Tag: West Asia crisis

  • पश्चिम एशिया संकट के बीच इथेनॉल ब्लेंडिंग बनी सुरक्षा कवच, ग्राहकों के बचे 30 रुपये प्रति लीटर

    पश्चिम एशिया संकट के बीच इथेनॉल ब्लेंडिंग बनी सुरक्षा कवच, ग्राहकों के बचे 30 रुपये प्रति लीटर


    नई दिल्ली।
    केंद्र सरकार ने इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर बड़ा दावा किया है। सरकार का कहना है कि अगर पेट्रोल में इथेनॉल नहीं मिलाया जाता, तो हाल के पश्चिम एशिया संकट के दौरान देश में पेट्रोल की कीमत 125 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती थी लेकिन इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की वजह से ग्राहकों को बड़ी राहत मिली और उन्हें करीब 30 रुपये प्रति लीटर तक की बचत हुई है।

    पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने शुक्रवार को जारी एक बयान में बताया कि पेट्रोल में ईथेनॉल का मिश्रण सिर्फ ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने में मदद नहीं कर रहा, बल्कि इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत हो रही है। मंत्रालय ने कहा कि पेट्रोल में इथेनॉल को मिलाने (ब्लेंडिंग) से दिल्ली के उपभोक्ताओं को प्रति लीटर लगभग 30 रुपये की बचत हुई है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने पर बिना इथेनॉल के दिल्ली में पेट्रोल 125 रुपये प्रति लीटर हो सकता था, जो इस मिश्रण के कारण 94.77 रुपये प्रति लीटर मिला।

    पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम ने कई मोर्चों पर फायदा पहुंचाया है। इससे जहां एक ओर कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम हुई है। वहीं, किसानों और डिस्टिलरी उद्योग को आर्थिक लाभ मिला है। मंत्रालय के अनुसार यह योजना खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और देश की ऊर्जा जरूरतों के बीच संतुलन बनाने का काम कर रही है।

    सरकार ने साफ किया है कि इथेनॉल बनाने के लिए केवल वही अनाज इस्तेमाल किया जाता है, जो खाद्य सुरक्षा की जरूरतें पूरी होने के बाद अतिरिक्त बचता है। सरकार ने ये साफ किया है कि ई20 पेट्रोल से पुरानी या नई गाड़ियों के इंजन को नुकसान पहुंचने की बातें साबित नहीं हुई हैं।

  • पश्चिम एशिया संकट पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश ने पीएम मोदी की चुप्पी पर उठाए सवाल

    पश्चिम एशिया संकट पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश ने पीएम मोदी की चुप्पी पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी तनाव और लेबनान में इजराइली सैन्य कार्रवाई को लेकर भारत की विदेश नीति पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा कि मौजूदा वैश्विक घटनाक्रमों पर भारत का स्पष्ट रुख सामने आना चाहिए, क्योंकि ये सीधे तौर पर देश की आर्थिक और रणनीतिक हितों को प्रभावित करते हैं।

    जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत पश्चिम एशिया में संभावित शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उनके अनुसार, यदि दोनों देशों के बीच किसी प्रकार का समझौता होता है तो होर्मुज स्ट्रेट के संचालन में स्थिरता आएगी, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति सामान्य होगी और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत जैसे ऊर्जा-आधारित आयातक देश के लिए यह स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है।

    कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि इस कूटनीतिक प्रक्रिया में सबसे बड़ी बाधा लेबनान में इजराइल की सैन्य कार्रवाई है। उन्होंने दावा किया कि इस सैन्य गतिविधि के कारण क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित हो रही है और शांति वार्ता पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। जयराम रमेश ने यह भी उल्लेख किया कि कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस कार्रवाई की आलोचना की गई है और वैश्विक स्तर पर चिंता व्यक्त की जा रही है।

    अपने बयान में जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र और वैश्विक शक्ति को इन घटनाओं पर स्पष्ट और संतुलित प्रतिक्रिया देनी चाहिए, खासकर तब जब ये घटनाएं सीधे वैश्विक ऊर्जा बाजार और क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर रही हों। उन्होंने कटाक्ष करते हुए यह भी कहा कि विदेश नीति में स्पष्टता की कमी सवाल खड़े करती है।

    कांग्रेस का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति श्रृंखला की अनिश्चितता भारत की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल सकती है। ऐसे में सरकार की सक्रिय कूटनीतिक भूमिका और स्पष्ट रुख आवश्यक माना जा रहा है।

    वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान आने वाले समय में विदेश नीति को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर सकते हैं। विपक्ष लगातार सरकार से अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अधिक पारदर्शिता और सक्रियता की मांग कर रहा है, जबकि सरकार का रुख अक्सर संतुलित और रणनीतिक कूटनीति पर आधारित माना जाता है।

    कुल मिलाकर यह मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीतिक संतुलन और भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका जैसे महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हुए हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है, जिससे विदेश नीति को लेकर बहस और गहराने की उम्मीद है।

  • चार घंटे चली मोदी सरकार की बड़ी बैठक: विकसित भारत 2047, रिफॉर्म्स और वैश्विक संकट पर गहन मंथन

    चार घंटे चली मोदी सरकार की बड़ी बैठक: विकसित भारत 2047, रिफॉर्म्स और वैश्विक संकट पर गहन मंथन

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित मंत्रिपरिषद की एक महत्वपूर्ण और विस्तृत बैठक में देश के भविष्य की दिशा को लेकर गहन विचार-विमर्श किया गया। करीब चार से साढ़े चार घंटे तक चली इस बैठक में ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य, प्रशासनिक सुधारों, आम नागरिकों के जीवन को सरल बनाने तथा वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों से निपटने की रणनीतियों पर विशेष जोर दिया गया। बैठक में प्रधानमंत्री के साथ सभी केंद्रीय मंत्री, स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री और अन्य राज्य मंत्री भी उपस्थित रहे, जिससे यह बैठक नीति निर्माण और समीक्षा के दृष्टिकोण से बेहद अहम मानी जा रही है।

    बैठक में 9 प्रमुख मंत्रालयों ने अपने-अपने कार्यों का विस्तृत प्रस्तुतीकरण दिया, जिसमें उनके कामकाज का रिपोर्ट कार्ड भी शामिल था। सबसे पहले वाणिज्य मंत्रालय ने अपनी प्रस्तुति दी, जिसके बाद पेट्रोलियम, गृह, वित्त और विदेश मंत्रालय सहित अन्य महत्वपूर्ण विभागों ने अपने-अपने क्षेत्र में किए गए सुधारों और उपलब्धियों को सामने रखा। सभी मंत्रालयों को पहले से निर्देश दिया गया था कि वे अपने कार्यों को चार प्रमुख श्रेणियों में विभाजित कर प्रस्तुत करें—कानूनी सुधार, नियामक बदलाव, नीतिगत परिवर्तन और कार्य प्रणाली में सुधार। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि इन सुधारों का सीधा असर आम जनता के जीवन पर किस प्रकार पड़ा है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैठक में स्पष्ट रूप से कहा कि सरकार का मुख्य लक्ष्य 2047 तक भारत को एक पूर्ण विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित करना है। उन्होंने मंत्रियों से अपील की कि वे अपने-अपने विभागों में ऐसे सुधारों को प्राथमिकता दें, जिनसे ‘ईज ऑफ लिविंग’ यानी नागरिकों के दैनिक जीवन को अधिक सरल और सुविधाजनक बनाया जा सके। इसके साथ ही ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को और मजबूत करने पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता पर बल दिया गया, ताकि आर्थिक विकास की गति को और तेज किया जा सके।

    बैठक में पश्चिम एशिया में चल रहे संकट और उसके वैश्विक प्रभावों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। विशेष रूप से ऊर्जा आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर इसके संभावित प्रभावों का आकलन किया गया। प्रधानमंत्री ने मंत्रियों को निर्देश दिया कि इस स्थिति के मद्देनज़र ऐसे कदम उठाए जाएं जिससे आम नागरिकों पर इसका न्यूनतम प्रभाव पड़े। ऊर्जा, कृषि, उर्वरक, विमानन, शिपिंग और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों को विशेष रूप से संवेदनशील मानते हुए उन पर सतत निगरानी रखने पर जोर दिया गया।

    बैठक के दौरान यह भी स्पष्ट संकेत दिया गया कि सरकार आने वाले वर्षों में नीति निर्माण और क्रियान्वयन के स्तर पर बड़े सुधारों की दिशा में आगे बढ़ेगी। तकनीक आधारित प्रशासन, पारदर्शिता और तेज निर्णय प्रक्रिया को प्राथमिकता देने की बात दोहराई गई। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक कल्याण, सुशासन और नागरिक संतुष्टि भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

    इस बैठक को सरकार के तीसरे कार्यकाल की शुरुआत में एक महत्वपूर्ण समीक्षा और दिशा निर्धारण कदम के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें भविष्य की नीतियों और प्राथमिकताओं की स्पष्ट रूपरेखा उभरकर सामने आई है।

  • पीएम मोदी की उच्चस्तरीय मंत्रिपरिषद बैठक शुरू, पश्चिम एशिया संकट और कैबिनेट फेरबदल पर नजर

    पीएम मोदी की उच्चस्तरीय मंत्रिपरिषद बैठक शुरू, पश्चिम एशिया संकट और कैबिनेट फेरबदल पर नजर



    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री Narendra Modi की अध्यक्षता में दिल्ली के सेवा तीर्थ में मंत्रिपरिषद की अहम बैठक शुरू हो गई है। यह इस साल की पहली बड़ी कैबिनेट बैठक मानी जा रही है, जो ऐसे समय पर हो रही है जब पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक आर्थिक हालात को लेकर चिंता बढ़ी हुई है।

    सूत्रों के अनुसार, इस उच्चस्तरीय बैठक में सभी कैबिनेट मंत्री, स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री और अन्य राज्य मंत्री शामिल हुए हैं। सरकार ने पहले ही सभी मंत्रियों को राष्ट्रीय राजधानी में मौजूद रहने के निर्देश दिए थे। बैठक शाम 5 बजे शुरू हुई और इसमें शासन के प्रदर्शन, नीतियों के क्रियान्वयन और विभिन्न मंत्रालयों के कामकाज की समीक्षा की जा रही है।

    किन मुद्दों पर चर्चा संभव
    बैठक में सरकार की प्रमुख योजनाओं की प्रगति, उनके प्रभाव और जनता तक पहुंच को लेकर विस्तृत समीक्षा होने की संभावना है। साथ ही विभिन्न मंत्रालयों के प्रदर्शन और अब तक लिए गए नीतिगत फैसलों के नतीजों पर भी चर्चा की जा रही है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा वैश्विक हालात खासकर तेल कीमतों और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों पर भी सरकार की नजर बनी हुई है। इसी वजह से आर्थिक स्थिरता और ईंधन आपूर्ति जैसे मुद्दे बैठक के एजेंडे में शामिल बताए जा रहे हैं।

    विदेश यात्रा के बाद अहम बैठक
    यह बैठक ऐसे समय पर हो रही है जब प्रधानमंत्री हाल ही में अपनी पांच देशों की कूटनीतिक यात्रा पूरी कर लौटे हैं। इस दौरे में उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली की यात्रा की। इस यात्रा का उद्देश्य ऊर्जा सहयोग, तकनीकी साझेदारी और वैश्विक आर्थिक रिश्तों को मजबूत करना बताया गया है।

  • ब्रिक्स बैठक में पश्चिम एशिया पर फूटा मतभेद, संयुक्त बयान अटका; 63 बिंदुओं का अलग दस्तावेज जारी

    ब्रिक्स बैठक में पश्चिम एशिया पर फूटा मतभेद, संयुक्त बयान अटका; 63 बिंदुओं का अलग दस्तावेज जारी



    नई दिल्ली। भारत की अध्यक्षता में हुई ब्रिक्स (BRICS) विदेश मंत्रियों की बैठक में पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को लेकर गंभीर मतभेद सामने आए, जिसके चलते इस बार कोई संयुक्त बयान जारी नहीं किया जा सका। बैठक में ईरान, इजरायल और अमेरिका से जुड़े मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच अलग-अलग राय देखने को मिली, जिससे साझा सहमति बनाना मुश्किल हो गया। इसके बाद अध्यक्ष की ओर से एक विस्तृत बयान जारी किया गया, जिसमें 63 बिंदुओं के जरिए सभी देशों के विचारों को शामिल किया गया।

    सूत्रों के अनुसार, बैठक में ईरान ने मांग रखी थी कि इजरायल और अमेरिका द्वारा किए गए हमलों की निंदा ब्रिक्स मंच से की जाए, लेकिन इस पर सभी सदस्य देश सहमत नहीं हो सके। कुछ देशों ने कहा कि किसी एक पक्ष को सीधे तौर पर निशाना बनाना कूटनीतिक संतुलन के खिलाफ होगा, जबकि अन्य देशों ने क्षेत्रीय तनाव को देखते हुए सख्त रुख अपनाने की वकालत की।

    इसी असहमति के कारण संयुक्त बयान पर सहमति नहीं बन सकी। बाद में जारी अध्यक्षीय बयान में कहा गया कि पश्चिम एशिया की स्थिति पर सदस्य देशों के विचार अलग-अलग हैं, लेकिन सभी देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि संकट का समाधान संवाद और कूटनीति के जरिए ही संभव है। बयान में अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान पर भी जोर दिया गया।

    बयान में यह भी कहा गया कि ब्रिक्स देशों ने एकतरफा प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय कानून के विपरीत दंडात्मक उपायों की आलोचना की है। साथ ही मानवीय संकटों से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। बैठक में फलस्तीन के मुद्दे पर भी चर्चा हुई, जिसमें 1967 की सीमाओं के आधार पर स्वतंत्र फलस्तीन राज्य के समर्थन की बात दोहराई गई।

    इस तरह पश्चिम एशिया के संवेदनशील मुद्दों पर अलग-अलग दृष्टिकोण के कारण ब्रिक्स बैठक में एकजुटता की कमी दिखी, हालांकि संवाद और शांति की आवश्यकता पर सभी देशों ने सहमति व्यक्त की।

  • ईरान-यूएई तनाव और होर्मुज संकट के बीच अबू धाबी में पीएम मोदी की अहम कूटनीति, ऊर्जा-रक्षा साझेदारी पर बड़ा फोकस

    ईरान-यूएई तनाव और होर्मुज संकट के बीच अबू धाबी में पीएम मोदी की अहम कूटनीति, ऊर्जा-रक्षा साझेदारी पर बड़ा फोकस



    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने खाड़ी दौरे के पहले चरण में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) पहुंचे, जहां अबू धाबी एयरपोर्ट पर राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। पीएम मोदी और यूएई राष्ट्रपति के बीच द्विपक्षीय वार्ता में ऊर्जा सुरक्षा, निवेश, व्यापार और रक्षा सहयोग को मजबूत करने पर विस्तृत चर्चा हुई।

    यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया में ईरान-यूएई तनाव, समुद्री मार्गों में अनिश्चितता और होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की चिंता बढ़ी हुई है। भारत के लिए यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद अहम है, क्योंकि उसकी बड़ी ऊर्जा जरूरतें खाड़ी देशों पर निर्भर हैं।

    दोनों देशों के बीच बातचीत में एलपीजी सप्लाई, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण, शिपिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। साथ ही रक्षा और समुद्री सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करने पर भी जोर दिया गया।

    सूत्रों के मुताबिक, यूएई की ओर से भारत में बड़े निवेश प्रस्तावों और ऊर्जा साझेदारी को विस्तार देने पर भी चर्चा हुई है, जिससे दोनों देशों के आर्थिक संबंध और गहरे होने की उम्मीद है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की ‘वेस्ट एशिया स्ट्रैटेजी’ का अहम हिस्सा है। होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव के बीच भारत को ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन दोनों को साथ लेकर चलना होगा।

    रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों के अनुसार, भारत के लिए चुनौती यह है कि वह UAE, ईरान और सऊदी अरब जैसे प्रमुख देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखे, क्योंकि यह पूरा क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा और व्यापार का केंद्र है।

  • पश्चिम एशिया संकट पर ईरान का पलटवार, अमेरिका-इजराइल को बताया जिम्‍मेदार, ट्रंप की सख्‍ती से बढ़ा तनाव

    पश्चिम एशिया संकट पर ईरान का पलटवार, अमेरिका-इजराइल को बताया जिम्‍मेदार, ट्रंप की सख्‍ती से बढ़ा तनाव

    वॉशिंगटन । पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। कई देशों में जरूरी वस्तुओं की सप्लाई पर असर पड़ा है। इस बीच ईरान ने इन हालात के लिए खुद को जिम्मेदार मानने से इनकार करते हुए अमेरिका और इजराइल पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
    पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। कई देशों में जरूरी वस्तुओं की सप्लाई पर असर पड़ा है। इस बीच ईरान ने इन हालात के लिए खुद को जिम्मेदार मानने से इनकार करते हुए अमेरिका और इजराइल पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

    ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि भारत समेत कई देशों में पैदा हुई मौजूदा स्थिति के लिए ईरान नहीं, बल्कि अमेरिका और इजराइल जिम्मेदार हैं। उन्होंने दावा किया कि यह संघर्ष ईरान पर थोपा गया है और देश इससे खुश नहीं है।

    “हमने नहीं शुरू की यह जंग”
    एक साक्षात्कार में बघाई ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अमेरिका और इजराइल की भूमिका की जवाबदेही तय करनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि इन देशों की कार्रवाई से ही मौजूदा हालात पैदा हुए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से प्रभावित देशों के सवाल पर उन्होंने कहा कि पहले यह समुद्री मार्ग पूरी तरह सुरक्षित था और हर देश के लिए खुला था।

    होर्मुज पर ईरान का दावा
    बघाई ने यह भी कहा कि ईरान ने जो भी कदम उठाए हैं, वे अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में हैं। उनका कहना है कि अमेरिका और इजराइल ने खाड़ी क्षेत्र के देशों की जमीन का इस्तेमाल ईरान पर हमलों के लिए किया, जिसके जवाब में ईरान को कार्रवाई करनी पड़ी। ईरान का कहना है कि वह खुद भी इस जलमार्ग पर निर्भर है, इसलिए उसकी प्राथमिकता इसकी सुरक्षा है।

    अमेरिका की सख्त नीति
    दूसरी ओर अमेरिका ने ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव और बढ़ा दिया है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने वैश्विक बैंकों को ईरानी मनी लॉन्ड्रिंग और तेल नेटवर्क पर कड़ी निगरानी रखने के निर्देश दिए हैं। अमेरिका का आरोप है कि ईरान शेल कंपनियों और क्रिप्टो नेटवर्क के जरिए प्रतिबंधित तेल का व्यापार कर रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ संघर्ष विराम “कमजोर स्थिति” में पहुंच चुका है और उन्होंने तेहरान के शांति प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है।

    तेल कारोबार पर सख्ती
    अमेरिकी प्रशासन ने बैंकों से संदिग्ध कंपनियों की पहचान करने को कहा है, खासकर उन फर्मों पर नजर रखने के लिए जो अचानक बड़े वित्तीय लेनदेन कर रही हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2024 में ईरान से जुड़ी कंपनियों ने करीब 4 अरब डॉलर का तेल कारोबार किया है। अब अमेरिका इराक, यूएई और ओमान जैसे देशों पर भी दबाव बना रहा है ताकि ईरान की आर्थिक गतिविधियों पर रोक लगाई जा सके।

  • पश्चिम एशिया संकट के बीच 15 मई को यूरोप और यूएई के टूर पर जाएंगे PM मोदी, इन मुद्दों पर रहेगा फोकस

    पश्चिम एशिया संकट के बीच 15 मई को यूरोप और यूएई के टूर पर जाएंगे PM मोदी, इन मुद्दों पर रहेगा फोकस


    नई दिल्ली।
    ईरान और अमेरिका (Iran and America) में तनाव के बीच दुनियाभर में पैदा हुए ऊर्जा संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) 15 से 20 मई तक यूरोप और यूएई की यात्रा पर जाने वाले हैं। जानकारी के मुताबिक इस यात्रा के दौरन वह ऊर्जा सहयोग और व्यापार को बढ़ाने को लेकर कई समझौते कर सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) यूएई (UAE) और इटली (Italy) में रुकेंगे। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी , नीदरलैंड, स्वीडन और नॉर्वे का भी दौरा करेंगे। वह 15 मई को सबसे पहले यूएई पहुचेंगे और राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात करेंगे।


    किन मुद्दों पर होगा फोकस

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी इस यात्रा के दौरान ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर वैश्विक नेताओं से चर्चा करेंगे। इसके अलावा यूरोप के देशों के साथ सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक साझेदारी को बढ़ाने पर भी चर्चा होगी। जानकारी के मुताबिक यात्रा के दौरान सभी देशों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ाने पर भी चर्चा की जाएगी।


    यूएई के बाद की यात्रा

    बता दें कि यूएई भारत का बड़ा एनर्जी पार्टनर है। इसके अलावा भी निवेश के मामले में वह भारत का सातवां सबसे बड़ा स्रोत है। यहां 45 लाख से ज्यादा भारतीय भी रहते हैं। यूएई के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नीदरलैंड पहुंचेंगे और पीएम रॉब जेटेन से मुलकात करेंगे। वह 17 मई तक नीदरलैंड की आधिकारिक यात्रा पर रहेंगे। इसके बाद वह स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टनर्स के न्योते पर 17 से 18 मई तक के लिए स्वीडन के गोथेनबर्ग पहुंचेंगे। चौथे चरण में प्रधानमंत्री नॉर्वे पहुंचेंगे और भारत-नॉर्डिक शिखऱ सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। वर्ष 1983 के बाद यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की नॉर्वे की पहली यात्रा होगी।

    इस मुद्दे को लेकर हो सकती है अहम बात
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नीदरलैंड दूसरी बार जा रहे हैं। यहां वह पीएम विलियम- अलेक्जेंडर और रानी मैक्सिमा से मिलेंगे। पीएम मोदी इस यात्रा के दौरान रक्षा, ग्रीन हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर और नवाचार के मामलों को आगे बढ़ाने के लिए चर्चा करेंगे। यात्रा के अंतिम चरण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इटली जाएंगे और यहां प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी से मुलाकात करेंगे।

    विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा रक्षा, सुरक्षा, नवाचार, हरित हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर और जल पर रणनीतिक साझेदारी सहित विभिन्न क्षेत्रों में उच्च स्तरीय बैठकों और घनिष्ठ सहयोग की गति को और मजबूत करेगी। मंत्रालय ने कहा कि उनकी यह यात्रा बहुआयामी साझेदारी को और गहरा और विस्तारित करने का अवसर प्रदान करेगी। अपनी वार्ता में दोनों पक्ष हरित परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), उभरती प्रौद्योगिकियों, स्टार्टअप, सुदृढ़ आपूर्ति श्रृंखलाओं, रक्षा, अंतरिक्ष, लोगों का लोगों से संबंध और जलवायु परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करेंगे।

  • West Asia Crisis: युद्धविराम के बावजूद भड़का तनाव, लेबनान में इस्राइल का बड़ा एक्शन; ईरान-अमेरिका आमने-सामने

    West Asia Crisis: युद्धविराम के बावजूद भड़का तनाव, लेबनान में इस्राइल का बड़ा एक्शन; ईरान-अमेरिका आमने-सामने



    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में युद्धविराम लागू होने के बावजूद हालात लगातार विस्फोटक बने हुए हैं। दक्षिणी लेबनान में इस्राइल ने सैन्य कार्रवाई तेज कर दी है, जबकि होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिका और ईरान के बीच सीधा टकराव और गहरा गया है। पूरे क्षेत्र में एक बार फिर बड़े संघर्ष का खतरा मंडराने लगा है।

    लेबनान के गांव को खाली करने का आदेश
    इस्राइली सेना ने दक्षिणी लेबनान के अल-अब्बासियाह गांव के लोगों को तत्काल इलाका खाली करने का आदेश दिया है। इस्राइल के अरबी भाषा के प्रवक्ता अविचाई अद्राई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट जारी कर लोगों से गांव छोड़कर कम से कम 1000 मीटर दूर खुले इलाकों में जाने को कहा।

    युद्धविराम के बावजूद दक्षिण लेबनान में इस्राइली हवाई हमले और सैन्य गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। हिजबुल्लाह और इस्राइली सेना के बीच रुक-रुक कर झड़पें भी जारी हैं, जिससे स्थानीय लोगों में डर और पलायन का माहौल बना हुआ है।

    दक्षिण लेबनान में हवाई हमला, 11 लोगों की मौत
    अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, इस्राइल ने नबातियेह जिले के दुएर, हारौफ और हब्बौश कस्बों पर हवाई हमले किए। इन हमलों में 11 लोगों की मौत हो गई, जिनमें दो बच्चे भी शामिल हैं। वहीं 36 लोग घायल बताए जा रहे हैं।

    होर्मुज स्ट्रेट में अमेरिका-ईरान आमने-सामने
    उधर, होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ गया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने दावा किया है कि ईरान ने अमेरिकी युद्धपोतों पर मिसाइल और ड्रोन से हमला किया, लेकिन अमेरिकी सेना ने सभी हमलों को नाकाम कर दिया।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका के तीन बड़े युद्धपोत सुरक्षित हैं और जवाबी कार्रवाई में ईरानी हमलावरों को भारी नुकसान पहुंचाया गया है। ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि ईरान ने जल्द समझौता नहीं किया तो अमेरिका और कड़ी कार्रवाई करेगा।

    ईरान ने अमेरिका पर लगाए गंभीर आरोप
    ईरान ने अमेरिका पर युद्धविराम उल्लंघन और तेल टैंकरों पर हमला करने का आरोप लगाया है। ईरानी सेना के अनुसार, अमेरिका ने होर्मुज जलमार्ग और फुजैराह के पास जहाजों को निशाना बनाया, जिसके जवाब में ईरान ने अमेरिकी सैन्य जहाजों पर जवाबी हमला किया। ईरान ने दावा किया कि उसकी जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी जहाजों को भारी नुकसान पहुंचा है। साथ ही तेहरान ने साफ कहा कि किसी भी हमले का “बिना हिचकिचाहट करारा जवाब” दिया जाएगा।

    खाड़ी क्षेत्र से 5 भारतीयों की सुरक्षित वापसी
    इस बीच लेबनान स्थित भारतीय दूतावास ने खाड़ी क्षेत्र में फंसे पांच भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाल लिया है। दूतावास ने लेबनानी प्रशासन के सहयोग के लिए आभार जताया है।पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते हालात के बीच दुनिया की नजर अब अमेरिका, ईरान और इस्राइल की अगली चाल पर टिकी हुई है।

  • पश्चिम एशिया संकट पर बोले राजनाथ सिंह- हर स्थिति से निपटने की तैयारी जरूरी…. सतर्क रहे भारत

    पश्चिम एशिया संकट पर बोले राजनाथ सिंह- हर स्थिति से निपटने की तैयारी जरूरी…. सतर्क रहे भारत


    नई दिल्ली।
    रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (Defence Minister Rajnath Singh) ने शनिवार को पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी संघर्ष को अस्थिर बताते हुए कहा कि इससे हालात अचानक बिगड़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत को किसी भी परिस्थिति के लिए पूरी तरह तैयार रहना चाहिए। राजनाथ सिंह ने यह टिप्पणी पश्चिम एशिया की स्थिति की निगरानी के लिए गठित मंत्रियों के अनौपचारिक समूह (आईजीओएम) की उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता करते हुए की। बैठक में विदेश मंत्री एस जयशंकर, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी, रसायन एवं उर्वरक मंत्री जेपी नड्डा, उपभोक्ता मामले के मंत्री प्रह्लाद जोशी, नागरिक उड्डयन मंत्री राममोहन नायडू, पोत परिवहन मंत्री सर्बानंद सोनोवाल और ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल शामिल हुए।


    राजनाथ सिंह ने मैरिटाइम इंश्योरेंस पूल की तारीफ की

    रक्षा मंत्रालय के अनुसार, राजनाथ सिंह ने कहा कि ‘जमीनी स्थिति अनिश्चित और अस्थिर है और भारत को किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए।’ सोशल मीडिया पोस्ट में सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार जोखिमों को कम करने के लिए तेजी और प्रभावी ढंग से कदम उठा रही है। उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा ‘भारत मैरिटाइम इंश्योरेंस पूल’ के गठन को मंजूरी दिए जाने का भी उल्लेख किया, जिसे 12,980 करोड़ रुपये की गारंटी के साथ स्थापित किया जाएगा। इसका उद्देश्य अस्थिर समुद्री मार्गों के बीच भी भारतीय व्यापार के लिए निरंतर और सस्ती बीमा सुविधा सुनिश्चित करना है।

    रक्षा मंत्री ने कहा, यह अहम फैसला भारत के समुद्री व्यापार को सस्ती और निरंतर बीमा कवरेज देगा, जिससे आयात-निर्यात संचालन की सुरक्षा और स्थिरता मजबूत होगी। यह देश के व्यापार तंत्र को और मजबूत, सुरक्षित और लचीला बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।’ बैठक में बताया गया कि वैश्विक आपूर्ति में झटकों के बावजूद भारत ने ईंधन का पर्याप्त भंडार बनाए रखा है और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने की कोशिशें जारी हैं।


    भारत के पास ईंधन का पर्याप्त स्टॉक

    वर्तमान में भारत के पास कच्चे तेल, पेट्रोल, डीजल और एटीएफ (एविएशन टर्बाइन फ्यूल) का 60 दिनों से अधिक का स्टॉक है। वहीं एलएनजी का करीब 50 दिन और एलपीजी का लगभग 40 दिन का भंडार उपलब्ध है, जिसमें घरेलू उत्पादन का भी योगदान है। सरकार ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम करने के लिए आयात स्रोतों में विविधता हासिल की है और अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तथा लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों से कच्चा तेल, एलएनजी और एलपीजी की आपूर्ति सुनिश्चित की है। अप्रैल और मई 2026 के लिए आयात की जरूरतें काफी हद तक सुरक्षित कर ली गई हैं, जिससे आपूर्ति में निरंतरता बनी रहेगी।