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  • व्हाइट हाउस मीडिया बैन पर कोर्ट में सुनवाई, जज बोले- संस्थानों को पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं मिला

    व्हाइट हाउस मीडिया बैन पर कोर्ट में सुनवाई, जज बोले- संस्थानों को पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं मिला


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से CNN, MS NOW और Politico को व्हाइट हाउस से बैन किए जाने का मामला अब अदालत पहुंच गया है। सुनवाई के दौरान अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट जज टिमोथी केली ने प्रशासन के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि मीडिया संस्थानों को बैन से पहले अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।

    जज केली ने फिलहाल इस मामले में कोई तत्काल आदेश जारी नहीं किया है। उन्होंने कहा कि वह जल्द फैसला सुनाएंगे। तीनों मीडिया संस्थानों ने अदालत से मांग की है कि उनकी व्हाइट हाउस प्रेस एक्सेस अंतिम कानूनी निर्णय आने तक तुरंत बहाल की जाए।

    जज ने पुराने अदालती फैसलों का किया उल्लेख

    सुनवाई के दौरान जज टिमोथी केली ने अमेरिकी कोर्ट ऑफ अपील्स के दो पुराने फैसलों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इन फैसलों के मुताबिक व्हाइट हाउस की प्रेस एक्सेस वापस लेने से पहले पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को उचित प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।

    केली ने यह भी कहा कि भले ही सरकार इन पुराने अदालती फैसलों को गलत मानती हो, लेकिन डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज के तौर पर उन्हें फिलहाल इन्हीं कानूनी मिसालों का पालन करना होगा।

    उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि यदि मीडिया बैन पहले ही लागू कर दिया गया था, तो उसके बाद भेजे गए पत्र किस तरह संबंधित संस्थानों को पहले से नोटिस देने और अपना जवाब रखने का अवसर प्रदान कर सकते हैं।

    ट्रंप प्रशासन ने सुरक्षा को बनाया आधार

    ट्रंप प्रशासन की ओर से अदालत में दलील दी गई कि व्हाइट हाउस में मीडिया की पहुंच कोई कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि एक सुविधा है। सरकार का कहना है कि राष्ट्रपति को सुरक्षा और प्रशासनिक कारणों से मीडिया संस्थानों की पहुंच सीमित करने का अधिकार है।

    सरकारी वकील ने यह भी दावा किया कि तीनों मीडिया संस्थानों की कुछ रिपोर्टों से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े हुए थे। प्रशासन ने अपनी दलील के समर्थन में मिसाइल भंडार, व्हाइट हाउस में बन रहे बॉलरूम और रिपब्लिकन पार्टी के मिडटर्म कन्वेंशन से जुड़ी रिपोर्टों का हवाला दिया।

    मीडिया संस्थानों ने फर्स्ट अमेंडमेंट का दिया हवाला

    CNN, MS NOW और Politico ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर किया है। तीनों संस्थानों का कहना है कि व्हाइट हाउस का बैन अमेरिकी संविधान के फर्स्ट अमेंडमेंट में दिए गए प्रेस और अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के साथ-साथ उचित कानूनी प्रक्रिया के अधिकार का उल्लंघन करता है।

    मीडिया संस्थानों ने आरोप लगाया है कि ट्रंप प्रशासन ने उन रिपोर्टों के चलते कार्रवाई की, जो राष्ट्रपति को पसंद नहीं थीं।

    यह विवाद ट्रंप और अमेरिकी मीडिया के बीच लंबे समय से चले आ रहे टकराव के बीच सामने आया है। बैन के बाद कई बड़े अमेरिकी टीवी नेटवर्क ने इसके विरोध में व्हाइट हाउस की साझा वीडियो कवरेज रोकने का कदम भी उठाया था।

    2018 के जिम एकोस्टा मामले की भी चर्चा

    मौजूदा विवाद की तुलना 2018 में CNN के पत्रकार जिम एकोस्टा से जुड़े मामले से भी की जा रही है। उस समय भी जज टिमोथी केली ने व्हाइट हाउस को एकोस्टा का प्रेस पास बहाल करने का आदेश दिया था। अदालत ने उस मामले में माना था कि प्रेस पास वापस लेने से पहले उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।

    अब एक बार फिर व्हाइट हाउस और मीडिया से जुड़े मामले की सुनवाई जज केली के सामने है। फिलहाल अदालत ने CNN, MS NOW और Politico पर लगाया गया बैन हटाने का आदेश नहीं दिया है। मामले में जज केली के अगले फैसले का इंतजार है।

  • ट्रंप का मास्टरप्लान! सऊदी परमाणु समझौते के बदले इजरायल से दोस्ती की शर्त, मध्य पूर्व की राजनीति में हलचल

    ट्रंप का मास्टरप्लान! सऊदी परमाणु समझौते के बदले इजरायल से दोस्ती की शर्त, मध्य पूर्व की राजनीति में हलचल


    नई दिल्ली। अमेरिका ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि सऊदी अरब के साथ प्रस्तावित नागरिक परमाणु समझौता केवल ऊर्जा सहयोग तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसके साथ इजरायल के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने की बड़ी कूटनीतिक शर्त भी जुड़ी हुई है। व्हाइट हाउस ने संकेत दिए हैं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्य पूर्व नीति का सबसे अहम उद्देश्य सऊदी अरब को अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल कराना और इजरायल के साथ उसके संबंधों को औपचारिक रूप से सामान्य बनाना है। इस बयान ने एक बार फिर पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीतिक तस्वीर को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।

    व्हाइट हाउस के डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ स्टीफन मिलर ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने सऊदी नेतृत्व के सामने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि इजरायल के साथ संबंध सामान्य करना उनकी प्राथमिक अपेक्षाओं में शामिल है। उन्होंने कहा कि यह केवल वर्तमान कार्यकाल की नीति नहीं बल्कि लंबे समय से ट्रंप प्रशासन की रणनीतिक सोच का हिस्सा रही है। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि परमाणु समझौता पहले होगा या इजरायल से रिश्तों का सामान्यीकरण लेकिन इतना जरूर कहा कि दोनों मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

    मिलर ने ट्रंप की सऊदी अरब के साथ वर्षों पुरानी कूटनीतिक भागीदारी का जिक्र करते हुए कहा कि 2017 में रियाद में दिए गए ऐतिहासिक भाषण के बाद से ही अमेरिका ने सऊदी अरब को क्षेत्रीय स्थिरता का मजबूत साझेदार बनाने की दिशा में लगातार काम किया है। उनके अनुसार राष्ट्रपति ट्रंप सऊदी नेतृत्व की रणनीतिक सोच और भविष्य की योजनाओं को अच्छी तरह समझते हैं और उन्हें भरोसा है कि आने वाले समय में यह साझेदारी मध्य पूर्व में ऐतिहासिक बदलाव का कारण बनेगी।

    व्हाइट हाउस का मानना है कि यदि सऊदी अरब इजरायल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित करता है तो इससे पूरे क्षेत्र में स्थिरता बढ़ेगी और अब्राहम अकॉर्ड्स को नई मजबूती मिलेगी। ट्रंप के पहले कार्यकाल में संयुक्त अरब अमीरात बहरीन मोरक्को और सूडान ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे। अब अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि सऊदी अरब भी इस पहल का हिस्सा बने क्योंकि उसे क्षेत्र का सबसे प्रभावशाली अरब देश माना जाता है।

    इस दौरान स्टीफन मिलर ने निकारागुआ की राजनीति पर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने आरोप लगाया कि वहां की सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है और समाजवादी शासन चुनावी प्रक्रिया का उपयोग सत्ता हासिल करने के बाद राजनीतिक स्वतंत्रताओं को सीमित करने के लिए करता है। उन्होंने कहा कि विदेश मंत्री मार्को रुबियो पहले ही इस मुद्दे पर अमेरिकी नीति स्पष्ट कर चुके हैं।

    मिलर ने यह भी दावा किया कि ट्रंप प्रशासन की व्यापक रणनीति पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका के प्रभाव को मजबूत करने और सहयोगी देशों के साथ रिश्तों को नई दिशा देने पर केंद्रित है। उनके अनुसार कई देशों की सरकारें अमेरिका की सुरक्षा और समृद्धि आधारित नीति के साथ खड़ी हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब के साथ नागरिक परमाणु समझौते और इजरायल से संबंध सामान्य करने की अमेरिकी कोशिशें आने वाले समय में मध्य पूर्व की राजनीति को नई दिशा दे सकती हैं। यदि यह पहल सफल होती है तो क्षेत्रीय कूटनीति में एक और बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

  • पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप अच्छे मित्र, दोनों की सोच और कार्यशैली में समानता: अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर

    पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप अच्छे मित्र, दोनों की सोच और कार्यशैली में समानता: अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर


    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच लगातार मजबूत होते रणनीतिक संबंधों के बीच भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मित्रता को दोनों देशों की साझेदारी की सबसे मजबूत आधारशिला बताया है। उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं के बीच वर्षों पुराना भरोसा और व्यक्तिगत तालमेल ही द्विपक्षीय रिश्तों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

    व्हाइट हाउस में दिए गए एक विशेष साक्षात्कार में सर्जियो गोर ने भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर चल रही किसी भी तरह की नकारात्मक अटकलों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के संबंध बेहद मजबूत स्थिति में हैं और इस मजबूती का सबसे बड़ा कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच गहरी मित्रता है। उनके अनुसार दोनों नेता लंबे समय से एक-दूसरे के अच्छे मित्र हैं और यह रिश्ता आने वाले समय में भी इसी तरह मजबूत बना रहेगा।

    गोर ने कहा कि दोनों नेताओं के बीच नियमित संवाद और सीधे संपर्क ने व्यापार, रक्षा, सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सकारात्मक प्रगति सुनिश्चित की है। उन्होंने बताया कि भारत आने के बाद से उनका उद्देश्य भी दोनों देशों के बीच लगातार संवाद बनाए रखना और ऐसे अवसर तलाशना रहा है जो दोनों पक्षों के लिए समान रूप से लाभदायक हों।

    उन्होंने हाल ही में फ्रांस में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाकात का भी उल्लेख किया। गोर स्वयं उस बैठक में मौजूद थे। उनके अनुसार यह बैठक एक घंटे से अधिक समय तक चली और बेहद सौहार्दपूर्ण माहौल में व्यापार, रक्षा, प्रौद्योगिकी तथा कई अन्य द्विपक्षीय विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। उन्होंने इसे अत्यंत सार्थक और सकारात्मक बैठक बताया।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली की सराहना करते हुए सर्जियो गोर ने कहा कि वे अत्यंत ऊर्जावान, सक्रिय और परिणाम देने वाले नेता हैं। उन्होंने कहा कि कई मामलों में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की कार्यशैली काफी मिलती-जुलती है। दोनों स्वयं हर महत्वपूर्ण विषय पर सक्रिय रहते हैं, तेज निर्णय लेने में विश्वास रखते हैं और काम को परिणाम तक पहुंचाने पर विशेष जोर देते हैं।

    गोर के अनुसार यदि प्रधानमंत्री मोदी किसी कार्य को पूरा करना चाहते हैं तो वे तुरंत उस दिशा में आगे बढ़ते हैं और राष्ट्रपति ट्रंप भी इसी तरह काम करना पसंद करते हैं। उनका मानना है कि यही समान सोच दोनों नेताओं के बीच मजबूत विश्वास और मित्रता का आधार बनी हुई है।

    राष्ट्रपति ट्रंप के भारत के प्रति दृष्टिकोण पर बोलते हुए गोर ने कहा कि ट्रंप आज भी भारत और प्रधानमंत्री मोदी के प्रति बेहद सकारात्मक सोच रखते हैं। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप अक्सर अपनी पहली भारत यात्रा को याद करते हैं और भारत की ऊर्जा, संस्कृति तथा यहां के लोगों की गर्मजोशी की चर्चा करते हैं। उनके अनुसार भारत यात्रा का अनुभव ट्रंप के लिए बेहद खास रहा है।

    सर्जियो गोर ने यह भी खुलासा किया कि हाल ही में ओवल ऑफिस में हुई मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने उनसे स्वयं पूछा कि वे भारत कब जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से निमंत्रण मिलने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप भारत आने को लेकर बेहद उत्साहित हैं और भविष्य में इस यात्रा को लेकर सकारात्मक माहौल बना हुआ है।

    भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ वर्षों में व्यापार, रक्षा, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी, हिंद-प्रशांत क्षेत्र, आर्थिक सहयोग, सुरक्षा और उभरती तकनीकों जैसे क्षेत्रों में साझेदारी लगातार मजबूत हुई है। दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच नियमित संवाद और आपसी विश्वास को ही इस रणनीतिक रिश्ते की सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा है।

  • व्हाइट हाउस के बाहर फायरिंग से दहशत: 21 वर्षीय नासीर बेस्ट ढेर, खुद को ‘जीसस क्राइस्ट’ बताने का दावा

    व्हाइट हाउस के बाहर फायरिंग से दहशत: 21 वर्षीय नासीर बेस्ट ढेर, खुद को ‘जीसस क्राइस्ट’ बताने का दावा

    नई दिल्ली। अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में स्थित व्हाइट हाउस के बाहर शनिवार शाम उस समय दहशत फैल गई जब एक युवक ने सुरक्षा चेकपॉइंट के पास अचानक फायरिंग शुरू कर दी। अमेरिकी सीक्रेट सर्विस ने तुरंत जवाबी कार्रवाई करते हुए हमलावर को मार गिराया। इस घटना में एक राहगीर भी घायल हुआ है, जबकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सुरक्षित रहे।

    सीक्रेट सर्विस के अनुसार, यह घटना 17वीं स्ट्रीट और पेंसिल्वेनिया एवेन्यू के पास हुई, जहां 21 वर्षीय नासीर बेस्ट नामक युवक ने अपने बैग से हथियार निकालकर गोलीबारी शुरू कर दी। सुरक्षा बलों ने तत्काल प्रतिक्रिया देते हुए उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन उसने फायरिंग जारी रखी, जिसके बाद उसे जवाबी कार्रवाई में गोली लगी और अस्पताल ले जाते समय उसकी मौत हो गई।

    अधिकारियों ने बताया कि घटना के दौरान कोई भी सुरक्षा एजेंट घायल नहीं हुआ। हालांकि, एक राहगीर को गोली लगी है, जिसकी स्थिति को लेकर अभी स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है। मामले की जांच जारी है और अतिरिक्त विवरण जुटाए जा रहे हैं।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, मारा गया युवक मैरीलैंड का रहने वाला था और उसका नाम नासीर बेस्ट था। वह पहले भी सुरक्षा एजेंसियों की नजर में था और कई बार व्हाइट हाउस के आसपास संदिग्ध गतिविधियों में शामिल पाया गया था। कोर्ट रिकॉर्ड्स के मुताबिक, उसे पहले भी हिरासत में लिया गया था जब उसने वाहनों की एंट्री में बाधा डाली थी और प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश किया था।

    जानकारी के अनुसार, 26 जून 2025 को उसे व्हाइट हाउस के पास ट्रैफिक में बाधा डालने के आरोप में पकड़ा गया था, जबकि 10 जुलाई को वह चेतावनी के बावजूद प्रतिबंधित इलाके में घुस गया था। पूछताछ के दौरान उसने खुद को “जीसस क्राइस्ट” बताया और कथित तौर पर गिरफ्तारी की इच्छा जताई थी।

    सीक्रेट सर्विस का कहना है कि वह व्यक्ति मानसिक रूप से अस्थिर प्रतीत हो रहा था और लंबे समय से व्हाइट हाउस के आसपास संदिग्ध गतिविधियों में शामिल था। फिलहाल सुरक्षा एजेंसियां यह जांच कर रही हैं कि वह हथियार लेकर इतने संवेदनशील क्षेत्र तक कैसे पहुंचा।

    इस घटना ने व्हाइट हाउस की सुरक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं, हालांकि अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति की सुरक्षा में कोई चूक नहीं हुई और स्थिति को तुरंत नियंत्रित कर लिया गया।

  • ईरान युद्ध सवाल पर ट्रम्प पत्रकार पर भड़के, रिपोर्टिंग को बताया ‘देशद्रोह’, कहा- सच नहीं लिखते

    ईरान युद्ध सवाल पर ट्रम्प पत्रकार पर भड़के, रिपोर्टिंग को बताया ‘देशद्रोह’, कहा- सच नहीं लिखते


    नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ईरान युद्ध से जुड़े एक सवाल पर उस समय भड़क उठे जब एक पत्रकार ने सैन्य अभियान और राजनीतिक लक्ष्यों को लेकर सवाल पूछा। ट्रम्प ने पत्रकार को झूठा बताते हुए उसकी रिपोर्टिंग को देशद्रोह जैसा करार दिया और कहा कि वह सच नहीं लिखते तथा उनके एडिटर जो कहते हैं, वही वह लिखते हैं।

    ट्रम्प ने दावा किया कि अमेरिका ने ईरान में पूरी तरह सैन्य जीत हासिल कर ली है और यह बात सभी मानते हैं। उन्होंने पत्रकार से नाराजगी जताते हुए कहा कि ऐसे लोग देश के खिलाफ काम कर रहे हैं और उन्हें अपनी रिपोर्टिंग पर शर्म आनी चाहिए।

    दरअसल यह सवाल एक पत्रकार डेविड सेंगर ने पूछा था, जिसमें उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका ने सैन्य जीत हासिल कर ली है तो फिर राजनीतिक लक्ष्य पूरे क्यों नहीं हुए और संघर्ष अभी भी क्यों जारी है। इसी सवाल के बाद ट्रम्प ने तीखी प्रतिक्रिया दी।

    इस बीच ईरान संघर्ष को लेकर वैश्विक स्तर पर भी कई बड़े अपडेट सामने आए हैं। ट्रम्प और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बातचीत में माना गया कि युद्ध को खत्म करने की जरूरत है और होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखा जाना चाहिए। हालांकि चीन की भूमिका को लेकर कोई ठोस संकेत नहीं मिले हैं।

    वहीं ब्रिक्स देशों की बैठक में भी ईरान मुद्दे पर सहमति नहीं बन सकी और सदस्य देशों के अलग-अलग रुख सामने आए। भारत में हुई बैठक के बाद जारी बयान में कहा गया कि इस मुद्दे पर देशों की सोच अलग-अलग है।

    अमेरिकी ऊर्जा मंत्री ने दावा किया है कि चीन अमेरिका से तेल खरीद बढ़ा सकता है, जबकि चीन ने कहा है कि समाधान केवल बातचीत और कूटनीति से ही संभव है। जर्मनी ने भी ईरान से तुरंत बातचीत शुरू करने और परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने की मांग की है।

  • ईरान-अमेरिका तनाव: कैरोलिन लेविट को बधाई के साथ ‘मीनाब स्कूल’ हमले का जिक्र, कूटनीतिक बयानबाजी तेज

    ईरान-अमेरिका तनाव: कैरोलिन लेविट को बधाई के साथ ‘मीनाब स्कूल’ हमले का जिक्र, कूटनीतिक बयानबाजी तेज



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच पहले से जारी तनाव के बीच एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है। ईरान ने व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट को उनकी बेटी के जन्म पर बधाई दी, लेकिन उसी संदेश में “मीनाब स्कूल हमले” का उल्लेख कर अमेरिका पर तीखा राजनीतिक वार भी किया।

    बधाई के साथ तीखा संदेश
    आर्मेनिया स्थित ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए कहा, 

    बच्चे मासूम होते हैं और उनकी भावनाएं सार्वभौमिक हैं

    लेविट को अपनी खुशी के साथ उन मांओं का दर्द भी याद रखना चाहिए जिन्होंने संघर्ष में अपने बच्चे खोए

    मीनाब स्कूल में मारे गए बच्चों को भी उतना ही मासूम बताया गया।ईरान ने अपने संदेश में यह भी संकेत दिया कि इस तरह की घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    क्या है मीनाब स्कूल हमला मामला?
    ईरान का दावा है कि 28 फरवरी को मीनाब क्षेत्र के एक स्कूल पर हुए हमले में भारी जनहानि हुई थी।ईरान के अनुसार: करीब 168 लोगों की मौत। 

    मृतकों में बच्चे, शिक्षक और आम नागरिक शामिल

    ईरान ने इस घटना के लिए अमेरिका और इजरायल को जिम्मेदार बताया

    हालांकि, इस घटना को लेकर अलग-अलग देशों और रिपोर्ट्स में भिन्न दावे सामने आते रहे हैं और आधिकारिक पुष्टि को लेकर मतभेद हैं।



    अमेरिका का रुख
    अमेरिकी पक्ष ने शुरुआती प्रतिक्रिया में कहा था कि,अमेरिका नागरिकों को जानबूझकर निशाना नहीं बनाता। घटना संभवतः तकनीकी चूक या मिसफायर का परिणाम हो सकती हैमामले की अलग-अलग जांच रिपोर्ट सामने आई हैं। 

    ट्रंप के बयानों से बढ़ा विवाद
    इस मामले में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान भी सुर्खियों में रहे! उन्होंने बिना प्रमाण ईरान को जिम्मेदार ठहराया थाबाद में दावा किया कि ईरान के पास ऐसी मिसाइल क्षमता है, जिसे विशेषज्ञों ने गलत बताया।बाद में जब रिपोर्ट पर सवाल हुआ तो उन्होंने अनभिज्ञता जताई


    कूटनीति से ज्यादा संदेश की राजनीति
    विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम केवल शिष्टाचार संदेश नहीं, बल्कि 

    अमेरिका पर नैतिक दबाव बनाने की कोशिश

    मानवीय संवेदनाओं के जरिए वैश्विक विमर्श प्रभावित करने का प्रयास

    पहले से तनावपूर्ण रिश्तों में नई तल्खी जोड़ने वाला कदम

    कैरोलिन लेविट को दी गई बधाई के साथ मीनाब स्कूल हमले का जिक्र एक बार फिर अमेरिका-ईरान संबंधों की जटिलता को सामने लाता है। जहां यह संदेश मानवीय भावनाओं से जुड़ा प्रतीत होता है, वहीं इसके पीछे कूटनीतिक और राजनीतिक संदेश भी साफ तौर पर देखा जा रहा है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव और गहराने की आशंका बनी हुई है।

  • ट्रंप बोले पागलों के हाथ में परमाणु हथियार नहीं ; ईरान युद्ध अभी लंबा खिंच सकता है

    ट्रंप बोले पागलों के हाथ में परमाणु हथियार नहीं ; ईरान युद्ध अभी लंबा खिंच सकता है


    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध अब और लंबा चल सकता है। वॉशिंगटन स्थित व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि दुनिया पागलों के नियंत्रण में परमाणु हथियार नहीं रहने दे सकती। ट्रंप ने बताया कि अमेरिका ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई करके यह सुनिश्चित किया कि यह देश कभी परमाणु खतरा न बने।

    28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़रायल ने मिलकर ईरान पर सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। ट्रंप ने बताया कि बिना इस कार्रवाई के ईरान पहले ही परमाणु ताकत बन चुका होता। उन्होंने कहा कि उस समय ईरान परमाणु हथियार हासिल करने से सिर्फ दो हफ्ते दूर था और कूटनीतिक बातचीत काम नहीं आती।

    राष्ट्रपति ने कहा युद्ध बहुत अच्छे से आगे बढ़ रहा है। हम बहुत बढ़िया काम कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने स्पष्ट नहीं किया कि यह संघर्ष कब तक चलेगा। ट्रंप ने यह भी बताया कि अमेरिका भविष्य में लौट सकता है लेकिन अब तक मकसद यह सुनिश्चित करना था कि किसी और राष्ट्रपति को ऐसी परेशानी न झेलनी पड़े।

    इस बीच ट्रंप प्रशासन को अंदरूनी झटका भी लगा है। नेशनल काउंटरटेररिज्म सेंटर के प्रमुख जोसेफ केंट ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई के विरोध में इस्तीफा दे दिया। केंट ने सोशल मीडिया पर अपने त्याग पत्र में लिखा कि अमेरिका पर ईरान की ओर से कोई आसन्न खतरा नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि यह युद्ध इज़रायल और उसके प्रभावशाली लॉबी समूहों के दबाव में शुरू किया गया। केंट ने साफ शब्दों में कहा कि वह अपनी अंतरात्मा के खिलाफ इस युद्ध का समर्थन नहीं कर सकते।

    इस इस्तीफे के समय ऑपरेशन एपिक फ्यूरी अपने तीसरे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और क्षेत्रीय तनाव लगातार बढ़ रहा है। इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि ईरान संकट न केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बल्कि अमेरिकी प्रशासन के अंदर भी गंभीर बहस का विषय बन गया है।

  • ईरान संघर्ष के बीच ट्रंप ने टाली चीन यात्रा, बोले युद्ध ज्यादा लंबा नहीं चलेगा

    ईरान संघर्ष के बीच ट्रंप ने टाली चीन यात्रा, बोले युद्ध ज्यादा लंबा नहीं चलेगा


    वॉशिंगटन। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी सैन्य तनाव के बीच अपनी चीन यात्रा फिलहाल टाल दी है। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात को देखते हुए उनका व्हाइट हाउस में रहना जरूरी है और यही कारण है कि उन्होंने बीजिंग दौरे को करीब एक महीने के लिए स्थगित करने का अनुरोध किया है।

    ट्रंप की यह यात्रा 28 मार्च से 1 अप्रैल के बीच प्रस्तावित थी लेकिन अब नई तारीखों की घोषणा नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि वे चीन जाने के इच्छुक हैं और दोनों देशों के रिश्ते अच्छे हैं लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में अमेरिका में रहना प्राथमिकता है।

    ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ईरान के साथ जारी संघर्ष पर भी बयान दिया। उन्होंने कहा कि यह युद्ध जल्द खत्म हो सकता है और यह ज्यादा लंबा नहीं चलेगा। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह जरूरी नहीं कि युद्ध इसी सप्ताह समाप्त हो जाए।

    ट्रंप ने अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि यह कदम वैश्विक सुरक्षा के हित में उठाया गया है। उनके अनुसार यदि यह कार्रवाई नहीं की जाती तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते थे। उन्होंने दावा किया कि इस संघर्ष के बाद ईरान की सैन्य क्षमता काफी कमजोर हो गई है जिसमें उसकी नौसेना वायुसेना और एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से युद्ध से बचना चाहते थे लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें यह फैसला लेने के लिए मजबूर किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह कदम केवल अमेरिका के लिए नहीं बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए उठाया गया है।

    शेयर बाजार पर संभावित असर को लेकर ट्रंप ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि बाजार में ज्यादा गिरावट देखने को मिलेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनके मुताबिक अगर थोड़े समय के लिए असर पड़ता भी है तो यह बहुत छोटी कीमत है।

    जब उनसे भविष्य की सैन्य रणनीति या जमीनी सेना भेजने की संभावना पर सवाल किया गया तो उन्होंने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। कुल मिलाकर ईरान के साथ जारी तनाव के बीच ट्रंप का यह फैसला वैश्विक कूटनीति और सुरक्षा पर गहरा असर डाल सकता है जबकि दुनिया की नजर अब इस संघर्ष के संभावित अंत पर टिकी हुई है।

  • ईरान युद्ध खत्म करने की घोषणा क्यों नहीं कर पा रहे ट्रंप? व्हाइट हाउस में मतभेद, फैसले पर बढ़ा दबाव

    ईरान युद्ध खत्म करने की घोषणा क्यों नहीं कर पा रहे ट्रंप? व्हाइट हाउस में मतभेद, फैसले पर बढ़ा दबाव

    वॉशिंगटन। ईरान के साथ जारी युद्ध को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump के सामने बड़ी राजनीतिक और रणनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। व्हाइट हाउस के भीतर ही इस बात को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है कि युद्ध को कब और किस तरह खत्म घोषित किया जाए।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रशासन के भीतर कुछ अधिकारी मानते हैं कि संघर्ष लंबा खिंचने से वैश्विक तेल कीमतों में उछाल आ सकता है, जिसका असर अमेरिका की घरेलू राजनीति पर भी पड़ेगा। वहीं दूसरी ओर कुछ सख्त रुख वाले नेता ईरान पर सैन्य दबाव जारी रखने के पक्ष में हैं।

    तेल की कीमतों को लेकर चिंता

    अमेरिकी ट्रेजरी विभाग और नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल के अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि युद्ध के कारण पेट्रोल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो अमेरिका में इस अभियान के लिए जनसमर्थन कम हो सकता है।
    हालांकि कुछ रिपब्लिकन नेता और रणनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अमेरिका को ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से हर हाल में रोकना होगा और अमेरिकी सैनिकों या जहाजों पर हमले का कड़ा जवाब देना चाहिए।

    लंबी जंग से बचना चाहते हैं कई रणनीतिकार

    ट्रंप के कुछ करीबी सलाहकार और समर्थक यह भी चाहते हैं कि अमेरिका मध्यपूर्व में लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में न फंसे। वे चाहते हैं कि मौजूदा संघर्ष को सीमित रखा जाए और जल्द कोई रास्ता निकाला जाए।

    ईरान की सरकार गिरने की संभावना कम

    अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का मानना है कि फिलहाल ईरान की मौजूदा सरकार के जल्द गिरने की संभावना कम है। इसी कारण ट्रंप प्रशासन ने हाल के दिनों में तेहरान की सरकार को हटाने की बात भी कम कर दी है।

    युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे ट्रंप

    सूत्रों के अनुसार ट्रंप प्रशासन अब इस संघर्ष से निकलने का रास्ता खोज रहा है। युद्ध शुरू होने के समय इसके कई लक्ष्य बताए गए थे—जैसे ईरान के हमलों को रोकना, उसके परमाणु कार्यक्रम को कमजोर करना और उसकी सैन्य क्षमता को सीमित करना।

    युद्ध रोकना भी आसान नहीं

    विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध शुरू करने के बाद उसे खत्म करना भी उतना ही मुश्किल होता है। अगर अमेरिका अचानक जीत का ऐलान कर सैन्य कार्रवाई रोक देता है और सैनिकों की वापसी शुरू कर देता है, तो अल्पकाल में वैश्विक बाजार शांत हो सकते हैं।
    लेकिन यदि ईरान की धार्मिक सरकार सत्ता में बनी रहती है और उसके पास परमाणु सामग्री, मिसाइल और ड्रोन मौजूद रहते हैं, तो इससे क्षेत्रीय सुरक्षा पर नए खतरे पैदा हो सकते हैं।

    ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा असर

    ईरान के पास अभी भी कई कम दूरी की मिसाइलें, ड्रोन और समुद्री बारूदी सुरंगें हैं। इनके जरिए वह तेल और गैस की आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है, खासकर Strait of Hormuz के रास्ते। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है।

    होर्मुज को खोलना भी चुनौती

    सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह सुरक्षित करना हो तो ईरान के तटीय इलाकों में जमीनी सैन्य कार्रवाई करनी पड़ सकती है। ऐसा कदम युद्ध को और व्यापक बना सकता है और अमेरिकी सैनिकों के लिए बड़ा जोखिम पैदा कर सकता है।

    इसी वजह से विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप के लिए युद्ध शुरू करना जितना आसान था, उसे खत्म करना उतना ही कठिन साबित हो रहा है।

  • भारत ने दुनिया में तेल की कीमतें स्थिर रखने में अमेरिका के लिए निभाई अहम भूमिका: राजदूत सर्जियो गोर

    भारत ने दुनिया में तेल की कीमतें स्थिर रखने में अमेरिका के लिए निभाई अहम भूमिका: राजदूत सर्जियो गोर


    नई दिल्ली । अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर ने हाल ही में भारत की वैश्विक ऊर्जा बाजार में भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया में तेल की कीमतें स्थिर रखने में अमेरिका का बहुत बड़ा साथी रहा है। गोर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यह बात साझा करते हुए विशेष रूप से भारत की रूस से लगातार तेल खरीद को वैश्विक ऊर्जा स्थिरता के लिए जरूरी बताया।

    राजदूत गोर ने लिखा भारत तेल के सबसे बड़े कंज्यूमर और रिफाइनर में से एक है। अमेरिका और भारत के लिए मार्केट में स्थिरता लाने के लिए मिलकर काम करना बेहद जरूरी है। उनके अनुसार भारत की नीति न केवल घरेलू स्तर पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर भी गहरा असर डालती है।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक तेल बाजार में ईरान संकट के चलते भारी अस्थिरता देखी जा रही है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में संभावित बंदी की वजह से तेल आपूर्ति पर खतरा मंडरा रहा है और कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में भारत की सक्रिय भूमिका और रूस से तेल खरीद की नीति को अमेरिका ने विशेष महत्व दिया है।

    व्हाइट हाउस ने पहले ही प्रेस बयान में कहा था कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए तत्कालीन छूट दी थी। प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला राष्ट्रपति ट्रेजरी विभाग और नेशनल सिक्योरिटी टीम के संयुक्त विचार-विमर्श के बाद लिया गया। लेविट के अनुसार भारत में हमारे सहयोगी अच्छे रहे हैं और वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिरता बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया।

    उन्होंने बताया कि ईरान संकट के कारण दुनिया भर में तेल सप्लाई में पैदा हुए अस्थायी अंतर को कम करने के मकसद से यह तत्कालीन उपाय किया गया। छूट मिलने से पहले ही भारत को शिपमेंट भेज दिए गए थे। व्हाइट हाउस का मानना है कि इस व्यवस्था से मास्को को आर्थिक रूप से कोई खास लाभ नहीं होगा।

    विश्लेषकों का कहना है कि भारत का यह कदम न केवल घरेलू ऊर्जा जरूरतों को पूरा करता है बल्कि वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता लाने में भी मददगार साबित होता है। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल कंज्यूमर और रिफाइनर है। ऐसे में देश की नीति और तेल खरीद की रणनीति वैश्विक स्तर पर भावनाओं और कीमतों को प्रभावित करती है।

    इस पूरे परिप्रेक्ष्य में अमेरिका और भारत के बीच ऊर्जा सहयोग की नई चुनौतियों और अवसरों का संकेत मिलता है। वैश्विक तेल बाजार की अस्थिरता और ईरान-संबंधी संकट के बीच भारत की भूमिका और रणनीतिक महत्व बढ़ गया है। राजदूत गोर के बयान से यह भी साफ होता है कि अमेरिका भारत को एक भरोसेमंद और सक्रिय साझेदार के रूप में देखता है जो अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा स्थिरता में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।