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुआ था।

    इसके तहत पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, झेलम, चिनाब) पाकिस्तान को पूर्वी नदियाँ (रावी, ब्यास, सतलुज) भारत को दी गईं। दशकों तक यह समझौता स्थिर रहा, लेकिन हाल के वर्षों में राजनीतिक और सुरक्षा तनाव के कारण यह विवादों में आ गया है।

    पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय रणनीति
    पाकिस्तान इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाने की कोशिश कर रहा है। हाल ही में इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भी उठाया गया है। पाकिस्तान का दावा है कि भारत का जल नीति निर्णय उसकी खाद्य सुरक्षा और कृषि व्यवस्था पर गंभीर असर डाल सकता है।

    बढ़ता तनाव और क्षेत्रीय असर
    दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ा

    सीमापार बयानबाजी तेज हुई

    जल संसाधनों को लेकर राजनीतिक दबाव बढ़ा

    अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें फिर इस मुद्दे पर टिकीं

    सिंधु जल संधि अब केवल जल बंटवारे का समझौता नहीं, बल्कि भारत-पाक रिश्तों का एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। पाकिस्तान की धमकी भरी बयानबाजी और भारत के सख्त रुख ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। आने वाले समय में यह विवाद कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर और तेज होने की संभावना है।

  • इंदौर पानी विवाद: हाईकोर्ट ने MP सरकार को घेरा, मौतों के आंकड़ों पर उठाए सवाल

    इंदौर पानी विवाद: हाईकोर्ट ने MP सरकार को घेरा, मौतों के आंकड़ों पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली। इंदौर में दूषित पेयजल से हो रही मौतों ने अब न्यायपालिका का ध्यान खींच लिया है। इस गंभीर मामले को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में अहम सुनवाई हुई, जहां कुल 5 जनहित याचिकाओं पर एक साथ विचार किया गया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठाते हुए सख्त रुख अपनाया।

    मौतों के आंकड़ों पर HC की नाराजगी
    पिछली सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में एक स्टेटस रिपोर्ट पेश की गई थी, जिसमें दूषित पानी से सिर्फ 4 मौतों की जानकारी दी गई। जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। कोर्ट के संज्ञान में आया कि इस मामले में अब तक 17 लोगों की मौत हो चुकी है। इस विरोधाभास को लेकर हाई कोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई और रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए। कोर्ट ने कहा कि इतने गंभीर मामले में गलत आंकड़े पेश करना बेहद चिंताजनक है।

    पूरे प्रदेश के पानी पर उठे सवाल
    हाई कोर्ट ने सिर्फ इंदौर ही नहीं, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के पीने के पानी की गुणवत्ता पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि अगर लोगों को मिलने वाला पानी ही दूषित है, तो यह बेहद गंभीर स्थिति है। यह समस्या केवल एक इलाके तक सीमित नहीं मानी जा सकती।

    मुख्य सचिव को वर्चुअली पेश होने का आदेश
    मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को वर्चुअली पेश होने के निर्देश दिए हैं। अगली सुनवाई की तारीख 15 जनवरी तय की गई है। कोर्ट ने साफ किया कि वह इस मामले में किसी और अधिकारी की नहीं, बल्कि सीधे मुख्य सचिव की बात सुनना चाहता है।

    कोरोना की तरह मांगा मेडिकल बुलेटिन
    कोर्ट ने प्रशासन को निर्देश दिया कि जिस तरह कोरोना महामारी के दौरान रोजाना मेडिकल बुलेटिन जारी किया जाता था, उसी तरह दूषित पानी से फैली बीमारी और मौतों का भी नियमित अपडेट दिया जाए।

    अब तक 17 मौतें, 110 मरीज भर्ती
    स्वास्थ्य विभाग के अनुसार दूषित पानी से अब तक 421 लोग बीमार हुए, जिनमें से 311 मरीज डिस्चार्ज हो चुके हैं। फिलहाल 110 मरीज अस्पताल में भर्ती हैं, जबकि 15 मरीज आईसीयू में इलाजरत हैं।

    15 जनवरी की सुनवाई पर टिकी निगाहें
    अब पूरे प्रदेश की नजरें 15 जनवरी की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह साफ होगा कि सरकार इस गंभीर लापरवाही पर क्या जवाब देती है और आगे क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं

  • बांग्लादेश संकट के बीच पाकिस्तान की गीदड़भभकी, इशाक डार बोले– पानी रोकना युद्ध की कार्रवाई के बराबर

    बांग्लादेश संकट के बीच पाकिस्तान की गीदड़भभकी, इशाक डार बोले– पानी रोकना युद्ध की कार्रवाई के बराबर


    नई दिल्ली
    /इस्लामाबाद:बांग्लादेश में जारी राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल के बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर भारत के खिलाफ तीखे बयान देकर माहौल गरमाने की कोशिश की है। पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने भारत पर सिंधु जल संधि के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए कहा है कि यदि पानी की आपूर्ति रोकी जाती है तो इसे युद्ध की कार्रवाई के तौर पर देखा जाएगा।इशाक डार ने यह बयान शुक्रवार 19 दिसंबर को मीडिया से बातचीत के दौरान दिया। यह बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान ने चिनाब नदी के जल प्रवाह में बदलाव को लेकर भारत से औपचारिक रूप से स्पष्टीकरण मांगा है।

    भारत संधि को कमजोर कर रहा है

    डार ने आरोप लगाया कि भारत लगातार 1960 की सिंधु जल संधि को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहाहमने इस साल अप्रैल में भारत की ओर से संधि से एकतरफा हटने जैसे कदम देखे लेकिन अब जो हो रहा है वह समझौते के मूल सिद्धांतों पर सीधा हमला है। इसका असर न सिर्फ क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ेगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून की विश्वसनीयता भी खतरे में पड़ जाएगी।
    पाकिस्तानी उप प्रधानमंत्री का कहना था कि भारत की ये कार्रवाइयां केवल तकनीकी मुद्दा नहीं हैं बल्कि इसके गंभीर रणनीतिक और मानवीय परिणाम हो सकते हैं।

    पहलगाम हमले के बाद बदले हालात

    गौरतलब है कि 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के एक दिन बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई कड़े और दंडात्मक कदम उठाए थे। इन्हीं में से एक कदम था सिंधु जल संधि को स्थगित करना।यह संधि विश्व बैंक की मध्यस्थता में 1960 में हुई थी जो भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के जल बंटवारे को नियंत्रित करती है। दशकों से यह संधि दोनों देशों के बीच तनाव के बावजूद कायम रही है लेकिन हालिया घटनाओं ने इसे फिर विवाद के केंद्र में ला दिया है।

    कृषि और आजीविका पर खतरे का दावा

    इशाक डार ने दावा किया कि भारत द्वारा किए जा रहे कथित जल प्रवाह में हेरफेर के कारण पाकिस्तान के सिंधु आयुक्त को अपने भारतीय समकक्ष को पत्र लिखकर जवाब मांगना पड़ा है।उन्होंने कहा कि कृषि चक्र के अहम समय में पानी के प्रवाह में बदलाव पाकिस्तान के किसानों खाद्य सुरक्षा और आम नागरिकों की आजीविका के लिए सीधा खतरा है।डार के मुताबिक सिंधु बेसिन पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और उसमें किसी भी तरह का असंतुलन गंभीर संकट पैदा कर सकता है।

    बाढ़ और सूखे का खतरा

    पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि भारत ने संधि के तहत जरूरी जल विज्ञान संबंधी डेटा साझा करना पूर्व सूचना देना और संयुक्त निगरानी तंत्र को लगभग बंद कर दिया है।उनका कहना है कि इससे पाकिस्तान को अचानक बाढ़ या लंबे सूखे जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।इशाक डार ने चेतावनी भरे लहजे में कहापानी की आपूर्ति को हथियार बनाना अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है और इसे युद्ध की कार्रवाई माना जाएगा।

    चिनाब में पानी छोड़े जाने से बढ़ा विवाद

    पाकिस्तान की नाराजगी की एक बड़ी वजह यह भी बताई जा रही है कि भारत ने हाल ही में बिना पूर्व सूचना के चिनाब नदी में पानी छोड़ा जिससे पाकिस्तान में बाढ़ जैसे हालात की आशंका पैदा हो गई। इस कदम के बाद इस्लामाबाद में राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई।
    विश्लेषकों का मानना है कि आंतरिक और क्षेत्रीय दबावों के बीच पाकिस्तान एक बार फिर जल मुद्दे को कूटनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है। भारत की ओर से फिलहाल इस बयान पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।