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  • पश्चिम के संपन्न देशों में भविष्य को लेकर पहले से ज्यादा डरे हुए हैं लोग, जानें इसकी वजह….

    पश्चिम के संपन्न देशों में भविष्य को लेकर पहले से ज्यादा डरे हुए हैं लोग, जानें इसकी वजह….


    लंदन/न्यूयॉर्क।
    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artifical Intelligence) से नौकरियों पर खतरा, जलवायु परिवर्तन, युद्ध की आहट और गहराता आर्थिक ध्रुवीकरण (Economic polarization)…। पश्चिमी दुनिया (Western world- अमेरिका और यूरोप) के संपन्न देशों में हर हफ्ते सामने आने वाले ओपिनियन पोल्स एक ही बात दोहरा रहे हैं, लोग भविष्य को लेकर पहले कभी इतने ज्यादा आशंकित और डरे हुए नहीं थे।

    2026 में सामने आए एक सर्वे में 5 में से 2 अमेरिकी नागरिकों (40%) ने आशंका जताई कि 2276 में अपनी स्थापना के 500 साल पूरे होने तक अमेरिका शायद एक देश के तौर पर बचेगा ही नहीं। अधिकांश लोगों का मानना है कि 2050 तक उनका देश कमजोर, आर्थिक रूप से पिछड़ा और राजनीतिक तौर पर और बंटा हुआ होगा। ब्रिटेन और फ्रांस जैसे अमीर देश संकटग्रस्त मुल्कों के साथ कतार में खड़े हैं। लेकिन इसके उलट, 55 देशों में किए गए यूनिसेफ और ग्लोबल सर्वे के आंकड़े बिल्कुल विपरीत तस्वीर पेश करते हैं।

    इंडोनेशिया, कीनिया, सऊदी अरब और कोलंबिया जैसे मध्यम आय वाले देशों के नागरिक अपने कल को लेकर पश्चिमी रईसों के मुकाबले कई गुना ज्यादा आशावादी हैं। साइंस जर्नल ‘नेचर’ में प्रकाशित शोध के अनुसार, भविष्य को लेकर उम्मीद इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आज आपके पास कितनी दौलत हैं, बल्कि यह इस बात पर टिकी है कि आप किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।


    उम्र का 55वां साल : जहां से शुरू होता है निराशावाद का चक्र

    55 साल की उम्र पार करते ही निराशावादी सोच रखने वाले लोग बहुसंख्यक हो जाते हैं।
    पश्चिमी देशों की बूढ़ी आबादी : ब्रिटेन (31%), अमेरिका (30%), फ्रांस (34%) और जर्मनी (38%) में 55 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की आबादी सबसे ज्यादा है। यही वजह है कि ये देश सबसे ज्यादा निराशावादी हैं। बुल्गारिया, बोस्निया, ऑस्ट्रिया और बेल्जियम दुनिया के सबसे कम उम्मीद वाले देशों में शीर्ष पर हैं।

    युवा देशों में भारी उत्साह : इसके विपरीत, युवा आबादी वाले देशों में भविष्य को लेकर जबर्दस्त सकारात्मकता है। कीनिया (सिर्फ 7.5% आबादी 55+), सीरिया (11%), सऊदी अरब (13%) और दक्षिण अफ्रीका (12%) दुनिया के सबसे ज्यादा आशावादी देशों में शामिल हैं।


    लोकतांत्रिक देशों में निराशावाद ज्यादा क्यों?

    हैरानी की बात यह है कि नागरिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की आजादी और अवसरों की समानता के बावजूद लोकतांत्रिक देशों में अधिनायकवादी देशों की तुलना में भविष्य को लेकर निराशा ज्यादा दर्ज की जाती है। इसकी तीन मुख्य वजहें हैं:

    चुनावी वादों का भारी दबाव : लोकतंत्र में नेता हर चुनाव में जिंदगी बेहतर बनाने के बड़े-बड़े वादे करते हैं। जब वास्तविक जीवन में वे वादे पूरे नहीं होते, तो नागरिकों में गहरा असंतोष पैदा होता है।

    स्वतंत्र मीडिया का फोकस : स्वतंत्र प्रेस लगातार व्यवस्था की खामियों, घोटालों और समस्याओं को उजागर करती है, जिससे जनता के बीच लगातार नकारात्मकता का माहौल बना रहता है।

    कम संपन्न में आगे बढ़ने की संभावनाएं ज्यादा : आप जितने कम संपन्न होते हैं, आपके ऊपर उठने की उम्मीद उतनी ही ज्यादा होती हैं। आशावाद इस बात से तय नहीं होता कि आज आपके पास क्या है, बल्कि इससे तय होता है कि आप भविष्य में किस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं। लोग अपने निजी जीवन को लेकर आमतौर पर आश्वस्त रहते हैं, लेकिन पूरे देश या समाज के भविष्य को लेकर भारी चिंता जताते हैं।