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  • मंत्री तुलसी सिलावट ने डॉ. ए.के. द्विवेदी के सुझावों को सराहा, अधिकारियों को दिए त्वरित कार्रवाई के निर्देश

    मंत्री तुलसी सिलावट ने डॉ. ए.के. द्विवेदी के सुझावों को सराहा, अधिकारियों को दिए त्वरित कार्रवाई के निर्देश

    मध्य प्रदेश में जल संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। प्रदेश के जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट ने वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक, शिक्षाविद एवं देवी अहिल्या विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद के सदस्य डॉ. ए.के. द्विवेदी द्वारा प्रस्तुत जल संरक्षण संबंधी सुझावों की सराहना करते हुए विभागीय अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। मंत्री ने कहा कि जल संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप देना वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है और इस दिशा में किए गए प्रयास भविष्य की पीढ़ियों के लिए उपयोगी साबित होंगे।

    डॉ. ए.के. द्विवेदी ने मंत्री से मुलाकात के दौरान प्रदेश के सभी शासकीय एवं निजी विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में प्रतिवर्ष “जल ही जीवन है” विषय पर व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाने का प्रस्ताव सौंपा। उनका मानना है कि यदि विद्यार्थियों को प्रारंभिक स्तर से ही जल संरक्षण के प्रति जागरूक किया जाए, तो समाज में पानी के प्रति जिम्मेदारी की भावना मजबूत होगी और भविष्य में जल संकट की चुनौतियों का बेहतर तरीके से सामना किया जा सकेगा।

    प्रस्ताव में यह भी उल्लेख किया गया कि इस विषय को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय के सीपीग्राम्स पोर्टल के माध्यम से भी सुझाव भेजे गए थे। इसके बाद संबंधित विभाग द्वारा आवश्यक प्रक्रिया प्रारंभ करते हुए अधिकारियों को मामले पर कार्रवाई के लिए निर्देशित किया गया। इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए मंत्री सिलावट ने विभागीय अधिकारियों से कहा कि प्रस्ताव का सकारात्मक परीक्षण करते हुए प्रमुख सचिव को आवश्यक अनुशंसा शीघ्र भेजी जाए, ताकि इसे प्रभावी रूप से लागू करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए जा सकें।

    डॉ. द्विवेदी ने अपने प्रस्ताव में प्रदेश के सभी शिक्षण संस्थानों को “वॉटर कंजर्वेशन कैंपस” के रूप में विकसित करने की अवधारणा भी प्रस्तुत की है। इसके तहत परिसरों में वर्षा जल संचयन व्यवस्था को बढ़ावा देने, भूजल संवर्धन के उपाय लागू करने तथा जल संरक्षण को व्यवहारिक शिक्षा का हिस्सा बनाने का सुझाव दिया गया है। उनका मानना है कि जब विद्यार्थी स्वयं इन गतिविधियों से जुड़ेंगे, तो समाज में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा।

    प्रस्ताव के अनुसार विद्यार्थियों में जल संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए विभिन्न शैक्षणिक और सामाजिक गतिविधियों का आयोजन किया जा सकता है। इनमें निबंध लेखन, भाषण, वाद-विवाद, पोस्टर एवं चित्रकला प्रतियोगिताएं, स्लोगन लेखन, जन-जागरूकता रैलियां तथा जल संरक्षण की शपथ जैसे कार्यक्रम शामिल किए जाने का सुझाव दिया गया है। इन गतिविधियों का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल सैद्धांतिक जानकारी देना नहीं, बल्कि उन्हें व्यवहारिक रूप से जल बचाने के लिए प्रेरित करना है।

    मंत्री तुलसी सिलावट ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि इसमें समाज की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यदि शिक्षण संस्थानों के माध्यम से व्यापक जन-जागरूकता अभियान संचालित किए जाते हैं, तो जल संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप दिया जा सकता है। इससे जल संसाधनों के संरक्षण के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भाव भी विकसित होगा।

    डॉ. ए.के. द्विवेदी ने उम्मीद जताई कि यदि उनके सुझावों पर प्रभावी अमल होता है, तो मध्य प्रदेश जल संरक्षण के क्षेत्र में देश के लिए एक प्रेरणादायक मॉडल बन सकता है। उनका मानना है कि विद्यार्थियों में जल बचाने के संस्कार विकसित करना भविष्य की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों का स्थायी समाधान साबित हो सकता है।

  • जहां हर मिनट फूटता था 25 हजार लीटर पानी, वहीं बनी देश की सबसे लंबी जल सुरंग, सीएम मोहन यादव ने किया ड्रीम प्रोजेक्ट का निरीक्षण

    जहां हर मिनट फूटता था 25 हजार लीटर पानी, वहीं बनी देश की सबसे लंबी जल सुरंग, सीएम मोहन यादव ने किया ड्रीम प्रोजेक्ट का निरीक्षण

    मध्य प्रदेश के कटनी जिले में लगभग तैयार हो चुकी स्लीमनाबाद जल सुरंग राज्य की सबसे महत्वाकांक्षी सिंचाई परियोजनाओं में शामिल हो गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शुक्रवार को इस परियोजना का निरीक्षण करते हुए इसे प्रदेश के किसानों और विंध्य-महाकौशल क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। करीब 17 वर्षों के लंबे निर्माण कार्य के बाद अंतिम चरण में पहुंची यह परियोजना नर्मदा के पानी को गुरुत्वाकर्षण के आधार पर सोन नदी क्षेत्र तक पहुंचाएगी, जिससे हजारों किसानों को स्थायी सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी।

    करीब 11.95 किलोमीटर लंबी यह जल सुरंग देश की सबसे लंबी जल सुरंगों में गिनी जा रही है। इसके माध्यम से जबलपुर, कटनी, मैहर, सतना, रीवा और पन्ना सहित छह जिलों के लगभग 1450 गांवों की करीब 2.45 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई का लाभ मिलेगा। सरकार का मानना है कि इस परियोजना के शुरू होने से विंध्य और महाकौशल क्षेत्र में कृषि उत्पादन बढ़ेगा, किसानों की आय में सुधार होगा और जल संकट से प्रभावित इलाकों को स्थायी राहत मिलेगी।

    मुख्यमंत्री ने बताया कि परियोजना का निर्माण आसान नहीं था। शुरुआती वर्षों में कार्य अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सका, लेकिन बाद में आधुनिक तकनीक और विदेशी मशीनों की मदद से खुदाई का काम तेज किया गया। कठिन भूगर्भीय परिस्थितियों, कठोर चट्टानों, भूमिगत गुफाओं और लगातार हो रहे जल रिसाव के बीच इंजीनियरों तथा तकनीकी विशेषज्ञों ने सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए कार्य को आगे बढ़ाया। कई स्थानों पर सुरंग जमीन की सतह से लगभग 120 फीट नीचे बनाई गई है।

    निर्माण के दौरान सबसे बड़ी चुनौती प्रति मिनट लगभग 25 हजार लीटर तक भूमिगत पानी का तेज प्रवाह था। इसके कारण सुरंग के भीतर लगातार जलभराव और मिट्टी धंसने जैसी परिस्थितियां पैदा होती रहीं। प्रारंभिक मशीनों को भी नुकसान पहुंचा, जिसके बाद अत्याधुनिक जर्मन तकनीक और विशेष ग्राउटिंग पद्धति का उपयोग किया गया। इन तकनीकी उपायों की मदद से निर्माण कार्य को सुरक्षित ढंग से पूरा किया गया। सुरंग राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे ट्रैक और घनी आबादी वाले क्षेत्रों के नीचे से गुजरती है, लेकिन निर्माण के दौरान किसी बड़े नुकसान की सूचना नहीं मिली।

    परियोजना की अनुमानित लागत समय के साथ बढ़ती गई। वर्ष 2008 में शुरू हुई इस योजना की शुरुआती लागत लगभग 799 करोड़ रुपये थी, जो तकनीकी चुनौतियों और अतिरिक्त निर्माण कार्यों के कारण बढ़कर 1600 करोड़ रुपये से अधिक हो गई। अधिकारियों के अनुसार परियोजना का अधिकांश कार्य पूरा हो चुका है और इससे जुड़ी नहरों का निर्माण भी लगभग समाप्ति पर है। आने वाले महीनों में चरणबद्ध तरीके से सिंचाई नेटवर्क को पूरी तरह क्रियाशील किया जाएगा।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि यह परियोजना केवल सिंचाई तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि क्षेत्र में पेयजल उपलब्धता, कृषि उत्पादन, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति देगी। उन्होंने विश्वास जताया कि परियोजना के पूर्ण रूप से शुरू होने के बाद विंध्य और महाकौशल क्षेत्र की कृषि व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन देखने को मिलेगा। सरकार का लक्ष्य आगामी चरणों में सिंचाई क्षमता का लगातार विस्तार करते हुए अधिक से अधिक किसानों तक इसका लाभ पहुंचाना है, जिससे प्रदेश का कृषि विकास और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों मजबूत हो सकें।